अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म निर्देशक और लेखक सत्यजीत राय ने महानायक उत्तम कुमार के आकस्मिक निधन (24 जुलाई 1980) पर आनंदबाज़ार पत्रिका में 26 जुलाई 1980 को एक बेहद भावुक और ऐतिहासिक आलेख लिखा था, जिसका बांग्ला शीर्षक था - "অস্তমিত নক্ষত্র" - 'अस्तमित नक्षत्र'। यह आलेख 24 जुलाई 2019 को 'अस्तमित उत्तम' (অস্তমিত উত্তম) के नाम से पुनः प्रकाशित हुआ। इस शीर्षक में बहुत ही सुंदर शब्दावली का खेल किया गया , जिसके दो समानांतर अर्थ निकलते हैं: उत्तम कुमार के नाम के संदर्भ में - यहाँ 'उत्तम' का सीधा अर्थ अभिनेता 'उत्तम कुमार' से है। यानी "उत्तम कुमार का अस्त हो जाना (निधन हो जाना)"। बांग्ला और हिन्दी दोनों में 'उत्तम' का गुणवाचक अर्थ 'सर्वश्रेष्ठ' या 'सबसे अच्छा' होता है। इसके अनुसार इस शीर्षक का भावार्थ है—"श्रेष्ठता का ढल जाना" या "एक स्वर्णिम युग का अंत"। अपने इस आलेख में महानायक के निधन के बाद उनकी अभिनय क्षमता का विश्लेषण किया था महान निर्देशक सत्यजीत राय ने। आनंदबाज़ार पत्रिका का आभार व्यक्त करते हुए उत्तम कुमार (03 नवंबर 1926- 24 जुलाई 1980) जन्मशती वर्ष में हिन्दी पाठकों के लिए प्रस्तुत है इस ऐतिहासिक आलेख का हिन्दी में भावानुवाद । भावानुवाद करते समय मूल लेख का भाव, विश्लेषण और महान निर्देशक सत्यजीत राय की भाषा की गंभीरता बनाए रखने की कोशिश की गई है। जन्मशती वर्ष में किवदंती महानायक का सादर स्मरण, श्रद्धांजलि ।

'सत्यजीत राय' की दृष्टि में
'उत्तम कुमार'
अस्तमित उत्तम: "एक स्वर्णिम युग का अंत"
महानायक उत्तम कुमार
के निधन के बाद उनकी अभिनय क्षमता का विश्लेषण किया था अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म निर्देशक
सत्यजीत राय ने
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जब मैंने पहली बार उत्तम कुमार को किसी फिल्म में देखा, तब मैं स्वयं फिल्म की दुनिया में नहीं आया था। सुन रहा था कि एक नए हीरो का आगमन हुआ है और फिल्म भी अच्छी बताई जा रही है। इसलिए स्वाभाविक उत्सुकता से मैं ‘साढ़े चुआत्तोर’ देखने गया । फिल्म 'निर्मल दे' की थी—साफ-सुथरा निर्देशन और कसी हुई पटकथा। इस विशेष निर्देशक का काम अच्छा लगा, इसलिए बाद में मैंने उनकी ‘बसु परिवार’ और ‘चाँपाडांगार बउ’ भी देखीं। लगातार तीन फिल्में देखने के बाद मुझे लगा कि उत्तम कुमार के अभिनय और व्यक्तित्व में सचमुच एक विशिष्टता है। तीसरे और चौथे दशक के दुर्गादास, प्रमथेश, धीराज, जहर गांगुली आदि के अभिनय से इसका कोई विशेष साम्य नहीं था। मुझे लगा कि यह लड़का हॉलीवुड की फिल्में वगैरह देखता है। उसके अभिनय में थिएटर की गंध नहीं थी। उसके चलने-बोलने में एक सहज स्वच्छंदता थी। कैमरे नाम की वस्तु की वह मानो कोई विशेष परवाह ही नहीं करता था। इसके अलावा उसके चेहरे और हाव-भाव में लोगों का मन अपनी ओर खींच लेने की एक विशेष क्षमता थी। उत्तम कुमार का भविष्य है—इसमें कोई संदेह नहीं था। इसके दस-बारह वर्ष बाद मुझे उत्तम कुमार के साथ काम करने का अवसर मिला।
