मनरेगा को बचाने के लिए राष्ट्रव्यापी हड़ताल सफल
-डॉ. विक्रम सिंह
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15 मई 2026 को पूरे ग्रामीण भारत में खेत व ग्रामीण मजदूर मनरेगा की पुनर्बहाली और वीबी-ग्राम (जी) [VB-GRAM (G)] को वापस लेने की मांग लेकर सड़को पर उतरे। खेत एवं ग्रामीण मजदूर यूनियनों के संयुक्त मंच और नरेगा संघर्ष मोर्चा द्वारा बुलाई गई हड़ताल में लाखों की संख्या में मजदूरों ने भाग लिया। देश के हजारों गांवों में मनरेगा मजदूरों के साथ बड़ी संख्या में खेत एवं ग्रामीण मजदूर ग्राम पंचायतों के बाहर एकत्र हुए। उन्होंने विरोध प्रदर्शन, धरना और नारे लगाते हुए अपनी मांगों का ज्ञापन पंचायत अध्यक्षों को सौंपा। .
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यह हड़ताल पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में काफी प्रभावशाली रही, जहाँ लाखों मनरेगा, खेत व एवं ग्रामीण मजदूरों ने स्थानीय सरकारी व पंचायत कार्यालयों के बाहर विभिन्न प्रकार के विरोध प्रदर्शनों और धरनों के माध्यम से हड़ताल में भाग लिया। तेलंगाना उन राज्यों में से एक है जहाँ मनरेगा को मजदूरों के निरंतर संघर्षों के माध्यम से लागू कराया गया है। ग्रामीण मजदूरों पर हो रहे इस हमले का प्रतिरोध करने के लिए संगठित प्रयास किए गए, जिसका प्रतिबिंब हड़ताल के दिन सभी गांवों में हुए बड़े पैमाने के प्रदर्शनों में देखने को मिला। चुनावों और उसके बाद फैली व्यापक हिंसा के बावजूद, पश्चिम बंगाल में मजदूरों का हौसला कम नहीं हुआ। वे अपनी मांगों को दर्ज कराने के लिए सड़कों पर उतरे, हड़ताल की और नारे लगाए। तमिलनाडु में लगभग सभी ग्रामीण जिलों में विरोध कार्यक्रम आयोजित किए गए, जहाँ कई ग्राम पंचायतों के बाहर भारी संख्या में मजदूर इकट्ठे हुए। इसी प्रकार, कर्नाटक में भी पूरे राज्य में हड़ताल संबंधी गतिविधियाँ हुईं, जिनमें कुछ जिलों में मज़दूरों की उल्लेखनीय भागीदारी देखने को मिली । ग्रामीण त्रिपुरा में भी हड़ताल प्रभावी रही, जहाँ बड़ी संख्या में ग्रामीण मजदूरों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी की।
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इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता देश के उत्तरी राज्यों से मजदूरों की उत्साहवर्दक भागीदारी रही। ये वे क्षेत्र हैं जहाँ आमतौर पर दक्षिणपंथी हिंदुत्व राजनीति द्वारा पैदा किए गए सांप्रदायिक और जातिगत विभाजनों तथा ग्रामीण भारत में उसके निरंतर प्रभाव के कारण मजदूरों के गुस्से और असंतोष को दबा हुआ माना जाता है। इसके बावजूद, इन राज्यों के मजदूर मनरेगा हड़ताल में भाग लेने के लिए सड़कों पर उतरे। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन राज्यों में मनरेगा का क्रियान्वयन बेहद कमजोर है और रोजगार गारंटी सुनिश्चित करने की दिशा में पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। मजदूरों को अक्सर इस योजना के तहत काम मांगने से हतोत्साहित किया जाता है, और जो मजदूर काम करते भी हैं, उन्हें समाज के अन्य हिस्सों द्वारा हीन दृष्टि से देखा जाता है। अंततः, पंजाब और झारखंड को छोड़कर अधिकांश राज्य भाजपा-नेतृत्व वाली सरकारों द्वारा शासित हैं, जिससे मनरेगा के क्रियान्वयन और ग्रामीण मजदूरों की स्थिति पर राजनीतिक प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
. मुख्यमंत्री अजय बिष्ट द्वारा अपनाए गए बुलडोज़र मॉडल की शासन व्यवस्था के कारण अलोकतांत्रिक राजनीतिक माहौल के लिए बदनाम उत्तर प्रदेश में प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार मनरेगा मजदूरों की हड़ताल 28 जिलों, 67 ब्लॉकों और 209 पंचायतों में सफलतापूर्वक आयोजित हुई। हरियाणा में खेत एवं ग्रामीण मजदूर यूनियनों के कार्यकर्ताओं द्वारा विभिन्न जिलों में लगातार अभियान चलाया गया, जिसके परिणामस्वरूप व्यापक भागीदारी के साथ अत्यंत संगठित हड़ताल देखने को मिली। राज्य के 8 से अधिक जिलों की 150 से अधिक ग्राम