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हम मानिक बंद्योपाध्याय को क्यों पढ़ें? - मालिनी भट्टाचार्य

केशव कुमार भट्टर•20 मई 202612 मिनट पठन49 बार पढ़ा गया

" विशेष रूप से 1920 के दशक से न केवल हमारे देश में, बल्कि पूरी दुनिया में समय बहुत उथल-पुथल भरा और तेज़ी से बदलने वाला था। उस समय भारत का स्वतंत्रता आंदोलन विभिन्न स्तरों के अनगिनत लोगों को समेटकर एक विशाल जन-आंदोलन का रूप ले रहा था। इंसानों को दो-दो विश्व युद्धों का गवाह बनना पड़ा था। सोवियत रूस के उदय ने उस पीढ़ी को चमत्कृत कर दिया था। इसके साथ ही, इस देश में अकाल , दंगे, देश का विभाजन और आज़ादी के बाद के शुरुआती कुछ वर्षों के भारी मंथन से विष और अमृत दोनों ही निकले, जो समाज के सभी अलग-अलग स्तरों के लोगों की जीवनशैली और सोच को बदल सकते थे। बांग्ला भाषा के साहित्यकारों के बीच यथार्थवादी शैली को लेकर तरह-तरह के प्रयोग इसी दौर में प्रासंगिक हुए। एक रचनात्मक लेखक के रूप में मानिक का आत्म-विकास भी इसी समय के दौरान हुआ।"

हम मानिक बंद्योपाध्याय को क्यों पढ़ें? - मालिनी भट्टाचार्य

हम मानिक बंद्योपाध्याय को क्यों पढ़ें?

(मालिनी भट्टाचार्य)

मानिक बंद्योपाध्याय का जन्म 19 मई 1908 को हुआ था और मात्र 48 वर्ष की आयु में 3 दिसंबर 1956 को उनका निधन हो गया। उनके जन्म को 118 वर्ष बीत चुके हैं, यहाँ तक कि उनके देहावसान के बाद भी लगभग सत्तर साल गुजर चुके हैं। किसी भी भाषा में ऐसे लेखक बहुत कम होते हैं, जिन्हें इतने लंबे समय के बाद भी हमारे समकालीन जीवन में बार-बार याद करना पड़े। इसलिए ऊपर दिया गया प्रश्न बेहद प्रासंगिक है।

आधुनिक काल में मिथकों और काल्पनिक कथाओं के जाल को तोड़कर यथार्थवादी कथा-साहित्य की नींव रखी गई थी। हम जानते हैं कि इसके पीछे एक ऐसा दृष्टिकोण था जो यह मानता था कि साहित्यिक कृतियों के भीतर भी वास्तविक जीवन का प्रत्यक्ष चित्रण संभव है। हो सकता है कि वह उस जीवन का हूबहू प्रतिबिंब न हो, लेकिन एक प्रकार का कलात्मक प्रतिनिधित्व तो है ही। इस मूल विश्वास के बल पर विश्व-साहित्य में जिन्होंने यथार्थवादी शैली का सबसे रचनात्मक उपयोग किया है, उनमें मानिक बंदोपाध्याय का नाम निश्चित रूप से शामिल रहेगा। इसलिए मानिक की प्रतिभा की दिशा का अंदाज़ा लगाने के लिए उनके समय को थोड़ा समझना होगा।

विशेष रूप से 1920 के दशक से न केवल हमारे देश में, बल्कि पूरी दुनिया में समय बहुत उथल-पुथल भरा और तेज़ी से बदलने वाला था। उस समय भारत का स्वतंत्रता आंदोलन विभिन्न स्तरों के अनगिनत लोगों को समेटकर एक विशाल जन-आंदोलन का रूप ले रहा था। इंसानों को दो-दो विश्व युद्धों का गवाह बनना पड़ा था। सोवियत रूस के उदय ने उस पीढ़ी को चमत्कृत कर दिया था। इसके साथ ही, इस देश में अकाल , दंगे, देश का विभाजन और आज़ादी के बाद के शुरुआती कुछ वर्षों के भारी मंथन से विष और अमृत दोनों ही निकले, जो समाज के सभी अलग-अलग स्तरों के लोगों की जीवनशैली और सोच को बदल सकते थे। बांग्ला भाषा के साहित्यकारों के बीच यथार्थवादी शैली को लेकर तरह-तरह के प्रयोग इसी दौर में प्रासंगिक हुए। एक रचनात्मक लेखक के रूप में मानिक का आत्म-विकास भी इसी समय के दौरान हुआ।

