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पश्चिम बंगाल में 'एनकाउंटर राज' की आहट ? बारूईपुर में गैर-न्यायिक कार्रवाई आरोपों के घेरे में।

केशव कुमार भट्टड़09 जुलाई 20267 मिनट पठन39 बार पढ़ा गया

उत्तर प्रदेश का बदनाम ‘एनकाउंटर राज’ क्या अब पश्चिम बंगाल में भी पैर पसार रहा है? बारूईपुर के सूर्यपुर में एक नाबालिग बच्ची के साथ हुए जघन्य बलात्कार और हत्या के मामले में एक मुख्य आरोपी, प्रभास मंडल की पुलिस हिरासत में हुई 'मुठभेड़' (एनकाउंटर) ने राज्य की कानून-व्यवस्था और पुलिसिया कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा और गंभीर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर प्रभास मंडल जिंदा रहता तो क्या ऐसी कोई जानकारी सामने आ सकती थी, जो जाँच के दायरे को और बढ़ा देती? क्या यह सिर्फ बलात्कार और हत्या थी, या इसके पीछे कोई और बड़ा आपराधिक गिरोह था? अपहरण, तस्करी, स्थानीय बदमाशों का नेटवर्क या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की मिलीभगत—क्या ये संभावनाएँ जाँच में सामने आ रही थीं? पुलिस की ओर से इस संबंध में अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं मिला है।

पश्चिम बंगाल में 'एनकाउंटर राज' की आहट ? बारूईपुर में गैर-न्यायिक कार्रवाई आरोपों के घेरे में।

पश्चिम बंगाल में 'एनकाउंटर राज' की आहट ? बारूईपुर में गैर-न्यायिक कार्रवाई आरोपों के घेरे में।

जाँच के बीच में ही मुख्य आरोपी ढेर, एनकाउंटर को लेकर पुलिस पर उठ रहे गंभीर सवाल।


सुदीप्तो बसु ■ सूर्यपुर (दक्षिण 24 परगना , बारूईपुर ,पश्चिम बंगाल), 8 जुलाई।

उत्तर प्रदेश का बदनाम ‘एनकाउंटर राज’ क्या अब पश्चिम बंगाल में भी पैर पसार रहा है? बारूईपुर के सूर्यपुर में एक नाबालिग बच्ची के साथ हुए जघन्य बलात्कार और हत्या के मामले में एक मुख्य आरोपी, प्रभास मंडल की पुलिस हिरासत में हुई 'मुठभेड़' (एनकाउंटर) ने राज्य की कानून-व्यवस्था और पुलिसिया कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा और गंभीर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

हैरानी की बात यह है कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा बारूईपुर पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय का दौरा करने और कानून-व्यवस्था को लेकर कड़ा संदेश देने के महज 12 घंटे के भीतर ही इस सनसनीखेज घटना को अंजाम दे दिया गया। इस घटना के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और सचेत नागरिकों के बीच यह बहस तेज हो गई है कि क्या यह वाकई पुलिस द्वारा दावा की गई ‘आत्मरक्षार्थ (आत्मरक्षा में की गई) गोलीबारी’ थी, या फिर गैर-न्यायिक कार्रवाई के माध्यम से एक महत्वपूर्ण गवाह और सबूत को हमेशा के लिए खामोश कर दिया गया?

पुलिस की थ्योरी और आधिकारिक बयान

अदालत ने इस मामले के चार आरोपियों को 14 दिनों की पुलिस हिरासत में भेजा था और जाँच आगे बढ़ रही थी। जिला पुलिस के आधिकारिक दावे के अनुसार, मंगलवार रात करीब 11:30 बजे प्रभास मंडल को बारूईपुर थाने से घटनास्थल पर ले जाया गया था। वहाँ कैनिंग पुलिस सर्कल के प्रभारी रोनी सरकार, बारूईपुर थाने के पुलिस सर्कल प्रभारी तथा विशेष जाँच दल (SIT) के सदस्य अर्घ्य मंडल सहित कई पुलिस अधिकारी मौजूद थे। सूर्यपुर स्टेशन के पास रेलवे लाइन पार करके झाड़ियों और दलदली जमीन के बीच ले जाकर घटना का पुनर्निर्माण (क्राइम सीन रीक्रिएशन) किया जा रहा था।