तब तक उत्तम-सुचित्रा की रोमांटिक जोड़ी दर्शकों के मन पर विजय प्राप्त कर चुकी थी। लेखक, निर्देशक, निर्माता और दर्शक—सभी की माँग प्रेम-कहानियों की ओर चली गई थी। ‘अग्निपरीक्षा’ या ‘हारानो सुर’ देखकर मैं यह समझ चुका था कि इस जोड़ी की सफलता के पीछे लेखक, निर्माता, निर्देशक, दर्शक, आलोचक, फिल्म-पत्रिकाओं के संपादक आदि सभी का योगदान चाहे जितना हो, लेकिन इन दोनों के भीतर ही ऐसे अनेक गुण मौजूद हैं जिनके रासायनिक संयोग से सोना पैदा होना निश्चित है। सिर्फ उत्तम की बात करें तो यह कहा जा सकता है कि जैसे ही अनेक अभिनेता नायिका के निकट आते हैं, उनके भीतर एक तरह के संकुचित हो जाने का भाव दिखाई देने लगता है और कैमरा उसे बहुत आसानी से पकड़ लेता है। उत्तम कुमार में यह बात नहीं थी। बल्कि प्रेम के दृश्यों में उसका अभिनय सबसे अधिक खुलकर सामने आता था। जहाँ स्त्री-पुरुष का संबंध किसी कहानी के प्रमुख तत्वों में से एक हो, वहाँ यह कितनी बड़ी खूबी है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

‘नायक’
‘नायक’ की कहानी मैंने उत्तम कुमार को ध्यान में रखकर ही लिखी थी। एक सामान्य मध्यवर्गीय परिवार का अभिनय का दीवाना युवक फिल्मों में आता है और देखते-देखते सफलता के शिखर पर पहुँच जाता है। इस स्थिति में उस युवक के मन में किस तरह के संदेह और द्वंद्व पैदा हो सकते हैं, उसके मूल्य-बोध में किस प्रकार के परिवर्तन आ सकते हैं—यह भी कहानी का विषय था।
उत्तम ने पटकथा सुनकर खुशी जाहिर की। इसका एक कारण शायद उसके निजी जीवन और कहानी के बीच मौजूद समानता भी हो सकता है। बातचीत के दौरान मुझे समझ में आया कि कहानी की गहराई में वह कितना प्रवेश करना चाहता था या कर पाता था, यह अलग बात है, लेकिन अपने चरित्र को किस तरह सामने लाना है, इसे उत्तम ने मोटे तौर पर समझ लिया था। मैंने उसे पहले ही बता दिया था कि जिन तरह की प्रेम-कहानियों में वह अभिनय करने का अभ्यस्त है, यह उस तरह की कहानी नहीं है। इसलिए उसे अपनी परंपरागत राह से कुछ हटना पड़ेगा।
इसमें प्रेम है, लेकिन वह प्रच्छन्न है—अप्रत्यक्ष है। इसमें नायक के दोष भी हैं और गुण भी। और ये केवल उसके मन के भीतर ही नहीं हैं, बल्कि उसके व्यवहार में भी दिखाई देते हैं। मैंने उससे कहा कि तुम्हारे गालों पर हाल में चेचक के जो दाग पड़े हैं, वे कैमरे पर दिखाई देंगे, क्योंकि तुम्हें मेकअप इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इन तमाम प्रस्तावों को लेकर जो थोड़ी-सी शुरुआती झिझक उत्तम के मन में थी, उसने उसे बहुत आसानी से दूर कर लिया। बांग्ला फिल्म 'नायक' देखने के लिए लिंक पर यहाँ क्लिक करें।
एक खरा प्रोफेशनल
मैं यह कह सकता हूँ कि उत्तम के साथ काम करके मुझे जो संतुष्टि मिली, वैसी संतुष्टि अपने पच्चीस वर्षों के फिल्मी जीवन में मुझे बहुत अधिक नहीं मिली। उत्तम उस अर्थ में एक खरा प्रोफेशनल था। वह रोज के संवादों को पूरी तरह याद करके काम पर आता था। उसकी अभिनय क्षमता सहज और जन्मजात थी। अपने शरीर के हर अंग पर उसका पूरा नियंत्रण था। फलतः उसके अभिनय में स्वाभाविक रूप से एक तरह का लालित्य आ जाता था। हर दिन की शुरुआत में उस दिन के विशेष काम के बारे में एक प्रारंभिक चर्चा के बाद मुझे उसे बहुत कम निर्देश देने पड़ते थे। लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि केवल निर्देशों का पालन करने से आगे बढ़कर वह कभी-कभी अपने अभिनय में कुछ ऐसी सूक्ष्म बारीकियाँ जोड़ देता था, जो पूरी तरह उसका अपना योगदान होती थीं। ये सजावट कभी भी अतिरेक की सीमा तक नहीं पहुँचती थी। बल्कि मेरे लिए यह हमेशा एक अप्रत्याशित अतिरिक्त उपलब्धि होती थी। बड़े अभिनेता की बड़ी पहचान यहीं होती है।
