जन समाचार मंच

धुरंधर: द रिवेंज— अवधि 229 मिनट- लगभग चार घंटे का एक घृणित, फूहड़ और सस्ते राजनीतिक प्रचार का बेहद घटिया नमूना, जो राष्ट्रीयता, मानवता और जासूसी जैसे गंभीर विषयों का खुल्लमखुल्ला उपहास उड़ाता है। यह फिल्म मोदी सरकार की अंधभक्ति और अनावश्यक चाटुकारिता का जीता-जागता प्रमाण है, जिसमें उन्नत तकनीक के हथियारों का ढोंग रचकर भी नायक और खलनायक हर लड़ाई के अंत में जंगली जानवरों की तरह आदिम हिंसा पर उतर आते हैं। विभत्स क्रूरता, भाषाई गंदगी और स्वयं की तारीफ में डूबी यह रचना न केवल सिनेमा की गरिमा को कलंकित करती है, बल्कि देशभक्ति और बलिदान के पवित्र नाम पर नई पीढ़ी को खतरनाक ढंग से भटकाती है। फिल्म की शुरुआत से ही इसका कुरूप चेहरा उजागर होता है। हीरो जस्कीरत सिंह रंगी (रणवीर सिंह) अपने परिवार- पिता की निर्मम हत्या और दोनों बहनों- पर हुए अत्याचार के ‘प्रतिशोध’ के बदले में विधायक और उसके परिवार की निर्मम हत्या करता है। उन्नत सैन्य प्रशिक्षण के बावजूद हथौड़े से सिर फोड़ने, सीमेंट ब्लॉक से कुचलने और आँख फोड़ने जैसे जंगलीपन से भरे दृश्य हैं। सेंसर बोर्ड की काट-छाँट करने के बावजूद हिंसक दृश्यों का घिनौनापन कायम रहा है। मध्यांतर के बाद गैंगवार और राजनीतिक सत्ता के दृश्यों में तो हिंसा और भी बर्बर हो जाती है — सर कलम करना, लातों से कुचलना और आग लगाकर मारना जैसे सीन फिल्म को ‘टॉर्चर पोर्न’ बना देते हैं। फ़िल्म में रॉ की कार्यप्रणाली का मजाक बना दिया गया है: एक अंडरकवर एजेंट बिना किसी वास्तविक चुनौती के पाकिस्तानी सिंडिकेट का राजा बन जाता है। यह जासूसी नहीं, बल्कि जासूसी के नाम पर सस्ता नशा है, फूहड़ता है। फिल्मों की आम बात है कि धन लगाकर वे साबित करती है कि बौद्धिकता गैर जरूरी है। फिल्म स्वयं को ‘धुरंधर’ कहकर महिमामंडित करती है, जबकि वास्तव में यह मोदी सरकार की नीतियों (नोटबंदी को मास्टरस्ट्रोक दिखाना, प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण क्लिप्स सम्मिलित करना) की बेहद घटिया चापलूसी है। 26/11 जैसे हमलों का बदला लेने के नाम पर पूरे पाकिस्तान को शैतान साबित करना और भारतीय खुफिया तंत्र को अतिरंजित रूप में पेश करना — यह सब सच्ची देशभक्ति नहीं - गुरुदेव रबीन्द्र नाथ ठाकुर के शब्दों में - जहरीला राष्ट्रवाद है। भाषाई अभद्रता इतनी ज्यादा है कि सीबीएफसी को कई गालियां म्यूट करनी पड़ीं, फिर भी अत्यधिक बची रह गयी। यह फिल्म दर्शकों , जिसमें अधिकतर युवा है, को सिखाती है कि देशभक्ति का मतलब प्रतिशोध, क्रूरता और राजनीतिक चाटुकारिता है — न कि समर्पण, बुद्धिमत्ता या मानवीय मूल्य। विदेशी मीडिया ने भी इसकी पोल खोल दी है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसे “ultraviolent rah-rah sequel” और “license to kill a lot” करार दिया, जहां रणनीति की जगह सिर्फ हत्या-प्रतिहत्या है। वैरायटी ने इसे “brazen, blood-soaked saga that nakedly preys on jingoistic sentiment and fawns at the foot of government power” बताया। बीबीसी