पुलिस का कहना है कि रात करीब पौने एक बजे, जब पुलिस ने उसे एक डोभा (छोटे तालाब) के सामने घेर रखा था, तब आरोपी प्रभास ने अचानक रोनी सरकार की कमर से सर्विस रिवॉल्वर छीन ली और दलदली जमीन के रास्ते भागने की कोशिश की। भागते समय उसने पुलिस को निशाना बनाकर एक राउंड गोली चलाई। बदले में अपनी रक्षा के लिए बारूईपुर थाने के पीसी प्रभारी अर्घ्य मंडल ने सर्विस रिवॉल्वर से प्रभास पर जवाबी गोलीबारी की। प्रभास के शरीर में दो गोलियाँ लगीं—एक दाहिने सीने के थोड़े नीचे और दूसरी कमर के थोड़े ऊपर। इसके तुरंत बाद उसे बारूईपुर उप-मंडल (सब-डिवीजन) अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

चार आरोपी पहले से ही पुलिस की हिरासत में थे। अदालत ने 14 दिनों की पुलिस हिरासत की अनुमति दी थी। जाँच भी आगे बढ़ रही थी। ऐसे में एक मुख्य आरोपी की मौत जाँच को कहाँ ले जाएगी, इस पर वकील, मानवाधिकार कार्यकर्ता और जाँच पर्यवेक्षक सवाल उठा रहे हैं। अदालत के मुकदमे के बजाय पुलिस की गोली से आरोपी की मौत क्या व्यावहारिक रूप से गैर-न्यायिक गतिविधियों के आरोपों को सामने ले आई है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर प्रभास मंडल जिंदा रहता तो क्या ऐसी कोई जानकारी सामने आ सकती थी, जो जाँच के दायरे को और बढ़ा देती? क्या यह सिर्फ बलात्कार और हत्या थी, या इसके पीछे कोई और बड़ा आपराधिक गिरोह था? अपहरण, तस्करी, स्थानीय बदमाशों का नेटवर्क या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की मिलीभगत—क्या ये संभावनाएँ जाँच में सामने आ रही थीं? पुलिस की ओर से इस संबंध में अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं मिला है।

पुलिसिया दावों में विसंगतियाँ और उठते तीखे सवाल

इस आधिकारिक बयान को लेकर जनता और कानून के जानकारों के बीच गहरी असंगति और संदेह की स्थिति है। वकील, मानवाधिकार कार्यकर्ता और जाँच पर्यवेक्षक सवाल उठा रहे हैं :

* आधी रात को ही घटना का पुनर्निर्माण क्यों ? ऐसा क्या आपातकाल था कि सुरक्षा बलों को कस्टडी में मौजूद आरोपी को लेकर देर रात 11:30 बजे दलदली और झाड़ियों वाले इलाके में जाना पड़ा?

* सुरक्षा व्यवस्था में इतनी बड़ी चूक कैसे? देर रात, चारों तरफ से भारी संख्या में हथियारबंद पुलिस बल से घिरे होने के बावजूद, एक आरोपी आसानी से पुलिस अधिकारी का हथियार कैसे छीन सकता है?

* भागने की व्यावहारिक संभावना क्या थी? कीचड़ और पानी से भरे डोभा (छोटा तालाब) के बीच, पुलिस से घिरे होने पर आरोपी के बंदूक तानकर सुरक्षित भाग निकलने की क्या कोई वास्तविक गुंजाइश थी?

क्या किसी बड़े आपराधिक चक्र (गिरोह) को छुपाने की हुई कोशिश?

