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महानायक उत्तम कुमार की जन्मशती- अरिजित मैत्रा

अपराजिता•01 अगस्त 20268 मिनट पठन40 बार पढ़ा गया

उत्तम कुमार केवल एक व्यावसायिक फ़िल्म के नायक या आम दर्शकों के लिए 'गुरु' मात्र नहीं थे; वे थोड़ा-बहुत अध्ययन करने वाले, साहित्य-प्रेमी और एक संवेदनशील अभिनेता भी थे। उनकी जन्म-शताब्दी पर उन्हें केंद्र में रखकर व्यक्ति-पूजा का कोई कारण मुझे नहीं दिखता, लेकिन उनके जैसे दुर्लभ अभिनेता का सही मूल्यांकन होना अत्यंत आवश्यक है।

महानायक उत्तम कुमार की जन्मशती- अरिजित मैत्रा

" महानायक उत्तम कुमार की जन्मशती"

अरिजित मैत्रा

बांग्ला सिनेमा के रोमांटिक नायक उत्तम कुमार। मृत्यु के 46 वर्षों के बाद भी उनकी लोकप्रियता ज़रा भी कम नहीं हुई है, बल्कि बढ़ी ही है। टॉलीवुड (टॉलीगंज) स्टूडियो में उनका स्थान आज भी रिक्त ही है। 'स्टार' शब्द से आज भी बांग्ला सिनेमा का दर्शक उत्तम कुमार को ही समझता है। अपने अभिनय जीवन की कुल 204 फ़िल्मों में से कितनी सुपर-डुपर हिट रहीं, सुचित्रा-उत्तम जोड़ी के जादू ने कितने सैकड़ों दर्शकों को सम्मोहित किया, यह मेरी चर्चा का विषय नहीं है। चरित्र-अभिनय उन्हें एक अलग ही स्तर पर ले गया था! और मुझे यह जानकर अचरज और प्रसन्नता होती है जब मैं बांग्ला साहित्य के प्रति उनके अनुराग के बारे में सुनता हूँ। मैंने महानायक को साक्षात केवल एक बार कुछ क्षणों के लिए देखा था। हेमंत मुखर्जी के साथ मैं रवींद्र सदन गया था, वहीं बांग्ला सिनेमा के महानायक को देखा। जहाँ तक मुझे याद आता है, वह BFJA (बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन) का कोई कार्यक्रम था। इसलिए कुछ बातें उनके दिवंगत पुत्र गौतम चटर्जी और अन्य लोगों के मुख से सुनी हुई हैं।

सबसे पहले, अभिनेता उत्तम कुमार के विविध प्रकार के चरित्रों को लेकर मेरे मन की पसंद और नापसंद पर चर्चा करते हैं। 'सप्तपदी' के कृष्णेंदु और 'बाघबंदी खेला' के भवेश बनर्जी—दोनों ही मेरे प्रिय हैं। कृष्णेंदु एक रोमांटिक नायक हैं और भवेश बाबू एक बेपरवाह अपराधी, जिन्हें आसानी से खलनायक कहा जा सकता है। दोनों फ़िल्मों के बीच 14 साल का अंतराल है। दिसंबर 1975 में रिलीज़ हुई 'बाघबंदी खेला' 170 दिनों से अधिक समय तक सिनेमाघरों में चली थी। यह घटना साबित करती है कि बांग्ला सिनेमा के दर्शकों ने न केवल 'नायक' उत्तम को स्वीकार किया था, बल्कि उनके लिए चरित्र-अभिनेता और खलनायक उत्तम कुमार भी उतने ही स्वीकार्य थे! 1961 के कृष्णेंदु यानी उत्तम कुमार ने अपने अभिनय जीवन के विभिन्न बदलावों से गुज़रते हुए खुद को तोड़-मरोड़कर 'बाघबंदी खेला' के पात्र में क्या असाधारण क्रूरता दर्शाई है! दो विपरीत ध्रुवों के चरित्रों में अपने अभिनय की क्या अद्भुत कुशलता दिखाई है!

दूसरी ओर, अरबिंद मुखर्जी की फ़िल्म 'अग्नीश्वर' में वे औपनिवेशिक सभ्यता में शिक्षित और प्रभावित एक डॉक्टर हैं—कुरीतियों और संस्कारों से मुक्त, थोड़े अहंकारी और पूरी तरह ईमानदार! 'बनफूल' (बलाईचंद मुखोपाध्याय) द्वारा रचित इस पात्र में आत्ममुग्ध उत्तम कुमार को देखकर हैरान होना पड़ता है! दूसरी ओर, रवींद्रनाथ के 'राइचरण' के पात्र में वे पूरी तरह असफल रहे, क्योंकि उस भूमिका में वे काफी अनुपयुक्त (बेमेल) लग रहे थे। उत्तम-प्रशंसक इससे दुखी हो सकते हैं, लेकिन इस विश्लेषण को मेरी व्यक्तिगत अनुभूति मात्र माना जा सकता है। फ़िल्म के कुछ विशेष दृश्यों को देखकर लगा कि उन्होंने ओवर-एक्टिंग की है।

