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पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव एक अभूतपूर्व राजनीतिक परिस्थिति में होने जा रहे हैं। इस चुनाव की मुख्य विशेषता यह है कि राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस और केंद्र की सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी—ये दो प्रत्यक्ष विरोधी शक्तियाँ वास्तव में एक ही अराजनीतिक और निरंकुश सत्ता के दो अलग-अलग मुखौटे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 'दोमुँहे यक्ष' की तरह ये दोनों शक्तियाँ भारत के संविधान को कुचलकर कट्टरता, भ्रष्टाचार और तानाशाही स्थापित करना चाहती हैं। इनके विरुद्ध एकमात्र विकल्प के रूप में वामपंथी लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष ताकतें लड़ रही हैं।
एक चेहरा, दो मुखोटे
तृणमूल और भाजपा भले ही एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध में लगे होने का ढोंग करें, लेकिन उनका राजनीतिक और आर्थिक मॉडल बिल्कुल एक जैसा है। दोनों ही दल जनविरोधी आर्थिक नीति, सांप्रदायिक विभाजन, बेलगाम भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य और शिक्षा प्रणाली के निजीकरण और लोकलुभावन 'खेल और उत्सव' की राजनीति में विश्वास करते हैं।
तृणमूल कांग्रेस एक तरफ अल्पसंख्यक समुदाय को भाजपा का डर दिखाकर वोट हासिल करती है, तो दूसरी तरफ संसद में वक्फ कानून, सीएए या एनआरसी जैसे अल्पसंख्यक विरोधी बिलों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सहायता करती है। भ्रष्टाचार और कुशासन के कारण इनके नेता केंद्रीय जांच एजेंसियों की रडार पर तो रहते हैं, लेकिन रहस्यमय तरीके से न्याय की आवाज 'अंधेरे में दबकर' रह जाती है।
भाजपा सीधे तौर पर संविधान को चुनौती देकर बहुसंख्यकों को कट्टरता के जहर से अंधा बना रही है। राज्य में मीम (AIMIM) या एजीयूपी (AGUP) जैसे 'प्रॉक्सी' दलों को मैदान में उतारकर अल्पसंख्यक वोटों को बांटने की साजिश चल रही है, ताकि अंततः इस आरएसएस नियंत्रित इकोसिस्टम को फायदा हो सके।
इन दोनों दलों की शक्ति का मुख्य स्रोत एकाधिकारवादी पूँजीपतियों का पैसा (जैसे इलेक्टोरल बॉन्ड) और वसूली का काला धन है। इसके विपरीत, वामपंथी जनता के मौलिक अधिकारों—अन्न, वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए लड़ रहे हैं।"वाम मोर्चा सरकार के 34 वर्षों के शासन के दौरान राज्य में सांप्रदायिक सद्भाव अटूट था; आज भी दंगों को रोकने और सद्भाव बहाल करने के लिए वामपंथी ही एकमात्र भरोसा हैं।"
1998 में बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन में शामिल होने और मंत्री पद पाने से लेकर, 2011 में वाम मोर्चा विरोधी 'बिना नीति वाले' इंद्रधनुषी गठबंधन में भाजपा को पश्चिम बंगाल में बुलाने का मुख्य सूत्रधार तृणमूल कांग्रेस ही थी।उनके शासनकाल के लंबे कुशासन, भ्रष्टाचार और अपराधीकरण को केंद्रीय एजेंसियों (सीबीआई, ईडी) ने आज भी बिना किसी ठोस नतीजे के अदालतों में लटका रखा है। सबूतों के अभाव में अपराधियों को जमानत मिलने में परोक्ष रूप से मदद की गई है।
