राज्य में ओबीसी आरक्षण फिर से 7%
ओबीसी सूची से बाहर हुए 2 करोड़ गरीब अल्पसंख्यक
गरीब और पिछड़े अल्पसंख्यकों के लिए ओबीसी आरक्षण की जो व्यवस्था वाम मोर्चा सरकार ने की थी, भाजपा सरकार ने उसे रद्द कर दिया है। ममता बनर्जी की सरकार ने उस आरक्षण को लेकर जो जटिलता पैदा की थी, उसी ने शुभेंदु अधिकारी की सरकार को इस आरक्षण को रद्द करने के फैसले तक पहुँचने में मदद की।
राज्य के अन्य पिछड़ा वर्ग कल्याण, आदिवासी विकास और अल्पसंख्यक विकास विभाग के मंत्री खुदीराम टुडू ने सोमवार को बताया, "हम पुरानी स्थिति में वापस चले गए हैं, जो फरवरी 2010 से पहले थी। यानी अब से राज्य में ओबीसी आरक्षण 7 प्रतिशत रहेगा, 17 प्रतिशत नहीं।" 8 फरवरी 2010 को राइटर्स बिल्डिंग से ओबीसी आरक्षण को 7 से बढ़ाकर 17 प्रतिशत करने के फैसले की घोषणा तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने की थी। पिछड़े मुसलमानों के विभिन्न समूहों को ओबीसी सूची में शामिल करने का नीतिगत फैसला लेते हुए उस दिन बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कहा था, "धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि मुसलमानों में जो लोग आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हैं, वही इस आरक्षण के दायरे में आएंगे। समाज के क्रीमी लेयर यानी अमीरों के लिए यह आरक्षण नहीं है।"
उस दिन राइटर्स बिल्डिंग में इस फैसले की घोषणा करने से पहले, अलीमुद्दीन स्ट्रीट स्थित सीपीआई(एम) के राज्य कार्यालय में वाम मोर्चे की बैठक में यह निर्णय लिया गया था। वाम मोर्चा के चेयरमैन बिमान बसु ने उस दिन पत्रकारों से कहा था, "राज्य सरकार को हर संभव तरीके से यह देखने के लिए कहा गया है कि रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों के अनुसार सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े अल्पसंख्यकों को कैसे सुरक्षा कवच दिया जा सकता है। इस काम के प्रक्रियात्मक पहलुओं को अंतिम रूप देने में कुछ समय लग सकता है, लेकिन राज्य सरकार को तुरंत इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।" उल्लेखनीय है कि तब राज्य की ओबीसी सूची में 66 समूह शामिल थे, जिनमें से 12 मुस्लिम समुदाय से थे। उनकी संख्या करीब 16 लाख 38 हजार थी। वाम मोर्चे के आरक्षण के फैसले के बाद, मार्च 2012 तक ओबीसी सूची में शामिल गरीब अल्पसंख्यकों की संख्या लगभग 1 करोड़ 70 लाख हो गई थी।
सोमवार को वर्तमान प्रशासनिक मुख्यालय 'नबान्न' में भाजपा सरकार की दूसरी कैबिनेट बैठक हुई। उस बैठक में ओबीसी आरक्षण को पुरानी स्थिति में वापस ले जाने का निर्णय लिया गया। कैबिनेट के इस फैसले की जानकारी पत्रकारों को देते हुए राज्य की महिला, बाल एवं समाज कल्याण मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा, "पश्चिम बंगाल सरकार के अधीन नौकरियों और सरकारी पदों पर ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत, राज्य द्वारा सूचीबद्ध ओबीसी सूची की समीक्षा और उप-श्रेणियों (सब-कैटेगरी) को रद्द करने का निर्णय कैबिनेट में लिया गया है।" उन्होंने आगे बताया, "नए सिरे से जांच होगी। हाई कोर्ट के निर्देशानुसार जिन समूहों को शामिल करने की बात कही गई है, राज्य सरकार उस पर फैसला लेगी।"
