जन समाचार मंच


जीवन के इस पड़ाव पर आकर मुझे भाजपा को पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होते देखना पड़ेगा, यह मैंने कभी नहीं सोचा था। फिर भी कहूँगी कि छोटे फासीवादी को लात मारकर हटाकर बड़े फासीवादियों द्वारा सत्ता दखल करने के उदाहरण इतिहास में और भी हैं।
हमने जिन सीटों पर जीत हासिल की है या जहाँ न जीत पाने के बावजूद अपनी छाप छोड़ी है, हमें याद रखना चाहिए कि वर्तमान परिस्थितियों में उसका एक - एक इंच संघर्ष करके हासिल किया गया है। यह भी याद रखना होगा कि पिछले विधानसभा चुनाव में हमारा जो वोट प्रतिशत था, वह कम नहीं हुआ है, बल्कि शायद थोड़ा बढ़ा ही है। इसका अर्थ यह है कि हमारे पक्ष के लोगों ने इस लड़ाई में हमारा साथ नहीं छोड़ा है। उन सभी को, हमारे कार्यकर्ताओं और उम्मीदवारों को, इस कठिन संघर्ष में हार न मानने के लिए मेरा लाल सलाम।
हमारे कुछ कार्यकर्ता या समर्थक भाजपा के हाथों तृणमूल के लोगों को लांछित होते देख खुश हो रहे हैं। पहले हमारे ऊपर जो अत्याचार हुए हैं, उसे देखते हुए यह शायद स्वाभाविक है। लेकिन हमारे पास अब शायद वह समय नहीं है। इसके अलावा, भाजपा का असली निशाना हम ही हैं, यह मोदी के चुनाव के बाद दिए गए पहले भाषण से ही स्पष्ट है। यहाँ भी जीत के पहले झोंके के साथ ही हमारे बूथ ऑफिस, पार्टी कार्यालयों या लेनिन की मूर्ति पर हमले शुरू हो चुके हैं। अब समय है अपनी ज़मीन को मजबूती से पकड़कर एकजुट होकर ऐसे हमलों का प्रतिरोध करने का।
SIR की मदद से मतदाताओं के मताधिकार की हत्या,, तृणमूल कांग्रेस के प्रति जनता का स्वाभाविक गुस्सा, और भाजपा के पक्ष में चुनाव आयोग की दबंग भूमिका—इन सबके अलावा यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सक्रिय भूमिका रही आरएसएस के ज़मीनी स्तर पर किए गए खामोश प्रचार की। यह पिछले दस-पंद्रह साल या उससे भी अधिक समय से चल रहा है। लेकिन इस चुनाव में उनकी भूमिका सबसे निर्णायक थी। ज़मीनी स्तर पर हमारे संगठन का विस्तार लंबे समय से कमजोर बना हुआ है, और इसी ने तृणमूल और आरएसएस को उस जगह पर कब्ज़ा करने में मदद की है।
एक पुराने साधारण पार्टी कार्यकर्ता के रूप में मेरा मानना है कि उस जगह को तुरंत वापस पाना ही अभी हमारे सामने सबसे ज़रूरी काम है। चुनाव प्रचार के दौरान हमें अपने दायरे से बाहर निकलकर अति-साधारण लोगों के बीच जाने के कुछ मौके मिले थे। वहीं से शुरू करके और अधिक विस्तार करने का 'दिखावा-रहित' काम ही अब हमारे सभी जन-संगठनों का मुख्य कार्य होना चाहिए।
मोदी का कथन है: "देश में कम्युनिस्ट सरकार न होने का अर्थ है कि केवल सरकार नहीं, बल्कि विचारधारा बदली है।" इस उल्लासपूर्ण कथन का अर्थ यह है कि वे कम्युनिस्टों के विचारों या विचारधारा से ही डरते हैं। हमें भी आज उस वैचारिक लड़ाई को और अधिक मज़बूत करने की ज़रूरत है। वास्तव में, वर्तमान में यह काम काफी कठिन हो गया है। इसे अपने छोटे घेरे से बाहर ले जाने की रणनीति और उसके अनुकूल भाषा हमें तुरंत खोजने की आवश्यकता है। अपने इस अशक्त शरीर के बावजूद, यदि उस लड़ाई में मेरे करने योग्य कुछ भी होगा, तो मैं पीछे नहीं हटूंगी।
- (पूर्व सांसद और अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष)
क्या यह लेख उपयोगी था?
प्रकाशित: 05 मई 2026 • 3 मिनट पठन

