वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 | Tuesday, 13 October 2026
|
संपर्क: vaamkiaawaz@gmail.comसदस्यता में
वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
लाइव कवरेज
होमताज़ा खबरेंअंतर्राष्ट्रीय

वाम की आवाज़

जन समाचार मंच

अंतर्राष्ट्रीय

" सोमेन चन्द-फासीवादविरोधी संघर्ष में शहादत देने वाले प्रथम साहित्यकार "- विद्युत पाल

श्रेया जायसवाल•24 मई 202610 मिनट पठन106 बार पढ़ा गया

" सोमेन का परिचय उन मार्क्सवादी क्रांतिकारियों से हुआ जो अन्दमान में जेल की अवधि पूरी कर घर आये थे, जैसे सतीश पकड़ाशी एवं अन्य। उनका गहरा असर सोमेन के जीवन पर पड़ा। इस असर के कारण सोमेन के नजरिए एवं सोच के तरीके में बदलाव आया। स्पेन के गृहयुद्ध में कलाकारों एवं लेखकों ने जो महान त्याग स्वीकारे, उसके बारे में सुनने के बाद सोमेन, निराश व उद्यमशून्य असहाय गरीब जनता के जीवन की कहानियों पर आधारित, आम आदमी का साहित्य रचने को प्रेरित हुए। "

" सोमेन चन्द-फासीवादविरोधी संघर्ष में शहादत देने वाले प्रथम साहित्यकार "- विद्युत पाल

सोमेन चन्द-फासीवादविरोधी संघर्ष में शहादत देने वाले प्रथम साहित्यकार

  • विद्युत पाल

बांग्ला लेखक सोमेन चन्द भारतीय उपमहाद्वीप में, फासीवाद-विरोधी संघर्ष में शहादत देने वाले प्रथम साहित्यकार हैं। मात्र 22 वर्ष की उम्र में फासीवादी ताकतों ने उनकी हत्या कर दी।

सोमेन चन्द का जन्म 24 मई 1920 को, वर्तमान बांग्लादेश की राजधानी ढाका शहर के आसपास हुआ था। उनके जन्म के गाँव के नाम को लेकर थोड़ा मतभेद है – किन्हीं का कहना है नरसिंग्दी जिले का आशुलिया, किन्हीं का कहना है तेघरिया एवं किन्हीं का कहना है बलिया। पश्चिम बंगाल में उनकी रचनाओं के संकलन के सम्पादक दिलीप मजुमदार एक और अतिरिक्त तथ्य देते हैं कि 17 वर्ष की उम्र के होते -होते सोमेन अपने परिवार के साथ ढाका शहर के मोइशुन्दी इलाके में रहने लगे थे।

8 मार्च 2016 को एनटीवी ऑनलाइन में प्रकाशित अंजन आचार्य लिखित एक प्रतिवेदन के अनुसार, सोमेन चन्द के पिता का नाम था नरेन्द्र कुमार चन्द एवं माता का नाम था हिरणबाला। सोमेन के पिता ढाका स्थित मिटफोर्ड अस्पताल के स्टोर्स डिपार्टमेन्ट में काम करते थे। सोमेन ने अपनी माँ को चार वर्ष की उम्र में खो दिया था। पिता नरेन्द्र कुमार की दूसरी शादी धोउर गाँव के डा॰ शरतचन्द्र बसु की बेटी सरयू देवी से हुई थी। इन्ही को, यानि सौतेली माँ को ही सोमेन अपनी माँ के रूप में जानते थे।

सन 1936 में ढाका स्थित पोगोज स्कूल से सोमेन ने एन्ट्रैंस पास किया। वह चिकित्सक बनना चाहते थे इसलिये मिटफोर्ड मेडिकल कॉलेज में उन्होंने दाखिला लिया। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, फिर भी सोमेन के डाक्टर बनने की ईच्छा को पूरी करने की उन्होंने भरसक कोशिश की। लेकिन खुद सोमेन कठिन बीमारी से ग्रस्त हो गये। सन 1939 में उन्हे तीव्र ब्रॉन्काइटिस एवं प्लुरिसी से गुजरना पड़ा। परिवार के लिये शिक्षा और इलाज, दोनों खर्च को उठाना सम्भव नहीं था। मेडिकल की पढ़ाई अन्तत: छूट गई।

