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{फुटबाल, बाज़ार और विस्मृति } भारतीय फ़ुटबॉल के खो जाने की कहानी:शमीक लाहिड़ी

अपराजिता•10 जुलाई 202610 मिनट पठन21 बार पढ़ा गया

भारत की समस्या शायद प्रतिभा की कमी नहीं है। समस्या है प्रतिभा को खोजने का धैर्य, उसे तराशने वाली संस्थाएं और उसे खोने न देने की राजनीतिक इच्छाशक्ति। और शायद इसी वजह से भारतीय फ़ुटबाल का सबसे ज़रूरी सवाल मैदान पर नहीं, बल्कि मंत्रालय में खड़ा है — भारत सचमुच फ़ुटबाल खेलना चाहता है, या सिर्फ विश्व कप देखना चाहता है?

फुटबाल, बाज़ार और विस्मृति

भारतीय फ़ुटबॉल के

खो जाने की कहानी:

शमीक लाहिड़ी

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(विश्व कप फुटबाल के खेलों के बारे में डायमंड हार्बर के पूर्व सांसद शमीक लाहिड़ी लगातार बांग्ला में लिख रहे हैं।उनके चुने हुए लेखों का अनुवाद 'वाम की आवाज 'में लगातार प्रकाशित हो रहा है।शमीक लाहिड़ी देश के पहले सांसद रहे हैं जिन्होंने विश्व के प्रसिद्ध फुटबाल खिलाड़ी माराडोना को बंगाल में लाकर सनसनी फैला दी थी। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश की उपस्थिति विश्व कप फुटबाल में क्यों नहीं है,इसके बारे में भारत का मुख्यधारा का मीडिया खामोश है। इतिहास की स्मृति के साथ वर्तमान की शोचनीय दशा के बीच भविष्य की उम्मीद पर शमीक लाहिड़ी ने विस्तार से लिखा है।'वाम की आवाज 'की ओर से लेखक को बधाई!)

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फ़ुटबॉल कभी-कभी देशों की आत्मकथा लिख देता है। ब्राज़ील के फ़ुटबॉल में साम्बा की लय है। अर्जेंटीना के फ़ुटबॉल में लातीनी और यूरोपीय शैली की जुगलबंदी है। उरुग्वे के फ़ुटबॉल में एक छोटे से देश का ज़िद्दी साहस है। यूरोप के फ़ुटबॉल में कारखानों का अनुशासन है।

और भारत के फ़ुटबॉल में एक तरह की अनुपस्थिति है। जबकि एक समय था जब कहानी कुछ और ही थी।

1951 के दिल्ली एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक । 1956 के मेलबर्न ओलंपिक का सेमीफाइनल। 1962 के जकार्ता एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक ।सैयद अब्दुल रहीम का भारत कभी एशिया के लिए भविष्य का वादा था। तब जापान भारत की ओर देखता था। आज भारत जापान की ओर देखता है।

इतिहास कभी-कभी खोता नहीं है। उसे खो दिया जाता है।

सैयद अब्दुल रहीम की मृत्यु के बाद भारतीय फ़ुटबॉल ने धीरे-धीरे यह समझना शुरू किया कि सरकार का भी एक पसंदीदा खेल होता है। भारत ने अपने पसंदीदा खेल का नाम 'क्रिकेट' लिखा था। क्रिकेट की सफलता कोई अपराध नहीं है। अपराध है पक्षपात। एक तरफ टेलीविजन की रोशनी, कॉर्पोरेट पूँजी, नीतिगत समर्थन और बुनियादी ढाँचा ।

दूसरी तरफ फ़ुटबाल। उसके हिस्से में आए भाषण, उद्घाटन समारोह और वादे। जबकि फ़ुटबाल बहुत महंगा खेल नहीं है। एक गेंद चाहिए। थोड़ी घास चाहिए। और कुछ बच्चे।

उदार अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण में भारत के शहर एक अलग ही अर्थशास्त्र सीख रहे थे। जहाँ कभी गोलपोस्ट हुआ करते थे, वहाँ अपार्टमेंट खड़े हो गए। जहाँ शाम को मैच होते थे, वहाँ गाड़ियों की पार्किंग बन गई। जहाँ ऑफसाइड को लेकर बहस होती थी, वहाँ रियल एस्टेट के विज्ञापन आ गए। और गाँवों में — धान कटाई के बाद उबड़-खाबड़ खेत ही एकमात्र सहारा बचे।

फ़ुटबॉल की मौत एक दिन में नहीं होती। पहले मैदान खोता है। फिर समय खोता है। फिर बचपन खोता है। और फिर एक दिन वैश्विक स्तर खो जाता है।