सलीम ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी असल में आरएसएस के इशारे पर दलाल की भूमिका निभाती आ रही है। दरअसल, इस राज्य से वामपंथी राजनीति के दायरे को सिकोड़ना ही आरएसएस का मुख्य उद्देश्य था। राज्य में आज भले ही तृणमूल कांग्रेस नहीं है, लेकिन वामपंथी आज भी मैदान में हैं और भविष्य में भी रहेंगे।
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

"जब आग लगती है, तो वह धर्म नहीं देखती, हिंदू-मुस्लिम का भेद किए बिना सभी के घरों को जलाकर खाक कर देती है। बीजेपी की बुलडोजर राजनीति के खतरे से भी कोई नहीं बचेगा। सभी इसके शिकार होंगे। इसलिए प्रतिरोध की लड़ाई में सभी लोगों को एकजुट होना होगा।"
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

हर उस व्यक्ति तक पहुँचना होगा जो मेहनतकश है, सताया हुआ है या प्रताड़ित है। भाजपा ने एसआईआर (SIR) के नाम पर एक बड़े वर्ग के लोगों से उनका मताधिकार छीन लिया है। इन सभी लोगों को एकजुट करना होगा। उनके मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों को वापस लाना होगा। जनता की रोटी-रोजी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और पीने के पानी जैसी स्थानीय मांगों को पूरा कराने के लिए संघर्ष करना होगा। भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एकता, भाईचारा और रोजगार के लिए लड़ना होगा। बुलडोजर राज के खिलाफ लाल झंडा पहले ही उठ खड़ा हुआ है। उन्होंने डर का माहौल बढ़ाया है, लेकिन हम चाहते हैं कि जनता का यह डर टूटे। अन्याय के खिलाफ खड़े होकर हक के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी।
सीपीआई (एम)पश्चिम बंगाल के सचिव
14 जून 2026

हिंदी क्षेत्र के वामपंथी आंदोलन के शलाका पुरुष गणेश शंकर विद्यार्थी के संस्मरणों पर केंद्रित पुस्तक ‘मार्क्सवाद : मेरा संघर्ष पथ’ का हाल ही में प्रकाशन हुआ है। 1 सितंबर को पटना के जमाल रोड स्थित सीपीआई(एम) कार्यालय में पार्टी पोलित ब्यूरो सदस्य अशोक धवले के हाथों लोकार्पण किया जा रहा है। यह पुस्तक गणेश शंकर विद्यार्थी ('गणेश दा') के लगभग आठ दशकों लंबे राजनीतिक और वैचारिक जीवन का दस्तावेज है। एक समृद्ध जमींदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद, उन्होंने सामंती व्यवस्था के खिलाफ वर्गीय चेतना को अपनाया और बिहार में कम्युनिस्ट आंदोलन व स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीपीआई(एम) के बिहार राज्य सचिव के रूप में उन्होंने कठिन दौर में पार्टी का नेतृत्व किया और भूमि आंदोलनों से गरीबों को जोड़ा। अपने अंतिम समय तक वे मार्क्सवादी अध्ययन, आंदोलन और संगठन के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे।
केशव कुमार भट्टड़ • 31 अगस्त 2026

भोजन की थाली से भजन की हाथताली तक—साझा संस्कृति बचाना ही बंगाल की असली पहचान है !
मालिनी भट्टाचार्य का यह आलेख बंगाली संस्कृति के मुख्य घटकों—खान-पान (भोजन) और पूजा-अर्चना (भजन)—पर हो रहे राजनीतिक व बाजारी हमलों को रेखांकित करता है। इलिश, बकरे और गोमांस पर पाबंदी से लेकर मिड-डे मील में इस्कॉन के प्रवेश तक, यह केवल खान-पान का मुद्दा नहीं बल्कि बंगालियों की बौद्धिक अस्मिता पर प्रहार है। आज कॉर्पोरेट पूंजी और सांप्रदायिक ताकतें मिलकर राज्य की साझा लोक-संस्कृति को बाजारीकरण व अंधविश्वास के ढोंग में धकेल रही हैं। इस खतरनाक सामाजिक-राजनीतिक नागपाश से बंगाली चेतना को मुक्त कराना आज बेहद ज़रूरी है।
केशव कुमार भट्टड़ • 13 सितंबर 2026

श्रेया जायसवाल • 09 मई 2026
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...