वामपंथियों का भरोसा किसी पूँजीपति के चंदे या भ्रष्टाचार और वसूली के पैसे पर नहीं है। वे जनता के साथ जनसंपर्क मजबूत करके आगे बढ़ते हैं। कहीं भी राजनीतिक अशांति या सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ने पर वे ही सबसे पहले सामाजिक कदम उठाते हैं। वे ही इस तूफान के बीच नैया पार लगाने वाले सच्चे 'लाल नाविक' हैं।
संकट, बेरोजगारी और अनुदान
भारत की पूँजीवादी और सामंतवादी मिश्रित अर्थव्यवस्था में धर्म और जाति के भेद का इस्तेमाल करके मेहनतकश लोगों के वर्ग संघर्ष को कमजोर कर दिया जाता है। देश के वर्तमान आर्थिक आंकड़े वास्तव में भयावह हैं।
राष्ट्रीय स्थिति: देश के लगभग 53 करोड़ कार्यक्षम लोगों में से 42-47 करोड़ असंगठित क्षेत्र में हैं। देश में वास्तविक बेरोजगारों की संख्या लगभग 4 करोड़ है और करीब 10 करोड़ युवा काम की तलाश में भटक रहे हैं। 80 लाख गिग वर्कर्स और संविदा कर्मियों के पास रोजगार की कोई सुरक्षा नहीं है। पिछले एक दशक में मुद्रास्फीति (महंगाई) दोगुनी हो गई है, जबकि संपत्ति का भयानक केंद्रीकरण हुआ है। देश की 20% संपत्ति केवल 1% अमीरों के हाथों में सिमट गई है। पूँजीपतियों का 15 लाख करोड़ रुपये का कर्ज माफ कर दिया गया, लेकिन आम आदमी की आय उस अनुपात में नहीं बढ़ी।पश्चिम बंगाल की स्थिति और भी हृदयविदारक है। पिछले 15 वर्षों में राज्य में कोई उल्लेखनीय उद्योग स्थापित नहीं हुआ है।रिक्त पदों पर भर्ती बंद होने के कारण राज्य में शिक्षित बेरोजगारी की दर लगभग 18% तक पहुँच गई है। वैकल्पिक रोजगार के अभाव में करीब 60 लाख लोग प्रवासी श्रमिक के रूप में दूसरे राज्यों में पलायन कर चुके हैं।सरकार ने रोजगार सृजन के बजाय 'निशर्त भत्ते' की राजनीति शुरू की है, जो अस्थायी राहत तो देती है लेकिन राज्य की अर्थव्यवस्था को पंगु बना रही है।
कर्ज का बोझ: राज्य पर कर्ज का बोझ 2 लाख करोड़ से बढ़कर लगभग 8 लाख करोड़ रुपये हो गया है। तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद से पश्चिम बंगाल में कोई भी महत्वपूर्ण भारी उद्योग नहीं लगा है।
असली समस्याओं को छिपाना
केंद्र की सत्ताधारी पार्टी भाजपा सीमा पर आक्रामकता और उग्र राष्ट्रवादी भावनाओं को भुनाकर देश की आंतरिक आर्थिक विफलताओं और कट्टरता को छिपाना चाहती है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस 'बंगाली बनाम गैर-बंगाली' के प्रांतीयतावाद का मुद्दा उठाकर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश कर रही है।
जब 60 लाख बंगाली दूसरे राज्यों में प्रवासी श्रमिक के रूप में अमानवीय कष्टों में दिन गुजारते हैं या लॉकडाउन के दौरान पैदल घर लौटते हैं, तब 'बंगाली अस्मिता' के ये ध्वजवाहक चुप रहते हैं। इन्होंने लोकतंत्र मजाक बना दिया है।
यह सरकार बंगाल के मेहनतकश गरीब लोगों के लिए भोजन, वस्त्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार और महिला सुरक्षा को लेकर रत्ती भर भी रचनात्मक कार्य नहीं करती है।जब भारत के अन्य हिस्सों में किसी प्रवासी बंगाली श्रमिक की हत्या होती है या वह निर्माण कार्य के दौरान छत से गिरकर मर जाता है, तब ये लोग उसकी 'बंगाली' पहचान को मुद्दा बनाकर राजनीतिक प्रचार में गला फाड़ते हैं। लेकिन वह अभागा श्रमिक अपनी जन्मभूमि छोड़कर प्रवासी बनने पर मजबूर क्यों हुआ (आज लगभग साठ लाख लोग इसी स्थिति में हैं), इसका उत्तर तृणमूल सरकार नहीं देती है।
बढ़ती राजनीतिक हिंसा