दिक्कत इसी कारण से होती है कि बांग्ला साहित्य की पारंपरिक आलोचना पद्धति में एक ऐसा स्थापित विचार बना हुआ है कि मानिक के मामले में इस विकास-रेखा को सीधे 'फ्रायड से मार्क्स' तक खींचा जा सकता है। आलोचक चाहे रूढ़िवादी हो या प्रगतिशील, और लेखक की निंदा या प्रशंसा करना ही उसका उद्देश्य क्यों न हो, कई बार मानिक का साहित्यिक मूल्यांकन इसी सरल रेखा को मानकर ही किया जाता है।

कुछ लोगों का कहना है कि मानव की मानसिक विकृति और अवचेतन की जटिलताओं के चित्रण में ही उनका सबसे बेहतरीन योगदान है, लेकिन बाद में मार्क्सवाद के सांचे को मानने या 'पार्टी लाइन के अनुसार' लिखने के चक्कर में उनकी रचनात्मक प्रतिभा का ह्रास हुआ। वहीं कुछ अन्य लोगों का मानना है कि एक विशेष दौर में व्यक्तिगत मन की अंधकारमय भूलभुलैया से निकलकर मार्क्सवाद के आलोकित वृत्त (प्रकाशमान दायरे) में प्रवेश करके ही मानिक ने खुद को पाया। यह मूल्यांकन पाठक वर्ग को भी प्रभावित करता है। आज की पीढ़ी के पाठक को ऐसा लग सकता है कि इस बहस के दोनों ही पक्ष आज के साहित्य में अप्रासंगिक (कालातीत) हो चुके हैं; इसलिए अनिवार्य रूप से पढ़े जाने वाले लेखकों की सूची में यदि उनका नाम न भी हो, तो चल सकता है।

मानिक फ्रायडवादी नहीं थे, यह उन्होंने खुद कहा था। फ्रायड और अन्य मनोविश्लेषकों की रचनाएं उन्होंने, उन्हीं के शब्दों में, बचपन से ही उस 'क्यों-रोग' (जिज्ञासा की बीमारी) के कारण पढ़ी थीं जिससे वे पीड़ित थे (जिसके चलते उन्होंने कॉलेज में विज्ञान के छात्र के रूप में दाखिला लिया था)। लेकिन उन्हें यह स्पष्ट समझ थी कि मनुष्य जिन विभिन्न प्रकार के मानसिक विकारों से पीड़ित होता है और जिससे उसके सामाजिक संबंध प्रभावित होते हैं, उसका सूत्र खोजने के लिए फ्रायड के सिद्धांत की दमित आदिम प्रवृत्तियों (repressed primal instincts) की बात ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए व्यक्ति पर लगातार बदलते सामाजिक-परिवेश के दबाव की वास्तविकता को भी समझना होगा, जो भले ही सामाजिक मनुष्यों द्वारा ही निर्मित है, लेकिन जिसका एक बड़ा हिस्सा हमारे नियंत्रण से बाहर है। उनके 'चतुष्कोण' उपन्यास का नायक इसी 'क्यों-रोग' के प्रभाव में आकर समाज द्वारा 'स्वाभाविक' मानी जाने वाली बंदिशों के घेरे को छिन्न-भिन्न कर निषेध (वर्जना) के असामान्य स्रोत को खोजता है। वास्तव में, यह उसका एक 'ऑब्सेशन' (जुनून/अति-मोह) बन जाता है।