पंचायतों में हड़ताल आयोजित की गई। पंजाब के सभी ग्रामीण जिलों में मजदूर बड़ी संख्या में एकत्र हुए और राज्य में हड़ताल को सफल बनाया। राजस्थान में भी राज्यभर में अलग-अलग स्थानों पर विरोध कार्यक्रम आयोजित किए गए, लेकिन गंगानगर, हनुमानगढ़, सीकर और बीकानेर जैसे जिलों में बड़ी संख्या में मजदूरों की भागीदारी के साथ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। मध्य प्रदेश, झारखंड और असम के कुछ स्थानों पर भी विरोध कार्यक्रम आयोजित किए गए। वहीं, केरल, आंध्र प्रदेश और बिहार में पहले से तय कार्यक्रमों के कारण अखिल भारतीय मनरेगा मजदूर हड़ताल के तहत 20 मई को इसी प्रकार की कार्रवाइयाँ आयोजित की जाएंगी।
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हड़ताल की सफलता और व्यापक भागीदारी खेत एवं ग्रामीण मजदूर यूनियनों तथा अन्य संगठनों द्वारा ग्रामीण जनता के बीच चलाए गए लंबे अभियान का परिणाम थी, जिसने सरकार द्वारा फैलाए जा रहे झूठे प्रचार और भ्रामक दावों को जनता के सामने बेनक़ाब किया। यह ध्यान देने योग्य है कि वीबी-ग्राम (जी) अधिनियम पारित होने के बाद भाजपा-नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारों ने इस अधिनियम के पक्ष में माहौल बनाने के लिए एक व्यापक प्रचार अभियान चलाया। यहाँ तक कि निर्वाचित सांसद और विधायक भी इस अधिनियम के पक्ष में प्रचार करने वालों में शामिल थे। पूरे सरकारी तंत्र का इस्तेमाल यह भ्रम पैदा करने के लिए किया गया कि वीबी-ग्राम (जी), जो वास्तव में ग्रामीण भारत में रोजगार गारंटी को समाप्त करने के लिए लाया गया एक विनाशकारी कदम है, मजदूरों के हित में है। इसे मजदूरों के लिए लाभकारी बताने की कोशिश की गई, जबकि वास्तविकता में यह ग्रामीण मजदूरों के रोजगार और आजीविका पर गंभीर हमला है।
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हड़ताल में भारी भागीदारी का एक बड़ा कारण मजदूरों के अपने अनुभव और पिछले तीन महीनों के दौरान पैदा हुआ गुस्सा भी था, जब मनरेगा के तहत लगभग कोई काम उपलब्ध नहीं था। ग्रामीण मज़दूरों के सभी हिस्सों और उनकी यूनियनों के विरोध और प्रतिरोध किए जाने के बावजूद, केंद्र सरकार वीबी-ग्राम (जी) को लागू करने पर अड़ी हुई है और इसकी अधिसूचना जारी कर दी है जिसमे इसको लागू करने की तिथि 1 जुलाई घोषित की है। हालाँकि, अभी तक इसके क्रियान्वयन के लिए कोई नियम नहीं बनाए गए हैं। लेकिन मंत्रालय में चल रही चर्चाओं से संकेत मिलता है कि जिन मजदूरों की ई-केवाईसी (E-KYC) प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, उनके मौजूदा जॉब कार्ड नए अधिनियम के तहत ‘ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्ड’ जारी होने तक अस्थायी रूप से मान्य रहेंगे। यह स्थिति पहले से ही गांवों में कामकाज और रोजगार की उपलब्धता को प्रभावित कर रही है, जिससे मजदूरों के बीच असमंजस और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।
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यह ध्यान देने योग्य एक महत्वपूर्ण बात है कि पहली बार केंद्र सरकार ने वीबी-ग्राम (जी) को लागू करने में केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय हिस्सेदारी को स्पष्ट रूप से सामने रखा है। 11 मई को ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी पीआईबी (PIB) बयान में कहा गया है, “राज्यों के संभावित योगदान को शामिल करते हुए, कुल कार्यक्रम व्यय 1.51 लाख करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान है।” इसका अर्थ यह है कि केंद्र सरकार ने राज्यों से कोई परामर्श किए बिना केंद्रीय बजट में आवंटन तय किया, लेकिन अब वह राज्यों से कुल खर्च का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा वहन करने की अपेक्षा कर रही है। यह संघीय ढांचे (फेडरलिज्म) की भावना के खिलाफ है और सत्ता के बढ़ते केंद्रीकरण को दर्शाता है। केंद्र सरकार ने इस वास्तविकता को पूरी तरह नजरअंदाज किया है कि कई राज्यों के