और अन्य आउटलेट्स ने hyper-nationalist टोन, अत्यधिक हिंसा और भारत-पाकिस्तान संबंधों को inflammatory बनाने की निंदा की। रोटन टोमाटोज पर मात्र 38% स्कोर के साथ इसे “overlong, gratuitously violent, and brimming with self-indulgence” माना गया। विदेशी समीक्षक इसे sociopathic, propaganda और toxic barbaric nationalism कहकर खारिज कर चुके हैं। संक्षेप में, धुरंदर: द रिवेंज एक घटिया व्यावसायिक उत्पाद है जो हिंसा, प्रचार और स्वप्रशंसा के सहारे पैसे कमाने का धंधा करती है। देशभक्ति और बलिदान के नाम पर यह नई पीढ़ी को क्रूरता और अंध राष्ट्रवाद की ओर धकेलती है। ऐसी फिल्मों की न प्रशंसा होनी चाहिए, न स्वीकार किया जाना चाहिए। यह सिनेमा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक पतन का प्रतीक है। और खास धोखाधड़ी यह है कि फ़िल्म शातिरता से डिक्लेरेशन की इम्युनिटी को अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करती है। दृश्यों, चरित्रों का गठन स्पष्ट करता है कि फ़िल्म एक विशेष नैरेटिव सेट करते हुए पाकिस्तान नामक घाव के रिसते मवाद को देशप्रेम की चाशनी में लपेटकर कुंठित मनोदशा को जय का सुख देकर आमदनी करती है। कमोबेश भारतीय व्यावसायिक सिनेमा फूहड़ता के नए सोपान गढ़ता ही है, तो इस पर ही लिखना क़्यो जरूरी लगा ? इस फ़िल्म को लेकर एक हाइप महसूस हुई। फ़िल्म और फ़िल्म के आय-व्यय के आंकड़े देखने के बाद स्पष्ट हुआ कि परंपरागत प्रचार के तरीकों से हटकर सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स पर फ़िल्म ने जबरदस्त धन बहाया है। और इंफ्लुएंसर्स ने धन लेकर बदले में एक सिंथेटिक प्रमोशन कर हाइप की माया रच डाली। वास्तविक घटनाओं का काल्पनिक प्रतिशोध देखकर, आनंद मिलता है तो लें, लेकिन साथ ही ठहरकर सोचें कि यह आनंद क्यों ? और यह सोचना जरूरी है। गिरावट का दौर तीव्रतर होता जा रहा है, यह कहां जाकर रुकेगा। क्या भारत पाकिस्तान के बर्बाद राजनीतिक स्तर को मानक मानकर चलेगा ? क्या यही विकास है ? यहां तक आते आते स्पष्ट है कि फ़िल्म तो फ़िल्म है, और रचनाशीलता के विभिन्न आयाम, सकारात्मक और नकारात्मक, होना एक सामान्य बात है। लेकिन डिस्क्लेमर की इम्युनिटी लेकर सेंस और सेंसर को चुनौती देती जियो स्टूडियो की प्रस्तुति धुरंधर जिस फूहड़ता, छिछोरी भाषा और अतार्किकता के साथ बहुत ही महीन तरीके से दर्शकों के जेहन में, दिमाग में जो धुंध भर रही है, उसे युवाओं के लिए, देश के लिए ठीक नहीं समझता। मन उसका तीव्र विरोध करता है। तमाम चिंताओं के बावजूद इसमें दो मत नहीं कि फ़िल्म व्यावसायिक रूप से सफल होने के साथ ही फ़िल्म-उद्योग से लेकर दर्शकों तक - सोच से लेकर विमर्श तक एक विभाजक रेखा के रूप में भी सफल है। सभी के अपने-अपने पाकिस्तान उरूज पर हैं। यह गंभीर बात है। धुरंधर-1 और धुरंधर-2 में से ही चुनने की बाध्यता हो तो पहली को दूसरी से बेहतर मेकिंग कहूंगा। जयहिंद।
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प्रकाशित: 10 अप्रैल 2026 • 5 मिनट पठन

