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'शिकागो' के 26 साल पहले हावड़ा स्टेशन के 1260 मुटिया-मजदूरों ने 8 घंटे काम (कार्य-दिवस) की मांग पर की थी हड़ताल। - तपन सेन

केशव कुमार भट्टड़•03 मई 20269 मिनट पठन146 बार पढ़ा गया
मई 1860 में हावड़ा स्टेशन के 1260 'मुटिया' मजदूरों (बोझ ढोने वाले) ने 8 घंटे काम (कार्य-दिवस) की मांग को लेकर एक दिन की हड़ताल की थी। इसी हड़ताल के जरिए भारत में मजदूर जागरण की शुरुआत हुई। इस हड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 1886 में अमेरिका के हे-मार्केट (Haymarket) में 8 घंटे काम की मांग पर हुए ऐतिहासिक मई दिवस की घटनाओं से 26 साल पहले ही भारतीय मजदूरों ने 8 घंटे काम की मांग पर हड़ताल कर दी थी।अमेरिका के मजदूरों ने 8 घंटे काम की मांग 1866 में उठाई थी। 1866 से 1886 तक लंबा आंदोलन चला।
'शिकागो' के 26 साल पहले हावड़ा स्टेशन के 1260 मुटिया-मजदूरों ने 8 घंटे काम (कार्य-दिवस) की मांग पर की थी हड़ताल। - तपन सेन

मई 1860 में हावड़ा स्टेशन के 1260 'मुटिया' मजदूरों (बोझ ढोने वाले) ने 

8 घंटे के काम (कार्य-दिवस) की मांग को लेकर एक दिन की हड़ताल की थी। इसी हड़ताल के जरिए भारत में मजदूर जागरण की शुरुआत हुई। इस हड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 1886 में अमेरिका के हे-मार्केट (Haymarket) में 8 घंटे काम की मांग पर हुए ऐतिहासिक मई दिवस की घटनाओं से 26 साल पहले ही भारतीय मजदूरों ने 8 घंटे काम की मांग पर हड़ताल कर दी थी। 

【यह 2025 का लिखा हुआ आलेख आज भी 

प्रासंगिक है। इसलिए इसे बार बार दोहराया जाना जरूरी है। 20 मई 2025 की सफलतम हड़ताल के बावजूद 4 श्रम संहिताएं लागू हो चुकी हैं। मजदूरों के सर पर मंडराता खतरा आज भयावह हो चुका है। नोएडा की घटना ने सारी स्थिति दिन के उजाले की तरह स्पष्ट कर दी है। श्रम शोषण की शक्तियां ज्यादा बलशाली हुई हैं।लगातार बड़े आंदोलन और जन दबाव ही बचाव का उपाय है। • वाम की आवाज़ 】

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'शिकागो के 26 साल पहले 

हावड़ा स्टेशन के 1260 मुटिया-मजदूरों ने 8 घंटे के  कार्य-दिवस की मांग पर की थी हड़ताल।'

- तपन सेन

भारत में कारखाने उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध (आखिरी हिस्से) से ही बनने लगे थे। उद्योगों के विकास के साथ-साथ मजदूर वर्ग का जन्म हुआ। इस वर्ष मई दिवस की पूर्व संध्या पर हमें यह याद रखना चाहिए कि अपने जन्मकाल से ही भारत का मजदूर वर्ग लड़ाई और आंदोलन के रास्ते पर ही आगे बढ़ा है। हालाँकि, शुरुआत में ये सभी संघर्ष बिखरे हुए और असंगठित थे।

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हमें यह सोचकर गर्व होता है कि मई 1860 में हावड़ा स्टेशन के 1260 'मुटिया' मजदूरों (बोझ ढोने वाले) ने 8 घंटे काम (कार्य-दिवस) की मांग को लेकर एक दिन की हड़ताल की थी। इसी हड़ताल के जरिए भारत में मजदूर जागरण की शुरुआत हुई। इस हड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 1886 में अमेरिका के हे-मार्केट (Haymarket) में 8 घंटे काम की मांग पर हुए ऐतिहासिक मई दिवस की घटनाओं से 26 साल पहले ही भारतीय मजदूरों ने 8 घंटे काम की मांग पर हड़ताल कर दी थी।