साल 2014 के बाद से पूरे देश में तानाशाही का उदय हुआ है। एक ओर दलितों और अल्पसंख्यकों पर 'गोरक्षा' के नाम पर मब लिंचिंग (अखलाक, पहलू खान), तो दूसरी ओर तर्कवादियों और पत्रकारों की हत्या (कलबुर्गी, गौरी लंकेश)—ये सब प्रमाण हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आज कितनी खतरे में है।
पश्चिम बंगाल में 2011 के सत्ता परिवर्तन के बाद हिंसा का चरित्र और भी भयानक हो गया है। चुनाव के बाद की हिंसा (अभिजीत सरकार), अफवाहों पर आधारित मॉब लिंचिंग और छात्र-युवा राजनीति में पुलिसिया व राजकीय आतंक (सुदीप्त गुप्ता, अनीस खान, मैदुल मिद्दा) अब रोज़मर्रा की घटनाएं बन गई हैं। यहाँ तक कि सत्ताधारी दल के भीतर हिस्सेदारी को लेकर आपसी कलह में बगटुई जैसा नारकीय नरसंहार हुआ, जहाँ महिलाओं और बच्चों को जिंदा जला दिया गया।
'ह्यूमन राइट्स वॉच' और 'इंडिया स्पेंड' जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़ों के अनुसार,सांप्रदायिक हिंसा 2015 से 2018 के बीच कम से कम 40-50 निर्दोष लोग इस तरह की पाशविक हिंसा में मारे गए, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम या दलित थे।दादरी में मोहम्मद अखलाक, राजस्थान में पहलू खान और झारखंड में तबरेज अंसारी जैसी नृशंस घटनाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर तीव्र प्रतिक्रिया पैदा की थी।
तथ्यों को छिपाना: गौर करने वाली बात यह है कि केंद्र सरकार के पास इस तरह की घटनाओं का कोई पूर्ण सरकारी आंकड़ा मौजूद नहीं है। सूचनाओं को छिपाया गया है, जिससे इस संभावना को नकारा नहीं जा सकता कि वास्तविक मौतों की संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।
ठीक इसी समय के दौरान कई प्रतिष्ठित तर्कवादियों और साहसी पत्रकारों को चरमपंथियों ने अपनी हत्या का शिकार बनाया। गोविंद पानसरे (2015), एम.एम. कलबुर्गी (2015) और बेंगलुरु में गौरी लंकेश (2017) की हत्याएं विशेष रूप से उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण हैं। इनमें से प्रत्येक व्यक्ति धार्मिक कट्टरवाद, अवैज्ञानिक अंधविश्वास और दक्षिणपंथी आरएसएस की राजनीति के तीव्र आलोचक थे। लंबी जांच के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और विभिन्न विशेष जांच दलों (SIT) ने इन हत्याओं में सीधे तौर पर हिंदू चरमपंथी संगठनों की संलिप्तता के स्पष्ट संकेत दिए हैं।
पश्चिम बंगाल के संदर्भ में हिंसा:
पश्चिम बंगाल में भी 2011 के राजनीतिक परिवर्तन के साथ ही हिंसा का चरित्र एक नए और भयावह रूप में सामने आया है। विरोधी आवाजों को दबाने के लिए इस राज्य में लगभग 51 हजार प्रदर्शनकारियों को झूठे मामलों में गिरफ्तार किया गया है। तृणमूल कांग्रेस के आश्रित गुंडों के आतंक के कारण 51,714 राजनीतिक कार्यकर्ता घर छोड़ने पर मजबूर हुए हैं। लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष में अब तक 274 लोग शहीद हुए हैं।
छात्र-युवा राजनीति और राजकीय आतंक
छात्र और युवा राजनीति को लेकर इस दौरान राजकीय हिंसा भी अत्यंत चर्चा में रही है। प्रदर्शनकारी छात्र नेता सुदीप्त गुप्ता की मृत्यु विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिनकी पुलिस हिरासत में बर्बरता के कारण जान चली गई। पुलिसिया आतंक के बीच सड़क पर पीट-पीटकर शहीद मैदुल मिद्दा की हत्या कर दी गई। प्रदर्शनकारी छात्र नेता शहीद अनीस खान को उनके अपने घर की छत से फेंककर मार दिया गया।