किशोरावस्था से ही सोमेन उत्सुक पाठक थे और स्थानीय पुस्तकालयों में जाया करते थे। आगे हम उनके रचनासंकलन के सम्पादक दिलीप मजुमदार के शब्दों का ही यथासंभव अनुवाद प्रस्तुत करते हैं:

“इस बीच सोमेन का परिचय उन मार्क्सवादी क्रांतिकारियों से हुआ जो अन्दमान में जेल की अवधि पूरी कर घर आये थे, जैसे सतीश पकड़ाशी एवं अन्य। उनका गहरा असर सोमेन के जीवन पर पड़ा। इस असर के कारण सोमेन के नजरिए एवं सोच के तरीके में बदलाव आया। स्पेन के गृहयुद्ध में कलाकारों एवं लेखकों ने जो महान त्याग स्वीकारे, उसके बारे में सुनने के बाद सोमेन, निराश व उद्यमशून्य असहाय गरीब जनता के जीवन की कहानियों पर आधारित, आम आदमी का साहित्य रचने को प्रेरित हुए।

“सन 1938 के अन्त में, दक्षिण मोइशुन्दी की जोड़पुल गली में मार्क्सवादियों का एक दफ्तर था। हर दिन मजदूर वहाँ मिलते थे और आपस में विचारविमर्श करते थे। छोटे कद का, गोल चेहरा वाला, शर्मीला एवं सरल स्वभाव के एक किशोर को अक्सर वहाँ पूरी तन्मयता के साथ उनके विचारविमर्श को सुनते देखा जाता था। कहने की जरूरत नहीं कि इस किशोर का ही नाम था सोमेन चन्दा। अपने आग्रह एवं निष्ठा के कारण थोड़े ही दिनों के अन्दर वह मार्क्सवादी नेताओं एवं कार्यकर्ताओं के बीच परिचित हो उठे। फलस्वरूप, साहित्यसृजन के साथ -साथ इस किशोर ने मानवमुक्ति के लिए सामाजिक क्रांति के एक कार्यकर्ता की भूमिका को भी स्वीकार किया। सन 1939 के मध्य में सोमेन ने दक्षिण मोइशुन्दी प्रगति पाठागार के क्रियाकलापों में सक्रिय रूप से अपना योगदान देना शुरू किया। निरहंकार इस किशोर के उत्साह एवं कार्यकुशलता को देखते हुए तत्कालीन कम्युनिस्ट नेताओं ने इसे उक्त ‘पाठागार’ [पुस्तकालय] के संचालन का जिम्मा दिया। ‘पाठागार’ के संचालन में सोमेन ने जो दक्षता दिखाई थी उसकी चर्चा उनके तत्कालीन मित्रों ने बारबार की है। ‘प्रगति पाठागार’ को संगठित करने के बाद सोमेन ने खुद को ‘ढाका प्रगति लेखक व शिल्पी संघ’ बनाने के काम में नियोजित किया। साहित्य की दुनिया में उस समय वह नये थे, फिर भी उनके अथक परिश्रम, सांगठनिक कार्यकर्ता के गुण, आदमी को आकर्षित करने की क्षमता, विनम्र आचरण एवं उदार दृष्टि का लाभ संगठन को अपने स्थापनाकाल में मिला। इसी समय सोमेन ने पार्टी के नेताओं को अपनी इच्छा बताई कि वह ढाकेश्वरी मिल में या नारायणगंज के जूटमिल में जाकर सांगठनिक गतिविधियों के माध्यम से श्रमिकों के जीवन के साथ परिचित होना चाहते हैं। लेकिन नेताओं ने सही फैसला लिया और सोमेन को लेखक संघ में ही रखना आवश्यक समझा। वैसे, पार्टी के नेताओं के समक्ष सोमेन द्वारा किए गए इस आवेदन से पता चलता है कि वह एक लेखक के तौर पर एकान्तवासी बन कर रहना नहीं चाहते थे। और यही यथार्थ भी था। ढाका शहर के आसपास गाँवों में जाकर, दुख और गरीबी से भरा हुआ किसानों का एकरस जीवन वह खुद अपनी आँखों से देख आते थे। मज़दूरों और किसानों के लांछित निरादरपूर्ण जीवन से ही उन्हें जनसाहित्य के रचना की प्रेरणा मिली थी। अपने हृदय से उन्होंने अनुभव किया था कि साहित्य को सर्वहारा क्रांति का सहायक होना पड़ेगा।