यह ध्यान देने योग्य है कि एक समय यह धारणा थी कि 'चतुष्कोण' 1948 में लिखा गया था, यानी उनके तथाकथित 'मार्क्स-दौर' में। इसे लेकर आलोचकों की असहजता के बारे में युगांतर चक्रवर्ती ने भी बताया है। हालांकि, बाद में पता चला कि पुस्तकाकार में इसका पहला प्रकाशन 1942 में हुआ था। इस संदर्भ में युगांतर चक्रवर्ती ने जो आगे कहा है, वह विचारणीय है: इतने समय बाद इस बात को जानकर आश्वस्त होने का प्रयास करते हुए भी, उनके कम्युनिस्ट-दौर की कुछ ऐसी रचनाएं या किसी रचना के कुछ ऐसे प्रसंग याद आ सकते हैं, जिन्हें मानिक बंद्योपाध्याय की स्थापित राजनीतिक छवि के साथ किसी एकतरफा या हठधर्मी व्याख्या द्वारा जोड़ना कठिन है। (मानिक बंद्योपाध्याय: द्वंद्व के दो चेहरे / एवं मुशायरा, 2008, पृष्ठ 125)। इसके अलावा, मानिक के कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होने में अभी भी लगभग दो साल बाकी थे, लेकिन इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि इस समय तक उन्होंने समाज-क्रांति के सिद्धांत का अध्ययन शुरू कर दिया था। 'चतुष्कोण' यह सिद्ध करता है कि इस नई रुचि का अभ्यास करते समय वे मानव मन की जटिलता के प्रसंग को भूल नहीं गए थे।

बल्कि, इस नई रुचि के मूल में भी उसी 'क्यों-रोग' का प्रभाव मौजूद था। मानव मन का विकार और उसकी अतार्किकता, उस व्यापक सामाजिक अतार्किकता की दुनिया से गहराई से जुड़ी हुई है जिसमें हम रहते हैं। मातृगर्भ के अंधकार से लेकर भय और आकर्षण से भरी इस विशाल, रहस्यमयी, अज्ञात और अर्ध-अंधकारमयी दुनिया के दायरे में हमारी हलचल मानिक को गहराई से आकर्षित करती है। मनुष्य इसके भीतर भी प्रकाश की तलाश करता रहता है, वह समस्याओं को हल करने का प्रयास नहीं छोड़ सकता। जब से मानिक मार्क्सवादी विचार की ओर आकर्षित हुए, उन्होंने इसके उपकरणों को इसी प्रकाश की खोज के सूत्र के रूप में देखा, किसी अंतिम समाधान के रूप में नहीं।

तर्क और अतार्किकता के बीच निरंतर द्वंद्व, टकराव और आदान-प्रदान उनकी रचनाओं में शुरू से ही रहा है। दुनिया की आदिम रहस्यमयता मनुष्य की बनाई हुई नहीं है, फिर भी उसके द्वारा निर्मित सामाजिक संबंधों के चक्रव्यूह में इस रहस्य की जटिलता बढ़ती ही जाती है; इस पर मनुष्य का नियंत्रण भले ही बहुत सीमित हो, लेकिन वही वास्तविक स्थिति को स्वीकार करते हुए भी तर्क की सहायता से उसे वश में कर सकता है, उस पर अपने जीवन को स्थापित कर सकता है। मनुष्य और उसके प्राकृतिक-सामाजिक परिवेश के बीच के इस अटूट संवाद को समझने का एक माध्यम मार्क्सवाद है। मार्क्सवाद से जब उनका वैसा परिचय नहीं हुआ था, क्या तब भी मानिक ने 'शशि' (पुतुलनाचेर इतिकथा का नायक) जैसे चरित्र का सृजन नहीं किया था? शशि कोई पराजित रोमान्टिक नायक नहीं है; उपन्यास के अंत में क्या वह अपने यथार्थ से गहराई से जुड़े एक परिपक्व मनुष्य में नहीं बदल जाता?

मानिक के लेखन में मानव जीवन की यह द्वैतता शुरू से अंत तक मौजूद है। इस रचनात्मक द्वैतता के प्रमाण उनकी रचनाओं के विवरणों की मारक संक्षिप्तता, बोलचाल की भाषा के छंद और संगीत के असाधारण उपयोग (जो 'पद्मा नदीर माझी' से लेकर एक किसान के माध्यम से कही गई पचास के अकाल की कहानी 'छिनिये खायनी केनो?' [छीनकर क्यों नहीं खाया?] तक लगातार जारी रहता है) और साथ ही संवादों की शैली में बहस, प्रश्न तथा जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति—इन सभी चीजों में मिलते हैं। उनके अंतिम दौर में लिखे गए 'स्वाधीनतार स्वाद' (1951), 'इतिकथार पोरेर कथा' (1952) या 'आरोग्य' (1953) जैसे उपन्यास, जो नई सामूहिक राजनीति का संदेश देते हैं—वहां भी मानवीय संबंधों की जटिलता और उसके साथ व्यक्ति के निरंतर मुकाबले की बात ओझल नहीं होती।