इसके अलावा, आनंद बर्मन जैसी घटनाएं दिखाती हैं कि प्रशासन और पुलिस की मिलीभगत से स्थानीय स्तर पर छात्र-संघर्ष कभी-कभी कितना प्राणघातक और जानलेवा रूप ले लेता है।
महिला सुरक्षा और न्यायहीनता
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से बलात्कार के मामलों की संख्या लगातार बहुत उच्च स्तर पर बनी हुई है:
आंकड़े: 2014 में लगभग 36,735 मामले दर्ज हुए, जो 2016 में बढ़कर 38,947 तक पहुँच गए, और बाद के वर्षों में यह संख्या आमतौर पर 32,000 से 33,000 के बीच रही; 2022 में यह आंकड़ा 31,516 था।
जमीनी हकीकत: प्रति लाख जनसंख्या पर महिला उत्पीड़न की दर में कोई खास कमी नहीं आई है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि 2012 के 'निर्भया' कांड के बाद कानून में कड़े सुधार होने के बावजूद, समाज और वास्तविक स्थिति में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ है।
पश्चिम बंगाल में पार्क स्ट्रीट रेप केस ने शहर की सुरक्षा और महिला अधिकारों पर गहरे सवाल खड़े किए। 2012 में कोलकाता के पॉश इलाके पार्क स्ट्रीट में एक महिला के साथ चलती गाड़ी के अंदर सामूहिक बलात्कार किया गया था। इस घटना के बाद, खुद राज्य की मुख्यमंत्री ने इसे 'सजाई हुई घटना' बताकर खारिज कर दिया था।
कामदुनी बलात्कार कांड साल। 2013 में उत्तर 24 परगना के कामदुनी में हुई एक नृशंस बलात्कार और हत्या की घटना ने पूरे पश्चिम बंगाल को भीतर तक झकझोर दिया था। एक कॉलेज छात्रा का जबरन अपहरण कर सामूहिक बलात्कार के बाद उसकी बर्बरता से हत्या कर दी गई थी। इस पाशविक घटना के विरोध में स्थानीय आम लोगों, विशेषकर ग्रामीण महिलाओं ने तमाम डर को दरकिनार कर सड़कों पर उतरकर तीव्र जन-आंदोलन खड़ा किया। मुख्यमंत्री ने वहां जाकर भी आंदोलनकारियों को 'माओवादी' करार दे दिया था। अंततः न्यायिक प्रक्रिया के बाद कुछ आरोपियों को मृत्युदंड और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज और 'अभया' मामला
आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में कार्यरत एक युवा महिला चिकित्सक का 'अभया बलात्कार-हत्या मामला' पूरी दुनिया के जनमानस में एक प्रबल आक्रोश पैदा कर चुका है। एक सरकारी अस्पताल में कार्यस्थल पर ऐसी वीभत्स घटना प्रमाणित करती है कि राज्य में महिला सुरक्षा नाम की कोई चीज़ शेष नहीं बची है।
इस मामले में राज्य पुलिस की घृणित पक्षपातपूर्ण कार्यशैली, जल्दबाजी में शव का दाह-संस्कार करना, 'क्राइम सीन' के तथ्यों को छिपाना, सबूतों को मिटाना और मुख्य दोषियों को बचाने की कोशिश—ये सब मिलकर एक भयानक साजिश की ओर इशारा करते हैं।इसके बाद जांच का जिम्मा संभालने वाली केंद्रीय एजेंसी सीबीआई की जानबूझकर अपनाई गई धीमी गति और कार्यप्रणाली की लापरवाही ने जनता में जिस अभूतपूर्व गुस्से और तूफ़ान को जन्म दिया है, वह निर्विवाद है।'रात दखल' से लेकर लाखों लोगों के स्वतःस्फूर्त विरोध प्रदर्शनों ने पूरे राज्य को हिलाकर रख दिया है।
बदलाव का आह्वान
यह पूरी तरह विफल, भ्रष्ट और तानाशाही वाली केंद्र और राज्य सरकार का प्रशासन आज आगामी 2026 के विधानसभा चुनाव में बंगाल की आम जनता की अदालत और कटघरे में आकर खड़ा हो गया है। आरएसएस-भाजपा-तृणमूल के इस अशुभ, जनविरोधी और सांप्रदायिक सांठगांठ के खिलाफ आज एकमात्र विकल्प के रूप में वामपंथी-लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष गठबंधन सड़कों पर उतरकर कठिन राजनीतिक लड़ाई लड़ रहा है।
