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अनीक दत्त:-श्रद्धांजलि (शिबम दास )

श्रेया जायसवाल•29 मई 20265 मिनट पठन35 बार पढ़ा गया

अनीक दा सिनेमा में लौटना चाहते थे! लेकिन आज वह शववाहन (एम्बुलेंस) में 'नंदन 'लौटे! जिस 'नंदन' ने उनकी फिल्म को बार-बार ठुकराया, उसी 'नंदन' में आज वह इस भारी कोलाहल के बीच शांत होकर सोए हुए लौटे! जो लोग आज भीड़ लगाकर खड़े हैं, क्या वे उस दिन इसी तरह उनके साथ आकर खड़े होकर नहीं कह सकते थे—"अनीक दा, आपकी फिल्म 'नंदन 'में चलेगी ही चलेगी! हम आपके साथ हैं!" पता नहीं, किसी ने ऐसा क्यों नहीं कहा! आज अब ये सब कहने से भी क्या होगा! जो चला गया, वह तो वापस नहीं आता! इंसान कभी लौटकर नहीं आता! समय के नियम के अनुसार सब कुछ धुंधला हो जाता है! लेकिन मैं दिल से मानता हूँ कि सब कुछ खो जाने के बाद भी, इन चापलूसों की भीड़ में अनीक दत्त का सिनेमा, उनकी सामाजिक चेतना और उनका प्रतिवाद हमेशा एक इतिहास बनकर ज़िंदा रहेगा!

अनीक दत्त:-श्रद्धांजलि  (शिबम दास )

अनीक दत्त:-श्रद्धांजलि

शिबम दास

उस दिन अनीक दा को बहुत दुख हुआ था! वोट देने गए तो अचानक ही तृणमूल कांग्रेस के कुछ समर्थकों के साथ उनकी बहस हो गई! इसके तुरंत बाद उन्होंने देखा कि घर पर पुलिस का नोटिस आया है! शायद अनीक दा के खिलाफ छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज कराई गई थी! कारण? उन्होंने बस इतना कहा था कि मतदान केंद्र के बाहर इस तरह भीड़ लगाकर क्यों बैठे हो? बदले में तृणमूल के लड़के उनकी तरफ झपट पड़े! और इसी वजह से अनीक दत्त के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज कर दिया गया! बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने उस दिन खुद पूरे मामले को संभाला था! उन्होंने फोन पर कहा, "क्या ऐसा भी हो सकता है शिवम? तुम लोग आज कैसे काम कर रहे हो, यह मैं समझ रहा हूँ!"

इसके बाद मैंने अनीक दा को 'अपराजित' के समय दुखी होते देखा था! बहुत कोशिशों के बाद भी सत्यजीत राय को समर्पित करके बनाई गई उनकी फिल्म को 'नंदन' (सिनेमा हॉल) में नहीं दिखाया जा सका! बाद में कोलकाता फिल्म फेस्टिवल में भी उस फिल्म को जगह नहीं मिली! मुँह से तो वो कहते थे कि देश-विदेश में हर जगह फिल्म को पुरस्कार मिले हैं, इसलिए कोई मलाल नहीं है! लेकिन मैं समझता था कि उन्हें अंदर से बहुत दुख पहुँचा है! आज जो लोग उनके शव के पास भीड़ लगाकर खड़े हैं, क्या उस दिन किसी ने प्रतिवाद किया था? जवाब है, नहीं! अनीक दा ने फोन करके कहा था, "कोई तो कुछ नहीं बोल रहा है! क्या तुम कुछ कर सकते हो?" मैंने विवेकानंद पार्क वाले अनीक दा के फ्लैट पर जाकर उनका इंटरव्यू लिया था! कल मैं वही इंटरव्यू देख रहा था। उन्होंने कहा था, "शायद वे लोग इस फिल्म को इस लायक नहीं समझते, इसीलिए...! 'नंदन 'में ममता (बनर्जी) के पोस्टर रहें, सत्यजीत राय से अब क्या लेना-देना?"

अनीक दा नियमित रूप से हमारे वीडियो देखते थे! व्हाट्सएप करते थे! वीडियो शेयर करते थे! उन्हीं अनीक दा से एक दिन मैंने कहा कि मैं कोर्ट मैरिज (रजिस्ट्री) कर रहा हूँ, आपको आना होगा! उन्होंने कहा, "इस बार छोड़ दो! शादी में जाऊँगा! तबीयत ठीक नहीं है! सीओपीडी (COPD) बहुत गंभीर स्थिति में पहुँच गया है! रजिस्ट्री के बाद एक दिन घर आना।" अनीक दा कभी झूठ नहीं बोलते थे! इसलिए मैं समझ गया था कि शायद अब उनका शरीर उनका साथ नहीं दे रहा है! बाद में सुना कि वह अस्पताल में भर्ती हो गए हैं! 'जतो कांडो कोलकाताते' (Jato Kando Kolkatate) को उन्होंने इसी हालत में पूरा किया था!

