देशभर में शुक्रवार को आंदोलन करेंगे खेतिहर मजदूर

.

.

 केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा वीबी जी रामजी (VB G Ramji) को लागू करने की अधिसूचना जारी करते ही देशभर के मनरेगा श्रमिकों और खेतिहर मजदूरों ने भारी आक्रोश व्यक्त किया है। 'अखिल भारतीय खेतिहर मजदूर यूनियन' ने सोमवार को एक बयान में कहा कि इस परियोजना के माध्यम से मनरेगा को खत्म करने का रास्ता साफ किया गया है। नई परियोजना के नाम पर केंद्र सरकार झूठे वादे कर रही है और ग्रामीण श्रमजीवी लोगों के रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा को और कमजोर करने की साजिश रची गई है। आगामी शुक्रवार (15 मई) को खेतिहर मजदूरों ने देशभर में आंदोलन और हड़ताल का आह्वान किया है। खेतिहर मजदूरों ने मनरेगा को बहाल करने और इस नई परियोजना को रद्द करने की जोरदार मांग उठाई है। इसी मांग को लेकर वे फिर से आंदोलन करेंगे।

.

बयान में कहा गया है कि केंद्र दावा कर रहा है कि वीबी जी रामजी परियोजना में 125 दिनों के काम की गारंटी होगी। लेकिन वास्तव में, भाजपा सरकार मनरेगा में औसतन 55 दिनों का काम भी सुनिश्चित नहीं कर पा रही है। भ्रष्टाचार रोकने के नाम पर तकनीक का इस्तेमाल इस तरह किया जा रहा है कि बड़ी संख्या में खेतिहर मजदूर और मनरेगा श्रमिक काम खो रहे हैं। कई जगहों पर महीनों से मजदूरी बकाया है, कहीं-कहीं तो एक साल से अधिक समय से उन्हें पैसा नहीं मिल रहा है। जबकि इन समस्याओं के समाधान को लेकर सरकारी अधिसूचना में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। नई व्यवस्था में साल में दो महीने काम बंद रखने का जो फैसला लिया गया है, सरकार ने उसकी भी कोई तर्कसंगत व्याख्या नहीं दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में वैकल्पिक आय के अवसर कम होने पर मजदूरों को कम मजदूरी में काम करने के लिए मजबूर करना आसान हो जाएगा।

.

अधिसूचना के एक महत्वपूर्ण पहलू को रेखांकित करते हुए संगठन ने उल्लेख किया कि यह पहली बार है जब केंद्र स्पष्ट कर रहा है कि परियोजना में केंद्र और राज्यों का वित्तीय उत्तरदायित्व कितना होगा। सरकारी दस्तावेजों में कहा गया है कि राज्यों के संभावित आवंटन सहित कुल परियोजना लागत 1.51 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है। जबकि केंद्र ने बजट में एकतरफा आवंटन की घोषणा की थी। अब राज्यों पर 40 प्रतिशत राशि जुटाने की जिम्मेदारी थोपी जा रही है। यह व्यवस्था वास्तव में संघीय ढांचे के विपरीत और सत्ता के चरम केंद्रीकरण का उदाहरण है। कई राज्यों की इतनी वित्तीय क्षमता ही नहीं है। संगठन का कहना है कि केंद्र सरकार की कॉर्पोरेट-परस्त आर्थिक नीतियों के कारण राज्यों पर वित्तीय दबाव पहले ही बढ़ चुका है। उस पर सामाजिक सुरक्षा परियोजना के खर्च का बड़ा हिस्सा राज्यों पर थोपे जाने से रोजगार परियोजना का कार्यान्वयन और कमजोर हो जाएगा। इसके परिणामस्वरूप राज्य सरकारें काम की मांग होने के बावजूद पर्याप्त काम नहीं देना चाहेंगी।

.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संकट की एक और चिंताजनक तस्वीर पेश करते हुए खेतिहर मजदूर यूनियन ने बताया कि हालिया एनसीआरबी (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024 में कृषि से जुड़े 10,546 लोगों ने आत्महत्या की है। इसमें 4,633 किसान और 5,913 खेतिहर मजदूर हैं। इस स्थिति में मनरेगा को कमजोर करने या रद्द करने से ग्रामीण गरीबी बढ़ेगी और इसके परिणामस्वरूप आत्महत्या की प्रवृत्ति और अधिक बढ़ेगी। खेतिहर मजदूरों ने साल में कम से कम 200 दिन का काम, 700 रुपये दैनिक मजदूरी और महंगाई के अनुरूप मजदूरी में संशोधन की व्यवस्था करने की मांग की है। साथ ही 'फेशियल रिकॉग्निशन' जैसी तकनीक को रद्द करने और ग्राम सभाओं को परियोजना कार्यान्वयन में मुख्य भूमिका देने की मांग भी की गई है। शुक्रवार के देशव्यापी आंदोलन में किसानों, श्रमिकों और मनरेगा कर्मियों से शामिल होने का आह्वान किया गया है।

संबंधित खबर: मनरेगा को बचाने के लिए राष्ट्रव्यापी हड़ताल सफल - डॉ. विक्रम सिंह