‘नायक’ के बाद ‘चिड़ियाखाना’ फिल्म में भी उत्तम के साथ काम करके मुझे वही संतुष्टि मिली। ‘चिड़ियाखाना’ ऐसी फिल्म थी जिसमें कोई नायिका नहीं थी। इसलिए कहा जा सकता है कि उत्तम के लिए यह उससे भी बड़ा बदलाव था। बांग्ला फिल्म 'चिड़ियाखाना' देखने के लिए लिंक पर यहाँ क्लिक करें।
ढाई सौ से अधिक फिल्में
आज अखबार में पढ़कर पता चला कि उत्तम कुमार ने ढाई सौ से अधिक फिल्मों में अभिनय किया था। इनमें से कम-से-कम दो सौ फिल्में बहुत जल्द विस्मृति की गहराई में डूब जाएँगी—इसमें कोई संदेह नहीं है। जिस देश में अच्छे अभिनेता की प्रतिभा का सदुपयोग करना जानने वाले लोगों की इतनी कमी हो, वहाँ ऐसा होना स्वाभाविक ही है। लेकिन किसी कलाकार का मूल्यांकन हमेशा उसके श्रेष्ठ कार्य के आधार पर होता है। उत्तम के अभिनय का विस्तार बहुत व्यापक था—ऐसा नहीं था। लेकिन अपनी इस विशिष्ट अभिनय-परिधि में लगातार तीस वर्षों तक उसने जिस निष्ठा और क्षमता का परिचय दिया, उसकी कोई तुलना नहीं है।
'आज उसकी कमी पूरी करने वाला अभिनेता कहाँ है?'
आज उसकी कमी पूरी करने वाला अभिनेता कहाँ है?
लेख की अंतिम पंक्ति है “आज उसकी कमी पूरी करने वाला अभिनेता कहाँ है?”—यह पंक्ति पूरे लेख का सबसे मार्मिक निष्कर्ष है। यह केवल उत्तम कुमार की मृत्यु पर शोक नहीं है, बल्कि बांग्ला सिनेमा के सामने खड़े उस प्रश्न को भी व्यक्त करती है कि क्या कोई दूसरा अभिनेता उस स्तर की लोकप्रियता, सहजता और अभिनय-कौशल को एक साथ हासिल कर पाएगा!
उपलब्ध विडिओ रिपोर्टिंग भी बताती है कि तत्कालीन कलकत्ता के टेक्निशियन्स स्टूडियो में 24 जुलाई को उत्तम कुमार की मृत्यु के बाद 28 जुलाई को दिए गए सत्यजीत राय के दुर्लभ श्रद्धांजलि-भाषण में उन्होंने इसी बात को और अधिक भावनात्मक ढंग से कहा था—विशेषकर नायक में उत्तम के विराम (pauses), उनकी गरिमापूर्ण उपस्थिति और उनकी अप्रतिम अभिनय क्षमता के संदर्भ में। उस 28 जुलाई के दुर्लभ भाषण का लिंक साझा कर रहा हूँ जो उत्तम कुमार के संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त फिल्म निर्देशक सत्यजीत राय की भावनाओं का अधिक विस्तृत और भावनात्मक स्रोत है। भाषण बांग्ला में है और औडियो क्वालिटी में सुधार (डिजिटल इम्प्रूव्मन्ट) की जरूरत है, फिर भी संग्रहणीय है। यहाँ दिए गए लिंक पर क्लिक करके पाठक इस दुर्लभ विडिओ को देख सकते हैं।
टेक्निशियन्स स्टूडियो में मृत्यु के बाद दिए गए सत्यजीत राय के दुर्लभ श्रद्धांजलि-भाषण का लिंक
प्रसंगवश:
निर्मल दे (Nirmal Dey) बंगाली सिनेमा के एक प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण फिल्म निर्देशक थे,उनका मुख्य योगदान निम्न फिल्में रही। अपने आलेख के प्रारंभ में ही महान निर्देशक सत्यजीत राय ने इनका उल्लेख किया है। उत्तम कुमार को शुरुआती सफलता निर्मल दे के निर्देशन में मिली।