उस निर्विवाद सत्य को ध्यान में रखते हुए ही आगामी चुनाव में आप ईवीएम (EVM) का बटन पूरी जागरूकता के साथ दबाएं। भूलिएगा मत, भ्रमित न हों। याद रखें कि यह वामपंथी लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष शक्ति ही एकमात्र वह ताकत है, जो आपके देश, आपके राज्य, आपके स्थानीय क्षेत्र, आपके अपने और सबसे बढ़कर आपकी अगली पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सही जन-कल्याणकारी राजनीतिक नीति, वैज्ञानिक रणनीति और उसका वास्तविक कार्यान्वयन करने में सक्षम है।इनके हाथों ही बंगाल का खोया हुआ उद्योग, युवाओं का रोजगार, महिलाओं का सम्मान और समाज में स्थायी शांति वापस आएगी। यही इस तूफ़ान के बीच नैया पार लगाने वाले निडर 'लाल नाविक' हैं।
अपलोडर: श्रेया जायसवाल
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अपलोडर: श्रेया जायसवाल • प्रकाशित: 27 अप्रैल 2026 • 11 मिनट पठन

सलीम ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी असल में आरएसएस के इशारे पर दलाल की भूमिका निभाती आ रही है। दरअसल, इस राज्य से वामपंथी राजनीति के दायरे को सिकोड़ना ही आरएसएस का मुख्य उद्देश्य था। राज्य में आज भले ही तृणमूल कांग्रेस नहीं है, लेकिन वामपंथी आज भी मैदान में हैं और भविष्य में भी रहेंगे।
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

"जब आग लगती है, तो वह धर्म नहीं देखती, हिंदू-मुस्लिम का भेद किए बिना सभी के घरों को जलाकर खाक कर देती है। बीजेपी की बुलडोजर राजनीति के खतरे से भी कोई नहीं बचेगा। सभी इसके शिकार होंगे। इसलिए प्रतिरोध की लड़ाई में सभी लोगों को एकजुट होना होगा।"
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

हर उस व्यक्ति तक पहुँचना होगा जो मेहनतकश है, सताया हुआ है या प्रताड़ित है। भाजपा ने एसआईआर (SIR) के नाम पर एक बड़े वर्ग के लोगों से उनका मताधिकार छीन लिया है। इन सभी लोगों को एकजुट करना होगा। उनके मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों को वापस लाना होगा। जनता की रोटी-रोजी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और पीने के पानी जैसी स्थानीय मांगों को पूरा कराने के लिए संघर्ष करना होगा। भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एकता, भाईचारा और रोजगार के लिए लड़ना होगा। बुलडोजर राज के खिलाफ लाल झंडा पहले ही उठ खड़ा हुआ है। उन्होंने डर का माहौल बढ़ाया है, लेकिन हम चाहते हैं कि जनता का यह डर टूटे। अन्याय के खिलाफ खड़े होकर हक के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी।
सीपीआई (एम)पश्चिम बंगाल के सचिव
14 जून 2026

केशव कुमार भट्टड़ • 13 अप्रैल 2026
श्रेया जायसवाल • 22 मई 2026

प्रश्न पूछना ही नागरिक का धर्म है- भारत का लोकतंत्र आज एक संधिकाल से गुजर रहा है। यदि सूचनाओं को छिपाकर जनता के जनादेश को बदलने का प्रयास किया जाता है, तो यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होगा।
श्रेया जायसवाल • 19 अप्रैल 2026
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