1931 में मानिक ने 'बृहत्तर ओ महत्तर' (बृहत्तर और महत्तर) नाम की कहानी लिखी थी, जिसे नौ साल बाद उन्होंने पूरी तरह बदलकर 'ममतादी' नाम से लिखा। हम कथावाचक के मुंह से उनके घर में उसके बचपन के दिनों में खाना पकाने आने वाली 'ममतादी' के बारे में सुनते हैं। मूल कहानी में, वह अपने अत्याचारी शराबी पति और बिगड़े हुए बच्चे के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी से मुक्ति पाकर गांव चली जाती है और किसी महिला संगठन में शामिल हो जाती है, जहाँ काम करते हुए उसे जेल भी काटनी पड़ती है। संसार के इस नरक से बाहर उसे कोई 'बृहत्तर या महत्तर' जीवन मिला या नहीं, कथावाचक यह सवाल अधूरा छोड़ जाता है। लेकिन दूसरी कहानी में, हम उसे नरक से बाहर निकलने के बारे में बार-बार सोचने के बावजूद उसी के भीतर बने रहते हुए देखते हैं; आत्मरक्षा के लिए आत्मसमर्पण करते हुए देखते हैं। क्या इसका मतलब यह है कि लेखक अपने पहले के कथानक के 'समाधान' को पूरी तरह से खारिज कर रहे हैं? शायद नहीं। उस चरित्र की गंतव्य दिशा दोनों तरह की हो सकती है—उपलब्ध विकल्पों की यह सीमा वास्तव में लेखक की दृष्टि की द्वंद्वात्मकता को दर्शाती है।

तर्क और अतार्किकता की द्वंद्वात्मकता मानिक की रचनाओं में कितनी विविधता लाती है, इसे एक ही वर्ष (1944) में लिखी गई दो कहानियों 'रोमांस' और 'साढ़े सात सेर चाल' (साढ़े सात सेर चावल) के कथानक को अगल-बगल रखकर समझा जा सकता है। ऊपर से देखने पर पहली कहानी उनके तथाकथित पहले दौर के अनुकूल लग सकती है; जहाँ वे दिखाते हैं कि दमित यौन-क्षुधा और उससे उत्पन्न विकार एक ग्रामीण लड़की के जीवन में कैसा जाल बुनते हैं। लेकिन वह असामान्यता तो गांव के उस दमघोंटू परिवेश की असामान्यता में ही निहित है, जहाँ एक तरफ नारी 'रोमांस' का भ्रम पालती है, तो दूसरी तरफ पति और प्रेमी दोनों मिलकर नारी के शरीर पर मालिकाना हक जताने और उसके इस्तेमाल का एक चक्र बना देते हैं। मगर क्या यह 'रोमांस' का सपना भी उस असहनीय जीवन के साथ एक हताश संवाद बुनकर लड़की के जीवित रहने का प्रयास नहीं है?

  • इसके विपरीत, 'साढ़े सात सेर चाल' मानिक के परवर्ती राजनीतिक दर्शन के अनुकूल अकाल की कठोर वास्तविक कहानी है। लेकिन वास्तविकता पर मानसिक असामान्यता की छाया बिछाकर मानिक का विवरण उजड़े हुए गाँव के क्रूर सच को 'सन्न्यासी' नाम के एक व्यक्ति के दुस्वप्न में बदल देता है। शहर से साढ़े सात सेर चावल वह खुद न खाकर जिन लोगों के लिए लाया था, भूख और अकेलेपन के उस असामान्य माहौल में उनकी अनुपस्थिति, मृत्यु से ठीक पहले सन्न्यासी की आँखों में उन्हीं लोगों की प्रेत-उपस्थिति का एक भ्रम (माया) रच देती है।

  • वहीं 'राघव मालाकार' (1946) निश्चित रूप से राजनीतिक विरोध की कहानी है; जो भोजन के साथ-साथ कपड़ों की असामान्य किल्लत की गाथा है। घर की महिलाओं के लिए पहनने के कपड़ों की स्वाभाविक मांग का सामना करने के प्रयासों में भी अतार्किकता हावी हो जाती है। लोगों के आक्रोश को संगठित करने का राघव का प्रयास ग्रामीणों की आपस की मारपीट में समाप्त हो जाता है। पुलिस आकर सबको डकैती के आरोप में गिरफ्तार कर लेती है। तो क्या इसका मतलब यह है कि विरोध करने जाना ही यहाँ असामान्य था? कथावाचक का स्वर इसके विपरीत बात कहता है। कहानी विद्रोही राघव मालाकार को संबोधित करते हुए उसकी तुलना द्रौपदी की लाज बचाने वाले कृष्ण से करती है।

