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हमारी मांग है: 'छब्बीस के विधानसभा के सभी वोट - धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक वाम मोर्चा':- कमलेश्वर मुखर्जी

डॉ. अशोक सिंह•11 अप्रैल 20261 मिनट पठन63 बार पढ़ा गया
बात हो नौकरी, कारखानों और फसलों के उचित दाम की; स्कूल-कॉलेज-अस्पतालों की उन्नति, बढ़ती महंगाई के बोझ, बढ़ी हुई मजदूरी की मांग, अन्यायपूर्ण छंटनी के खिलाफ विरोध और राज्य में नए निवेश की।
हमारी मांग है: 'छब्बीस के विधानसभा के सभी वोट - धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक वाम मोर्चा':- कमलेश्वर मुखर्जी
पिछले 15 वर्षों में बंगाल के लोगों ने चोरी, गुंडाराज, हत्या-बलात्कार, भाई-भतीजावाद, धमकी, पुलिस केस, सबूत मिटाना, पाला बदलना, उत्सव-मेला, गिरफ्तारी-जमानत और शाम की रंगीन महफिलों के किस्से बहुत देखे हैं। दो समुदायों के बीच फैलाए गए जहरीले सांप्रदायिक विद्वेष को तो इससे भी कहीं अधिक देखा है। 'अवैध घुसपैठियों' और 'रोहिंग्या' संक्रमण को लेकर लोगों ने बहुत सिर खपाया है। 'परिवर्तन' के बाद 'अच्छे दिन' से लेकर 'विकास' तक सब देख लिया है। 'जय श्री राम' और 'जय बांग्ला' के नारे भी बहुत सुन लिए हैं। अब बात हो नौकरी, कारखानों और फसलों के उचित दाम की; स्कूल-कॉलेज-अस्पतालों की उन्नति, बढ़ती महंगाई के बोझ, बढ़ी हुई मजदूरी की मांग, अन्यायपूर्ण छंटनी के खिलाफ विरोध और राज्य में नए निवेश की। हर क्षेत्र में नागरिक सुविधाओं - सड़कों, सार्वजनिक परिवहन, सीवरेज, पुल और शुद्ध पेयजल पर बात हो। इसलिए हमारी मांग है: 'छब्बीस के विधानसभा के सभी वोट - धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक वाम मोर्चा'। (प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक कमलेश्वर मुखर्जी)

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हमारी मांग है: 'छब्बीस के विधानसभा के सभी वोट - धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक वाम मोर्चा':- कमलेश्वर मुखर्जी

प्रकाशित: 11 अप्रैल 2026 • 1 मिनट पठन

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इस मानसिकता का परत-दर-परत विश्लेषण जरूरी हो जाता हैं।

“माई कहा करती थी सर , समाज का एक ठो विधान होता है.. राजा होता है.. प्रजा होती है.. सेवक होता है.. दास होता है। इस सबका संतुलन है सर एक… ब्रह्मा जी ने बनाया है…संस्कृत में। हमको कोई अधिकार नहीं है, इस संतुलन को बिगाड़ने का। और सर... सब बराबर हो जाएंगे तो फिर राजा कौन बनेगा ? “ - “लेकिन राजा बनाना ही क्यों है ?” नायक-नायिका (पुलिस-पत्रकार हैं ) का चिंतन उभर कर सामने आता है।

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आज के दौर में जब मुख्यधारा के मीडिया और फ़िल्मों का एक बड़ा वर्ग समाज में वैमनस्य, नफ़रत, शोर और विभाजन फैलाने का औजार बनता जा रहा है, डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘प्रेमचंद – एक जीवन’ यह सिद्ध करती है कि धर्म, भाषा और संस्कृति कभी भी भारतीय जनमानस में नफ़रत का आधार नहीं रहे हैं। फ़िल्म का हर फ्रेम सादगी में भव्यता की कहानी कहता है और एक शांत, गंभीर, कल-कल बहती नदी की तरह दर्शक को अपने साथ बहा ले जाता है। निर्माण के दौरान निर्देशक गुलबहार सिंह को जिस सुकून और निर्झर आनंद की अनुभूति हुई होगी, वह इस फ़िल्म के एक-एक फ्रेम में छलकती है। यह फ़िल्म देश के प्रत्येक स्कूल, विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक मंचों पर अनिवार्य रूप से दिखाई जानी चाहिए। प्रसार भारती को अविलंब इस अमूल्य धरोहर को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना चाहिए ताकि देश की नई पीढ़ी प्रेमचंद के लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील भारत के सपने से जुड़ सके।

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