वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 | Tuesday, 13 October 2026
|
संपर्क: vaamkiaawaz@gmail.comसदस्यता में
वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
लाइव कवरेज
होमताज़ा खबरेंराज्य

वाम की आवाज़

जन समाचार मंच

राज्य

पश्चिम बंगाल में 'एनकाउंटर राज' की आहट ? बारूईपुर में गैर-न्यायिक कार्रवाई आरोपों के घेरे में।

केशव कुमार भट्टड़•09 जुलाई 20267 मिनट पठन43 बार पढ़ा गया

उत्तर प्रदेश का बदनाम ‘एनकाउंटर राज’ क्या अब पश्चिम बंगाल में भी पैर पसार रहा है? बारूईपुर के सूर्यपुर में एक नाबालिग बच्ची के साथ हुए जघन्य बलात्कार और हत्या के मामले में एक मुख्य आरोपी, प्रभास मंडल की पुलिस हिरासत में हुई 'मुठभेड़' (एनकाउंटर) ने राज्य की कानून-व्यवस्था और पुलिसिया कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा और गंभीर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर प्रभास मंडल जिंदा रहता तो क्या ऐसी कोई जानकारी सामने आ सकती थी, जो जाँच के दायरे को और बढ़ा देती? क्या यह सिर्फ बलात्कार और हत्या थी, या इसके पीछे कोई और बड़ा आपराधिक गिरोह था? अपहरण, तस्करी, स्थानीय बदमाशों का नेटवर्क या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की मिलीभगत—क्या ये संभावनाएँ जाँच में सामने आ रही थीं? पुलिस की ओर से इस संबंध में अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं मिला है।

पश्चिम बंगाल में 'एनकाउंटर राज' की आहट ? बारूईपुर में गैर-न्यायिक कार्रवाई आरोपों के घेरे में।

पश्चिम बंगाल में 'एनकाउंटर राज' की आहट ? बारूईपुर में गैर-न्यायिक कार्रवाई आरोपों के घेरे में।

जाँच के बीच में ही मुख्य आरोपी ढेर, एनकाउंटर को लेकर पुलिस पर उठ रहे गंभीर सवाल।


सुदीप्तो बसु ■ सूर्यपुर (दक्षिण 24 परगना , बारूईपुर ,पश्चिम बंगाल), 8 जुलाई।

उत्तर प्रदेश का बदनाम ‘एनकाउंटर राज’ क्या अब पश्चिम बंगाल में भी पैर पसार रहा है? बारूईपुर के सूर्यपुर में एक नाबालिग बच्ची के साथ हुए जघन्य बलात्कार और हत्या के मामले में एक मुख्य आरोपी, प्रभास मंडल की पुलिस हिरासत में हुई 'मुठभेड़' (एनकाउंटर) ने राज्य की कानून-व्यवस्था और पुलिसिया कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा और गंभीर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

हैरानी की बात यह है कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा बारूईपुर पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय का दौरा करने और कानून-व्यवस्था को लेकर कड़ा संदेश देने के महज 12 घंटे के भीतर ही इस सनसनीखेज घटना को अंजाम दे दिया गया। इस घटना के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और सचेत नागरिकों के बीच यह बहस तेज हो गई है कि क्या यह वाकई पुलिस द्वारा दावा की गई ‘आत्मरक्षार्थ (आत्मरक्षा में की गई) गोलीबारी’ थी, या फिर गैर-न्यायिक कार्रवाई के माध्यम से एक महत्वपूर्ण गवाह और सबूत को हमेशा के लिए खामोश कर दिया गया?