  • मनुष्य की उचित मांगों के खिलाफ राज्य की सशस्त्र अतार्किकता को लेकर उनके अंतिम दौर की एक और कहानी है 'रक्त नोनता' (नमकीन खून, 1953)। डॉक्टर पुलिस की गोली से मरे हुए अपने बच्चे को छोड़कर चुपचाप जीवित मरीज का इलाज करता रहता है। लोग गुस्से में सड़कों पर उतर आए हैं; राज्य बौखलाकर उन पर गोलियां चलाकर उन्हें मार रहा है। परिवेश की इस समग्र अतार्किकता के खिलाफ, नियंत्रण से बाहर की स्थिति में भी, वह वही करने के लिए दृढ़ है जो तर्कसंगत है। जो मर गया उसे बचाया नहीं जा सकता; जीवित को जीवित रखने का प्रयास मानो मानवीय और चिकित्सीय तर्क के पक्ष में उसकी दांत भींचकर की जाने वाली जंग है। इन कुछ गिने-चुने उदाहरणों के माध्यम से मैंने यहाँ मानिक की रचनाओं के जटिल ताने-बाने का आभास देने का प्रयास किया है।

  • जब मानिक का जीवन समाप्त हुआ, तब पूरी दुनिया में और स्वतंत्र संप्रभु भारत में पिछले दौर के भारी मंथन के बाद कुछ स्थिरता आ रही थी। अंतर्राष्ट्रीय पटल पर तीसरी दुनिया के देशों की स्वतंत्रता के फलस्वरूप जहाँ साम्राज्यवाद के एकछत्र दबदबे की जगह कुछ हद तक संतुलन बन रहा था, वहीं देश के भीतर भी जन-कल्याणकारी राज्य व्यवस्था के वादों और उसके अनुकूल कुछ प्रगति के माध्यम से थोड़ी स्थिरता आई थी। लगभग दो दशकों तक चली यह स्थिरता फिर से बीते साठ के दशक के उत्तरार्ध से टूटने लगी। लोकतंत्र, समान अधिकार, धर्मनिरपेक्षता जैसे संवैधानिक मूल्यों की स्वीकार्यता भी तब से फीकी पड़ने लगी।

  • इस दौर में लोगों को जिस चीज़ ने झकझोरा और अतार्किकता की दुनिया में नए तर्क-निर्माण की आवश्यकता की ओर उंगली उठाकर दिखाया, वे थे—आपातकाल (इमरजेंसी), अर्ध-फासीवादी आतंक, उग्रपंथी राजनीति, एक राज्य में एक लोकप्रिय वामपंथी सरकार की लंबी पारी, सोवियत व्यवस्था के पतन के साथ ही नए उदारवाद के हथियारों से लैस होकर साम्राज्यवाद की बढ़ती हुई अस्वभाविक विजय-लालसा की स्वाभाविकता, जिसका ताल से ताल मिलाया इस देश में उग्र सांप्रदायिक फासीवाद के उदय ने। आज की पीढ़ी अपने इतिहास के पुनर्पाठ के माध्यम से इस स्थिति का सामना करने के लिए प्रतिबद्ध है। मानिक जीवनभर मानव जीवन के अंधकारमयी अतार्किकता के बीच जिस मानवीय तर्क की खोज में लगे रहे, उसका सूत्र आज हमारे लिए बेहद ज़रूरी है।

  • .

.

(लेखक पूर्व सांसद, जादवपुर विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग की पूर्व प्रोफेसर और अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की पूर्व अध्यक्ष हैं।)

साभार: मार्क्सवादी पथ

दिनांक: 20 मई,2026

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हम मानिक बंद्योपाध्याय को क्यों पढ़ें? - मालिनी भट्टाचार्य

