जिस तरह रेणु के "मैला आँचल" में मेरीगंज नायक की भूमिका में है वैसे ही मृणाल सेन की अधिकांश फिल्मों में कलकत्ता शहर नायक की भूमिका में दिखाई देता है।
जन समाचार मंच
जिस तरह रेणु के "मैला आँचल" में मेरीगंज नायक की भूमिका में है वैसे ही मृणाल सेन की अधिकांश फिल्मों में कलकत्ता शहर नायक की भूमिका में दिखाई देता है।


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मृणाल सेन और कलकत्ता
-डॉ. अशोक सिंह
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आज अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म निर्देशक मृणाल सेन का 104 वाँ जन्मदिन है। ऋत्विक घटक,सत्यजित राय और मृणाल सेन ने भारतीय सिनेमा को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिलायी।
ऋत्विक घटक की फिल्मों में विस्थापन एक महाकाव्य की तरह दिखायी पड़ता है। उनकी फिल्म "बाड़ी थेके पालिए "में उनके जीवन का सपना सिनेमा के पर्दे पर हकीकत में बदल जाता है। अपनी जन्मभूमि बांग्लादेश से बिछड़ने का दर्द उनकी फिल्मों में बार -बार दिखायी पड़ता है। "तितास एकटी नदीर नाम "फिल्म में बांग्लादेश की नदियाँ, धान के खेत,वहाँ के लोकगीत एक जबर्दस्त नास्टालजिया पैदा करते हैं।उन्हें भारतीय सिनेमा के जीनियस के रूप में याद किया जाता है।
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"जुक्ति तक्को आर गप्पो "पूरी तरह से राजनीतिक फिल्म है। इस पूरी फिल्म में वे एक घर की तलाश करते हैं। कलकत्ता के एक कमरे से निकलकर वे अपनी शिक्षक पत्नी और बेटे से मिलने के लिए केवल एक रात वहाँ ठहरते हैं। उनके साथ बांग्लादेश से शरणार्थी बनकर आयी एक युवती (सांवली मित्र)है,जिसे वे "माँ "संबोधित करते हैं। लौटते समय जंगल में कुछ नक्सलवादी युवकों से मुलाकात और लम्बी बहस होती है। भारतीय सिनेमा के सत्तर के दशक को समझने के लिए यह दृश्य सबसे महत्वपूर्ण है। वे उन युवकों से कहते हैं कि उनका रास्ता सही नहीं है। पुलिस और नक्सली युवकों के बीच संघर्ष में पुलिस की गोली से उनकी मृत्यु होती है। जीवन की बिडम्बना देखिए भारतीय सिनेमा के जीनियस के पास जीवन के अंत तक अपना घर नसीब नहीं हुआ।
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"बाड़ी थेके पालिए "उनके जीवन का सपना है,जो सिनेमा के पर्दे पर जीवंत हो उठता है। अपने पिता की डाँट खाकर एक बच्चा गाँव से कलकत्ता आता है। वह अपनी आँखों से महानगर को देखता है.बच्चे द्वारा कलकत्ता को देखे जाने का दृश्य "तारे जमीन पर "फिल्म में दिखता है। कलकत्ता की जगह बम्बई है।भूख से व्याकुल यह बच्चा कलकत्ता के डलहौसी इलाके में घूम रहा है। एक सत्तू बेचनेवाले ने बच्चे को बुलाकर बड़े प्रेम से सत्तू खिलाया।सत्तू बेचनेवाला बिहार के एक गाँव से शहर में कमाने आया है।दोनों ही विस्थापित हैं ।कलकत्ता का मानवीय चेहरा इस फिल्म में पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है।
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सत्यजित राय की फिल्मों में कलकत्ता की उपस्थिति महत्वपूर्ण है। कलकत्ता का मानवीय और प्रतिवादी चेहरा पूरी गरिमा के साथ उपस्थित है।