“सन 1940-41 में अंग्रेज सरकार ने जबर्दस्त हमले चलाये कम्युनिस्ट पार्टी पर। कई कम्युनिस्ट जेल गये, कई, गोपनीय तरीके से काम करने के लिए घर छोड़ दिए। सोमेन तब क्रांतिकारी गतिविधियों में और ज्यादा शामिल होने लगे। साहित्य के काम का अवसर कम होता गया। उस समय, रेल कम्पनी में कार्यरत मजबूत रेलवे श्रमिक यूनियन में काम करने वाले आदमी का अभाव हुआ। रेलवे यूनियन का कामकाज भी फैला हुआ था – नारायणगंज से बहादुरघाट, जगन्नाथघाट से भैरव स्टेशन तक। दिनरात सोमेन पड़े रहते थे श्रमिकों के बीच, उनकी समस्याओं को समझने की कोशिश करते थे, पूरी उर्जा के साथ समझ रहे थे यूनियन के कार्य करने की पद्धति। दो महीनों तक काम करने के उपरांत वह भाँति -भाँति के असंख्य श्रमिकों के अपने हो उठे। सन 1941 में वह सर्वसम्मति से श्रमिक यूनियन के सचिव चुने गये। इतनी कम उम्र के युवा के लिये यह बड़े गौरव की बात थी। सिर्फ इतना ही नहीं, अपनी निष्ठा एवं लगन के कारण उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता भी हासिल हुई।

“इस समय, अपने लेखन पर वह कम ध्यान दे रहे थे। अपनी सैद्धांतिक बुनियाद को मजबूत करने तथा जनता के जीवन से नये अनुभव प्राप्त करने में लगे हुए थे। दूसरी ओर इस कठोर परिश्रम के साथ -साथ रात में जग कर या कभी फुरसत में गहरी तल्लीनता से वह पढ़ाई करते गए और श्रमिक परिवारों को, उनके रोजमर्रे को और उनकी आशाओं व आकांक्षाओं को जानने का प्रयास चलाते रहे।

“सन 1941 के जून के महीने में हिटलर द्वारा सोवियत संघ पर आक्रमण किया गया। सोमेन के काम का दायरा भी बढ़ गया। तत्काल जरूरी था कि इस युद्ध का तात्पर्य एवं सोवियत संघ की भूमिका के बारे में जनता के बीच प्रचार किया जाय। प्रगति लेखक व शिल्पी संघ द्वारा इस काम का बीड़ा उठाया गया और मार्क्सवादियों ने सोवियत सुहृद [मित्र] समिति के नाम से एक संगठन बनाया। सोमेन चन्द, रेलवे श्रमिक यूनियन के काम में व्यस्त रहने के बावजूद प्रगति लेखक व शिल्पी संघ का काम तो देख ही रहे थे ,अब 'सोवियत सुहृद समिति 'का काम भी देखने लगे। हालाँकि इस समय वह अपनी रचनाएं किसी पत्रिका में प्रकाशित करने पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे थे ।पर उनका लेखन बन्द नहीं हुआ। यथार्थ तौर पर जन-साहित्य के सृजन के काम में कितनी दूर वह आगे बढ़ पाये इसकी जाँच करते रहते थे।

