फुटबॉल हमेशा इतिहास को दोहराता नहीं है। वह इतिहास को फिर से मैदान पर बुलाता है, उसे एक नई रोशनी में खड़ा करता है, और फिर पूछता है — इस बार क्या बदलेगा?
जन समाचार मंच
फुटबॉल हमेशा इतिहास को दोहराता नहीं है। वह इतिहास को फिर से मैदान पर बुलाता है, उसे एक नई रोशनी में खड़ा करता है, और फिर पूछता है — इस बार क्या बदलेगा?

"उस दिन फ्रांस के लिए थियो एर्नांदेज़ ने पांचवें मिनट में गोल किया था। मानो मैच की शुरुआत में ही इतिहास के दरवाज़े पर नीले रंग की एक दस्तक पड़ी हो। उसके बाद काफी देर तक मोरक्को लड़ा था। मरुस्थल की हवा जैसी ज़िद लेकर, एटलस पर्वत की तरह अडिग होकर। लेकिन उन्यानासीवें (79th) मिनट में रैंडल कोलो मुआनी के पैर से आया दूसरा गोल मानो सिर्फ स्कोरलाइन बदलने के लिए नहीं था, उसने एक परीकथा की मंज़िल को भी बदल दिया था।
अल खोर शहर का आल बायेत स्टेडियम आज सिर्फ एक स्टेडियम नहीं था। यह दो महाद्वीपों के संवाद का मंच था। एक तरफ विश्व चैंपियन की विरासत थी। दूसरी तरफ वह महाद्वीप था, जिससे फुटबॉल ने लंबे समय तक वादे तो किए, लेकिन पुरस्कार बहुत कम दिए।
मोरक्को आज हार गया। लेकिन वे इतिहास के बीच से गुज़रते हुए मैदान से बाहर निकले। क्योंकि वे पहले अफ्रीकी, पहले अरब देश बने, जो विश्व कप के अंतिम चार के दरवाज़े तक पहुंचे।उनकी इस यात्रा के रास्ते में यूरोप के दो पुराने किले पड़े थे। पहले स्पेन, जिसने पेनल्टी शूटआउट की खामोशी के साथ विदाई ली थी। फिर पुर्तगाल, जिसका सपना यूसुफ एन-नेसिरी के एक हेडर से अटलांटिक की हवा में विलीन हो गया था।फ्रांस आज रात फाइनल में पहुंच गया। लेकिन मोरक्को? वे तो इससे भी कहीं आगे निकल गए। उन्होंने उस दिन एक मधुर स्मृति का निर्माण किया।" मुझे 14 दिसंबर, 2022 का अपना ही एक लिखा हुआ लेख मिला।
मज़ेदार बात यह है कि 2026 के इस क्वार्टर फाइनल को कई लोग 'कतर के अधूरे संवाद का दूसरा अध्याय' के रूप में देख रहे थे। 2022 विश्व कप में मोरक्को के सपने को फ्रांस ने रोका था; 2026 में मोरक्को उसी पुराने हिसाब को चुकता करने उतरा था। लेकिन इतिहास ने एक बार फिर नीली जर्सी के पक्ष में ही फैसला सुनाया। इस दिन भी उसी स्कोर की पुनरावृत्ति हुई, फ्रांस 2 (किलियन एम्बापे 60', उस्मान देम्बेले 66') - मोरक्को 0।
फुटबॉल हमेशा इतिहास को दोहराता नहीं है। वह इतिहास को फिर से मैदान पर बुलाता है, उसे एक नई रोशनी में खड़ा करता है, और फिर पूछता है — इस बार क्या बदलेगा? बोस्टन की रात यही सवाल कर रही थी।चार साल पहले, इस मरुस्थलीय देश ने अफ्रीका-अरब के तमाम सपनों को अपने कंधों पर उठाकर दुनिया के 'शीर्ष चार' की मेज पर जगह बनाई थी। लेकिन वहाँ दरवाज़े पर नीली जर्सी की एक पुरानी विरासत खड़ी थी। फ्रांस। उन्होंने मोरक्को को रोका था। 2026 का यह क्वार्टर फाइनल इसलिए सिर्फ एक मैच नहीं था। यह यादों का पुनर्मिलन था। एक तरफ बास्तिल के पतन वाले देश की विरासत थी, तो दूसरी तरफ मरुस्थल का विद्रोह। एक तरफ तीसरे सितारे का सपना था, तो दूसरी तरफ अधूरा प्रतिशोध।