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जिस तरह रेणु के "मैला आँचल" में मेरीगंज नायक की भूमिका में है वैसे ही मृणाल सेन की अधिकांश फिल्मों में कलकत्ता शहर नायक की भूमिका में दिखाई देता है।भारतीय सिनेमा में संभवतः यह विरल घटना है। बंगाल के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मध्यम वर्ग नेतृत्व की भूमिका में है."कलकत्ता 71"नाम से उनकी अविस्मरणीय फिल्म है। आजादी के पहले और बाद में भुखमरी की समस्या पर यह फिल्म है। 1980 के आसपास उनकी दो फिल्मों "एक दिन प्रतिदिन "और "खारिज" ने बंगाल के मध्यवर्ग को बेचैन कर दिया था। "एक दिन प्रतिदिन "में एक निम्नमध्यवर्गीय बंगाली परिवार की एकमात्र नौकरी करनेवाली युवती के रात तक घर न लौटने की कहानी है। पूरी रात कलकत्ता शहर महत्वपूर्ण हो उठता है। सुबह घर लौटने पर पड़ोसियों की उत्सुकता के बीच घरवाले उससे सवाल -जवाब नहीं करते। यह फिल्म नारी मुक्ति का दस्तावेज़ है। दूसरी फिल्म "खारिज "में" कलकत्ता के एक मध्यवर्गीय परिवार में गाँव से आया एक गरीब बच्चा घरेलू नौकर है जिसकी रात में रसोई घर में सोते समय मौत हो जाती है. महानगर के मध्यवर्गीय जीवन के खोखलेपन को यह फिल्म बेपर्दा कर देती है।
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मृणाल सेन का सबसे मशहूर फोटो कलकत्ता की सबसे खूबसूरत सड़क रेड रोड (इंदिरा गाँधी सरणी) का है। जहाँ वे सड़क पर लेटे हुए निर्देशन दे रहे हैं। एक बार एक विदेशी को उन्होंने कहा था कि कलकत्ता का असली चेहरा देखना है तो ब्रिगेड परेड ग्राउंड चले जाओ। उस दिन ब्रिगेड में सी पी आई (एम)की जनसभा थी।
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मृणाल सेन मानते थे कि सिनेमा के पर्दे पर सच को अगर दिखा दिया जाये तो आग लग जाएगी। भारत में फिल्म सोसाइटी आंदोलन का उन्होंने नेतृत्व दिया था। अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में उन्होंने देश का मान बढ़ाया। वे अपने को सबसे पहले सिनेमा का दर्शक मानते थे। 90 वर्ष की उम्र में निर्देशक अनीक दत्त की बहुचर्चित फिल्म "भूतेर भविष्यत" 'नंदन' में जाकर देखी थी। फिल्म देखने के बाद उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में अब तक शायद ऐसी फिल्म नहीं बनी है।
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मृणाल सेन से मेरी दो बार मुलाकात हुयी थी। पहली बार 11 फरवरी1989 को कलामंदिर के बाहर ऊषा गांगुली के साथ काफी देर तक उनसे बात हुयी. 'आरंभ' और 'रंगकर्मी 'द्वारा आयोजित सफदर हाशमी मेमोरियल कलकत्ता हिन्दी नाट्य महोत्सव के सप्ताहव्यापी आयोजन का उद्घाटन करते के लिए वे आए थे।यह आयोजन मुख्यतः सात महीने पहले कलकत्ता के हिन्दीभाषी विद्यार्थियों की संस्था 'आरंभ' की पहल पर हुआ था. मृणाल सेन कलकत्ता और उसके आसपास के हिन्दीभाषी समाज की सांस्कृतिक गतिविधियों पर संवाद कर रहे थे।दूसरी बार नंदन 'में राज्यसभा के सांसद मोहम्मद सलीम के साथ उनसे मिला।मृणाल सेन उस समय राज्यसभा के सदस्य थे. सांसद मोहम्मद सलीम के लिखित प्रस्ताव पर 1998में 'नंदन' ने पहली बार प्रेमचंद जयंती मनायी थी।मृणाल सेन ने उसका उद्घाटन किया था।
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ममता बनर्जी की तानाशाही सरकार का उन्होंने जीवन की अंतिम साँस तक विरोध किया। मरने के बाद भी उनकी वसीयत में लिखा था कि उनकी अंतिम यात्रा में सरकार के किसी प्रतिनिधि को शामिल नहीं किया जाय।जीवन भर प्रतिवादी रहे मृणाल सेन की मृत्यु के बाद उनके सबसे प्रिय पात्र कलकत्ता महानगर ने उनके प्रतिवाद को श्रद्धांजलि दी।
मृणाल सेन अमर रहें!
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प्रकाशित: 14 मई 2026 • 5 मिनट पठन