“पहले ही कहा गया है कि सोमेन के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। फिर वह खुद भी कमजोर स्वास्थ्य के थे। उनके प्रति स्नेहशील रहने वाले उनके पिता कभी भी उनके नौकरी करने के पक्ष में राय नहीं देते थे। लेकिन सोमेन पिता की तकलीफ समझ रहे थे। इसलिये बाद के दिनों में अपने मित्र सरलानन्द सेन को सोमेन ने कहा था, “किसी काम पर लगाइए मुझे, नहीं तो मोराल टूट जाएगा!” अस्थाई तौर पर सोमेन कहीं नौकरी करने लगे थे या नहीं इसके बारे में जानकारी नहीं मिलती है।

“आपस में चन्दा इकट्ठा कर प्रगति लेखक संघ ने उस समय, ‘क्रांति’ नाम से एक संकलन ग्रंथ प्रकाशित किया था। ‘क्रांति’ के प्रकाशन में सोमेन चन्दा का ही उद्यम मुख्य था और उस ग्रंथ में सोमेन की, नई शैली में लिखी कहानी ‘वनस्पति’ प्रकाशित हुई थी। उसी समय ढाका में साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए। दिन-दोपहर में सड़कें सुनसान, आदमी के करीब से आदमी को चलने में डर लगता है लेकिन सोमेन को छुट्टी नहीं। जोखिम-भरे इलाकों में भी जा रहे हैं देश के काम के लिए, हिन्दू और मुसलमानों के बीच सद्भाव वापस लाने के लिए। इसी पृष्ठभूमि में रचित हुई सोमेन की एक असाधारण कहानी ‘दंगा’। इसकी रचना के कुछ ही दिनों के बाद रचित हुई उनकी प्रख्यात कहानी ‘चूहे’।

“सन 1941 का अन्त होते- होते मार्क्सवादियों के साथ राष्ट्रवादियों की लड़ाई बहुत आगे बढ़ गई। सन 1942 के 8 मार्च को मार्क्सवादियों ने ढाका में एक सम्मेलन का आह्वान किया; सम्मेलन का नाम था ‘फासीवाद-विरोधी कार्यकर्ता सम्मेलन’। सुत्रापूर में इस आयोजन की तैयारी चल रही थी। कलकत्ता से बंकिम मुखर्जी और स्नेहांशु आचार्य ढाका पहुँचे सम्मेलन में सभापति एवं मुख्य अतिथि के तौर पर हिस्सा लेने के लिए। लेकिन इस सम्मेलन में बाधा डालने के लिये राष्ट्रवादी लोग हथियार वगैरह के साथ तैयार हो रहे थे। अपराह्न के ढाई बजे सोमेन चन्द अपने हाथों में लाल झंडा उठाए हुए, रेल मजदूरों के एक जुलूस का नेतृत्व करते हुए सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए रेल-कॉलोनी से रवाना हुए। लगभग तीन बजे जुलूस पहुँचा लक्ष्मीबाज़ार, हृषिकेश दास रोड के मोड़ पर। उसी समय छुरा, कुकरी, लोहे के रॉड आदि के साथ राष्ट्रवादियों के एक हिस्से ने जुलूस पर हमला किया। जुलूस तितर-बितर हो गया। तब उन लोगों ने सोमेन को चुन लिया। कुकरी से बार -बार चोट कर उन्हें जमीन पर गिरा दिया, उनकी आँखें निकाल ली, जीभ खींच कर काट दिया, पेट चीर कर अँतड़ियाँ बाहर निकाल दी और अट्टहास करते हुये पशुओं की तरह सोमेन के लुंजपुंज रक्ताक्त शरीर पर वे नाचते रहे। जब तक शरीर में ताकत बची थी, सोमेन लगातार नारे लगा रहे थे, आखरी सांस तक उनके हाथों से लाल झंडे को छीनना दुश्मनों के लिए सम्भव नहीं हुआ था। इसी तरह सोमेन चन्द ने अपनी विचारधारा को स्थापित करने के लिए शहादत दी। उनका रक्त पूरी दुनिया के मुक्तियोद्धाओं के रक्त के साथ मिल गया। एक महान बलिदान के बदले वह ढाका के संग्रामी प्रगतिशील साहित्यकारों को गौरवान्वित कर गए।”