मैच की शुरुआत से ही साफ था कि फ्रांसीसी आज आसमान पर अपना मालिकाना हक जताने आए हैं। गेंद उनके पैरों में थी, लय उनके शरीर में, और उनके आक्रमण एक के बाद एक लहर बनकर मोरक्को के रक्षात्मक किले से टकरा रहे थे। लेकिन हर किले का एक प्रहरी होता है। आज मोरक्को के उस प्रहरी का नाम था यासीन बूनू।प्रथमार्ध में फ्रांसीसी आक्रमण जब लगातार तेज हो रहा था, तब गोलपोस्ट के सामने खड़े बूनू मानो कोई गोलकीपर नहीं, बल्कि मरुस्थल के कोई प्राचीन द्वारपाल थे, जिनका काम सिर्फ एक था — जब तक संभव हो दरवाज़ा बंद रखना। फिर वह पल आया। पेनाल्टी। दुनिया के कई गोलकीपरों के लिए जो मृत्युदंड की घोषणा का मंच होता है, बूनू के लिए वह विद्रोह का अवसर बन गया। पेनल्टी लेने के लिए किलियन एम्बापे आगे बढ़े। पूरा स्टेडियम सांसें थामे इंतजार कर रहा था। लेकिन बूनू के गोता लगाते हुए बाएं हाथ ने कहा — 'मैं हूँ, अभी नहीं'।
मोरक्को के समर्थकों की आवाज़ों में तब एटलस पर्वत की हवाओं की गूँज थी।लेकिन फुटबॉल में कुछ खिलाड़ी ऐसे होते हैं, जिन्हें रोका जा सकता है, बांधा जा सकता है, लेकिन लंबे समय तक बंदी बनाकर नहीं रखा जा सकता। किलियन एम्बापे उन्हीं में से एक हैं। दूसरे हाफ के पंद्रह मिनट बीतते ही वे फिर से किस्मत के सामने आ खड़े हुए। खेल का 60वां मिनट था। एक असंभव कोण (एंगल)। जहां से अधिकांश फुटबॉलरों को गोलपोस्ट दिखाई नहीं देता, एम्बापे वहां भविष्य देख लेते हैं। गति की एक झलक। संतुलन का एक पल। तोप के गोले जैसा शॉट और गेंद सीधे जाल में। 0-0 का गतिरोध टूट गया। मोरक्को के सपने में पहली दरार पड़ी।एम्बापे ने जश्न मनाया, लेकिन उस जश्न में उल्लास से ज़्यादा एक घोषणा थी — फ्रांस अब विश्व चैंपियन बनने का प्रबल दावेदार है।

गोल के बाद मानो फ्रांसीसियों के शरीर में और अधिक रक्त का संचार होने लगा। उनके पास तेज़ हो गए। उनके आक्रमण और अधिक धारदार हो गए। और मोरक्को के खिलाड़ी समझ रहे थे कि पहाड़ पर खड़े रहना आसान है, लेकिन पहाड़ को तोड़कर आने वाले हिमस्खलन को रोकना बेहद मुश्किल है। छह मिनट बाद उस हिमस्खलन की दूसरी लहर आई। 66वां मिनट। उस्मान देम्बेले। सिर्फ एक मौका। सटीक फिनिश। और एक बार फिर गेंद जाल के अंदर। 2-0।
फ्रांसीसी तब तक अपने पसंदीदा इलाके यानी नियंत्रण के साम्राज्य में पहुँच चुके थे। इस टूर्नामेंट में देम्बेले का यह पांचवां गोल था। और मोरक्को के लिए यह वह पल था, जब प्रतिशोध की कहानी धीरे-धीरे वास्तविकता के सामने आत्मसमर्पण करने लगी थी। फिर भी वे लड़े। मोरक्को ने कभी आसानी से हार मानना नहीं सीखा है। कैसाब्लांका की सड़कें, माराकेश के बाज़ार, एटलस के पहाड़ लोगों को अलग ही सीख देते हैं। वे अंत तक दौड़े, लड़े ,कोशिश की। लेकिन कुछ रातें फुटबॉल में प्रतिरोध की कहानी नहीं लिखतीं। इस दिन फुटबॉल विद्रोह की नहीं, बल्कि विरासत की भाषा में बात कर रहा था।
अंतिम सीटी बजते ही मैसाचुसेट्स के फॉक्सबरो शहर के जिलेट स्टेडियम के आसमान में एक और आंकड़ा दर्ज हो गया। फ्रांस लगातार तीसरी बार विश्व कप के सेमीफाइनल में।2018, 2022, 2026। पीढ़ियां बदल जाती हैं। टीमें भी बदल जाती हैं। लेकिन कुछ देशों की फुटबॉल शक्ति समय के थपेड़ों के बीच भी खुद को बनाए रखना जानती है। फ्रांस अब अपने तीसरे विश्व कप खिताब से सिर्फ दो मैच दूर है। और किलियन एम्बापे? वे सिर्फ गोल नहीं कर रहे हैं, बल्कि समय के पन्नों पर अपना नाम दर्ज कर रहे हैं। मोरक्को इस बार भी सिर उठाकर विश्व कप से विदा हुआ। क्योंकि इतिहास में कुछ हार ऐसी होती हैं, जो हार नहीं होतीं। वे भविष्य के बीज होती हैं।और फ्रांस? वे आगे बढ़ते रहे। नीली जर्सी की परतों में अब एक और नए सितारे के लिए जगह बन रही है।
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(लेखक पूर्व सांसद, दैनिक 'गणशक्ति ' के संपादक और CPIM की केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं)
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