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सेंस और सेंसर को चुनौती देती जियो स्टूडियो की प्रस्तुति धुरंधर । देशभक्ति और बलिदान के नाम पर यह नई पीढ़ी को क्रूरता और अंध राष्ट्रवाद की ओर धकेलती है।

केशव कुमार भट्टड़•10 अप्रैल 20265 मिनट पठन109 बार पढ़ा गया
धुरंदर: द रिवेंज एक घटिया व्यावसायिक उत्पाद है जो हिंसा, प्रचार और स्वप्रशंसा के सहारे पैसे कमाने का धंधा करती है। देशभक्ति और बलिदान के नाम पर यह नई पीढ़ी को क्रूरता और अंध राष्ट्रवाद की ओर धकेलती है। ऐसी फिल्मों की न प्रशंसा होनी चाहिए, न स्वीकार किया जाना चाहिए। यह सिनेमा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक पतन का प्रतीक है। और खास धोखाधड़ी यह है कि फ़िल्म शातिरता से डिक्लेरेशन की इम्युनिटी को अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करती है। दृश्यों, चरित्रों का गठन स्पष्ट करता है कि फ़िल्म एक विशेष नैरेटिव सेट करते हुए पाकिस्तान नामक घाव के रिसते मवाद को देशप्रेम की चाशनी में लपेटकर कुंठित मनोदशा को जय का सुख देकर आमदनी करती है। कमोबेश भारतीय व्यावसायिक सिनेमा फूहड़ता के नए सोपान गढ़ता ही है, तो इस पर ही लिखना क़्यो जरूरी लगा ? इस फ़िल्म को लेकर एक हाइप महसूस हुई। फ़िल्म और फ़िल्म के आय-व्यय के आंकड़े देखने के बाद स्पष्ट हुआ कि परंपरागत प्रचार के तरीकों से हटकर सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स पर फ़िल्म ने जबरदस्त धन बहाया है। और इंफ्लुएंसर्स ने धन लेकर बदले में एक सिंथेटिक प्रमोशन कर हाइप की माया रच डाली। वास्तविक घटनाओं का काल्पनिक प्रतिशोध देखकर, आनंद मिलता है तो लें, लेकिन साथ ही ठहरकर सोचें कि यह आनंद क्यों ? और यह सोचना जरूरी है। गिरावट का दौर तीव्रतर होता जा रहा है, यह कहां जाकर रुकेगा। क्या भारत पाकिस्तान के बर्बाद राजनीतिक स्तर को मानक मानकर चलेगा ? क्या यही विकास है ?
सेंस और सेंसर को चुनौती देती जियो स्टूडियो की प्रस्तुति धुरंधर । देशभक्ति और बलिदान के नाम पर यह नई पीढ़ी को क्रूरता और अंध राष्ट्रवाद की ओर धकेलती है।