लेखक के रूप में उनकी रचनाओं के प्रकाशन से सम्बन्धित जो तथ्य मिलते हैं उनके अनुसार, सन 1937 में, 17 वर्ष की उम्र में उनकी पहली कहानी ‘शिशु तपन’ साप्ताहिक ‘देश’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। उनकी कई कहानियाँ ढाका, कलकत्ता, सिलहट एवं अन्य शहरों से निकलने वाली पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थी। ‘नवशक्ति’ पत्रिका में उनका लिखा हुआ एक उपन्यास ‘बन्या’ [बाढ़] भी प्रकाशित हुआ था। गौरतलब है कि यह उपन्यास बाढ़ के उन विध्वंसों पर था जिनका सामना बंगाल की जनता हर साल करती है।

एनटीवी ऑनलाइन में प्रकाशित प्रतिवेदन में अंजन आचार्य कहते हैं कि मार्क्सवादी नेताओं में अगर सतीश पकड़ाशी थे जिन्होंने सोमेन को राजनीति एवं दर्शन की शिक्षा दी, तो रणेश दासगुप्ता सरीखे नेता भी थे जिन्होंने सोमेन को अपने समय का साहित्य – बंकिमचन्द्र, शरतचन्द्र, विभूतिभूषण से लेकर गोर्की, मोपासाँ, बारबूस तक एवं अन्य कईयों को - पढ़ने को प्रेरित किया।

उनकी सूचना के अनुसार अब तक सोमेन की अट्ठाइस कहानियाँ, एक उपन्यास, तीन कविताएं एवं दो नाटक प्रकाशित हुए हैं। उनके द्वारा लिखे गये पत्रों का एक संकलन भी प्रकाशित हुआ है। वाममोर्चा सरकार की पश्चिम बंग बांग्ला अकादमी ने युवा लेखकों को सोमेन चन्द स्मृति पुरस्कार देने की शुरुआत की थी।

.

.

(लेखक बिहार बंगाली समिति के महासचिव और 'बिहार हेराल्ड' के संपादक हैं।)

क्या यह लेख उपयोगी था?

टिप्पणियाँ

0

अपनी राय साझा करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...

" सोमेन चन्द-फासीवादविरोधी संघर्ष में शहादत देने वाले प्रथम साहित्यकार "- विद्युत पाल

प्रकाशित: 24 मई 2026 • 10 मिनट पठन

वाम की आवाज़|जन समाचार मंच
विज्ञापन

शेयर करें

सबसे ज्यादा पढ़ी गईं

1

‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

361 क्लिक

2

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

358 क्लिक

3

'उत्तम कुमार': एक नक्षत्र का अस्त हो जाना ~ 'सत्यजीत राय'

338 क्लिक

4

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

333 क्लिक

5

नीट पेपर लीक कांड : केंद्र सरकार की गंभीरता पर '?' है। - केशव भट्टड़

330 क्लिक

विज्ञापन

संसाधन

शहीद ए आजम भगत सिंह के विचार - संकलनकर्ता श्रेया जायसवाल (PDF)

'तुम्हारी क्षय' - राहुल सांकृत्यायन (PDF)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (Link)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (PDF)

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल की वेब साइट (बांग्ला) (Link)

भाजपा क्यों है जनता की दुश्मन ? (PDF)

द लेफ्ट व्यूज - द पीपल्स लेंस (अंग्रेजी) (Link)

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा (PDF)

पुरानी फिल्मों में होता था संदेश - सीताराम येचुरी (Link)

मैं नास्तिक क्यों हूँ ? - शहीद-ए-आजम भगतसिंह (PDF)

वाममोर्चा घोषणापत्र। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-2026 (PDF)

