राज्य

ममता का दावा झूठा, जीत के बाद तृणमूल ने भी फैलाई थी हिंसा

डॉ. अशोक सिंह06 मई 20263 मिनट पठन37 बार पढ़ा गया
"चुनाव के बाद राजनीतिक हिंसा या अशांति का माहौल पैदा नहीं होना चाहिए। यदि इसका उपयोग सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश के लिए किया जाता है, तो हम राजनीतिक दलों और प्रशासन से उसे रोकने का आह्वान करते हैं।" सीपीआई(एम) के राज्य सचिव ने माँग की कि राज्य में कानून का शासन कड़ाई से बनाए रखना होगा।

ममता का दावा झूठा, जीत के बाद तृणमूल ने भी फैलाई थी हिंसा

"जब हम जीते थे, तब हमने कहा था कि किसी पर अत्याचार नहीं होना चाहिए। हमने सीपीएम के किसी भी पार्टी कार्यालय को हाथ नहीं लगाया। अत्याचार नहीं किया," मंगलवार को एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान तृणमूल नेत्री ममता बनर्जी ने यह दावा किया। ममता बनर्जी के इस बयान के तुरंत बाद वामपंथी हलकों ने याद दिलाया कि तृणमूल नेत्री ने पूरी तरह से असत्य बात कही है। 2011 के चुनाव के बाद ही नहीं, बल्कि बार-बार सीपीआई(एम) कार्यकर्ताओं पर हमले हुए हैं और उनके कार्यालयों को तोड़ा या कब्जा किया गया है—ठीक वैसे ही जैसे त्रिपुरा में भाजपा नियमित रूप से कर रही है।

चुनाव के बाद एक बयान में मोहम्मद सलीम ने कहा, "चुनाव के बाद राजनीतिक हिंसा या अशांति का माहौल पैदा नहीं होना चाहिए। यदि इसका उपयोग सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश के लिए किया जाता है, तो हम राजनीतिक दलों और प्रशासन से उसे रोकने का आह्वान करते हैं।" सीपीआई(एम) के राज्य सचिव ने माँग की कि राज्य में कानून का शासन कड़ाई से बनाए रखना होगा।

लेकिन आज तृणमूल नेत्री के दावे के संदर्भ में विभिन्न पक्षों ने याद दिलाया कि तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनने के पहले तीन महीनों में ही सीपीआई(एम) के 30 नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई थी।

चुनाव परिणाम निकलने के 24 घंटे के भीतर, प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक और सीपीआई(एम) की गड़बेता जोनल कमेटी के सदस्य जितेन नंदी (57) की गोली मारकर नहीं, बल्कि पीट-पीटकर नृशंस हत्या कर दी गई थी। उनका घर बेनाचपड़ा ग्राम पंचायत क्षेत्र के नेड़ाशोल गांव में था। उन्होंने तृणमूल की धमकियों के आगे घुटने नहीं टेके थे और परिणाम घोषित होने के अगले दिन सुबह भी वह कुछ पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ मायता स्थित पार्टी कार्यालय आए थे। ग्वालतोड़ और गड़बेता इलाके के कई हथियारबंद बदमाशों के साथ तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने अचानक उस पार्टी कार्यालय पर हमला कर दिया। वे जितेन नंदी को पार्टी कार्यालय से बाहर खींच लाए और पीटते हुए ले गए। उन्हें पीट-पीटकर मार डाला गया और उनका शव पार्टी कार्यालय से कुछ दूर एक नहर के पास फेंक दिया गया। इसके अलावा, उसी दिन बर्धमान के रायना में सीपीआई(एम) समर्थक पूर्णिमा घड़ुई की लोहे की रॉड से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी।

पहले तीन महीनों में जिन 30 वामपंथी कार्यकर्ताओं और नेताओं की हत्या हुई, उनमें से 10 अल्पसंख्यक, 3 आदिवासी और 11 अनुसूचित जाति से थे। इनमें तीन महिलाएं भी शामिल थीं। मरने वालों में खेतिहर मजदूर और गरीब किसान भी थे।

लेखक पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज के संस्थापक महासचिव

अपलोडर: VKA-ENGEAL

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पश्चिम बंगाल का राजनीतिक आकाश आज दो ध्रुवों — टीएमसी और भाजपा — के बीच आपसी वोट लाभ के लिए कुटिल योजना से फँसा दिया गया है। SIR , दबंगता, झूठ और पैसे के दम पर लोकतंत्र के अपहरण की पूरी तैयारी है। एक तरफ है राज्य सत्ता की मशीनरी, परिवारवाद और भ्रष्टाचार की संस्कृति। दूसरी तरफ है केंद्र का SIR अटैक, सांप्रदायिक विभाजन, संस्थाओं पर नियंत्रण और विकास के नाम पर ध्रुवीकरण की राजनीति। दोनों ही दल पूंजीवादी-नवउदारवादी मॉडल पर टिके हुए हैं, जो आर्थिक असमानता को बढ़ावा देते हैं, पर्यावरण की उपेक्षा करते हैं और केवल मुनाफे को प्राथमिकता देते हैं। इन नीतियों के कारण किसान, मजदूर, छात्र, युवा और महिलाओं सहित आम नागरिकों की आवाज दब रही है, उनकी चिंताएं उपेक्षित हो रही हैं और उनके हितों को नुकसान पहुंच रहा है। लेकिन लेफ्ट फ्रंट न तो केवल टीएमसी का विकल्प है और न ही केवल भाजपा का। यह उससे कहीं ज्यादा हैं। लेफ्ट फ्रंट एक स्वतंत्र वैचारिक शक्ति है जो न सत्ता की लूट को बढ़ावा देती है और न ही धर्म के नाम पर समाज को बाँटती है। टीएमसी और भाजपा के भ्रष्टाचार तथा सांप्रदायिक कोलाहल से पूरी तरह अलग, लेफ्ट फ्रंट तीसरा रास्ता प्रस्तुत कर रहा है — लोकतंत्र, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित एक प्रगतिशील भविष्य का रास्ता, जिसका नाम है “लेफ्ट फॉर फ्यूचर”।

केशव कुमार भट्टड़13 अप्रैल 2026