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मई दिवस की पृष्ठभूमि के बारे में हम सभी को थोड़ी-बहुत जानकारी है। बढ़ते आंदोलनों के दबाव में फ्रांस में 1848 में पेरिस शहर के लिए दैनिक 10 घंटे और अन्य जगहों के लिए 11 घंटे काम का समय निर्धारित किया गया था। जर्मनी में 1834 में 10 घंटे काम का कानून लागू हुआ। अमेरिका में 1840 में केवल सरकारी कर्मचारियों के लिए 10 घंटे काम का समय तय किया गया था। बाद में न्यूयॉर्क और अन्य शहरों के मजदूरों ने भी अधिकारियों को 10 घंटे काम का नियम मानने पर मजबूर किया। अमेरिका के मजदूरों ने 8 घंटे काम की मांग 1866 में उठाई थी। 1866 से 1886 तक लंबा आंदोलन चला।

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1 मई 1886 को पूरे देश (अमेरिका) में हड़ताल बुलाई गई थी। शिकागो शहर में मजदूरों के जुलूस पर पुलिस की गोलीबारी में कई मजदूर हताहत हुए। 1889 में 'द्वितीय इंटरनेशनल' में घोषणा की गई थी कि दुनिया भर में 1 मई को 'मई दिवस' मनाया जाएगा और 1890 से आधिकारिक तौर पर मजदूरों के अधिकारों की स्थापना के लिए 'अंतर्राष्ट्रीय मई दिवस' मनाया जाने लगा। याद रखना चाहिए कि 1848 में 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र' प्रकाशित हुआ था। इस पुस्तक में मार्क्स-एंगेल्स ने पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ मजदूर वर्ग की अंतरराष्ट्रीय एकता की आवश्यकता का उल्लेख करते हुए आह्वान किया था - "दुनिया के मजदूरों, एक हो!"

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आज इतने वर्षों के बाद, शासक वर्ग ऐतिहासिक रूप से स्थापित 8 घंटे काम की व्यवस्था को ही खत्म करना चाहता है। दुनिया भर में इसके खिलाफ कई प्रतिरोध आंदोलन चल रहे हैं। हमारे देश में भी ट्रेड यूनियन आंदोलन चुप नहीं बैठा है। समकालीन पूँजीवाद के बढ़ते संकट के कारण भारतीय मजदूर वर्ग के आंदोलन को एक अभूतपूर्व कठिन स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। शासक वर्ग की प्रतिक्रिया लगातार आक्रामक और क्रूर तानाशाही वाली होती जा रही है; लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर मजदूरों के सामूहिक संघर्ष का अधिकार छीना जा रहा है। कार्यस्थलों और राष्ट्रीय स्तर पर मजदूर वर्ग को निहत्था करना भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की एक मुख्य विशेषता बन गई है, जो स्पष्ट रूप से नए फासीवादी चरित्र का प्रतिबिंब है।

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इसी प्रक्रिया के हिस्से के रूप में, सरकार ने 29 श्रम कानूनों को रद्द कर चार 'श्रम कोड' (Labour Codes) बनाए हैं, जिसके जरिए मजदूरों को लगभग गुलामी की जंजीरों में जकड़ने की कोशिश की जा रही है। ये श्रम कानून मजदूरों को गुलाम बनाने के साथ-साथ कॉर्पोरेट-सांप्रदायिक शासन की नींव तैयार कर रहे हैं, जो अर्थव्यवस्था और समाज पर एकाधिकार स्थापित करेगा।

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ये चार श्रम संहिताएं केवल श्रम कानून नहीं हैं, बल्कि ये पूरे प्रशासनिक शासन को तानाशाही रूप देने की एक सोची-समझी योजना का हिस्सा हैं। हालाँकि ये श्रम संहिताएं 2019 और 2020 में ही पारित हो गई थीं, लेकिन मजदूर वर्ग के निरंतर विरोध के कारण 2025 तक इनके लागू होने को रोकना संभव हो पाया है।

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लेकिन भाजपा सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में (भले ही बहुमत पहले से कम हो) इन श्रम संहिताओं को लागू करने के लिए बेताब है और अप्रैल 2025 तक इन्हें प्रभावी बनाने की योजना बना रही है।

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इस संदर्भ में, केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच और स्वतंत्र महासंघों ने जनता पर गुलामी की शर्तें थोपने की इस साजिश के खिलाफ आंदोलन को और तेज करने का फैसला किया है। इसी लक्ष्य के साथ, 18 मार्च 2025 को नई दिल्ली में आयोजित मजदूरों के राष्ट्रीय सम्मेलन से 20 मई 2025 को देशव्यापी आम हड़ताल का आह्वान किया गया है। हमें इस चुनौती को स्वीकार करना चाहिए और देशव्यापी हड़ताल को व्यापक रूप से सफल बनाना चाहिए, जो एक बार फिर गुलामी थोपने की शासक वर्ग की साजिश के खिलाफ मजदूरों के दृढ़ संकल्प को साबित करेगी।