प्रभास मंडल का जीवित रहना इस पूरे आपराधिक नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए बेहद जरूरी था। वह इस मामले का एक बेहद महत्वपूर्ण आरोपी था, जिसके खिलाफ अतीत में भी छेड़छाड़ और आर्म्स एक्ट (हथियार कानून) के मामले दर्ज थे। घटना के दिन सीसीटीवी फुटेज (शाम 4:42 बजे पाठभवन स्कूल के सामने) और मोबाइल टावर लोकेशन से भी उसकी मौजूदगी के अकाट्य सबूत मिले थे।

जाँच सूत्रों से पता चला था कि प्रभास ने जान-पहचान का फायदा उठाकर नाबालिग को बहला-फुसलाकर शाम को रेलवे लाइन पार कराकर उस झाड़ी की ओट में पहुँचाया था। इसके बदले में उसे 10 हजार रुपये दिए जाने की बात प्रारंभिक जाँच में सामने आई थी।

बड़ा सवाल: क्या यह सिर्फ एक विकृत मानसिकता (हवस) का मामला था, या पैसों के बदले योजनाबद्ध तरीके से किया गया अपहरण? क्या इसके पीछे कोई और बड़ा आपराधिक गिरोह, तस्करी का नेटवर्क या स्थानीय रसूखदारों की मिलीभगत थी? प्रभास जीवित रहता तो अदालत में सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण गवाही, बयान या इस गिरोह के भीतर की जानकारी दे सकता था। लेकिन मुकदमे की प्रक्रिया से पहले ही उसे खो देने से जाँच की एक बड़ी संभावना व्यावहारिक रूप से समाप्त हो गई है।

जमीनी हकीकत: घटनास्थल को लेकर भी सवाल

बुधवार दोपहर जब रिमझिम बारिश और बादलों के बीच ग्राउंड जीरो पर पड़ताल की गई, तो सूर्यपुर स्टेशन से धपधपी स्टेशन की ओर रेलवे लाइन के सहारे दो सौ मीटर दूर वह एनकाउंटर स्थल दिखाई दिया। पूरा इलाका (डोभा और झाड़ी) पीले रिबन/टेप से घेर कर चिह्नित किया गया था। स्थानीय लोगों के मन में पुलिस की कहानी को लेकर कोई धुंधलापन नहीं है; वे स्पष्ट रूप से इसे 'एनकाउंटर' बता रहे हैं।

स्थानीय निवासियों का यह भी आरोप है कि जिस जगह पर इस जघन्य कृत्य को अंजाम दिया गया, वहाँ लंबे समय से बदमाशों का अड्डा जुटता था। यदि यह जानकारी पुलिस को पहले से थी, तो वह जगह नियमित निगरानी से बाहर क्यों थी?

न्याय प्रणाली की पराजय और गैर-न्यायिक हत्या के आरोप

एक लोकतांत्रिक और कानून के शासन वाले समाज में किसी भी आरोपी के दोष या बेगुनाही का निर्धारण करने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ अदालत की है। अदालत में ट्रायल शुरू होने से पहले ही पुलिस की गोली से आरोपी की मौत हो जाना न केवल मानवाधिकारों का हनन है, बल्कि न्याय प्रणाली की पारदर्शिता पर भी गंभीर धब्बा है।

नियम के मुताबिक इस मामले की न्यायिक जाँच (Judicial Inquiry) शुरू कर दी गई है। इस्तेमाल किए गए हथियार, गोलियों के खोखे, फॉरेंसिक नमूने और डॉक्टर का बयान इकट्ठा कर लिया गया है। लेकिन जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, यह मौलिक सवाल हमेशा बना रहेगा—महत्वपूर्ण आरोपी प्रभास मंडल की मौत वाकई एक अपरिहार्य इत्तेफाक थी, या जाँच के बीच में ही किसी 'बड़े मगरमच्छ' को बचाने के लिए एक महत्वपूर्ण आवाज को हमेशा के लिए दबा दिया गया?

स्रोत: बांग्ला दैनिक गणशक्ति। 9 जुलाई 2026

अपलोडर: VKA-FD9RRG

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'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

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