पुलिस की थ्योरी और आधिकारिक बयान

अदालत ने इस मामले के चार आरोपियों को 14 दिनों की पुलिस हिरासत में भेजा था और जाँच आगे बढ़ रही थी। जिला पुलिस के आधिकारिक दावे के अनुसार, मंगलवार रात करीब 11:30 बजे प्रभास मंडल को बारूईपुर थाने से घटनास्थल पर ले जाया गया था। वहाँ कैनिंग पुलिस सर्कल के प्रभारी रोनी सरकार, बारूईपुर थाने के पुलिस सर्कल प्रभारी तथा विशेष जाँच दल (SIT) के सदस्य अर्घ्य मंडल सहित कई पुलिस अधिकारी मौजूद थे। सूर्यपुर स्टेशन के पास रेलवे लाइन पार करके झाड़ियों और दलदली जमीन के बीच ले जाकर घटना का पुनर्निर्माण (क्राइम सीन रीक्रिएशन) किया जा रहा था।

पुलिस का कहना है कि रात करीब पौने एक बजे, जब पुलिस ने उसे एक डोभा (छोटे तालाब) के सामने घेर रखा था, तब आरोपी प्रभास ने अचानक रोनी सरकार की कमर से सर्विस रिवॉल्वर छीन ली और दलदली जमीन के रास्ते भागने की कोशिश की। भागते समय उसने पुलिस को निशाना बनाकर एक राउंड गोली चलाई। बदले में अपनी रक्षा के लिए बारूईपुर थाने के पीसी प्रभारी अर्घ्य मंडल ने सर्विस रिवॉल्वर से प्रभास पर जवाबी गोलीबारी की। प्रभास के शरीर में दो गोलियाँ लगीं—एक दाहिने सीने के थोड़े नीचे और दूसरी कमर के थोड़े ऊपर। इसके तुरंत बाद उसे बारूईपुर उप-मंडल (सब-डिवीजन) अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

चार आरोपी पहले से ही पुलिस की हिरासत में थे। अदालत ने 14 दिनों की पुलिस हिरासत की अनुमति दी थी। जाँच भी आगे बढ़ रही थी। ऐसे में एक मुख्य आरोपी की मौत जाँच को कहाँ ले जाएगी, इस पर वकील, मानवाधिकार कार्यकर्ता और जाँच पर्यवेक्षक सवाल उठा रहे हैं। अदालत के मुकदमे के बजाय पुलिस की गोली से आरोपी की मौत क्या व्यावहारिक रूप से गैर-न्यायिक गतिविधियों के आरोपों को सामने ले आई है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर प्रभास मंडल जिंदा रहता तो क्या ऐसी कोई जानकारी सामने आ सकती थी, जो जाँच के दायरे को और बढ़ा देती? क्या यह सिर्फ बलात्कार और हत्या थी, या इसके पीछे कोई और बड़ा आपराधिक गिरोह था? अपहरण, तस्करी, स्थानीय बदमाशों का नेटवर्क या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की मिलीभगत—क्या ये संभावनाएँ जाँच में सामने आ रही थीं? पुलिस की ओर से इस संबंध में अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं मिला है।

पुलिसिया दावों में विसंगतियाँ और उठते तीखे सवाल

इस आधिकारिक बयान को लेकर जनता और कानून के जानकारों के बीच गहरी असंगति और संदेह की स्थिति है। वकील, मानवाधिकार कार्यकर्ता और जाँच पर्यवेक्षक सवाल उठा रहे हैं :

* आधी रात को ही घटना का पुनर्निर्माण क्यों ? ऐसा क्या आपातकाल था कि सुरक्षा बलों को कस्टडी में मौजूद आरोपी को लेकर देर रात 11:30 बजे दलदली और झाड़ियों वाले इलाके में जाना पड़ा?

* सुरक्षा व्यवस्था में इतनी बड़ी चूक कैसे? देर रात, चारों तरफ से भारी संख्या में हथियारबंद पुलिस बल से घिरे होने के बावजूद, एक आरोपी आसानी से पुलिस अधिकारी का हथियार कैसे छीन सकता है?

* भागने की व्यावहारिक संभावना क्या थी? कीचड़ और पानी से भरे डोभा (छोटा तालाब) के बीच, पुलिस से घिरे होने पर आरोपी के बंदूक तानकर सुरक्षित भाग निकलने की क्या कोई वास्तविक गुंजाइश थी?

क्या किसी बड़े आपराधिक चक्र (गिरोह) को छुपाने की हुई कोशिश?