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श्रम संहिताओं को लागू करने का उद्देश्य कॉर्पोरेट-सांप्रदायिक शासन की निरंकुश पकड़ सुनिश्चित करना, जनता के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों को कम करना और मजदूर वर्ग के शोषण को और तेज करना है। इसके जरिए देश के प्राकृतिक और सरकारी संसाधनों को कॉर्पोरेट हितों के लिए लूटने का रास्ता साफ किया जा रहा है।

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उदाहरण के लिए, हाल के वर्षों में मोदी सरकार ने तथाकथित 'जन विश्वास अधिनियम' के प्रावधानों के अनुसार, बॉयलर कानून, वन कानून, चाय कानून, रबर कानून और दवा क्षेत्र से संबंधित कई कानूनों सहित 41 कानूनों के तहत कॉर्पोरेट्स के 180 अपराधों को 'डिक्रिमिनलाइज' (अपराध की श्रेणी से बाहर) कर दिया है। इन अपराधों के लिए जेल की सजा का प्रावधान हटा दिया गया है और केवल जुर्माने की व्यवस्था रखी गई है, जिससे उन्हें श्रम कानूनों के उल्लंघन का खुला लाइसेंस मिल गया है। हाल के बजट में 100 और अपराधों को इसी तरह अपराध की श्रेणी से बाहर करने का वादा किया गया है। यह सब कानून के उल्लंघन का लाइसेंस देने के अलावा और कुछ नहीं है।

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दूसरी ओर, मजदूरों द्वारा अपने अधिकारों के लिए की जाने वाली सामूहिक कार्रवाई को अपराध माना जा रहा है। यह इतना भयानक है कि मजदूरों और उनकी यूनियनों द्वारा सामूहिक शिकायत दर्ज कराने को 'भारतीय न्याय संहिता' (BNS) की धारा 111 के तहत 'संगठित अपराध' के रूप में व्याख्यायित करने की कोशिश की जा रही है, जिसके तहत गैर-जमानती जेल और पुलिस कार्रवाई हो सकती है। कई राज्यों में ट्रेड यूनियन नेताओं के खिलाफ पहले ही मामले दर्ज किए जा रहे हैं। श्रम कानूनों के पूरी तरह लागू होने से पहले ही गेट मीटिंग, पर्चा वितरण और ज्ञापन सौंपने जैसी नियमित गतिविधियों पर व्यावहारिक रूप से प्रतिबंध लगाया जा रहा है। यह सब मजदूरों के बीच डर का माहौल बनाने के लिए किया जा रहा है।

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संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में, काम के संबंधों को बदलकर अस्थायी और असुरक्षित रोजगार (जैसे आउटसोर्सिंग, इंटर्न, ट्रेनी) की व्यवस्था की जा रही है। यह न केवल लागत कम करने के लिए, बल्कि ट्रेड यूनियनों को कमजोर करने और खत्म करने के लिए भी किया जा रहा है। इस स्थिति में यह स्पष्ट है कि शासक वर्ग इन श्रम संहिताओं के माध्यम से मजदूरों की प्रतिरोध करने की शक्ति को पूरी तरह नष्ट करना चाहता है, ताकि कॉर्पोरेट हितों के लिए शासन चलाया जा सके और समाज में सांप्रदायिक विभाजन पैदा किया जा सके।

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मोदी सरकार ने आम जनता पर करों का बोझ लादकर सरकारी खजाने को अपने मुट्ठी भर दोस्तों की लूट के लिए खोल दिया है। पीएलआई (PLI) जैसी योजनाएं असल में बड़े कॉर्पोरेट्स के खर्चों को जनता के पैसे से भरने का जरिया हैं। ये कंपनियां न तो सरकार को कुछ वापस दे रही हैं और न ही रोजगार पैदा कर रही हैं। दूसरी ओर, सरकार ने मनरेगा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं के बजट में कटौती कर दी है। कुल मिलाकर, यह सरकार नव-उदारवादी नीतियों का चरम तानाशाही और नव-फासीवादी रूप स्थापित करना चाहती है। UAPA, PMLA और BNS जैसे कानूनों के जरिए वे अपनी तानाशाही को और मजबूत कर रहे हैं। यह संदेश मजदूरों तक पहुँचाना होगा। उन्हें जागरूक करना होगा कि यह आम हड़ताल केवल अधिकारों की लड़ाई नहीं, बल्कि हमारे राष्ट्र को बचाने के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आने वाली देशव्यापी हड़ताल को केवल एक नियमित हड़ताल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे श्रम संहिताओं और शासक वर्ग की तानाशाही योजनाओं के खिलाफ संघर्ष के एक ऊँचे स्तर की शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए। यह मजदूरों को उनकी ऐतिहासिक भूमिका के प्रति और अधिक सचेत करेगी।