धुरंधर: द रिवेंज— अवधि 229 मिनट- लगभग चार घंटे का एक घृणित, फूहड़ और सस्ते राजनीतिक प्रचार का बेहद घटिया नमूना, जो राष्ट्रीयता, मानवता और जासूसी जैसे गंभीर विषयों का खुल्लमखुल्ला उपहास उड़ाता है। यह फिल्म मोदी सरकार की अंधभक्ति और अनावश्यक चाटुकारिता का जीता-जागता प्रमाण है, जिसमें उन्नत तकनीक के हथियारों का ढोंग रचकर भी नायक और खलनायक हर लड़ाई के अंत में जंगली जानवरों की तरह आदिम हिंसा पर उतर आते हैं। विभत्स क्रूरता, भाषाई गंदगी और स्वयं की तारीफ में डूबी यह रचना न केवल सिनेमा की गरिमा को कलंकित करती है, बल्कि देशभक्ति और बलिदान के पवित्र नाम पर नई पीढ़ी को खतरनाक ढंग से भटकाती है। फिल्म की शुरुआत से ही इसका कुरूप चेहरा उजागर होता है। हीरो जस्कीरत सिंह रंगी (रणवीर सिंह) अपने परिवार- पिता की निर्मम हत्या और दोनों बहनों- पर हुए अत्याचार के ‘प्रतिशोध’ के बदले में विधायक और उसके परिवार की निर्मम हत्या करता है। उन्नत सैन्य प्रशिक्षण के बावजूद हथौड़े से सिर फोड़ने, सीमेंट ब्लॉक से कुचलने और आँख फोड़ने जैसे जंगलीपन से भरे दृश्य हैं। सेंसर बोर्ड की काट-छाँट करने के बावजूद हिंसक दृश्यों का घिनौनापन कायम रहा है। मध्यांतर के बाद गैंगवार और राजनीतिक सत्ता के दृश्यों में तो हिंसा और भी बर्बर हो जाती है — सर कलम करना, लातों से कुचलना और आग लगाकर मारना जैसे सीन फिल्म को ‘टॉर्चर पोर्न’ बना देते हैं। फ़िल्म में रॉ की कार्यप्रणाली का मजाक बना दिया गया है: एक अंडरकवर एजेंट बिना किसी वास्तविक चुनौती के पाकिस्तानी सिंडिकेट का राजा बन जाता है। यह जासूसी नहीं, बल्कि जासूसी के नाम पर सस्ता नशा है, फूहड़ता है। फिल्मों की आम बात है कि धन लगाकर वे साबित करती है कि बौद्धिकता गैर जरूरी है। फिल्म स्वयं को ‘धुरंधर’ कहकर महिमामंडित करती है, जबकि वास्तव में यह मोदी सरकार की नीतियों (नोटबंदी को मास्टरस्ट्रोक दिखाना, प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण क्लिप्स सम्मिलित करना) की बेहद घटिया चापलूसी है। 26/11 जैसे हमलों का बदला लेने के नाम पर पूरे पाकिस्तान को शैतान साबित करना और भारतीय खुफिया तंत्र को अतिरंजित रूप में पेश करना — यह सब सच्ची देशभक्ति नहीं - गुरुदेव रबीन्द्र नाथ ठाकुर के शब्दों में - जहरीला राष्ट्रवाद है। भाषाई अभद्रता इतनी ज्यादा है कि सीबीएफसी को कई गालियां म्यूट करनी पड़ीं, फिर भी अत्यधिक बची रह गयी। यह फिल्म दर्शकों , जिसमें अधिकतर युवा है, को सिखाती है कि देशभक्ति का मतलब प्रतिशोध, क्रूरता और राजनीतिक चाटुकारिता है — न कि समर्पण, बुद्धिमत्ता या मानवीय मूल्य। विदेशी मीडिया ने भी इसकी पोल खोल दी है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसे “ultraviolent rah-rah sequel” और “license to kill a lot” करार दिया, जहां रणनीति की जगह सिर्फ हत्या-प्रतिहत्या है। वैरायटी ने इसे “brazen, blood-soaked saga that nakedly preys on jingoistic sentiment and fawns at the foot of government power” बताया। बीबीसी और अन्य आउटलेट्स ने hyper-nationalist टोन, अत्यधिक हिंसा और भारत-पाकिस्तान संबंधों को inflammatory बनाने की निंदा की। रोटन टोमाटोज पर मात्र 38% स्कोर के साथ इसे “overlong, gratuitously violent, and brimming with self-indulgence” माना गया। विदेशी समीक्षक इसे sociopathic, propaganda और toxic barbaric nationalism कहकर खारिज कर चुके हैं। संक्षेप में, धुरंदर: द रिवेंज एक घटिया व्यावसायिक उत्पाद है जो हिंसा, प्रचार और स्वप्रशंसा के सहारे पैसे कमाने का धंधा करती है। देशभक्ति और बलिदान के नाम पर यह नई पीढ़ी को क्रूरता और अंध राष्ट्रवाद की ओर धकेलती है। ऐसी फिल्मों की न प्रशंसा होनी चाहिए, न स्वीकार किया जाना चाहिए। यह सिनेमा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक पतन का प्रतीक है। और खास धोखाधड़ी यह है कि फ़िल्म शातिरता से डिक्लेरेशन की इम्युनिटी को अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करती है। दृश्यों, चरित्रों का गठन स्पष्ट करता है कि फ़िल्म एक विशेष नैरेटिव सेट करते हुए पाकिस्तान नामक घाव के रिसते मवाद को देशप्रेम की चाशनी में लपेटकर कुंठित मनोदशा को जय का सुख देकर आमदनी करती है। कमोबेश भारतीय व्यावसायिक सिनेमा फूहड़ता के नए सोपान गढ़ता ही है, तो इस पर ही लिखना क़्यो जरूरी लगा ? इस फ़िल्म को लेकर एक हाइप महसूस हुई। फ़िल्म और फ़िल्म के आय-व्यय के आंकड़े देखने के बाद स्पष्ट हुआ कि परंपरागत प्रचार के तरीकों से हटकर सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स पर फ़िल्म ने जबरदस्त धन बहाया है। और इंफ्लुएंसर्स ने धन लेकर बदले में एक सिंथेटिक प्रमोशन कर हाइप की माया रच डाली। वास्तविक घटनाओं का काल्पनिक प्रतिशोध देखकर, आनंद मिलता है तो लें, लेकिन साथ ही ठहरकर सोचें कि यह आनंद क्यों ? और यह सोचना जरूरी है। गिरावट का दौर तीव्रतर होता जा रहा है, यह कहां जाकर रुकेगा। क्या भारत पाकिस्तान के बर्बाद राजनीतिक स्तर को मानक मानकर चलेगा ? क्या यही विकास है ? यहां तक आते आते स्पष्ट है कि फ़िल्म तो फ़िल्म है, और रचनाशीलता के विभिन्न आयाम, सकारात्मक और नकारात्मक, होना एक सामान्य बात है। लेकिन डिस्क्लेमर की इम्युनिटी लेकर सेंस और सेंसर को चुनौती देती जियो स्टूडियो की प्रस्तुति धुरंधर जिस फूहड़ता, छिछोरी भाषा और अतार्किकता के साथ बहुत ही महीन तरीके से दर्शकों के जेहन में, दिमाग में जो धुंध भर रही है, उसे युवाओं के लिए, देश के लिए ठीक नहीं समझता। मन उसका तीव्र विरोध करता है। तमाम चिंताओं के बावजूद इसमें दो मत नहीं कि फ़िल्म व्यावसायिक रूप से सफल होने के साथ ही फ़िल्म-उद्योग से लेकर दर्शकों तक - सोच से लेकर विमर्श तक एक विभाजक रेखा के रूप में भी सफल है। सभी के अपने-अपने पाकिस्तान उरूज पर हैं। यह गंभीर बात है। धुरंधर-1 और धुरंधर-2 में से ही चुनने की बाध्यता हो तो पहली को दूसरी से बेहतर मेकिंग कहूंगा। जयहिंद।

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सेंस और सेंसर को चुनौती देती जियो स्टूडियो की प्रस्तुति धुरंधर । देशभक्ति और बलिदान के नाम पर यह नई पीढ़ी को क्रूरता और अंध राष्ट्रवाद की ओर धकेलती है।

प्रकाशित: 10 अप्रैल 2026 • 5 मिनट पठन

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