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छोटे फासीवादी को लात मारकर हटाकर बड़े फासीवादियों द्वारा सत्ता दखल करने के उदाहरण इतिहास में और भी हैं _ मालिनी भट्टाचार्य

श्रेया जायसवाल05 मई 20263 मिनट पठन39 बार पढ़ा गया
वे कम्युनिस्टों के विचारों या विचारधारा से ही डरते हैं। हमें भी आज उस वैचारिक लड़ाई को और अधिक मज़बूत करने की ज़रूरत है। वास्तव में, वर्तमान में यह काम काफी कठिन हो गया है। इसे अपने छोटे घेरे से बाहर ले जाने की रणनीति और उसके अनुकूल भाषा हमें तुरंत खोजने की आवश्यकता है।
छोटे फासीवादी को लात मारकर हटाकर बड़े फासीवादियों द्वारा सत्ता दखल करने के उदाहरण इतिहास में और भी हैं _ मालिनी भट्टाचार्य

"छोटे फासीवादी को लात मारकर हटाकर बड़े फासीवादियों द्वारा

 सत्ता दखल करने के उदाहरण इतिहास में और भी हैं "

 - मालिनी भट्टाचार्य  

जीवन के इस पड़ाव पर आकर मुझे भाजपा को पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होते देखना पड़ेगा, यह मैंने कभी नहीं सोचा था। फिर भी कहूँगी कि छोटे फासीवादी को लात मारकर हटाकर बड़े फासीवादियों द्वारा सत्ता दखल करने के उदाहरण इतिहास में और भी हैं।

हमने जिन सीटों पर जीत हासिल की है या जहाँ न जीत पाने के बावजूद अपनी छाप छोड़ी है, हमें याद रखना चाहिए कि वर्तमान परिस्थितियों में उसका एक - एक इंच संघर्ष करके हासिल किया गया है। यह भी याद रखना होगा कि पिछले विधानसभा चुनाव में हमारा जो वोट प्रतिशत था, वह कम नहीं हुआ है, बल्कि शायद थोड़ा बढ़ा ही है। इसका अर्थ यह है कि हमारे पक्ष के लोगों ने इस लड़ाई में हमारा साथ नहीं छोड़ा है। उन सभी को, हमारे कार्यकर्ताओं और उम्मीदवारों को, इस कठिन संघर्ष में हार न मानने के लिए मेरा लाल सलाम।

हमारे कुछ कार्यकर्ता या समर्थक भाजपा के हाथों तृणमूल के लोगों को लांछित होते देख खुश हो रहे हैं। पहले हमारे ऊपर जो अत्याचार हुए हैं, उसे देखते हुए यह शायद स्वाभाविक है। लेकिन हमारे पास अब शायद वह समय नहीं है। इसके अलावा, भाजपा का असली निशाना  हम ही हैं, यह मोदी के चुनाव के बाद दिए गए पहले भाषण से ही स्पष्ट है। यहाँ भी जीत के पहले झोंके के साथ ही हमारे बूथ ऑफिस, पार्टी कार्यालयों या लेनिन की मूर्ति पर हमले शुरू हो चुके हैं। अब समय है अपनी ज़मीन को मजबूती से पकड़कर एकजुट होकर ऐसे हमलों का प्रतिरोध करने का।

SIR  की मदद से मतदाताओं के मताधिकार की हत्या,, तृणमूल कांग्रेस के प्रति जनता का स्वाभाविक गुस्सा, और भाजपा के पक्ष में चुनाव आयोग की दबंग भूमिका—इन सबके अलावा यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सक्रिय भूमिका रही आरएसएस  के ज़मीनी स्तर पर किए गए खामोश प्रचार की। यह पिछले दस-पंद्रह साल या उससे भी अधिक समय से चल रहा है। लेकिन इस चुनाव में उनकी भूमिका सबसे निर्णायक थी। ज़मीनी स्तर पर हमारे संगठन का विस्तार लंबे समय से कमजोर बना हुआ है, और इसी ने तृणमूल और आरएसएस को उस जगह पर कब्ज़ा करने में मदद की है।

एक पुराने साधारण पार्टी कार्यकर्ता के रूप में मेरा मानना है कि उस जगह को तुरंत वापस पाना ही अभी हमारे सामने सबसे ज़रूरी काम है। चुनाव प्रचार के दौरान हमें अपने दायरे से बाहर निकलकर अति-साधारण लोगों के बीच जाने के कुछ मौके मिले थे। वहीं से शुरू करके और अधिक विस्तार करने का 'दिखावा-रहित' काम ही अब हमारे सभी जन-संगठनों का मुख्य कार्य होना चाहिए।

मोदी का कथन है: "देश में कम्युनिस्ट सरकार न होने का अर्थ है कि केवल सरकार नहीं, बल्कि विचारधारा बदली है।" इस उल्लासपूर्ण कथन का अर्थ यह है कि वे कम्युनिस्टों के विचारों या विचारधारा से ही डरते हैं। हमें भी आज उस वैचारिक लड़ाई को और अधिक मज़बूत करने की ज़रूरत है। वास्तव में, वर्तमान में यह काम काफी कठिन हो गया है। इसे अपने छोटे घेरे से बाहर ले जाने की रणनीति और उसके अनुकूल भाषा हमें तुरंत खोजने की आवश्यकता है। अपने इस अशक्त शरीर के बावजूद, यदि उस लड़ाई में मेरे करने योग्य कुछ भी होगा, तो मैं पीछे नहीं हटूंगी।

 

- (पूर्व सांसद और अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष)

अपलोडर: श्रेया जायसवाल

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