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"चटकल मजदूरों की स्थिति"- मंगल बेनबंशी

श्रेया जायसवाल•26 मई 20264 मिनट पठन265 बार पढ़ा गया

केंद्र की मोदी सरकार ने बांग्लादेश से जूट खरीदना बंद कर दिया है और केंद्रीय वस्त्र मंत्री संसद में कहते है कि हमारे देश में जूट की कोई कमी नहीं है। दूसरी तरफ चल रहा है,जूट की जमाखोरी एवं काला बाजारी । JPM एक्ट 1987 का उल्लंघन करके सिंथेटिक बैग बनाने वाली कंपनियों को 10 लाख 75 हज़ार जूट बैग के ऑर्डर दिए गए हैं। असल में, हमारे देश में सिंथेटिक बैग बनाने वाली फैक्ट्री का मालिक कॉर्पोरेट पूँजीपति अंबानी है। जूट की कमी को दिखाते हुए, जूट मिल मालिक अपनी मर्ज़ी से मिलें खोल रहे हैं और गैर-कानूनी तरीके से मिलें बंद कर रहे हैं। मज़दूरों को वेतन, नुकसान का मुआवजा नहीं दी जा रही है, त्रिपक्षीय समझौता में तय हुआ कि जो मिलें चल रही हैं, जिनमें बंद मिलें भी शामिल हैं, लेकिन मज़दूरों को काम नहीं मिल रहा है, उन मज़दूरों को वेतन नुकसान का मुआवजा देना होगा।

"चटकल मजदूरों की स्थिति"- मंगल बेनबंशी

चटकल मजदूरों की स्थिति

मंगल बेनबंशी

पश्चिम बंगाल का चट उद्योग, बंगाल के अन्य बड़े उद्योगों में से एक उद्योग है । हुगली नदी के दोनों किनारे स्थित चट उद्योग की स्थापना ब्रिटिश शासन काल से ही हुयी है । शुरुआती दौर से ही इस चटकल में काम करने के लिए मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश ,उड़ीसा, आंध्र प्रदेश इत्यादि राज्यों से प्रवासी मजदूर के रूप में रोजगार की तलाश में आए और लगभग तीन-चार पीढ़ीयों ने अपने जीवन जीविका के साधन के लिए चटकल में काम करने लगे । जूट उत्पादन वस्तु का विदेशी बाजार में मांग के कारण , जूट विदेशी मुद्रा आय का भी स्रोत है । चट उद्योग में 12 महीने ऑर्डर ना रहने के कारण, प्राय: 3-4 महीना चटकल बंद रहता था । चूंकि इस चटकल में काम करने वाले मजदूर प्रवासी थे । चटकल बंद होने पर अपने राज्य को वापस चले जाते थे। प्राय: 3-4 महीने मिल बंद होने के कारण, मजदूरों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता था और अपने राज्य के ग्रामीण कार्यों में, रोजी-रोटी के लिए भाग लेते थे । और मिल खुलते ही चटकल में काम करने के लिए वापस चले आते थे । चटकल की स्थिति में एक बड़ा बदलाव तब हुआ, जब 1987 में संसद के अंदर जेपीएम एक्ट 1987 लागू करने के लिए, बंगाल के वाम सांसदों ने जब संसद में जोरदार तरीके से इस पर आवाज उठाई । ताकि चटकल उद्योग को 12 महीने चालू रखा जा सके और इसके अतिरिक्त ग्रेच्युटी का कानून एवं सामाजिक सुरक्षा वाम संसदो़ंं की लड़ाई का ही परिणाम था।

जूट उद्योग की वर्तमान स्थिति

जूट मिलें, जूट उद्योग के इतिहास में सबसे मुश्किल हालात में गुज़र रही हैं। करीब 18 जूट मिलें बंद हैं। जो मिलें खुली भी हैं, वहाँ भी शिफ्ट और मशीनों कम करके काम हो रहा है। लगभग 50-60 हज़ार से ज़्यादा जूट मिल मज़दूर बेरोज़गार हैं और आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। जूट कमिश्नर का कहना है कि इस साल जूट की खेती 30% कम हुई है। केंद्र की मोदी सरकार ने बांग्लादेश से जूट खरीदना बंद कर दिया है और केंद्रीय वस्त्र मंत्री संसद में कहते है कि हमारे देश में जूट की कोई कमी नहीं है। दूसरी तरफ चल रहा है,जूट की जमाखोरी एवं काला बाजारी । JPM एक्ट 1987 का उल्लंघन करके सिंथेटिक बैग बनाने वाली कंपनियों को 10 लाख 75 हज़ार जूट बैग के ऑर्डर दिए गए हैं। असल में, हमारे देश में सिंथेटिक बैग बनाने वाली फैक्ट्री का मालिक कॉर्पोरेट पूँजीपति अंबानी है। जूट की कमी को दिखाते हुए, जूट मिल मालिक अपनी मर्ज़ी से मिलें खोल रहे हैं और गैर-कानूनी तरीके से मिलें बंद कर रहे हैं। मज़दूरों को वेतन, नुकसान का मुआवजा नहीं दी जा रही है, त्रिपक्षीय समझौता में तय हुआ कि जो मिलें चल रही हैं, जिनमें बंद मिलें भी शामिल हैं, लेकिन मज़दूरों को काम नहीं मिल रहा है, उन मज़दूरों को वेतन नुकसान का मुआवजा देना होगा। इस समय जूट मिलों में मज़दूरों की छंटनी शुरू है, मशीन और उत्पादन का बहुत ज़्यादा बोझ है, यूनियन की बात न मानकर मिलों को अपनी मर्ज़ी से चलाने की कोशिश है, लेबर कोड को बिना आलोचना लागू करना है, ठेका प्रथा को पूरी तरह लागू करना है, जूट मिलों में त्रिपक्षीय समझौता अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हुआ है, मज़दूरों का ग्रेडेशन, मैन-मशीन अनुपात तय किए बिना, मशीन एवं उत्पादन का बोझ जानबूझकर मज़दूरों पर डाला जा रहा है, मज़दूरों को गैर-कानूनी तरीके से एक डिपार्टमेंट से दूसरे डिपार्टमेंट में ट्रांसफर किया जा रहा है। समझौते के मुताबिक मज़दूरों की बकाया ग्रेच्युटी का पेमेंट नहीं किया जा रहा है। यह सब राज्य की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस पार्टी के मदद से चल रहा था । विरोध की आवाज़ को दबाने के लिए टी एम सी सत्ताधारी पार्टी के मदद से मज़दूरों और मज़दूर नेताओं पर हमले करवाए गये। सत्ता परिवर्तन के बाद स्थिति एक जैसी ही है।

चटकल मजदूर का निवास स्थान

चटकल मजदूरों के रहने की जगह , आज भी वैसी है जैसे ब्रिटिश शासन काल के समय थी । मजदूर क्वार्टर की टूटी -फूटी हालत, निकासी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं, मजदूर बस्ती में कूड़े करकट का ढेर, पुराने ढांचे का सार्वजनिक शौचालय और टूटी- फूटी हालत में, जहां दरवाजे की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं ।

आज के इस आधुनिक युग में भी, सामाजिक व्यवस्था से वंचित, चटकल के मजदूर 100 साल पीछे की जिंदगी जी रहे हैं ।

(लेखक : बंगाल चटकल मजदूर यूनियन के महासचिव हैं)

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"चटकल मजदूरों की स्थिति"- मंगल बेनबंशी

प्रकाशित: 26 मई 2026 • 4 मिनट पठन

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