प्रभास मंडल का जीवित रहना इस पूरे आपराधिक नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए बेहद जरूरी था। वह इस मामले का एक बेहद महत्वपूर्ण आरोपी था, जिसके खिलाफ अतीत में भी छेड़छाड़ और आर्म्स एक्ट (हथियार कानून) के मामले दर्ज थे। घटना के दिन सीसीटीवी फुटेज (शाम 4:42 बजे पाठभवन स्कूल के सामने) और मोबाइल टावर लोकेशन से भी उसकी मौजूदगी के अकाट्य सबूत मिले थे।

जाँच सूत्रों से पता चला था कि प्रभास ने जान-पहचान का फायदा उठाकर नाबालिग को बहला-फुसलाकर शाम को रेलवे लाइन पार कराकर उस झाड़ी की ओट में पहुँचाया था। इसके बदले में उसे 10 हजार रुपये दिए जाने की बात प्रारंभिक जाँच में सामने आई थी।

बड़ा सवाल: क्या यह सिर्फ एक विकृत मानसिकता (हवस) का मामला था, या पैसों के बदले योजनाबद्ध तरीके से किया गया अपहरण? क्या इसके पीछे कोई और बड़ा आपराधिक गिरोह, तस्करी का नेटवर्क या स्थानीय रसूखदारों की मिलीभगत थी? प्रभास जीवित रहता तो अदालत में सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण गवाही, बयान या इस गिरोह के भीतर की जानकारी दे सकता था। लेकिन मुकदमे की प्रक्रिया से पहले ही उसे खो देने से जाँच की एक बड़ी संभावना व्यावहारिक रूप से समाप्त हो गई है।

जमीनी हकीकत: घटनास्थल को लेकर भी सवाल

बुधवार दोपहर जब रिमझिम बारिश और बादलों के बीच ग्राउंड जीरो पर पड़ताल की गई, तो सूर्यपुर स्टेशन से धपधपी स्टेशन की ओर रेलवे लाइन के सहारे दो सौ मीटर दूर वह एनकाउंटर स्थल दिखाई दिया। पूरा इलाका (डोभा और झाड़ी) पीले रिबन/टेप से घेर कर चिह्नित किया गया था। स्थानीय लोगों के मन में पुलिस की कहानी को लेकर कोई धुंधलापन नहीं है; वे स्पष्ट रूप से इसे 'एनकाउंटर' बता रहे हैं।

स्थानीय निवासियों का यह भी आरोप है कि जिस जगह पर इस जघन्य कृत्य को अंजाम दिया गया, वहाँ लंबे समय से बदमाशों का अड्डा जुटता था। यदि यह जानकारी पुलिस को पहले से थी, तो वह जगह नियमित निगरानी से बाहर क्यों थी?

न्याय प्रणाली की पराजय और गैर-न्यायिक हत्या के आरोप

एक लोकतांत्रिक और कानून के शासन वाले समाज में किसी भी आरोपी के दोष या बेगुनाही का निर्धारण करने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ अदालत की है। अदालत में ट्रायल शुरू होने से पहले ही पुलिस की गोली से आरोपी की मौत हो जाना न केवल मानवाधिकारों का हनन है, बल्कि न्याय प्रणाली की पारदर्शिता पर भी गंभीर धब्बा है।

नियम के मुताबिक इस मामले की न्यायिक जाँच (Judicial Inquiry) शुरू कर दी गई है। इस्तेमाल किए गए हथियार, गोलियों के खोखे, फॉरेंसिक नमूने और डॉक्टर का बयान इकट्ठा कर लिया गया है। लेकिन जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, यह मौलिक सवाल हमेशा बना रहेगा—महत्वपूर्ण आरोपी प्रभास मंडल की मौत वाकई एक अपरिहार्य इत्तेफाक थी, या जाँच के बीच में ही किसी 'बड़े मगरमच्छ' को बचाने के लिए एक महत्वपूर्ण आवाज को हमेशा के लिए दबा दिया गया?

स्रोत: बांग्ला दैनिक गणशक्ति। 9 जुलाई 2026

क्या यह लेख उपयोगी था?

टिप्पणियाँ

0

अपनी राय साझा करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...