उन अनीक दा को मैंने कभी इस तरह बेजान लेटे हुए नहीं देखा था, जैसा आज देखा! अनीक दत्त का मतलब था—लगातार बातें करना, गजब का सेंस ऑफ ह्यूमर और प्रखर बुद्धिमत्ता! जो इंसान सिर्फ अपने तर्कों से किसी को 'खत्म' कर सकता था, उसने आत्महत्या कर ली है, यह मेरे जैसे कई लोगों के लिए बहुत बड़े आश्चर्य की बात है।

अभी तो उस दिन की बात है, मैं दक्षिण कोलकाता में इस बार के दुर्गापूजा एपिसोड की शूटिंग के लिए गया था! अनीक दत्त की फिल्म 'जतो कांडो कोलकातातेइ' अभी रिलीज़ ही हुई थी! शूटिंग के बीच में करीब एक घंटे का खाली समय था। मैंने बिना झिझक अनीक दा को फोन किया! उन्होंने कहा, "चले आओ! कुछ बात करनी है! किसकी शूटिंग है?" मैंने कहा, "सृजन (भट्टाचार्य)और कलतान(दासगुप्ता )की!" उन्होंने कहा, "उन्हें भी साथ ले आओ!" इसके बाद अड्डा (बातचीत का दौर) शुरू हुआ! वह एक घंटे का था या तीन घंटे का, आज मुझे ठीक से याद नहीं! लेकिन जब मैं अनीक दा के घर से निकला, तो कोलकाता दुर्गा पूजा की चतुर्थी की शाम की भीड़ से जाम हो चुका था। आखिरी के कुछ घंटों में अनीक दा ने सौरव पालोधी की फिल्म 'अंको कि कठिन' पर, उन्होंने अपनी फिल्म में अर्क के बजाय पोटा से गाना क्यों गवाया—इस पर, निर्देशक सृजित मुखर्जी की 'पदातिक' पर, और अबीर, जीतु, प्रसेनजीत पर जमकर बातें की थीं! कभी-कभी अनीक दा की बातचीत का विषय दीप्सिता(धर), सृजन, शतरूप, ममता और बुद्धदेव भट्टाचार्य की राजनीति बन जाता था! सिंगुर, नंदीग्राम से लेकर शाहरुख खान तक—अनीक दा के ज्ञान का दायरा आसमान की तरह विशाल था।

और यह कहने के बाद भी कि 'अब फिल्में नहीं बनाऊँगा', अनीक दा 'अपराजितो 2' की योजना बना रहे थे! अनीक दा खुद को एक नए सांचे में ढालकर कॉलेज रोमांस पर आधारित एक फिल्म बनाना चाहते थे! हीरो के रूप में देब कैसे लगेंगे, इस पर भी लंबी बहस हुई थी! अनीक दा सिनेमा में लौटना चाहते थे! लेकिन आज वह शववाहन (एम्बुलेंस) में 'नंदन 'लौटे! जिस 'नंदन' ने उनकी फिल्म को बार-बार ठुकराया, उसी 'नंदन' में आज वह इस भारी कोलाहल के बीच शांत होकर सोए हुए लौटे! जो लोग आज भीड़ लगाकर खड़े हैं, क्या वे उस दिन इसी तरह उनके साथ आकर खड़े होकर नहीं कह सकते थे—"अनीक दा, आपकी फिल्म 'नंदन 'में चलेगी ही चलेगी! हम आपके साथ हैं!" पता नहीं, किसी ने ऐसा क्यों नहीं कहा! आज अब ये सब कहने से भी क्या होगा! जो चला गया, वह तो वापस नहीं आता! इंसान कभी लौटकर नहीं आता! समय के नियम के अनुसार सब कुछ धुंधला हो जाता है! लेकिन मैं दिल से मानता हूँ कि सब कुछ खो जाने के बाद भी, इन चापलूसों की भीड़ में अनीक दत्त का सिनेमा, उनकी सामाजिक चेतना और उनका प्रतिवाद हमेशा एक इतिहास बनकर ज़िंदा रहेगा!

आप क्यों चले गए अनीक दा? आपकी फिल्म के लिए हम दिनों-दिन इंतज़ार करते रहे! आपने एक बार भी हमारे जैसे प्रशंसकों के बारे में नहीं सोचा? शायद नहीं सोचा! और आपके बारे में ही किसने सोचा था? किसी ने नहीं! अच्छे रहिएगा! सिनेमा आपको बहुत मिस करेगा! मैं भी करूँगा! बस फर्क इतना है कि आपको अब पहले की तरह कुछ पता नहीं चल पाएगा! और हम भी तो आपके दिल की बात नहीं जान पाए! इसीलिए तो यह हार हुई! यह त्रासदी हुई! अनीक दत्त

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(लेखक शिबम दास The Independent Bengal बांग्ला न्यूज पोर्टल के प्रसिद्ध रिपोर्टर हैं)

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अनीक दत्त:-श्रद्धांजलि (शिबम दास )

प्रकाशित: 29 मई 2026 • 5 मिनट पठन

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