जन समाचार मंच


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- तपन सेन
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एक मात्र जन विश्वास अधिनियम, 2023 के जरिए कई ऐसे अपराधों के लिए जेल की सजा खत्म कर दी गई है जिनके लिए पहले सजा होती थी। अब केवल जुर्माना देकर अपराधी बच सकता है। यह मुख्य रूप से इसलिए बनाया गया है ताकि मालिक पक्ष श्रम कानूनों का उल्लंघन करने पर जुर्माना देकर आसानी से बच सके। (संपादक-गणशक्ति)
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अपलोडर: VKA-FD9RRG • प्रकाशित: 03 मई 2026 • 9 मिनट पठन

पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का साहित्य और सिनेमा के प्रति गहरा और ऐतिहासिक योगदान रहा है। उन्होंने ऋत्विक घटक के दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेज को सहेजकर प्रकाशित करवाया तथा 'रूपकला केंद्र' जैसी संस्था के माध्यम से युवाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण दिलाया। जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों का उत्साहवर्धन करने से लेकर कोलकाता फिल्म फेस्टिवल में विश्वस्तरीय सिनेमा को बढ़ावा देने तक, वे सदैव तत्पर रहे। राजनीति की व्यस्तताओं के बीच भी कला, विचारों और आम जनता की रुचि को बेहतर बनाने के प्रति उनका यह समर्पण अतुलनीय था। सौम्य राजनीतिक व्यक्तित्व के धनी बुद्धदेव भट्टाचार्य के आम जनता की रुचियों को समृद्ध करने के लिए सदैव तत्पर रहने वाले एक सचेतन पहलू को याद कर रहें हैं प्रो. संजय मुखोपाध्याय। पढ़ें मूल बांग्ला देशहितैषी (06.09.2024) में छपे आलेख ''आम जनता की पसंद और सोच को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था' का हिन्दी अनुवाद।
28 अगस्त 2026

फिल्म 'चिटगाँव’ चमत्कृत करती है| मास्टर दा सूर्य सेन की भूमिका में एकमात्र मनोज वाजपई को छोड़कर कोई भी ‘स्टार’ अभिनेता या अभिनेत्री इस फिल्म में नहीं है| फिल्म में ‘झुंकु ’, सुबोध रॉय के बचपन का नाम, की भूमिका में दिलजाद हवाले ने सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया है| एक बुझी-बुझी-सी आँखों वाला किशोर जिसकी दोनों आँखों में दुनिया भर का अबोध-आश्चर्य भरा है – उन्ही आँखों से वह समाज को बदलने का सपना देखता है| किशोरी क्रांतिकारी प्रीतिलता की भूमिका में वेगा तमोटिया ने प्रभावित किया| कोई व्यावसायिक मसाला, लटके झटके भी नहीं है| फिल्म में कैमरे का काम और संगीत का व्यवहार खूब ही जोरदार तरीके से लिया गया है| दर्शक के हिसाब से यह फिल्म हिंदी फिल्म जगत में मील का पत्थर है| इस तरह की शुद्ध देश-प्रेम से भरपूर संपूर्ण अंतिम फिल्म कौन सी थी, कब देखी, याद नहीं| सामाजिक दायित्व-बोध न होने पर ऐसी फ़िल्में बनाना असंभव है|
27 अगस्त 2026

सुबोध राय (झुंकु राय) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे युवा क्रांतिकारियों में से एक थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्होंने मास्टरदा सूर्यसेन के नेतृत्व में 1930 के चटगांव शस्त्रागार छापे और जलालाबाद युद्ध में वीरतापूर्वक भाग लिया। कम उम्र में सेलुलर जेल (काला पानी) की कठिन सजा काटने के बाद भी उनका राष्ट्रप्रेम डिगा नहीं। आजादी के बाद उन्होंने पेंशन या अन्य सरकारी सुविधाएं लेने से इनकार कर सादगीपूर्ण जीवन बिताया। उनका निष्कलंक और त्यागमय जीवन भावी पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा। चटगांव आंदोलन पर बनी बॉलीवुड फिल्म 'Chittagong' (2012) की कहानी मुख्य रूप से युवा झुंकु राय (सुबोध राय) के जीवन और उनके दृष्टिकोण पर ही आधारित है।
26 अगस्त 2026

केशव कुमार भट्टड़ • 16 अप्रैल 2026

यह आलेख वियतनाम के गौरवशाली मुक्ति संघर्ष, वहाँ समाजवाद की स्थापना और इस क्रांति में हो ची मिन्ह के अप्रतिम योगदान की एक ऐतिहासिक समीक्षा है, जिसे बुद्धदेव भट्टाचार्य (6 नवंबर 2000 से 13 मई 2011 तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे ) ने लिखा था। कल 19 मई को हो ची मिन्ह के जन्मदिन के अवसर पर उन्हें याद करते हुए इसे पुनः प्रकाशित किया जा रहा है। वियतनाम एक छोटा और कृषि-प्रधान देश होने के बावजूद सदियों तक फ्रांसीसी, जापानी और अमेरिकी साम्राज्यवाद के क्रूर शोषण और हमलों का शिकार रहा, लेकिन वहाँ की स्वतंत्रता प्रेमी जनता ने अपनी विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी। कॉमरेड हो ची मिन्ह और वियतनाम वर्कर्स पार्टी के कुशल नेतृत्व में, क्रांतिकारियों ने बिना किसी अंधानुकरण के अपने देश की वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार मार्क्सवाद-लेनिनवाद के सिद्धांतों को लागू किया। इस क्रांति की अभूतपूर्व सफलता का मुख्य स्रोत समाज के सभी वर्गों (मजदूरों, किसानों, बुद्धिजीवियों और अल्पसंख्यकों) की फौलादी एकजुटता, 'जनयुद्ध' (पीपल्स वॉर) की गुरिल्ला रणनीति और वैश्विक स्तर पर मिला भारी जनसमर्थन था। आलेख यह महत्वपूर्ण सीख भी देता है कि क्रांति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए कट्टरपंथ और विशेष रूप से संशोधनवाद के खतरों से मुक्त रहना अनिवार्य है। अंततः 30 अप्रैल 1975 को पूर्ण स्वतंत्रता हासिल कर वियतनाम ने दुनिया के सामने साबित कर दिया कि अदम्य इच्छाशक्ति और सही वैचारिक दिशा के बल पर दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी ताकत को भी झुकाया जा सकता है, और यही कारण है कि वियतनाम का यह संघर्ष आज भी दुनिया भर के मुक्ति आंदोलनों के लिए प्रेरणापुँज है।
केशव कुमार भट्टड़ • 20 मई 2026

" सोमेन का परिचय उन मार्क्सवादी क्रांतिकारियों से हुआ जो अन्दमान में जेल की अवधि पूरी कर घर आये थे, जैसे सतीश पकड़ाशी एवं अन्य। उनका गहरा असर सोमेन के जीवन पर पड़ा। इस असर के कारण सोमेन के नजरिए एवं सोच के तरीके में बदलाव आया। स्पेन के गृहयुद्ध में कलाकारों एवं लेखकों ने जो महान त्याग स्वीकारे, उसके बारे में सुनने के बाद सोमेन, निराश व उद्यमशून्य असहाय गरीब जनता के जीवन की कहानियों पर आधारित, आम आदमी का साहित्य रचने को प्रेरित हुए। "
श्रेया जायसवाल • 24 मई 2026
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