एक समय था जब कलकत्ता का मैदान श्रमिक शहर की धड़कन हुआ करता था। मोहन बागान सिर्फ एक क्लब नहीं था, ईस्ट बंगाल सिर्फ एक क्लब नहीं था। एक में औपनिवेशिक अपमान के खिलाफ विरोध था, तो दूसरे में देश विभाजन के शरणार्थियों की यादें। फ़ुटबाल ही लोगों की पहचान थी।

फिर फ़ुटबॉल धीरे-धीरे बाज़ार के हाथों में चला गया। 2010 में AIFF और रिलायंस-नियंत्रित FSDL ने भारतीय फ़ुटबाल के नए युग के वादे के साथ हाथ मिलाया। चकाचौंध आई। ड्रोन कैमरे आए। आतिशबाजी आई। सेलिब्रिटी मालिक आए। फ़ुटबाल भी आया। लेकिन जड़ें नहीं आईं।

ISL ने दर्शकों की संख्या बढ़ाई, प्रसारण का पैसा लाया, और व्यावसायिकता के कुछ तत्व भी लाए। लेकिन एक सवाल आज भी बना हुआ है। पंद्रह साल बाद भारत कहाँ है? विश्व कप में नहीं है। ओलंपिक में नहीं है। एशिया के दूसरे दर्जे के देशों के साथ भी नियमित प्रतिस्पर्धा करने में हाँफ जाता है। इस बार के एशियाड में तो भारतीय फ़ुटबाल टीम हिस्सा भी नहीं लेगी।

रिलायंस कुछ पैसा तो लाया है। लेकिन पैसा और ढांचा एक ही चीज़ नहीं हैं। देश में अकादमियाँ हैं, लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) नहीं है। जबकि, मणिपुर प्रतिभाएँ पैदा करता है। मिजोरम प्रतिभाएँ पैदा करता है। केरल प्रतिभाएँ पैदा करता है। बंगाल प्रतिभाएँ पैदा करता है। समस्या प्रतिभा की नहीं है। समस्या उस नदी की है, जिसके पास कोई समुद्र नहीं है।

AIFF में सबसे तेज़ चलने वाली चीज़ शायद गेंद नहीं — बल्कि फाइलें हैं। एक टेबल से दूसरी टेबल तक। एक समिति से दूसरी समिति तक। एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक। इस बीच दुनिया इंतज़ार नहीं करती। और फ़ुटबॉल तो बिल्कुल नहीं।

आज ISL खुद अनिश्चितता के दौर से गुज़र रहा है। जिस लीग को भारतीय फ़ुटबॉल का भविष्य कहा गया था, उसका अपना भविष्य ही अदालतों, समझौतों और व्यावसायिक वार्ताओं पर निर्भर है। जिस देश में फ़ुटबॉल की तक़दीर मैदान की घास नहीं, बल्कि वकीलों के दस्तावेज़ तय करते हों — वहाँ गेंद से ज़्यादा फाइलें तेज़ दौड़ती हैं।

फिर भी इस कहानी का अंत अभी नहीं लिखा गया है। क्योंकि रास्ता बाकी है।

पहला: फ़ुटबॉल को कोई तमाशा या समारोह नहीं, बल्कि राष्ट्र की नीति का हिस्सा बनाना होगा। हर ज़िले में स्कूल लीग, हर ब्लॉक में प्रशिक्षण केंद्र और हर राज्य में आधुनिक युवा विकास ढांचा तैयार करना होगा।

दूसरा: मैदानों को बचाना होगा। जो देश अपने बच्चों के खेलने की जगह नहीं बचा सकता, वह स्टेडियम तो बना सकता है, फ़ुटबॉल खिलाड़ी नहीं।

तीसरा: AIFF को एक प्रशासनिक कार्यालय से बदलकर फ़ुटबाल विकास संस्थान में तब्दील होना होगा।

चौथा: कॉर्पोरेट पूँजी को दुश्मन नहीं, बल्कि साझीदार बनाना होगा — लेकिन शर्त सिर्फ एक होगी; फ़ुटबाल पर बाज़ार का मालिकाना हक नहीं, बल्कि फ़ुटबाल के प्रति उसकी जवाबदेही होनी चाहिए।

जापान ने यह किया है। दक्षिण कोरिया ने यह किया है। उज्बेकिस्तान भी यह कर रहा है। भारत भी कर सकता है। क्योंकि इस देश में फ़ुटबाल खेलने वालों की कोई कमी नहीं है। कमी है तो बस फैसलों की और फ़ुटबाल को लेकर सपने देखने की।