इस संदर्भ में चर्चा करते हुए 'थाना थेके आसछी' फ़िल्म की याद आती है। उस फ़िल्म में हमें उत्तम कुमार बिल्कुल नए प्रकार के चरित्र में मिले। पद्मपुकुर थाने के सब-इंस्पेक्टर तीनकड़ी हालदार के पात्र को हम 'विवेक' भी मान सकते हैं। इस पात्र में पेड़ की डाल पकड़कर गाने के दृश्य नहीं हैं, न ही नायक-नायिका के बीच अंतरंग संवाद हैं। इसमें कुछ तीखे संवाद और पूछताछ हैं। पूरी फ़िल्म देखते समय धैर्य डगमगा सकता है, लेकिन फ़्लैशबैक-फ़्लैशफ़ॉरवर्ड और उत्तम कुमार के संवाद बोलने का अंदाज़ दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। इस फ़िल्म में उनके अभिनय की सबसे बड़ी विशेषता उनकी 'टाइमिंग' है।

बांग्ला फ़िल्मों में व्योमकेश का आगमन पहले भी हुआ है और अब भी हो रहा है। प्रत्येक निर्देशक और अभिनेता ने अपने-अपने तरीके से व्योमकेश के चरित्र के साथ न्याय करने का प्रयास किया है। वहीं दर्शक भी अपने-अपने पसंदीदा व्योमकेश को देखने सिनेमाघरों में उमड़े हैं। सत्यजीत राय की फ़िल्म 'चिड़ियाखाना' के व्योमकेश उत्तम कुमार ही थे, यह बात सभी जानते हैं। उस फ़िल्म में शुरू से अंत तक उत्तम कुमार की शारीरिक भाषा में व्योमकेश मानो जीवंत हो उठे हैं। फ़िल्म के कुछ दृश्यों में व्योमकेश रूपी उत्तम कुमार के माथे की सिलवटों और सन्नाटे के बीच बहुत से संवाद व्यक्त हुए हैं।

अगर 'जोदि जान्तेम' फ़िल्म की बात करें, तो इस फ़िल्म में दो महान अभिनेता आमने-सामने थे—एक तरफ़ सौमित्र चटर्जी और दूसरी तरफ़ उत्तम कुमार। यहाँ उत्तम कुमार एक एडवोकेट हैं, लेकिन उनकी तीखी नज़र ठीक एक जासूस की तरह है। प्रसन्न कुमार बसु के पात्र में उत्तम कुमार ने जासूसों जैसी सक्रियता नहीं दिखाई; इस फ़िल्म में वे एक निर्लिप्त व्यक्ति हैं—समझते सब हैं, लेकिन बोलते कम हैं। व्यक्तिगत त्रासदी के कारण नियमित वकालत छोड़ देने के बावजूद वे दूसरों के दुख और समस्याओं के प्रति संवेदनशील हैं। फ़िल्म के अन्य पात्रों में कमल मित्र, बसंत चौधरी, असितबरन, शैलेन मुखर्जी आदि के बीच एक महत्वपूर्ण सहायक भूमिका में भी उत्तम कुमार ने यह साबित कर दिया कि मुख्य नायक की भूमिका में न रहकर भी अपने अभिनय की विशिष्ट छाप छोड़ी जा सकती है।

समरेश बसु की कहानी पर आधारित पीयूष बसु निर्मित 'बिकेले भोरेर फूल' फ़िल्म में वे मुख्य नायक न होकर भी महानायक हैं! जीवन के ढलते पड़ाव की तस्वीर को उन्होंने अपने अभिनय के माध्यम से बड़े ही उत्तम ढंग से उकेरा है। उत्तम कुमार और सौमित्र चटर्जी दोनों ने ही फ़िल्म के पात्रों के अनुसार खुद को बार-बार ढाला और दर्शकों को तृप्त करने के लिए नए सिरे से गढ़ा। पीयूष बसु की एक और फ़िल्म 'दुई पृथिवी'—'मेमसाहब' फ़िल्म के बाद 'दुई पृथिवी' में भी उत्तम कुमार एक पत्रकार हैं, जो एक निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के आदर्शवादी बड़े बेटे हैं। उनके सामने विक्टर बनर्जी थे। अंध उत्तम-भक्त न होते हुए भी मैं सहजता से कह सकता हूँ कि उनके सामने फ़िल्म जगत के एक अन्य सशक्त अभिनेता विक्टर बनर्जी फीके पड़ गए थे। एक आत्मविश्वास से भरपूर चरित्र की अभिव्यक्ति को उन्होंने कितनी सहजता से उभारा था!

