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देशभर में शुक्रवार को आंदोलन करेंगे खेतिहर मजदूर

केशव कुमार भट्टड़•13 मई 20264 मिनट पठन82 बार पढ़ा गया

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा वीबी जी रामजी (VB G Ramji) को लागू करने की अधिसूचना जारी करते ही देशभर के मनरेगा श्रमिकों और खेतिहर मजदूरों ने भारी आक्रोश व्यक्त किया है। 'अखिल भारतीय खेतिहर मजदूर यूनियन' ने सोमवार को एक बयान में कहा कि इस परियोजना के माध्यम से मनरेगा को खत्म करने का रास्ता साफ किया गया है। नई परियोजना के नाम पर केंद्र सरकार झूठे वादे कर रही है और ग्रामीण श्रमजीवी लोगों के रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा को और कमजोर करने की साजिश रची गई है। आगामी शुक्रवार (15 मई) को खेतिहर मजदूरों ने देशभर में आंदोलन और हड़ताल का आह्वान किया है। खेतिहर मजदूरों ने मनरेगा को बहाल करने और इस नई परियोजना को रद्द करने की जोरदार मांग उठाई है।

देशभर में शुक्रवार को आंदोलन करेंगे खेतिहर मजदूर

देशभर में शुक्रवार को आंदोलन करेंगे खेतिहर मजदूर

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 केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा वीबी जी रामजी (VB G Ramji) को लागू करने की अधिसूचना जारी करते ही देशभर के मनरेगा श्रमिकों और खेतिहर मजदूरों ने भारी आक्रोश व्यक्त किया है। 'अखिल भारतीय खेतिहर मजदूर यूनियन' ने सोमवार को एक बयान में कहा कि इस परियोजना के माध्यम से मनरेगा को खत्म करने का रास्ता साफ किया गया है। नई परियोजना के नाम पर केंद्र सरकार झूठे वादे कर रही है और ग्रामीण श्रमजीवी लोगों के रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा को और कमजोर करने की साजिश रची गई है। आगामी शुक्रवार (15 मई) को खेतिहर मजदूरों ने देशभर में आंदोलन और हड़ताल का आह्वान किया है। खेतिहर मजदूरों ने मनरेगा को बहाल करने और इस नई परियोजना को रद्द करने की जोरदार मांग उठाई है। इसी मांग को लेकर वे फिर से आंदोलन करेंगे।

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बयान में कहा गया है कि केंद्र दावा कर रहा है कि वीबी जी रामजी परियोजना में 125 दिनों के काम की गारंटी होगी। लेकिन वास्तव में, भाजपा सरकार मनरेगा में औसतन 55 दिनों का काम भी सुनिश्चित नहीं कर पा रही है। भ्रष्टाचार रोकने के नाम पर तकनीक का इस्तेमाल इस तरह किया जा रहा है कि बड़ी संख्या में खेतिहर मजदूर और मनरेगा श्रमिक काम खो रहे हैं। कई जगहों पर महीनों से मजदूरी बकाया है, कहीं-कहीं तो एक साल से अधिक समय से उन्हें पैसा नहीं मिल रहा है। जबकि इन समस्याओं के समाधान को लेकर सरकारी अधिसूचना में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। नई व्यवस्था में साल में दो महीने काम बंद रखने का जो फैसला लिया गया है, सरकार ने उसकी भी कोई तर्कसंगत व्याख्या नहीं दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में वैकल्पिक आय के अवसर कम होने पर मजदूरों को कम मजदूरी में काम करने के लिए मजबूर करना आसान हो जाएगा।

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अधिसूचना के एक महत्वपूर्ण पहलू को रेखांकित करते हुए संगठन ने उल्लेख किया कि यह पहली बार है जब केंद्र स्पष्ट कर रहा है कि परियोजना में केंद्र और राज्यों का वित्तीय उत्तरदायित्व कितना होगा। सरकारी दस्तावेजों में कहा गया है कि राज्यों के संभावित आवंटन सहित कुल परियोजना लागत 1.51 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है। जबकि केंद्र ने बजट में एकतरफा आवंटन की घोषणा की थी। अब राज्यों पर 40 प्रतिशत राशि जुटाने की जिम्मेदारी थोपी जा रही है। यह व्यवस्था वास्तव में संघीय ढांचे के विपरीत और सत्ता के चरम केंद्रीकरण का उदाहरण है। कई राज्यों की इतनी वित्तीय क्षमता ही नहीं है। संगठन का कहना है कि केंद्र सरकार की कॉर्पोरेट-परस्त आर्थिक नीतियों के कारण राज्यों पर वित्तीय दबाव पहले ही बढ़ चुका है। उस पर सामाजिक सुरक्षा परियोजना के खर्च का बड़ा हिस्सा राज्यों पर थोपे जाने से रोजगार परियोजना का कार्यान्वयन और कमजोर हो जाएगा। इसके परिणामस्वरूप राज्य सरकारें काम की मांग होने के बावजूद पर्याप्त काम नहीं देना चाहेंगी।