प्रकाशित: 20 मई 2026 • 12 मिनट पठन

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बंगाल आज अराजकता के अंधकार में कैद है। एक ओर लूट का राज चल रहा है, तो दूसरी ओर नफरत और अविश्वास का जहर फैलाया जा रहा है। आम आदमी की जेब खाली हो रही है, जबकि सत्ताधारी दल सत्ता के अहंकार और लूट के पैसे से फल-फूल रहा है। रोजगार, सरकारी शिक्षा व्यवस्था, सरकारी स्वास्थ्य सेवा, किसानों की फसल की कीमत, मजदूरों की मजदूरी, खेतिहर मजदूरों का काम और महिलाओं का सम्मान—आज कुछ भी सुरक्षित नहीं है। जनता की वास्तविक पीड़ा, यानी उनकी असली समस्याओं को जाति, धर्म और भाषा के नाम पर विभाजन की राजनीति से दबाया जा रहा है। चोर और दंगाई—दोनों आज एकजुट हैं। इसलिए हमारी लड़ाई भी एकजुट होनी चाहिए। हम लड़ रहे हैं फसल के दाम के लिए, हम लड़ रहे हैं रोजगार की मांग के लिए। मध्यम वर्ग से लेकर गरीब तक—सभी के अधिकार वापस दिलाने होंगे। विभाजन नहीं, हमें काम और अन्न चाहिए। बंगाल के सौहार्द और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए आज मैदान में उतरें! यह नव-फासीवादी और तानाशाही आक्रमण एक-दूसरे के पूरक हैं। इनके खिलाफ लड़ाई वास्तव में लोकतंत्र, रोजगार, शिक्षा, आवास, मजदूरी, फसल के उचित दाम और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की लड़ाई है। यह लड़ाई किसान-मजदूर-छात्र-युवा-महिलाओं सहित सभी निम्न और मध्यम वर्गीय लोगों के अधिकारों और भाईचारा को बचाने की लड़ाई है। इसलिए आज सभी लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील शक्तियों के एकजुट संघर्ष की आवश्यकता है, ताकि बंगाल की जनता फिर से अपने अधिकार पा सके और विभाजन की राजनीति को परास्त किया जा सके। बंगाल बचाने की इस लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए वामपंथी, लोकतांत्रिक ,धर्मनिरपेक्ष शक्तियों की ओर से यह विकल्प घोषणापत्र राज्य की जनता के सामने पेश किया जा रहा है। अंधकार में डूबे हमारे प्रिय बंगाल में _अब रोशनी लाने की लड़ाई शुरू हो। . सबका बंगाल, सबके अधिकार रोजगार के अवसर, सामाजिक सुरक्षा और आधुनिक जीवन की सभी सुविधाएं सुनिश्चित करने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। बंगाल की मेधा (प्रतिभा) विश्वविजेता है, लेकिन बंगाल के लोग आज रोजगार के अभाव में राज्य से बाहर जाने को मजबूर हो रहे हैं। हमारा लक्ष्य एक ऐसा पश्चिम बंगाल बनाना है, जहाँ धर्म, जाति और लिंग के भेदभाव के बिना हर व्यक्ति की पहचान उसके काम से होगी। .... .... बंगाल के पुनर्जागरण में आप भी एक महत्वपूर्ण भागीदार हैं। मानव कल्याण के उज्ज्वल सपने को पूरा करने का एकमात्र मार्ग वामपंथ का पुनरुत्थान है। हम चाहते हैं कि विभाजन, द्वेष और नफरत की राजनीति की हार हो; जनता की एकता और मानवता की राजनीति मजबूत हो। हिंसा, घृणा, विभाजन और लूट-तंत्र के खिलाफ हमारी लड़ाई अडिग रहेगी; क्योंकि हमारा विश्वास है कि केवल एकता और न्याय के पथ पर ही वास्तविक जन-कल्याण संभव है। राज्य की इस अराजक स्थिति को समाप्त करने के लिए आगामी विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को पराजित करने के साथ-साथ भाजपा को भी रोकना होगा। वामपंथी, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के विकल्प को विजयी बनाना होगा। वाम मोर्चा और सहयोगी इंडियन सेकुलर फ्रंट, सीपीआई (एम-एल) लिबरेशन और पश्चिम बंगाल सोशलिस्ट पार्टी के सभी उम्मीदवारों को विजयी बनाएं। वामपंथ के पुनर्जागरण के पथ पर वामपंथी-लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष शक्तियों की 'जनता की सरकार' का निर्माण करें। . हम इस राज्य में शांति, भाईचारा, रोजगार का अधिकार और सम्मानजनक जीवन को प्रतिष्ठित करेंगे।यह हमारा संकल्प है।

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