सलीम ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी असल में आरएसएस के इशारे पर दलाल की भूमिका निभाती आ रही है। दरअसल, इस राज्य से वामपंथी राजनीति के दायरे को सिकोड़ना ही आरएसएस का मुख्य उद्देश्य था। राज्य में आज भले ही तृणमूल कांग्रेस नहीं है, लेकिन वामपंथी आज भी मैदान में हैं और भविष्य में भी रहेंगे।
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17 जून 2026

"जब आग लगती है, तो वह धर्म नहीं देखती, हिंदू-मुस्लिम का भेद किए बिना सभी के घरों को जलाकर खाक कर देती है। बीजेपी की बुलडोजर राजनीति के खतरे से भी कोई नहीं बचेगा। सभी इसके शिकार होंगे। इसलिए प्रतिरोध की लड़ाई में सभी लोगों को एकजुट होना होगा।"
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

हर उस व्यक्ति तक पहुँचना होगा जो मेहनतकश है, सताया हुआ है या प्रताड़ित है। भाजपा ने एसआईआर (SIR) के नाम पर एक बड़े वर्ग के लोगों से उनका मताधिकार छीन लिया है। इन सभी लोगों को एकजुट करना होगा। उनके मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों को वापस लाना होगा। जनता की रोटी-रोजी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और पीने के पानी जैसी स्थानीय मांगों को पूरा कराने के लिए संघर्ष करना होगा। भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एकता, भाईचारा और रोजगार के लिए लड़ना होगा। बुलडोजर राज के खिलाफ लाल झंडा पहले ही उठ खड़ा हुआ है। उन्होंने डर का माहौल बढ़ाया है, लेकिन हम चाहते हैं कि जनता का यह डर टूटे। अन्याय के खिलाफ खड़े होकर हक के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी।
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हिंदी क्षेत्र के वामपंथी आंदोलन के शलाका पुरुष गणेश शंकर विद्यार्थी के संस्मरणों पर केंद्रित पुस्तक ‘मार्क्सवाद : मेरा संघर्ष पथ’ का हाल ही में प्रकाशन हुआ है। 1 सितंबर को पटना के जमाल रोड स्थित सीपीआई(एम) कार्यालय में पार्टी पोलित ब्यूरो सदस्य अशोक धवले के हाथों लोकार्पण किया जा रहा है। यह पुस्तक गणेश शंकर विद्यार्थी ('गणेश दा') के लगभग आठ दशकों लंबे राजनीतिक और वैचारिक जीवन का दस्तावेज है। एक समृद्ध जमींदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद, उन्होंने सामंती व्यवस्था के खिलाफ वर्गीय चेतना को अपनाया और बिहार में कम्युनिस्ट आंदोलन व स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीपीआई(एम) के बिहार राज्य सचिव के रूप में उन्होंने कठिन दौर में पार्टी का नेतृत्व किया और भूमि आंदोलनों से गरीबों को जोड़ा। अपने अंतिम समय तक वे मार्क्सवादी अध्ययन, आंदोलन और संगठन के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे।
केशव कुमार भट्टड़ • 31 अगस्त 2026

भोजन की थाली से भजन की हाथताली तक—साझा संस्कृति बचाना ही बंगाल की असली पहचान है !
मालिनी भट्टाचार्य का यह आलेख बंगाली संस्कृति के मुख्य घटकों—खान-पान (भोजन) और पूजा-अर्चना (भजन)—पर हो रहे राजनीतिक व बाजारी हमलों को रेखांकित करता है। इलिश, बकरे और गोमांस पर पाबंदी से लेकर मिड-डे मील में इस्कॉन के प्रवेश तक, यह केवल खान-पान का मुद्दा नहीं बल्कि बंगालियों की बौद्धिक अस्मिता पर प्रहार है। आज कॉर्पोरेट पूंजी और सांप्रदायिक ताकतें मिलकर राज्य की साझा लोक-संस्कृति को बाजारीकरण व अंधविश्वास के ढोंग में धकेल रही हैं। इस खतरनाक सामाजिक-राजनीतिक नागपाश से बंगाली चेतना को मुक्त कराना आज बेहद ज़रूरी है।
केशव कुमार भट्टड़ • 13 सितंबर 2026

श्रेया जायसवाल • 09 मई 2026
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