मार्क्सवादी पथ पत्रिका (बांग्ला) (Link)

अभियान कैलेंडर

कोई आगामी ईवेंट नहीं

जुड़े रहने के लिए

रोज़ शाम 7 बजे प्रमुख खबरें सीधे आपके ईमेल पर।

सदस्यता लें
इस लेखक से और
सभी देखें →
राज्य

मुखौटा हट गया है, अब लड़ाई असली चेहरे से है - मोहम्मद सलीम

सलीम ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी असल में आरएसएस के इशारे पर दलाल की भूमिका निभाती आ रही है। दरअसल, इस राज्य से वामपंथी राजनीति के दायरे को सिकोड़ना ही आरएसएस का मुख्य उद्देश्य था। राज्य में आज भले ही तृणमूल कांग्रेस नहीं है, लेकिन वामपंथी आज भी मैदान में हैं और भविष्य में भी रहेंगे।

मोहम्मद सलीम

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव

17 जून 2026

राज्य

हिंदू-मुस्लिम सभी बुलडोजर के शिकार होंगे: मोहम्मद सलीम

"जब आग लगती है, तो वह धर्म नहीं देखती, हिंदू-मुस्लिम का भेद किए बिना सभी के घरों को जलाकर खाक कर देती है। बीजेपी की बुलडोजर राजनीति के खतरे से भी कोई नहीं बचेगा। सभी इसके शिकार होंगे। इसलिए प्रतिरोध की लड़ाई में सभी लोगों को एकजुट होना होगा।"

मोहम्मद सलीम

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव

17 जून 2026

राज्य

बुलडोजर नीति के खिलाफ भी लड़ेंगे वामपंथी: मोहम्मद सलीम

हर उस व्यक्ति तक पहुँचना होगा जो मेहनतकश है, सताया हुआ है या प्रताड़ित है। भाजपा ने एसआईआर (SIR) के नाम पर एक बड़े वर्ग के लोगों से उनका मताधिकार छीन लिया है। इन सभी लोगों को एकजुट करना होगा। उनके मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों को वापस लाना होगा। जनता की रोटी-रोजी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और पीने के पानी जैसी स्थानीय मांगों को पूरा कराने के लिए संघर्ष करना होगा। भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एकता, भाईचारा और रोजगार के लिए लड़ना होगा। बुलडोजर राज के खिलाफ लाल झंडा पहले ही उठ खड़ा हुआ है। उन्होंने डर का माहौल बढ़ाया है, लेकिन हम चाहते हैं कि जनता का यह डर टूटे। अन्याय के खिलाफ खड़े होकर हक के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी।

मोहम्मद सलीम

सीपीआई (एम)पश्चिम बंगाल के सचिव

14 जून 2026

और पढ़ें
सभी देखें →
अंतर्राष्ट्रीय

“सिनेमा का सबसे बड़ा जीनियस” चार्ली चैप्लिन को याद करते हुए - केशव भट्टड़

चार्ली चैप्लिन ((16 अप्रैल 1889 – 25 दिसंबर 1977) सिनेमा के इतिहास में एक महान हस्ती थे। वे ब्रिटेन में जन्मे एक कॉमेडियन, अभिनेता, निर्देशक, लेखक और संगीतकार थे। उन्होंने "द ट्रैम्प" (The Tramp) नामक प्रसिद्ध चरित्र के माध्यम से दुनिया भर में हंसी और भावुकता का अनोखा मिश्रण प्रस्तुत किया। चैप्लिन ने सन् 1914 से शुरू करके कुल 80 से अधिक छोटी फिल्में (शॉर्ट्स) और 11 प्रमुख फीचर फिल्में बनाईं। उनकी फिल्में मुख्य रूप से मूक सिनेमा (साइलेंट फिल्म) युग की हैं, जिनमें शारीरिक हास्य, भावनात्मक गहराई और सामाजिक संदेश प्रमुख थे।जब चार्ली चैप्लिन और अल्बर्ट आइंस्टीन 1931 में मिले थे, तब आइंस्टीन ने चैप्लिन से कहा था:- “आपकी कला में मुझे सबसे अधिक जो चीज प्रभावित करती है, वह है उसकी सार्वभौमिकता। आप एक भी शब्द नहीं बोलते, फिर भी पूरी दुनिया आपको समझ लेती है।” यह बात चैप्लिन की मूक फिल्मों की शक्ति को बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त करती है। चैप्लिन की शारीरिक हास्य, भावनाओं और मानवीय संदेश ने भाषा की सीमाओं को पार कर पूरी दुनिया को छू लिया था। चार्ली चैप्लिन आज भी सिनेमा प्रेमियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उनकी फिल्में हंसी के साथ जीवन की सच्चाई सिखाती हैं।