अब साहित्य-प्रेमी उत्तम कुमार के संदर्भ में बात करते हैं। अपने प्रोडक्शन हाउस के बैनर तले उन्होंने जिन फ़िल्मों का निर्माण किया, उनमें से अधिकांश साहित्य पर आधारित थीं; जैसे—सुबोध घोष की 'जतुगृह', नीहाररंजन गुप्त की 'उत्तर फाल्गुनी', ताराशंकर बंद्योपाध्याय की 'सप्तपदी', शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की 'गृहदाह' आदि। जेम्स हिल्टन रचित 'रैंडम हार्वेस्ट' की छाया पर अजय कर के निर्देशन में फ़िल्म 'हारानो सुर' बनी थी। उत्तम कुमार ने स्वयं रमापद चौधरी के उपन्यास 'बनपलाशीर पदावली' का निर्देशन किया था।

सत्यजीत राय की 'चिड़ियाखाना' में काम करने से पहले ही, बांग्ला साहित्य के लोकप्रिय कथाकार सचिंद्रनाथ बंद्योपाध्याय की रचना 'अभिमानी अंडमान' पढ़कर उत्तम कुमार की इच्छा उस पर फ़िल्म बनाने की हुई थी; लेकिन उनके इस विचार में शारीरिक अस्वस्थता ने बाधा डाल दी। बाद में महानायक ने स्वयं लेखक को बताया था कि फ़िल्म का काम पूरा करने के लिए लंबे समय तक अंडमान में रहने की आवश्यकता थी, लेकिन शारीरिक सीमाओं के कारण तब यह संभव नहीं था।

इसके कुछ वर्षों बाद, सचिंद्र बंद्योपाध्याय द्वारा 'निधु बाबू' के जीवन पर लिखे गए एक उपन्यास को पढ़कर उत्तम कुमार मुग्ध हो गए और उन्होंने स्वयं फ़ोन के माध्यम से लेखक से संपर्क किया। उन्होंने अनुरोध किया कि यदि सचिनबाबू एक बार मोयरा स्ट्रीट स्थित उनके घर आ जाएँ, तो वे उस उपन्यास को फ़िल्म में रूपांतरित करने के विषय में बातचीत करेंगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि वे स्वयं सचिन बाबू के घर चले जाते, लेकिन प्रसिद्धि की विडंबना उनके रास्ते में एक बाधा है। उत्तम कुमार मोहल्ले के किसी घर में आए हैं—यह सुनकर उनके प्रशंसकों की उत्सुकता और दीवानगी सचिन बाबू के लिए समस्या खड़ी कर देगी।

कथानुसार निधु बाबू पर आधारित उपन्यास के लेखक तय दिन पर अपने पुत्र शुभेंद्रनाथ के साथ मोयरा स्ट्रीट वाले घर पहुँचे। फ़िल्म को लेकर विस्तार से बातचीत हुई। फ़िल्म का काम तेज़ी से आगे बढ़ा, उत्तम कुमार ने शूटिंग के लिए तारीख़ें भी तय कर दीं, यहाँ तक कि फ़िल्म के गानों की रिकॉर्डिंग भी पूरी हो गई थी। कुछ दिनों के अंतराल के बाद वे फिर साथ बैठे थे, लेकिन सारी योजनाएँ रद्द हो गईं और कुछ ही दिनों बाद बंगालियों के दिल के महानायक असामयिक इस दुनिया से अलविदा हो गये! साहित्य पर आधारित ऐसी एक फ़िल्म की योजना फिर कभी साकार नहीं हो सकी।

और भी कई कारणों से कालकूट की 'कोथाय पाबो तारे' नहीं बन सकी। उस फ़िल्म का निर्देशन तपन सिन्हा करने वाले थे और मुख्य भूमिका में उत्तम कुमार का अभिनय होना तय था। दूसरी ओर, महादेवी वर्मा की 'चीनी फेरीवाला' पर आधारित हेमंतकुमार -बेला द्वारा निर्मित फ़िल्म 'नील आकाशेर नीचे' में भी मृणाल सेन के निर्देशन में उत्तम कुमार को काम करना था, लेकिन वास्तव में वह सम्भव नहीं हो सका। यदि ऐसा होता, तो बांग्ला सिनेमा में हम चरित्र-अभिनेता उत्तम कुमार के कई और बेहतरीन अभिनय देख पाते।

इसलिए उत्तम कुमार केवल एक व्यावसायिक फ़िल्म के नायक या आम दर्शकों के लिए 'गुरु' मात्र नहीं थे; वे थोड़ा-बहुत अध्ययन करने वाले, साहित्य-प्रेमी और एक संवेदनशील अभिनेता भी थे। उनकी जन्म-शताब्दी पर उन्हें केंद्र में रखकर व्यक्ति-पूजा का कोई कारण मुझे नहीं दिखता, लेकिन उनके जैसे दुर्लभ अभिनेता का सही मूल्यांकन होना अत्यंत आवश्यक है।

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(लेखक:-पत्रकार,लेखक, चित्रकार और रवीन्द्र संगीत के गायक)

साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति |1 अगस्त,2026

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महानायक उत्तम कुमार की जन्मशती- अरिजित मैत्रा

प्रकाशित: 01 अगस्त 2026 • 8 मिनट पठन

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