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यह हड़ताल भारत के मजदूर वर्ग का अब तक का सबसे बड़ा कार्यक्रम होने जा रहा है। CITU (सीटू) इस आम हड़ताल को मजदूर वर्ग के नेतृत्व में एक नए जवाबी हमले की शुरुआत की ऐतिहासिक जिम्मेदारी के रूप में ले रहा है। आज का संघर्ष राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की लूट के खिलाफ है; यह लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों पर हमले के खिलाफ है। इस हड़ताल को सफल बनाना ही इस मई दिवस का ऐतिहासिक आह्वान है। आइए, देश के सभी कामकाजी लोगों के साथ इस संघर्ष में जीत हासिल करने का प्रयास करें।

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मई दिवस अमर रहे! मजदूर-किसान एकता जिंदाबाद!

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एक मात्र जन विश्वास अधिनियम, 2023 के जरिए कई ऐसे अपराधों के लिए जेल की सजा खत्म कर दी गई है जिनके लिए पहले सजा होती थी। अब केवल जुर्माना देकर अपराधी बच सकता है। यह मुख्य रूप से इसलिए बनाया गया है ताकि मालिक पक्ष श्रम कानूनों का उल्लंघन करने पर जुर्माना देकर आसानी से बच सके। (संपादक-गणशक्ति)

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(लेखक 'सीटू' के भूतपूर्व महासचिव हैं।)
साभार: गणशक्ति आर्काइव ,1 मई 2025

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'शिकागो' के 26 साल पहले हावड़ा स्टेशन के 1260 मुटिया-मजदूरों ने 8 घंटे काम (कार्य-दिवस) की मांग पर की थी हड़ताल। - तपन सेन

प्रकाशित: 03 मई 2026 • 9 मिनट पठन

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"गुलाम भारत की मुक्ति और एशियाई जन-एकता को दिशा देने वाला लेनिन का क्रांतिकारी दृष्टिकोण।" - बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा बांग्ला में प्रस्तुत यह मूल-आलेख एक तारीखवार ऐतिहासिक-वैचारिक अध्ययन है, जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं औपनिवेशिक मुक्ति-संग्राम के प्रति लेनिन की गहरी विश्लेषणात्मक दृष्टि को रेखांकित करता है। अध्ययन 1900 से 1923 के मध्य रचित लेनिन के निबंधों, पत्रों, नोट्स और भाषणों के आधार पर यह स्पष्ट करता है कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा भारत के आर्थिक शोषण, दमनकारी नीतियों और बंबई के मजदूर आंदोलन की क्रांतिकारी चेतना का गहन मूल्यांकन किया था। लेनिन ने औपनिवेशिक राष्ट्रवाद के मूल लोकतांत्रिक स्वरूप को पहचानते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक सर्वहारा क्रांति और एशियाई जन-एकता से जोड़ा। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के मंच से मानबेंद्रनाथ रॉय के संकीर्णतावादी सिद्धांतों को संशोधित कर लेनिन ने भारतीय कम्युनिस्टों को व्यापक साम्राज्यवादी-विरोधी मंचों में भागीदारी और किसान-मजदूर आंदोलनों को संगठित करने की रणनीतिक दिशा प्रदान की। अंततः, यह आलेख स्थापित करता है कि लेनिन के अनुसार रूस, भारत, चीन आदि देशों का दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का मालिक होना ही संघर्ष के परिणाम को तय करेगा।

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“सिनेमा का सबसे बड़ा जीनियस” चार्ली चैप्लिन को याद करते हुए - केशव भट्टड़