जब विश्व कप आता है, तो करोड़ों भारतीय अर्जेंटीना के लिए चिल्लाते हैं, ब्राज़ील के लिए रोते हैं, मोरक्को के लिए तालियाँ बजाते हैं। वे फ़ुटबाल से प्यार करते हैं। फ़ुटबाल भी उनसे प्यार करता है। बस बीच में खड़ा है एक राष्ट्र, जो अब तक यह तय नहीं कर पाया है कि फ़ुटबाल उसके लिए एक राष्ट्रीय सपना है या फिर महज़ एक टेलीविजन उत्पाद।

फिर भी, जब शाम ढलती है, तो भारत में कहीं न कहीं कोई बच्चा फुटबाल लेकर दौड़ता है। वह नहीं जानता कि प्रसारण अधिकार क्या होते हैं। वह नहीं जानता कि 'मास्टर राइट्स एग्रीमेंट' क्या है। वह सिर्फ दो बातें जानता है — फुटबाल और गोल। मैदान बड़ा है। सिर पर आसमान है। और उसके सपनों को दौड़ना पसंद है। शायद भारतीय फ़ुटबाल का भविष्य आज भी उसी बच्चे के पास सुरक्षित है। अगर राष्ट्र उसे मैदान दे, स्कूल उसे समय दे, और प्रशासन उसे रास्ता दे, तो शायद एक दिन भारत विश्व कप को सिर्फ टीवी स्क्रीन पर नहीं देखेगा। विश्व कप भी एक दिन भारत की तरफ देखेगा।

फ़ुटबॉल बहुत क्रूर खेल है। वह यह नहीं जानना चाहता कि आपकी जीडीपी (GDP) कितनी है। वह यह नहीं जानना चाहता कि आपके पास कितने अरबपति हैं। वह सिर्फ यह जानना चाहता है — आपके देश में कितने मैदान हैं? कितने स्कूलों में शाम के बाद गेंद लुढ़कती है? कितने बच्चे रोज़ अपने घुटनों पर कीचड़ मलकर घर लौटते हैं? कितने प्रशासक सचमुच यह मानते हैं कि फ़ुटबाल भी एक राष्ट्रीय सपना हो सकता है?

भारत का उत्तर बहुत उज्ज्वल नहीं हैं। फिर भी फ़ुटबाल अब भी ज़िंदा है। कोलकाता की गलियों में। केरल के गाँवों में। मणिपुर की पहाड़ियों में। गोवा के समुद्र तटों पर।

लेकिन इतिहास की एक बुरी आदत होती है। वह कभी-कभी लौट आता है। अप्रत्याशित दरवाज़ों पर दस्तक देता है। भारतीय फ़ुटबाल का भविष्य किसी बोर्डरूम में बैठकर तय नहीं हो सकता। वह शायद आज भी किसी कस्बे के मैदान में दौड़ रहा है। शायद मणिपुर में। शायद मालदा में। शायद कोझिकोड में। शायद शिलांग में। या फिर गोवा के समुद्र तट पर। वह सिर्फ इतना जानता है — फुटबाल और गोल। आसमान बड़ा है। और सपनों का कोई ऑफसाइड नहीं होता। अगर राष्ट्र उसे मैदान दे, स्कूल उसे समय दे, और प्रशासन उसके रास्ते से हटना सीख जाए, तो शायद एक दिन भारत विश्व कप नहीं देखेगा। विश्व कप भी भारत को देखेगा। और उस दिन शायद किसी पुराने स्टेडियम की गैलरी में बैठे सैयद अब्दुल रहीम थोड़ा मुस्कुराकर कहेंगे — "इतने दिनों बाद, तुम लोग फिर से मैदान में लौटे।"

फिर भी इस कहानी का अंत अभी नहीं लिखा गया है। क्योंकि रास्ता बाकी है। शायद भारत को फिर से नक्शे से शुरुआत करनी होगी।

शायद देश को आठ या दस फ़ुटबाल क्षेत्रों में बाँटना होगा। हर क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर की आवासीय फ़ुटबाल अकादमी बनाई जा सकती है। उदाहरण के तौर पर ये क्षेत्र इस प्रकार हो सकते हैं —उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड, असम, त्रिपुरा, सिक्किम),बंगाल–झारखंड–ओडिशा क्षेत्र_केरल क्षेत्र,