यानी इस मामले में तीन मुख्य फैसले लिए गए हैं।पहला, सरकारी नौकरियों में ओबीसी आरक्षण कितना होगा, यह कैबिनेट ने तय कर दिया है। यह 7 प्रतिशत होगा।दूसरा, राज्य की जो मौजूदा ओबीसी सूची है, उसकी समीक्षा की जाएगी।तीसरा,ओबीसी सूची में वाम मोर्चा जो दो उप-श्रेणियां लाया था—ओबीसी-ए (अधिक पिछड़ा) और ओबीसी-बी (पिछड़ा)—उन दोनों उप-श्रेणियों को रद्द कर दिया गया है।
ओबीसी आरक्षण 17 प्रतिशत होने के बाद, ओबीसी-ए श्रेणी में ही आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े गरीब, मुख्य रूप से ग्रामीण अल्पसंख्यक सबसे ज्यादा जुड़े थे। 2010 में लिए गए इस आरक्षण के फैसले का आरएसएस की पसंदीदा ममता बनर्जी ने कड़ा विरोध किया था। हालांकि, मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने वाम मोर्चे के इस फैसले को लागू रखा। लेकिन उन्होंने प्रमाण पत्र जारी करने और नए समूहों को शामिल करने की प्रक्रिया में गड़बड़ी पैदा कर दी।
वाम मोर्चा सरकार के समय कौन ओबीसी सूची में शामिल होगा और प्रमाण पत्र कैसे दिए जाएंगे, यह सारा काम ओबीसी आयोग ने किया था। क्योंकि कानून इस मामले में केवल ओबीसी आयोग को ही यह अधिकार देता है। तृणमूल कांग्रेस सरकार ने ओबीसी आयोग को दरकिनार करके यह सारे काम अपने विभाग से करवाए, जो कि अवैध था। तृणमूल शासन के दौरान 'पाड़ाय समाधान' (मोहल्लों में समाधान) शिविरों से थोक के भाव में ओबीसी प्रमाण पत्र बांटे गए। आरोप लगे कि इस मामले में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कमीशन और कटमनी लेकर उन लोगों को भी ओबीसी प्रमाण पत्र दिलवा दिए, जो इसके हकदार नहीं थे। मामला अदालत में गया। हाई कोर्ट ने 12 लाख ओबीसी प्रमाण पत्र रद्द कर दिए।
2010 से 2012 के बीच 77 समूहों को ओबीसी सूची में शामिल किया गया था। यानी मार्च 2012 तक ओबीसी सूची में शामिल समूहों की संख्या 147 थी। 2023 तक ममता बनर्जी की सरकार इस संख्या को 179 पर ले गई। आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस सरकार ने इस मामले में मनमानी की। 22 मई 2024 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने राज्य के 66 समुदायों को बरकरार रखते हुए 113 समुदायों को ओबीसी सूची में शामिल करने के फैसले को खारिज कर दिया। उन सभी के प्रमाण पत्र रद्द हो गए।
मार्च 2025 में ममता बनर्जी ने घोषणा की थी कि राज्य का ओबीसी आयोग नए सिरे से सर्वेक्षण करके एक नई ओबीसी सूची तैयार करेगा। यही काम वाम मोर्चे ने भी किया था और अगर ममता बनर्जी शुरू से उसी रास्ते पर चलतीं, तो गरीब अल्पसंख्यकों को अपने प्रमाण पत्र और अवसर नहीं खोने पड़ते। जून 2025 में तृणमूल सरकार ने नए 76 समुदायों को ओबीसी सूची में जोड़कर 140 समूहों की एक ओबीसी सूची जारी की। हाई कोर्ट ने 17 जून 2025 को उस सूची पर रोक लगा दी थी। इसके खिलाफ तृणमूल कांग्रेस सरकार फिर से सुप्रीम कोर्ट गई। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच में था।
इसी बीच राज्य में भाजपा की सरकार बन गई। बीते 14 मई को भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से वह मामला वापस ले लिया। उसी दिन उनका रुख काफी हद तक साफ हो गया था। सोमवार को कैबिनेट की बैठक में इस पर अंतिम मुहर लग गई।
नतीजतन, ओबीसी सूची से 2 करोड़ से अधिक गरीब बाहर हो गए हैं, और मुख्य रूप से वे अल्पसंख्यक हैं।
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साभार : गणशक्ति