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ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संकट की एक और चिंताजनक तस्वीर पेश करते हुए खेतिहर मजदूर यूनियन ने बताया कि हालिया एनसीआरबी (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024 में कृषि से जुड़े 10,546 लोगों ने आत्महत्या की है। इसमें 4,633 किसान और 5,913 खेतिहर मजदूर हैं। इस स्थिति में मनरेगा को कमजोर करने या रद्द करने से ग्रामीण गरीबी बढ़ेगी और इसके परिणामस्वरूप आत्महत्या की प्रवृत्ति और अधिक बढ़ेगी। खेतिहर मजदूरों ने साल में कम से कम 200 दिन का काम, 700 रुपये दैनिक मजदूरी और महंगाई के अनुरूप मजदूरी में संशोधन की व्यवस्था करने की मांग की है। साथ ही 'फेशियल रिकॉग्निशन' जैसी तकनीक को रद्द करने और ग्राम सभाओं को परियोजना कार्यान्वयन में मुख्य भूमिका देने की मांग भी की गई है। शुक्रवार के देशव्यापी आंदोलन में किसानों, श्रमिकों और मनरेगा कर्मियों से शामिल होने का आह्वान किया गया है।

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संबंधित खबर: मनरेगा को बचाने के लिए राष्ट्रव्यापी हड़ताल सफल - डॉ. विक्रम सिंह

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देशभर में शुक्रवार को आंदोलन करेंगे खेतिहर मजदूर

प्रकाशित: 13 मई 2026 • 4 मिनट पठन

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"गुलाम भारत की मुक्ति और एशियाई जन-एकता को दिशा देने वाला लेनिन का क्रांतिकारी दृष्टिकोण।" - बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा बांग्ला में प्रस्तुत यह मूल-आलेख एक तारीखवार ऐतिहासिक-वैचारिक अध्ययन है, जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं औपनिवेशिक मुक्ति-संग्राम के प्रति लेनिन की गहरी विश्लेषणात्मक दृष्टि को रेखांकित करता है। अध्ययन 1900 से 1923 के मध्य रचित लेनिन के निबंधों, पत्रों, नोट्स और भाषणों के आधार पर यह स्पष्ट करता है कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा भारत के आर्थिक शोषण, दमनकारी नीतियों और बंबई के मजदूर आंदोलन की क्रांतिकारी चेतना का गहन मूल्यांकन किया था। लेनिन ने औपनिवेशिक राष्ट्रवाद के मूल लोकतांत्रिक स्वरूप को पहचानते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक सर्वहारा क्रांति और एशियाई जन-एकता से जोड़ा। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के मंच से मानबेंद्रनाथ रॉय के संकीर्णतावादी सिद्धांतों को संशोधित कर लेनिन ने भारतीय कम्युनिस्टों को व्यापक साम्राज्यवादी-विरोधी मंचों में भागीदारी और किसान-मजदूर आंदोलनों को संगठित करने की रणनीतिक दिशा प्रदान की। अंततः, यह आलेख स्थापित करता है कि लेनिन के अनुसार रूस, भारत, चीन आदि देशों का दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का मालिक होना ही संघर्ष के परिणाम को तय करेगा।

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आज जब देश में धर्म और संस्कृति का शोर सबसे ऊँचा है, तब उसी समाज की अंतरात्मा के भीतर बेईमानी की ऐसी भूख नाच रही है जो बच्चों की लाशों पर भी करोड़ों की गड्डियाँ गिनने से नहीं हिचकती।यह कैसी धार्मिक चेतना है जहाँ नारे तो भगवान के लगते हैं, लेकिन आचरण में केवल शैतानी हवस और भ्रष्टाचार का बोलबाला है?नीट पेपर लीक की यह आग सिर्फ परीक्षा प्रणाली की नहीं,बल्कि देश के नैतिक और सामाजिक ढांचे की भस्म उड़ा रही है।जब मेधावी छात्र फंदे पर झूल रहे हों,अस्मत के लिये छात्राएं गुरु से जूझ रही हों, और मगरमच्छ तिजोरियाँ भर रहे हों, तब चुप रहना इस महापाप में हिस्सेदार होना है!"

केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

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अंधाधुंध हॉकर उन्मूलन नहीं, पुनर्वास चाहिए.!.

साल 2014 का Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act देश के स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका के अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन रेल हॉकर अभी भी इस सुरक्षा से बाहर हैं। जबकि भारतीय रेलवे के साथ उनका रिश्ता कई दशकों पुराना है। ट्रेन यात्रा की संस्कृति के साथ झालमूड़ी , चनाचूर, चाय, मूंगफली, किताबें या खिलौने बेचने वाले रचे-बसे हुए हैं। वे सिर्फ सामान नहीं बेचते; वे रेल यात्रा की एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता हैं।

इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।

इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।

केशव कुमार भट्टड़ • 20 मई 2026

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