जन समाचार मंच


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- तपन सेन
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एक मात्र जन विश्वास अधिनियम, 2023 के जरिए कई ऐसे अपराधों के लिए जेल की सजा खत्म कर दी गई है जिनके लिए पहले सजा होती थी। अब केवल जुर्माना देकर अपराधी बच सकता है। यह मुख्य रूप से इसलिए बनाया गया है ताकि मालिक पक्ष श्रम कानूनों का उल्लंघन करने पर जुर्माना देकर आसानी से बच सके। (संपादक-गणशक्ति)
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प्रकाशित: 03 मई 2026 • 9 मिनट पठन

"गुलाम भारत की मुक्ति और एशियाई जन-एकता को दिशा देने वाला लेनिन का क्रांतिकारी दृष्टिकोण।" - बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा बांग्ला में प्रस्तुत यह मूल-आलेख एक तारीखवार ऐतिहासिक-वैचारिक अध्ययन है, जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं औपनिवेशिक मुक्ति-संग्राम के प्रति लेनिन की गहरी विश्लेषणात्मक दृष्टि को रेखांकित करता है। अध्ययन 1900 से 1923 के मध्य रचित लेनिन के निबंधों, पत्रों, नोट्स और भाषणों के आधार पर यह स्पष्ट करता है कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा भारत के आर्थिक शोषण, दमनकारी नीतियों और बंबई के मजदूर आंदोलन की क्रांतिकारी चेतना का गहन मूल्यांकन किया था। लेनिन ने औपनिवेशिक राष्ट्रवाद के मूल लोकतांत्रिक स्वरूप को पहचानते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक सर्वहारा क्रांति और एशियाई जन-एकता से जोड़ा। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के मंच से मानबेंद्रनाथ रॉय के संकीर्णतावादी सिद्धांतों को संशोधित कर लेनिन ने भारतीय कम्युनिस्टों को व्यापक साम्राज्यवादी-विरोधी मंचों में भागीदारी और किसान-मजदूर आंदोलनों को संगठित करने की रणनीतिक दिशा प्रदान की। अंततः, यह आलेख स्थापित करता है कि लेनिन के अनुसार रूस, भारत, चीन आदि देशों का दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का मालिक होना ही संघर्ष के परिणाम को तय करेगा।
कुछ घंटे पहले

"वोट के अधिकार पर हमला बंद करो, लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता बहाल करो!" मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालों और मतदाता सूचियों से नाम छांटने की मनमानी के बीच देश में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। 'इंडियन एक्सप्रेस' के सनसनीखेज खुलासे के बाद सीपीआई (एम) ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर प्रक्रिया को तुरंत रोकने की मांग को लेकर देशव्यापी जन-आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है।
11 अक्टूबर 2026

10 अक्टूबर की सुबह सड़कों का मंजर लोकतंत्र की नहीं, बल्कि एक सीलबंद सैन्य क्षेत्र की गवाही दे रहा था। जब एक सरकार अपने ही नागरिकों को रोकने और घेरने के लिए इतने व्यापक स्तर पर युद्ध जैसी तैयारियाँ करती है, तो स्वयं से यह सवाल पूछना ही होगा - आखिर सरकार किस चीज को दबाने और रोकने की कोशिश कर रही है?
10 अक्टूबर 2026

केशव कुमार भट्टड़ • 16 अप्रैल 2026

सदा हिन्दू राष्ट्र और अखंड भारत के गीत गानेवाले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 'विविधता में एकता' और बहुलतावाद का गीत गाया , लेकिन यह उनके वैचारिक बदलाव के बजाय अमेरिकी वीजा प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय विरोध से बचने का एक पैंतरा मात्र दिखता है। एक तरफ वे प्रवासियों को अमेरिका के प्रति वफादार रहने और भारत में सभी समुदायों के साथ रहने की सीख दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ देश के भीतर संघ परिवार का आचरण स्पष्ट रूप से बिल्कुल इसके उलट है। अहमदाबाद में ऐनी फ्रैंक और मलाला की किताबें पढ़ने के 'अपराध' में 'बजरंगियों' द्वारा बेरहमी से छात्रों की पिटाई, अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भाजपा नेताओं के घनघोर सांप्रदायिक बयान , आईटी सेल के लगातार जहरीले नफरती अभियान और दलित नेताओं की सभा के बाद स्थल के 'शुद्धिकरण' जैसी घटनाएं इस बात की गवाही देती हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्थापित भारतीय सिद्धांतों की शरण लेना और विरोध प्रदर्शनों के सामने समर्थकों का तीखा आक्रामक रवैया यह साबित करता है कि संघ का यह 'बहुलतावाद' सिर्फ एक मुखौटा है।
केशव कुमार भट्टड़ • 31 अगस्त 2026

फ़िलिस्तीन के हक़ में उठे बोल, मगर आक्रामक इज़राइल पर ब्रिक्स का रुख़ गोल!
ब्रिक्स के 'नई दिल्ली घोषणापत्र 2026' में 1967 की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र फ़िलिस्तीन राष्ट्र की स्थापना और गाजा में तुरंत युद्धविराम का समर्थन किया गया है। घोषणापत्र में मूल निवासियों के जबरन विस्थापन और गाजा के जनसांख्यिकीय स्वरूप को बदलने की कड़ी निंदा की गई है। हालांकि, गाजा में जारी हिंसा, वेस्ट बैंक पर अवैध कब्जे और मानवीय संकट के लिए जिम्मेदार इज़राइल का नाम लेने से सीधे तौर पर परहेज किया गया है। इस कारण फ़िलिस्तीन के अधिकारों की पैरोकारी के बावजूद, आक्रमणकारी की सीधी जवाबदेही तय करने के मामले में ब्रिक्स की सीमाएं उजागर होती हैं।
केशव कुमार भट्टड़ • 14 सितंबर 2026
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