_ गोवा–कोंकण क्षेत्र,

_ पंजाब–हरियाणा–हिमाचल क्षेत्र_ कश्मीर – उत्तरी क्षेत्र_

महाराष्ट्र–गुजरात क्षेत्र,

दक्षिण में कर्नाटक–तमिलनाडु–तेलंगाना क्षेत्र और मध्य भारत के राज्य।

सिर्फ अकादमी नहीं।फ़ुटबाल विश्वविद्यालय भी चाहिए। इसके बाद यूरोप और लैटिन अमेरिका के बड़े-बड़े क्लबों और अकादमियों के साथ दीर्घकालिक साझीदारी करनी होगी। भारतीय किशोर सीखेंगे — स्पेन की तकनीक, अर्जेंटीना का साहस, जर्मनी का अनुशासन, फ्रांस की स्काउटिंग और ब्राज़ील का गेंद के साथ दोस्ताना।

दुनिया से सीखने में कोई शर्म नहीं है। फ़ुटबाल खुद एक वैश्विक भाषा है। इसके बाद देश के इतिहास की सबसे बड़ी प्रतिभा खोज शुरू की जा सकती है। पहाड़ों से लेकर तटों तक। महानगरों से लेकर कस्बों और गाँवों तक, स्कूल के मैदानों से लेकर चाय के बागानों तक। कोई पक्षपात नहीं। कोई शहरी अहंकार नहीं। सिर्फ और सिर्फ प्रतिभा की खोज।

दस या बारह साल के एक बच्चे को अगर सही कोच, सही पोषण , सही शिक्षा, सही चिकित्सा और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का अनुभव दिया जाए, तो दस साल बाद वह सिर्फ एक 'प्रतिभा' नहीं रह जाता। वह एक 'फ़ुटबाल खिलाड़ी' बन जाता है। 140 करोड़ के देश में अगले 10-12 वर्षों में ऐसे दो सौ अंतर्राष्ट्रीय स्तर के फ़ुटबॉल खिलाड़ी तैयार करना कोई कल्प विज्ञान नहीं है। कल्प विज्ञान तो यह मानना है कि प्रयास, धैर्य, आंतरिकता और सही वैज्ञानिक योजना से अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार किए जा सकते हैं। फ़ुटबाल प्रतिभा से प्यार करता है। लेकिन वह तैयारी से और भी ज़्यादा प्यार करता है।

भारत में सबसे बड़ी कमी प्रतिभा की नहीं है। कल्पना की भी नहीं है। कमी है तो सिर्फ धैर्य की। क्योंकि एक पीढ़ी तैयार करने में दस साल लगते हैं। एक फ़ुटबाल राष्ट्र तैयार करने में बीस साल लगते हैं। और भारतीय राष्ट्र आमतौर पर अगले चुनाव के बारे में सोचता है। जबकि फ़ुटबाल अगली पीढ़ी के बारे में सोचता है।

इन दोनों कैलेंडरों के बीच, हर क्षेत्र में — आवासीय अकादमी, शिक्षा और फ़ुटबाल एक साथ, स्पोर्ट्स साइंस, पोषण विशेषज्ञों (न्यूट्रिशनिस्ट) और मनोवैज्ञानिकों की मदद से आवासीय अकादमियाँ बनाई जा सकती हैं। अंतर्राष्ट्रीय दौरे और प्रतियोगिताएं — यूरोप और लैटिन अमेरिका के क्लबों/अकादमियों के साथ तकनीकी साझीदारी और साल भर चलने वाली बहुस्तरीय स्काउटिंग के ज़रिए।

बेल्जियम, क्रोएशिया, उरुग्वे, जापान, मोरक्को और यहाँ तक कि हाल ही में केप वर्डे (काबो वर्दे) ने भी दिखाया है कि — बड़ी आबादी नहीं, बल्कि सही ढांचा ही अंतर्राष्ट्रीय सफलता की असली बुनियाद है।

भारत की समस्या शायद प्रतिभा की कमी नहीं है। समस्या है प्रतिभा को खोजने का धैर्य, उसे तराशने वाली संस्थाएं और उसे खोने न देने की राजनीतिक इच्छाशक्ति। और शायद इसी वजह से भारतीय फ़ुटबाल का सबसे ज़रूरी सवाल मैदान पर नहीं, बल्कि मंत्रालय में खड़ा है — भारत सचमुच फ़ुटबाल खेलना चाहता है, या सिर्फ विश्व कप देखना चाहता है?

{लेखक सीपीआई (एम) के पूर्व सांसद 'गणशक्ति' के संपादक और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं}

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{फुटबाल, बाज़ार और विस्मृति } भारतीय फ़ुटबॉल के खो जाने की कहानी:शमीक लाहिड़ी

प्रकाशित: 10 जुलाई 2026 • 10 मिनट पठन

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