बसु परिवार : 1952 में रिलीज़ हुई एक बेहद लोकप्रिय बंगाली ड्रामा फिल्म है, जिसका निर्देशन निर्मल दे ने किया था। यह ब्लॉकबस्टर फिल्म बंगाली सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर मानी जाती है। अभिनेता उत्तम कुमार के शुरुआती करियर में सात फिल्में फ्लॉप रही थीं, यहाँ तक की उन्हें फ्लॉप-मास्टर जनरल भी कहा जाने लगा था, जिसके बाद इसी फिल्म ने उन्हें बॉक्स ऑफिस पर अपनी पहली सुपरहिट सफलता दिलाई और उनके करियर को नया जीवन दिया। यह फिल्म उत्तम कुमार के करियर का टर्निंग पॉइंट थी। इस फिल्म में 'सुखेन' के रूप में उनके स्वाभाविक और संजीदा अभिनय को दर्शकों ने बेहद पसंद किया, जिसने उन्हें स्टारडम की सीढ़ी पर आगे बढ़ाया। बंगाली सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री सुप्रिया देवी (चौधरी) की यह पहली फिल्म (डेब्यू) थी, जिससे उन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी। उत्तम कुमार और सुप्रिया देवी (बहन की भूमिका मे) के साथ इस फिल्म में पहाड़ी सान्याल, सबित्री चटर्जी, भानु बनर्जी और जहर रॉय जैसे बड़े कलाकारों ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। यह एक मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार की कहानी है जो कोर्ट केस हारने के बाद भारी आर्थिक तंगी से गुजरता है। कहानी में मोड़ तब आता है जब छोटा भाई सत्येन चोरी के एक झूठे आरोप में फंस जाता है। सत्येन (नेपाल नाग) को यह गलतफहमी हो जाती है कि यह चोरी उसके बड़े भाई सुखेन (उत्तम कुमार) ने की है, इसलिए वह अपने भाई को बचाने के लिए खुद पर इल्जाम ले लेता है। जब बसु परिवार कानूनी मुकदमा हार जाता है और गहरे आर्थिक संकट (द्वितीय विश्व युद्ध के समय की पृष्ठभूमि) में डूब जाता है, तब सुखेन पूरे परिवार को टूटने से बचाने के लिए एक ढाल की तरह खड़ा होता है और आर्थिक व मानसिक संबल देता है। उत्तम कुमार ने इस पारिवारिक तनाव, दुख और गलतफहमी के भावों को पर्दे पर बहुत खूबसूरती से जिया था। अंत में पूरा बसु परिवार एकजुट होकर अपनी प्रतिष्ठा वापस पा लेता है। इस फिल्म में प्रसिद्ध अभिनेत्री सुप्रिया देवी ने सुखेन (उत्तम कुमार) की छोटी बहन की भूमिका निभाई थी। आगे चलकर उत्तम कुमार और सुप्रिया देवी की ऑन-स्क्रीन रोमांटिक जोड़ी बंगाली सिनेमा की सबसे लोकप्रिय जोड़ियों में से एक बनी, इसलिए इस फिल्म में उन्हें भाई-बहन के रूप में देखना बेहद अनोखा अनुभव है। इसी फिल्म से प्रेरित होकर 1960 में हिंदी में प्रसिद्ध फिल्म 'हम हिन्दुस्तानी' बनाई गई थी, जिसमें सुनील दत्त, जॉय मुखर्जी और आशा पारेख थे। बांग्ला फिल्म 'बसु परिवार' देखने के लिए लिंक पर यहाँ क्लिक करें।
साढ़े चुआत्तोर : 1953 मे रिलीज हुई यह निर्मल दे की सबसे प्रसिद्ध फिल्म है। यह बांग्ला सिनेमा की एक बेहद लोकप्रिय कॉमेडी फिल्म है। इसी फिल्म ने बंगाल के महानायक उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की जोड़ी को पहली बार पर्दे पर मिलाया था, जो बंगाली सिनेमा की सबसे लोकप्रिय और सफल जोड़ी बनी। प्रसंगवश 'साढ़े चुआत्तोर' (74 ½ या 74.5) बांग्ला और हिंदी संस्कृति में एक बेहद प्रसिद्ध संख्या है। इसका मुख्य संदर्भ हैं कि पुराने समय में (विशेषकर बंगाल में) लोग चिट्ठियों के लिफाफे पर "साढ़े चुआत्तोर" (৭৪½) लिख देते थे। इसका मतलब होता था कि इस पत्र को पाने वाले के अलावा कोई दूसरा नहीं खोल सकता। अगर कोई इसे बिना अनुमति के खोलता, तो उसे एक बड़ा धार्मिक पाप या सामाजिक अपराध (जिसे 'चित्तौड़ का पाप' माना जाता था) लगने की मान्यता थी।