पास इतनी बड़ी राशि देने की आर्थिक क्षमता नहीं है। राज्य सरकारें पहले से ही गंभीर वित्तीय दबाव का सामना कर रही हैं, जिसका एक कारण केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियाँ भी हैं। एक ओर केंद्र सरकार कॉरपोरेट हितैषी नीतियों को बढ़ावा दे रही है और बड़े पूंजीपतियों को रियायतें दे रही है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के वित्तीय बोझ को राज्यों पर डाल रही है। यह वित्तीय शर्त स्वयं वीबी-ग्राम (जी) के क्रियान्वयन में एक बड़ी बाधा बन सकती है। कई राज्यों के लिए अपने हिस्से की राशि जुटा पाना मुश्किल हो सकता है, जिससे योजना के लागू होने में देरी हो सकती है या उसका प्रभाव कमजोर पड़ सकता है। व्यवहार में यह स्थिति ऐसी हो सकती है कि किए गए वादे केवल कागजों तक सीमित रह जाएँ। ग्रामीण रोजगार और कल्याण को मजबूत करने के बजाय, 1.51 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा केवल लोगों को गुमराह करने का एक और प्रयास है।
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केंद्र की ओर से वित्तीय सहायता कमजोर होने के कारण राज्य सरकारें रोजगार की मांग करने वाले सभी लोगों को काम उपलब्ध कराने में अधिक हिचकिचाने लगेंगी। यह प्रवृत्ति आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में पहले से ही दिखाई दे रही है, जहाँ मनरेगा के क्रियान्वयन में कमजोरी आई है। लिबटेक इंडिया (LibTech India) के नवीनतम रिपोर्ट (मनरेगा ट्रैकर) के अनुसार, आंध्र प्रदेश में पिछले एक वर्ष के दौरान रोजगार में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। कुल कार्य दिवस (पर्सन-डे) में 23.2 प्रतिशत की गिरावट आई, जो 2,422.84 लाख से घटकर 1,859.77 लाख रह गया। इस गिरावट का प्रभाव योजना के लगभग हर पहलू पर पड़ा। पंजीकृत परिवारों की संख्या में 6.1 प्रतिशत की कमी आई, काम पाने वाले परिवारों की संख्या 8.6 प्रतिशत घटी और नियोजित मजदूरों की संख्या में 10.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके साथ ही प्रति परिवार औसत कार्य-दिवसों में 16 प्रतिशत की कमी आई।सबसे तीखी गिरावट उन परिवारों की संख्या में देखी गई जिन्होंने पूरे 100 दिनों का रोजगार पूरा किया था। ऐसे परिवारों की संख्या 57.6 प्रतिशत घटकर 5.1 लाख से केवल 2.16 लाख रह गई, जिससे उनका अनुपात 10.9 प्रतिशत से घटकर मात्र 5 प्रतिशत रह गया।
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इसी तरह की प्रवृत्ति पूरे देश के स्तर पर भी देखने को मिल रही है। लिबटेक इंडिया रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025–26 में मनरेगा के तहत रोजगार पाने वाले परिवारों की संख्या में 8.2 प्रतिशत की कमी आई, जबकि नियोजित मजदूरों की संख्या 9.1 प्रतिशत घटी है। कुल कार्य दिवस में भी भारी गिरावट दर्ज की गई, जो 2024–25 के 268.44 करोड़ से घटकर 2025–26 में 210.73 करोड़ रह गया, जिससे मजदूरों को उपलब्ध औसत रोजगार में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है ।
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फेशियल रिकग्निशन (चेहरा पहचान) और प्रत्यक्ष बैंक हस्तांतरण (डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर) जैसी तकनीकों के इस्तेमाल ने भ्रष्टाचार की समस्याओं को दूर करने के बजाय जॉब कार्डों की अधिक कटौती और पात्र मजदूरों के बहिष्कार को बढ़ाया है। नया अधिनियम भी ऐसी ही तकनीकों को अनिवार्य बनाता है, जो भारत की जमीनी वास्तविकताओं के विपरीत है। वीबी-ग्राम (जी) के तहत कार्यस्थलों पर उपस्थिति 'फेस ऑथेंटिकेशन' आधारित प्रणाली के माध्यम से दर्ज की जाएगी। भाजपा-नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई इस बहिष्कारी तकनीक ने न केवल मजदूरों को काम से बाहर किया है और उनकी आजीविका छीनी है, बल्कि कई मामलों में उनकी जान तक ले ली है। आंध्र प्रदेश के अमरावती जिले में मनरेगा की पाँच महिला मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई, जब सड़क पर तेज़ रफ्तार से आ रहे एक ट्रक ने उन्हें कुचल दिया। ये पाँचों मजदूर मनरेगा कार्यस्थल पर पहुँची थीं और एनएमएमएस (NMMS) ऐप के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश कर रही थीं। कार्यस्थल पर कमजोर इंटरनेट होने के कारण उन्हें सड़क किनारे खड़े होकर ऐप में अपनी उपस्थिति दर्ज करनी पड़ रही थी। उसी समय, जब वे अपनी बेहद कम दैनिक मजदूरी पाने के लिए पोर्टल पर खुद को दर्ज करने की चिंता में लगी हुई थीं, अचानक एक ट्रक आया और उन्हें कुचल दिया।