केशव कुमार भट्टड़ • 16 अप्रैल 2026

अंतर्राष्ट्रीय

'शिकागो' के 26 साल पहले हावड़ा स्टेशन के 1260 मुटिया-मजदूरों ने 8 घंटे काम (कार्य-दिवस) की मांग पर की थी हड़ताल। - तपन सेन

मई 1860 में हावड़ा स्टेशन के 1260 'मुटिया' मजदूरों (बोझ ढोने वाले) ने 8 घंटे काम (कार्य-दिवस) की मांग को लेकर एक दिन की हड़ताल की थी। इसी हड़ताल के जरिए भारत में मजदूर जागरण की शुरुआत हुई। इस हड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 1886 में अमेरिका के हे-मार्केट (Haymarket) में 8 घंटे काम की मांग पर हुए ऐतिहासिक मई दिवस की घटनाओं से 26 साल पहले ही भारतीय मजदूरों ने 8 घंटे काम की मांग पर हड़ताल कर दी थी।अमेरिका के मजदूरों ने 8 घंटे काम की मांग 1866 में उठाई थी। 1866 से 1886 तक लंबा आंदोलन चला।

केशव कुमार भट्टड़ • 03 मई 2026

अंतर्राष्ट्रीय

अमेरिका में भागवत के 'बहुलतावादी' सुर: यह बदलाव है या दबाव का असर?

"विदेश में बहुलतावाद की दुहाई और देश में नफरत की वही पुरानी सच्चाई!"

सदा हिन्दू राष्ट्र और अखंड भारत के गीत गानेवाले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 'विविधता में एकता' और बहुलतावाद का गीत गाया , लेकिन यह उनके वैचारिक बदलाव के बजाय अमेरिकी वीजा प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय विरोध से बचने का एक पैंतरा मात्र दिखता है। एक तरफ वे प्रवासियों को अमेरिका के प्रति वफादार रहने और भारत में सभी समुदायों के साथ रहने की सीख दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ देश के भीतर संघ परिवार का आचरण स्पष्ट रूप से बिल्कुल इसके उलट है। अहमदाबाद में ऐनी फ्रैंक और मलाला की किताबें पढ़ने के 'अपराध' में 'बजरंगियों' द्वारा बेरहमी से छात्रों की पिटाई, अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भाजपा नेताओं के घनघोर सांप्रदायिक बयान , आईटी सेल के लगातार जहरीले नफरती अभियान और दलित नेताओं की सभा के बाद स्थल के 'शुद्धिकरण' जैसी घटनाएं इस बात की गवाही देती हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्थापित भारतीय सिद्धांतों की शरण लेना और विरोध प्रदर्शनों के सामने समर्थकों का तीखा आक्रामक रवैया यह साबित करता है कि संघ का यह 'बहुलतावाद' सिर्फ एक मुखौटा है।

केशव कुमार भट्टड़ • 31 अगस्त 2026

वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़

अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ, न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !

मुख्य पन्ने
जानकारी
हमारे बारे में
संपादकीय नीति
सुधार नीति
गोपनीयता नीति
संपर्क करें
आर्काइव
अभियान कैलेंडर आर्काइव
© 2026 वाम की आवाज़ — जन संघर्ष का डिजिटल पुरालेखMade for the Movement