दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार
छीन रही राज्य सरकार
ब्रिटिश उपनिवेशवाद की निरंतरता को बनाए रखने वाले और लगभग परित्यक्त हो चुके 1959 के नियम को आगे लाकर, भाजपा सरकार सरकारी कर्मचारियों के अभिव्यक्ति के अधिकार को छीनने पर उतर आई है।
बीते 19 मई को राज्य के मुख्य सचिव मनोज अग्रवाल द्वारा जारी एक सर्कुलर में राज्य सरकार ने 'वेस्ट बंगाल गवर्नमेंट सर्वेंट कंडक्ट रूल्स 1959' को नए सिरे से सामने लाया है। अब तक इस राज्य में यह नियम लगभग ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ था। सत्ता में आने के महज 10 दिनों के भीतर कर्मचारियों में खौफ का माहौल बनाने के लिए दिशा-निर्देशों में 1959 के नियम की धारा 23, 24, 25 और 33 का उल्लेख किया गया है। कर्मचारियों के पालन के लिए 1959 के नियम की जिन धाराओं का उल्लेख किया गया है, वे एक शब्द में कहें तो भयावह हैं। इस नियम में कर्मचारियों को अपने सहकर्मियों के साथ सरकारी काम को लेकर राय साझा करने तक का अधिकार नहीं दिया गया है। अपने विभाग के सहकर्मियों के अलावा दूसरे विभाग के कर्मचारियों के साथ अपने विभाग के कामकाज को लेकर चर्चा करने पर भी रोक लगा दी गई है।
सरकारी कर्मचारी आंदोलन के वरिष्ठ नेता असित भट्टाचार्य ने बताया, "1959 का यह नियम असल में पराधीन भारत की ब्रिटिश सरकार के 1904 के सर्विस कंडक्ट रूल्स से बना था। राज्य की नई सरकार तमाम पुराने नियम-कानूनों को सामने लाकर कर्मचारियों को बांधना चाहती है।"
ममता बनर्जी ने डीए की माँग को लेकर आंदोलन कर रहे कर्मचारियों को 'घेऊ घेउ' कहकर संबोधित किया था और अब सत्ता में आने के बाद राज्य सरकार इस परित्यक्त नियम को सामने लाकर कर्मचारियों के गले में कुत्ते की तरह पट्टा बाँधने पर उतर आई है। 1959 के इस दानवीय कानून के खिलाफ इस राज्य के सरकारी कर्मचारियों के कई संघर्षों की परंपरा रही है। आखिरकार, 1977 में वाम मोर्चा की सरकार बनने के बाद 1980 में इस राज्य के कर्मचारियों के लिए नया सर्विस रूल आया—'वेस्ट बंगाल सर्विस (ड्यूटीज, राइट्स एंड ऑब्लिगेशन ऑफ द गवर्नमेंट एम्प्लॉइज) रूल्स 1980'। वाम मोर्चा सरकार के कार्यकाल के इस नियम में कर्मचारियों को ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार दिया गया था। 1980 के नियम ने हड़ताल करने के अधिकार को भी सुनिश्चित किया था। वरिष्ठ कर्मचारियों ने याद दिलाया कि 24 मई 1980 को तत्कालीन एस्प्लेनेड ईस्ट में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने कहा था, "आपको (सरकारी कर्मचारियों को) 1959 के दानवीय कानून से मुक्ति दी गई। नए नियम में अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा होगी।"
मुख्य सचिव की ओर से जारी दिशा-निर्देश में 1980 के नियम की भी कई धाराओं का उल्लेख किया गया है। उन धाराओं के तहत राज्य के सरकारी कर्मचारियों के रेडियो, टेलीविजन पर जाने, पत्रकारों को प्रतिक्रिया देने से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने पर पाबंदी की बात कही गई है। साथ ही यह भी कहा गया है कि कर्मचारी किसी दैनिक, साप्ताहिक पत्रिका या विज्ञान संबंधी जर्नल में भी नहीं लिख सकते। कर्मचारियों का आरोप है कि यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन सरकार द्वारा अब अधिसूचना जारी कर इसे याद दिलाने के पीछे वे 'खतरे के बादल' देख रहे हैं।
मुख्य सचिव के सर्कुलर में आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) अधिकारियों को भी 1968 के 'ऑल इंडिया सर्विस रूल' की याद दिलाई गई है। मुख्य सचिव के सर्कुलर के एक दिन बाद राज्य के प्रशासनिक और कार्मिक विभाग के प्रधान सचिव ने एक और दिशा-निर्देश जारी किया। उन्होंने विभिन्न विभागों के अतिरिक्त मुख्य सचिवों, प्रधान सचिवों, डिविजनल कमिश्नरों, जिलाधिकारियों (DM), राज्य पुलिस के डीजी और कोलकाता के पुलिस कमिश्नर को मुख्य सचिव का सर्कुलर भेज दिया है। इस सर्कुलर में राज्य के खजाने से वेतन पाने वाले सभी श्रेणियों के कर्मचारियों को इस पाबंदी की प्रक्रिया में शामिल कर लिया गया है। अब तक 'वेस्ट बंगाल सर्विस रूल' केवल सरकारी कर्मचारियों पर ही लागू होता था। इस बार उस नियम को बदलते हुए सरकार राज्य के खजाने से वेतन पाने वाले सभी हिस्सों—शिक्षकों, प्रोफेसरों, पंचायत और नगर पालिका के कर्मचारियों को भी नियमों के दायरे में बाँधना चाहती है। हालांकि, पिछले बुधवार के बाद राज्य सरकार ने अपने पिछले दिशा-निर्देश में कुछ बदलाव किए, जिसमें ऑल इंडिया सर्विस (अखिल भारतीय सेवा) के अधिकारियों को इससे बाहर रखा गया है।
सरकार का यह दिशा-निर्देश सामने आने के बाद से सरकारी कर्मचारी वर्ग में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। सोशल मीडिया पर समाज के सभी वर्गों के लोग भाजपा सरकार के इस दिशा-निर्देश को लेकर गुस्सा जताने लगे हैं। सत्ता में आने के बाद भ्रष्टाचार, जबरन वसूली और सिंडिकेट को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' नीति के साथ काम शुरू करने का वादा करने वाली सरकार अचानक कर्मचारियों के पीछे क्यों हाथ धोकर पड़ गई है?
प्रशासन के एक शीर्ष अधिकारी ने याद दिलाया कि विपक्ष के नेता रहते हुए शुभेंदु अधिकारी अक्सर सरकारी गोपनीय दस्तावेज हाथ में लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस किया करते थे। यहाँ तक कि वे यह भी दावा करते थे कि सरकार की सारी जानकारी उनके पास आ जाती है। एक शीर्ष अधिकारी का कहना है, "राज्य के पूर्व मुख्य सचिव हरिकृष्ण द्विवेदी के मुख्य सचिव रहते हुए, उनके वेतन के बिल को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए विपक्ष के नेता ने बताया था कि कैसे सरकारी बंगले में रहने के बावजूद मुख्य सचिव ने किराए की एक बड़ी रकम का गबन किया है।"
विपक्ष के नेता से अब शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बन चुके हैं। नतीजतन, सरकारी जानकारी बाहर आने से रोकने के लिए भाजपा सरकार इन पुराने और परित्यक्त कानूनों के जरिए कर्मचारियों पर पाबंदी लगाना चाहती है।
साभार : गणशक्ति