"न्याय केवल होना नहीं चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखना भी चाहिए - क्या हमारा लोकतंत्र इस कसौटी पर खरा उतर रहा है?" प्रस्तुत विश्लेषण भारतीय न्यायपालिका और निर्वाचन आयोग जैसी शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं में गहराते 'हितों के टकराव'और संस्थागत क्षरण पर चिंता व्यक्त करता है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा द्वारा चुनाव आयोग से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करना - जबकि उनके पुत्र आयोग के स्थायी वकील हैं - न्यायिक शुचिता और रोस्टर नियमों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इसी दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त की आईएएस बेटी को हाईकोर्ट के दंडात्मक आदेश से सुप्रीम कोर्ट द्वारा त्वरित राहत मिलना और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका का अनिश्चितकाल के लिए टल जाना व्यवस्थागत पक्षपात की ओर इशारा करता है। यह पूरा घटनाक्रम यह दर्शाता है कि कार्यपालिका (सरकार) के बढ़ते प्रभाव और प्रक्रियागत कमियों के कारण देश 'नियंत्रित लोकतंत्र' और संवैधानिक संतुलन के कमजोर होने की दिशा में बढ़ रहा है।
कुछ घंटे पहले

28 सितंबर 2026 - शहीद-ए-आजम भगत सिंह की 119वीं जयंती है। उनका प्रसिद्ध नारा ‘इंकलाब जिंदाबाद’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध आदमी होने की असली तमीज़ और चेतना का महाकाव्य है। यह वर्ष 'नौजवान भारत सभा' का शताब्दी वर्ष और 'शहीद यादगार समिति' का रजत जयंती वर्ष भी है। भगत सिंह की क्रांतिकारी आवाज़ केवल शोर नहीं थी, बल्कि उसके पीछे गहरा अध्ययन, सामाजिक न्याय और विश्व के महान विचारकों का वैचारिक आधार था। साम्राज्यवादी ब्रिटिश हुकूमत ने डरकर 23 मार्च 1931 को उन्हें फाँसी दे दी, लेकिन उनके विचार आज भी अमर हैं। ‘इंकलाब जिंदाबाद’ बाज़ारवाद, शोषण और अन्याय के खिलाफ आम आदमी की चेतना और बदलाव के लिए संघर्ष का प्रतीक है। आज के अवसरवादी राजनीतिक दौर में भगत सिंह के विचार एक न्यायपूर्ण भविष्य गढ़ने की प्रेरणा देते हैं और मशाल बनकर राह दिखाते हैं।
27 सितंबर 2026

वोटर लिस्ट में शुद्धि के नाम पर करोड़ों नागरिकों के मताधिकार पर डाका- यह लोकतंत्र का सुधार नहीं, उसका संहार है! विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में अन्य आयुक्तों की आपत्तियों को दरकिनार कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के एकतरफा फैसलों ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी सॉफ्टवेयर, आईटी विभाग के केंद्रीकरण और 'फॉर्म 7' के थोक दुरुपयोग के जरिए करोड़ों पात्र व अल्पसंख्यकों के नाम मतदाता सूची से बाहर करने की साजिश का पर्दाफाश हुआ है। अपीलों की जांच में 91% मामलों में नाम बहाल होना आयोग की मनमानी और न्यायिक ट्रिब्यूनल व सुप्रीम कोर्ट की नाकामी को उजागर करता है। यदि निष्पक्षता और जिम्मेदार अधिकारियों की बर्खास्तगी की मांग नहीं उठाई गई, तो देश के चुनावी लोकतंत्र का भविष्य बेहद अंधकारमय है।
27 सितंबर 2026

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों के लिए नहीं, बल्कि इतिहास के दबे हुए पन्नों को जिंदा करने के लिए बनाई जाती हैं। निर्देशक हनी त्रेहान की फिल्म 'सतलुज' (पूर्व नाम: घल्लूघारा / पंजाब '95) एक ऐसी ही फिल्म है। यह फिल्म सिर्फ एक सिनेमाई अनुभव नहीं, बल्कि पंजाब के इतिहास और समकालीन भारतीय राजनीति का एक ऐसा विस्फोटक कोलाज है, जिसने सेंसरशिप से लेकर नेशनल सिक्योरिटी (राष्ट्रीय सुरक्षा) तक की कई बहसों को दोबारा जिंदा कर दिया है।
केशव कुमार भट्टड़ • 13 जुलाई 2026