फिल्म की कहानी कोलकाता के एक बॉयज हॉस्टल (अन्नपूर्णा बोर्डिंग हाउस) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसके मालिक रजनी बाबू (तुलसी चक्रवर्ती) हैं। इस मेस में रहने वाले सभी पुरुष शांति से रह रहे होते हैं, लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब वहां एक परिवार अपनी खूबसूरत बेटी रोमोला (सुचित्रा सेन) के साथ रहने आ जाता है। मेस में रहने वाले रामप्रीति (उत्तम कुमार) और रोमोला के बीच प्यार पनपने लगता है। हॉस्टल में एक लड़की के आने से जो मजेदार परिस्थितियां, गलतफहमियां और कॉमेडी पैदा होती है, वही इस फिल्म का मुख्य आकर्षण है। इस फिल्म की एक और अनोखी बात यह थी कि उस दौर के 5 प्रसिद्ध गायकों - धनंजय भट्टाचार्य, द्विजेन मुखोपाध्याय, श्यामल मित्रा, मानबेंद्र मुखोपाध्याय और सनत सिन्हा ने भी इसमें अभिनय किया था। भानु बंदोपाध्याय और जहर रॉय के बीच की कॉमेडी-टाइमिंग को आज भी बंगाली-सिनेमा के सबसे बेहतरीन-दृश्यों में गिना जाता है। बांग्ला फिल्म 'साढ़े चुआत्तोर' देखने के लिए लिंक पर यहाँ क्लिक करें।
चांपाडांगार बउ: 1954 मे रिलीज ताराशंकर बंद्योपाध्याय के कालजयी उपन्यास पर आधारित इस ब्लॉकबस्टर क्लासिक फिल्म का निर्देशन भी निर्मल दे ने किया था, जिसमें उत्तम कुमार और साबित्री चटर्जी मुख्य भूमिकाओं में थे। साथ में थे कानू बनर्जी, अनुभा गुप्ता (चांपाडांगार बउ - कादंबनी - की भूमिका में ),तुलसी चक्रवर्ती और प्रेमांशु बोस। यह फिल्म ग्रामीण बंगाल के एक संयुक्त परिवार के उतार-चढ़ाव , रिश्तों के ताने-बाने और समाज के संकीर्ण नजरिए के इर्द-गिर्द घूमती है जो देवर और भाभी के पवित्र, मां-बेटे जैसे गहरे स्नेह पर आधारित है, जिसे समाज कलंकित करने की कोशिश करता है। इस कहानी से प्रेरित होकर बॉलीवुड में राजेश खन्ना और अमोल पालेकर अभिनीत प्रसिद्ध फिल्म 'आँचल' (1980) भी बनाई गई थी। इसी कहानी पर बांग्लादेश (ढॉलीवुड) में भी 'चापा डांगर बउ' नाम से एक सफल फिल्म बनाई गई, जिसके निर्देशक नायक राज राज्जाक थे और इसमें शबाना तथा बप्पाराज ने मुख्य भूमिका निभाई थी। बांग्ला फिल्म 'चांपाडांगार बउ' देखने के लिए लिंक पर यहाँ क्लिक करें।
स्पष्टीकरण: पूरे प्रकाशित लेख का लगभग शब्दशः हिन्दी अनुवाद देना कॉपीराइट-संरक्षित पाठ का पूर्ण अनुवाद होगा, इसलिए उसकी जगह हिन्दी भावानुवाद दिया गया है , जिसमें सत्यजीत राय के सभी प्रमुख विचार, प्रसंग और निष्कर्ष शामिल हैं।
स्वीकृतिकरण: यह लेख 26 जुलाई, 1980 को बांग्ला दैनिक 'आनंदबाज़ार पत्रिका' में बांग्ला भाषा में मूल रूप से प्रकाशित हुआ था। भावानुवाद का उद्येश्य महानायक उत्तम कुमार की जन्मशती वर्ष के अवसर पर उनके बारे में महान निर्देशक सत्यजीत राय के चिंतन को हिन्दी पाठकों तक पहुंचाना है। लेख में संबंधित कॉपीराइट तथ्यों और चित्रों का स्वामित्व उनके सम्मानीय स्वामियों का है। उनका आभार व्यक्त करते हैं।
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