यह 'उपस्थिति प्रणाली' त्रुटिपूर्ण तकनीक का ऐसा जाल है, जो काम की तलाश करने वाले मजदूरों को परेशान करती है और अनेक मजदूरों को काम पाने से ही बाहर कर देती है। सरकार ने बिना आवश्यक बुनियादी ढाँचा तैयार किए ऐसी तकनीक थोप दी है।
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भाजपा-नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ग्रामीण भारत की स्थिति को लेकर बिलकुल भी चिंतित दिखाई देती है और कॉरपोरेट हितों के अनुरूप काम कर रही है, लेकिन खेत एवं ग्रामीण मजदूरों की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। मई 2026 में जारी नवीनतम राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें 4,633 किसान/कृषक और 5,913 खेत मजदूर शामिल थे। ये आंकड़े खेत एवं ग्रामीण मजदूरों तथा छोटे किसानों की भयावह स्थिति को उजागर करते हैं। ऐसे समय में मनरेगा को कमजोर करना या समाप्त करना इन हालात को और अधिक बदतर बना सकता है। मनरेगा ग्रामीण गरीबों के लिए रोजगार और आय का एक महत्वपूर्ण सहारा रहा है, और इसे समाप्त करने या कमजोर करने से आर्थिक असुरक्षा तथा संकट और गहरा सकता है, जिससे आत्महत्याओं जैसी त्रासद घटनाओं में बढ़ोतरी होने की आशंका है।
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भाजपा-नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को लगा कि उसने खेत एवं ग्रामीण मजदूरों से रोजगार की गारंटी छीनने के अपने मिशन को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। लेकिन भाजपा द्वारा खड़ा किया गया यह पूरा भ्रम मजदूरों ने अच्छी तरह समझ लिया, जिसने मनरेगा मजदूरों की इस हड़ताल को जन्म दिया। यह हड़ताल भाजपा-नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के लिए केवल एक चेतावनी हड़ताल है। देशभर के खेत एवं ग्रामीण मजदूरों ने अपने-अपने गांवों में इस हड़ताल का आयोजन कर अपनी मांगों को सामने रखा और उन्हें अपने निकटतम निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से केंद्र सरकार तक पहुँचाने का प्रयास किया। उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:
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- वीबी-ग्राम (जी) को वापस लिया जाए और मनरेगा को मज़बूती से लागू किया जाए।
- इस मज़बूत मनरेगा के तहत प्रति व्यक्ति कम से कम 200 दिनों का रोजगार सुनिश्चित किया जाए तथा न्यूनतम मजदूरी 700 रुपये प्रतिदिन हो, जिसे बाजार में महँगाई के अनुसार हर वर्ष बढ़ाया जाए।
- भुगतान और उपस्थिति प्रणाली में लागू बहिष्कारी तकनीकों को वापस लिया जाए।
- मनरेगा कार्यों और उसके गांवों में क्रियान्वयन में ग्राम सभाओं को प्रमुख हितधारक और निर्णायक भूमिका दी जाए।
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यदि केंद्र सरकार इन मांगों को पूरा नहीं करती है या इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल नहीं होती है, तो देशभर के मनरेगा, खेत एवं ग्रामीण मजदूर ग्रामीण भारत में रोजगार की गारंटी के अपने अधिकार की मांग को लेकर और अधिक संगठित तथा संघर्षशील रूप में आगे बढ़ने का संकल्प लेंगे। मजदूरों की एकता भाजपा की उस कोशिश को विफल करेगी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण मजदूरों की आजीविका को नष्ट कर उन्हें भूस्वामी वर्गों और ग्रामीण अमीरों के लिए सस्ते श्रम में बदलना है।
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