चार्ली चैप्लिन ((16 अप्रैल 1889 – 25 दिसंबर 1977) सिनेमा के इतिहास में एक महान हस्ती थे। वे ब्रिटेन में जन्मे एक कॉमेडियन, अभिनेता, निर्देशक, लेखक और संगीतकार थे। उन्होंने "द ट्रैम्प" (The Tramp) नामक प्रसिद्ध चरित्र के माध्यम से दुनिया भर में हंसी और भावुकता का अनोखा मिश्रण प्रस्तुत किया। चैप्लिन ने सन् 1914 से शुरू करके कुल 80 से अधिक छोटी फिल्में (शॉर्ट्स) और 11 प्रमुख फीचर फिल्में बनाईं। उनकी फिल्में मुख्य रूप से मूक सिनेमा (साइलेंट फिल्म) युग की हैं, जिनमें शारीरिक हास्य, भावनात्मक गहराई और सामाजिक संदेश प्रमुख थे।जब चार्ली चैप्लिन और अल्बर्ट आइंस्टीन 1931 में मिले थे, तब आइंस्टीन ने चैप्लिन से कहा था:- “आपकी कला में मुझे सबसे अधिक जो चीज प्रभावित करती है, वह है उसकी सार्वभौमिकता। आप एक भी शब्द नहीं बोलते, फिर भी पूरी दुनिया आपको समझ लेती है।” यह बात चैप्लिन की मूक फिल्मों की शक्ति को बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त करती है। चैप्लिन की शारीरिक हास्य, भावनाओं और मानवीय संदेश ने भाषा की सीमाओं को पार कर पूरी दुनिया को छू लिया था। चार्ली चैप्लिन आज भी सिनेमा प्रेमियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उनकी फिल्में हंसी के साथ जीवन की सच्चाई सिखाती हैं।

केशव कुमार भट्टड़ • 16 अप्रैल 2026

अंतर्राष्ट्रीय

अमेरिका में भागवत के 'बहुलतावादी' सुर: यह बदलाव है या दबाव का असर?

"विदेश में बहुलतावाद की दुहाई और देश में नफरत की वही पुरानी सच्चाई!"

सदा हिन्दू राष्ट्र और अखंड भारत के गीत गानेवाले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 'विविधता में एकता' और बहुलतावाद का गीत गाया , लेकिन यह उनके वैचारिक बदलाव के बजाय अमेरिकी वीजा प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय विरोध से बचने का एक पैंतरा मात्र दिखता है। एक तरफ वे प्रवासियों को अमेरिका के प्रति वफादार रहने और भारत में सभी समुदायों के साथ रहने की सीख दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ देश के भीतर संघ परिवार का आचरण स्पष्ट रूप से बिल्कुल इसके उलट है। अहमदाबाद में ऐनी फ्रैंक और मलाला की किताबें पढ़ने के 'अपराध' में 'बजरंगियों' द्वारा बेरहमी से छात्रों की पिटाई, अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भाजपा नेताओं के घनघोर सांप्रदायिक बयान , आईटी सेल के लगातार जहरीले नफरती अभियान और दलित नेताओं की सभा के बाद स्थल के 'शुद्धिकरण' जैसी घटनाएं इस बात की गवाही देती हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्थापित भारतीय सिद्धांतों की शरण लेना और विरोध प्रदर्शनों के सामने समर्थकों का तीखा आक्रामक रवैया यह साबित करता है कि संघ का यह 'बहुलतावाद' सिर्फ एक मुखौटा है।

केशव कुमार भट्टड़ • 31 अगस्त 2026

अंतर्राष्ट्रीय

'ब्रिक्स' की सीमा ~ स्वतंत्र फ़िलिस्तीन को समर्थन ~ इज़राइल पर चुप्पी

फ़िलिस्तीन के हक़ में उठे बोल, मगर आक्रामक इज़राइल पर ब्रिक्स का रुख़ गोल!
ब्रिक्स के 'नई दिल्ली घोषणापत्र 2026' में 1967 की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र फ़िलिस्तीन राष्ट्र की स्थापना और गाजा में तुरंत युद्धविराम का समर्थन किया गया है। घोषणापत्र में मूल निवासियों के जबरन विस्थापन और गाजा के जनसांख्यिकीय स्वरूप को बदलने की कड़ी निंदा की गई है। हालांकि, गाजा में जारी हिंसा, वेस्ट बैंक पर अवैध कब्जे और मानवीय संकट के लिए जिम्मेदार इज़राइल का नाम लेने से सीधे तौर पर परहेज किया गया है। इस कारण फ़िलिस्तीन के अधिकारों की पैरोकारी के बावजूद, आक्रमणकारी की सीधी जवाबदेही तय करने के मामले में ब्रिक्स की सीमाएं उजागर होती हैं।

केशव कुमार भट्टड़ • 14 सितंबर 2026

वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़

अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ, न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !

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