पश्चिम बंगाल में 'एनकाउंटर राज' की आहट ? बारूईपुर में गैर-न्यायिक कार्रवाई आरोपों के घेरे में।

प्रकाशित: 09 जुलाई 2026 • 7 मिनट पठन

वाम की आवाज़|जन समाचार मंच
विज्ञापन

शेयर करें

सबसे ज्यादा पढ़ी गईं

1

‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

361 क्लिक

2

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

358 क्लिक

3

'उत्तम कुमार': एक नक्षत्र का अस्त हो जाना ~ 'सत्यजीत राय'

338 क्लिक

4

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

333 क्लिक

5

नीट पेपर लीक कांड : केंद्र सरकार की गंभीरता पर '?' है। - केशव भट्टड़

330 क्लिक

विज्ञापन

संसाधन

शहीद ए आजम भगत सिंह के विचार - संकलनकर्ता श्रेया जायसवाल (PDF)

'तुम्हारी क्षय' - राहुल सांकृत्यायन (PDF)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (Link)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (PDF)

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल की वेब साइट (बांग्ला) (Link)

भाजपा क्यों है जनता की दुश्मन ? (PDF)

द लेफ्ट व्यूज - द पीपल्स लेंस (अंग्रेजी) (Link)

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा (PDF)

पुरानी फिल्मों में होता था संदेश - सीताराम येचुरी (Link)

मैं नास्तिक क्यों हूँ ? - शहीद-ए-आजम भगतसिंह (PDF)

वाममोर्चा घोषणापत्र। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-2026 (PDF)

मार्क्सवादी पथ पत्रिका (बांग्ला) (Link)

अभियान कैलेंडर

कोई आगामी ईवेंट नहीं

जुड़े रहने के लिए

रोज़ शाम 7 बजे प्रमुख खबरें सीधे आपके ईमेल पर।

सदस्यता लें
इस लेखक से और
सभी देखें →
विश्लेषण

भारत के बारे में लेनिन ~ बुद्धदेव भट्टाचार्य

"गुलाम भारत की मुक्ति और एशियाई जन-एकता को दिशा देने वाला लेनिन का क्रांतिकारी दृष्टिकोण।" - बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा बांग्ला में प्रस्तुत यह मूल-आलेख एक तारीखवार ऐतिहासिक-वैचारिक अध्ययन है, जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं औपनिवेशिक मुक्ति-संग्राम के प्रति लेनिन की गहरी विश्लेषणात्मक दृष्टि को रेखांकित करता है। अध्ययन 1900 से 1923 के मध्य रचित लेनिन के निबंधों, पत्रों, नोट्स और भाषणों के आधार पर यह स्पष्ट करता है कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा भारत के आर्थिक शोषण, दमनकारी नीतियों और बंबई के मजदूर आंदोलन की क्रांतिकारी चेतना का गहन मूल्यांकन किया था। लेनिन ने औपनिवेशिक राष्ट्रवाद के मूल लोकतांत्रिक स्वरूप को पहचानते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक सर्वहारा क्रांति और एशियाई जन-एकता से जोड़ा। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के मंच से मानबेंद्रनाथ रॉय के संकीर्णतावादी सिद्धांतों को संशोधित कर लेनिन ने भारतीय कम्युनिस्टों को व्यापक साम्राज्यवादी-विरोधी मंचों में भागीदारी और किसान-मजदूर आंदोलनों को संगठित करने की रणनीतिक दिशा प्रदान की। अंततः, यह आलेख स्थापित करता है कि लेनिन के अनुसार रूस, भारत, चीन आदि देशों का दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का मालिक होना ही संघर्ष के परिणाम को तय करेगा।

कुछ घंटे पहले

राष्ट्रीय

'ज्ञानेश' हटाओ, 'एसआईआर' रोको ~ एम ए बेबी

"वोट के अधिकार पर हमला बंद करो, लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता बहाल करो!" मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालों और मतदाता सूचियों से नाम छांटने की मनमानी के बीच देश में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। 'इंडियन एक्सप्रेस' के सनसनीखेज खुलासे के बाद सीपीआई (एम) ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर प्रक्रिया को तुरंत रोकने की मांग को लेकर देशव्यापी जन-आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है।

11 अक्टूबर 2026

विश्लेषण

क्या अपनी ही जनता से भयभीत है हुकूमत ?