फिल्म का रीढ़ कंपा देने वाला हिस्सा यह संवाद है जो भारतीय समाज की उस गहरी नस को छूता है जिसे सदियों से 'नियतिवाद' (Fatalism) और 'यथास्थितिवाद' (Status Quo) के नाम पर सींचा गया है। 'माई' का यह तर्क केवल एक सरलचित्त माँ का विचार नहीं है, बल्कि यह भारतीय मानसिकता में गहरे तक पैठी उस सामाजिक कंडीशनिंग (Conditioning) का दस्तावेज़ है जो शोषण को भी 'ईश्वरीय विधान' मानकर स्वीकार कर लेती है।
इस मानसिकता का परत-दर-परत विश्लेषण जरूरी हो जाता हैं।
“माई कहा करती थी सर , समाज का एक ठो विधान होता है.. राजा होता है.. प्रजा होती है.. सेवक होता है.. दास होता है। इस सबका संतुलन है सर एक… ब्रह्मा जी ने बनाया है…संस्कृत में। हमको कोई अधिकार नहीं है, इस संतुलन को बिगाड़ने का। और सर... सब बराबर हो जाएंगे तो फिर राजा कौन बनेगा ? “ - “लेकिन राजा बनाना ही क्यों है ?” नायक-नायिका (पुलिस-पत्रकार हैं ) का चिंतन उभर कर सामने आता है।
केशव कुमार भट्टड़ • 24 जून 2026

यह तथ्य अत्यंत दुखद और विचारणीय है कि इतने गहन शोध, राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त निर्देशक और इरफ़ान ख़ान जैसे शानदार अभिनेता की कलात्मक निष्ठा से निर्मित यह ऐतिहासिक फिल्म धरोहर आज प्रसार भारती (दूरदर्शन) के अभिलेखागारों (Archives) में कहीं धूल फाँक रही है। अफसर ना सुनते हैं, ना सुध लेते हैं , यहाँ तक कि अनगिनत पत्राचार और सुझावों के बावजूद इसे किसी भी डिजिटल या प्रसारण माध्यम पर उपलब्ध कराया जाना तो दूर की बात , ई-मेल और पत्रों का जबाब तक नहीं मिलता- छह बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त , अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देशक गुलबहार सिंह ने दुखी मन से बताया - यह एक गहरे अनैतिक - प्रशासनिक, सामाजिक और सांस्कृतिक - अपराध के समान है।
आज के दौर में जब मुख्यधारा के मीडिया और फ़िल्मों का एक बड़ा वर्ग समाज में वैमनस्य, नफ़रत, शोर और विभाजन फैलाने का औजार बनता जा रहा है, डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘प्रेमचंद – एक जीवन’ यह सिद्ध करती है कि धर्म, भाषा और संस्कृति कभी भी भारतीय जनमानस में नफ़रत का आधार नहीं रहे हैं। फ़िल्म का हर फ्रेम सादगी में भव्यता की कहानी कहता है और एक शांत, गंभीर, कल-कल बहती नदी की तरह दर्शक को अपने साथ बहा ले जाता है। निर्माण के दौरान निर्देशक गुलबहार सिंह को जिस सुकून और निर्झर आनंद की अनुभूति हुई होगी, वह इस फ़िल्म के एक-एक फ्रेम में छलकती है। यह फ़िल्म देश के प्रत्येक स्कूल, विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक मंचों पर अनिवार्य रूप से दिखाई जानी चाहिए। प्रसार भारती को अविलंब इस अमूल्य धरोहर को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना चाहिए ताकि देश की नई पीढ़ी प्रेमचंद के लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील भारत के सपने से जुड़ सके।
केशव कुमार भट्टड़ • 05 अगस्त 2026
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