10 अक्टूबर की सुबह सड़कों का मंजर लोकतंत्र की नहीं, बल्कि एक सीलबंद सैन्य क्षेत्र की गवाही दे रहा था। जब एक सरकार अपने ही नागरिकों को रोकने और घेरने के लिए इतने व्यापक स्तर पर युद्ध जैसी तैयारियाँ करती है, तो स्वयं से यह सवाल पूछना ही होगा - आखिर सरकार किस चीज को दबाने और रोकने की कोशिश कर रही है?

10 अक्टूबर 2026

और पढ़ें
सभी देखें →
राज्य

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

पश्चिम बंगाल का राजनीतिक आकाश आज दो ध्रुवों — टीएमसी और भाजपा — के बीच आपसी वोट लाभ के लिए कुटिल योजना से फँसा दिया गया है। SIR , दबंगता, झूठ और पैसे के दम पर लोकतंत्र के अपहरण की पूरी तैयारी है। एक तरफ है राज्य सत्ता की मशीनरी, परिवारवाद और भ्रष्टाचार की संस्कृति। दूसरी तरफ है केंद्र का SIR अटैक, सांप्रदायिक विभाजन, संस्थाओं पर नियंत्रण और विकास के नाम पर ध्रुवीकरण की राजनीति। दोनों ही दल पूंजीवादी-नवउदारवादी मॉडल पर टिके हुए हैं, जो आर्थिक असमानता को बढ़ावा देते हैं, पर्यावरण की उपेक्षा करते हैं और केवल मुनाफे को प्राथमिकता देते हैं। इन नीतियों के कारण किसान, मजदूर, छात्र, युवा और महिलाओं सहित आम नागरिकों की आवाज दब रही है, उनकी चिंताएं उपेक्षित हो रही हैं और उनके हितों को नुकसान पहुंच रहा है। लेकिन लेफ्ट फ्रंट न तो केवल टीएमसी का विकल्प है और न ही केवल भाजपा का। यह उससे कहीं ज्यादा हैं। लेफ्ट फ्रंट एक स्वतंत्र वैचारिक शक्ति है जो न सत्ता की लूट को बढ़ावा देती है और न ही धर्म के नाम पर समाज को बाँटती है। टीएमसी और भाजपा के भ्रष्टाचार तथा सांप्रदायिक कोलाहल से पूरी तरह अलग, लेफ्ट फ्रंट तीसरा रास्ता प्रस्तुत कर रहा है — लोकतंत्र, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित एक प्रगतिशील भविष्य का रास्ता, जिसका नाम है “लेफ्ट फॉर फ्यूचर”।

केशव कुमार भट्टड़ • 13 अप्रैल 2026

राज्य

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

सोशल मीडिया पर समाज के सभी वर्गों के लोग भाजपा सरकार के इस दिशा-निर्देश को लेकर गुस्सा जताने लगे हैं। सत्ता में आने के बाद भ्रष्टाचार, जबरन वसूली और सिंडिकेट को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' नीति के साथ काम शुरू करने का वादा करने वाली सरकार अचानक कर्मचारियों के पीछे क्यों हाथ धोकर पड़ गई है?

श्रेया जायसवाल • 22 मई 2026

राज्य

राष्ट्र तुम किसके हो ? - शमीक लाहिड़ी

प्रश्न पूछना ही नागरिक का धर्म है- भारत का लोकतंत्र आज एक संधिकाल से गुजर रहा है। यदि सूचनाओं को छिपाकर जनता के जनादेश को बदलने का प्रयास किया जाता है, तो यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होगा।

श्रेया जायसवाल • 19 अप्रैल 2026

वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़

अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ, न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !

मुख्य पन्ने
जानकारी
हमारे बारे में
संपादकीय नीति
सुधार नीति
गोपनीयता नीति
संपर्क करें
आर्काइव
अभियान कैलेंडर आर्काइव
© 2026 वाम की आवाज़ — जन संघर्ष का डिजिटल पुरालेखMade for the Movement