कर्तारसिंह ने बड़ी मस्तानी अदा से केवल इतना कहा, "फांसी ही तो चढ़ा देंगे, और क्या? हम इससे नहीं डरते।"
जन समाचार मंच
कर्तारसिंह ने बड़ी मस्तानी अदा से केवल इतना कहा, "फांसी ही तो चढ़ा देंगे, और क्या? हम इससे नहीं डरते।"

शहीद कर्तारसिंह सराभा
-भगत सिंह
[शहीद कर्तारसिंह सराभा का चित्र भगतसिंह अपने पास रखते थे और कहा करते थे, "यह मेरा गुरु, साथी व भाई है" उनका प्रेरणा-स्रोत समझने के लिए यह लेख बहुत महत्त्वपूर्ण है। -सं.]
रणचण्डी के इस परम भक्त विद्रोही कर्तारसिंह की आयु अभी 20 वर्ष की भी नहीं हुई थी कि जब उन्होंने स्वतन्त्रता देवी की बलिवेदी पर अपना बलिदान दे दिया। आंधी की तरह वह अचानक कहीं से आए, अग्नि प्रज्ज्वलित की और सपनों में पड़ी रणचण्डी को जगाने की कोशिश की। विद्रोह का यज्ञ रचा और आखिर वह स्वयं इसमें भस्म हो गए। वे क्या थे, किस दुनिया से अचानक आए और झट कहां चले गए, हम कुछ भी न जान सके। 19 वर्ष की आयु में ही उन्होंने इतने काम कर दिखाए कि सोच कर हैरानी होती है। इतनी जुर्रत, इतना आत्मविश्वास, इतना आत्मत्याग और ऐसी लगन बहुत कम देखने को मिलती है। भारतवर्ष में ऐसे इन्सान बहुत कम पैदा हुए हैं, जिनको सही अर्थों में विद्रोही कहा जा सकता है, परन्तु इन गिने-चुने नेताओं में कर्तारसिंह का नाम सूची में सबसे ऊपर है। उनकी रग-रग में क्रांति का जज़्बा समाया हुआ था। उनकी जिन्दगी का एक ही लक्ष्य, एक ही इच्छा और एक ही आशा, जो भी था- क्रांति थी, इसीलिए उन्होंने जिन्दगी में पांव रखा और आखिर इसीलिए इस दुनिया से कूच कर गए।
आपका जन्म 1896 में गांव सराभा, जिला लुधियाना में हुआ था। आप माता-पिता के इकलौते बेटे थे। अभी इनकी आयु बहुत कम थी कि पिता जी का देहावसान हो गया। परन्तु आपके दादा ने बहुत प्रयत्न से आपको पाला। नवीं कक्षा पढ़ने के बाद आप अपने चाचा के यहां चले गए। वहां उन्होंने दसवीं की परीक्षा पास की और कालेज में पढ़ने लगे। यह 1910-11 के दिन थे। इधर आपको स्कूल और कालेज के पाठ्यक्रम के तंग दायरे से बाहर की बहुत-सी पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिला। यह आन्दोलन का जमाना था। इस वातावरण में रहकर आपकी देश-प्रेम की भावना पल्लवित हुई।
इसके बाद आपकी अमेरिका जाने की इच्छा हुई। घरवालों ने उसका कोई विरोध नहीं किया। आपको अमेरिका भेज दिया गया। सन् 1912 में आप सानफ्रांसिस्को की बन्दरगाह पर पहुंचे। आजाद देश में पहुंचकर कदम-कदम पर आपके कोमल हृदय पर चोट पड़ने लगी। इन गोरों की जबान से Damn Hindu (तुच्छ हिन्दू) और Black man (काला आदमी) आदि सुनते ही वे पागल हो उठते थे। उनको कदम-कदम पर देश की इज्जत व सम्मान खतरे में नजर आने लगे। घर की याद आने पर जंजीरों में जकड़ा हुआ विवश भारत सामने आ जाता। उनका कोमल दिल धीरे-धीरे सख्त होने लगा और देश की आजादी के लिए जिन्दगी कुर्बान करने का निश्चय दृढ़ होता गया। उनके दिल पर उस समय क्या गुजरती थी, यह हम कैसे समझ सकते हैं।
यह असम्भव था कि वे चैन से रह पाते। हर समय उनके सामने यह प्रश्न उठने लगा कि यदि शान्ति से काम न चला तो देश आजाद किस तरह होगा ? फिर बिना अधिक सोचे उन्होंने भारतीय मजदूरों का संगठन शुरू कर दिया। उनमें आजादी की भावना उभरने लगी। हर मजदूर के पास घण्टों बैठकर वे समझाने लगे कि अपमान से भरी गुलामी की जिन्दगी से तो मौत हजार दर्जा अच्छी है। काम शुरू होने पर और लोग भी उनसे आ मिले। मई, 1912 में इन लोगों की एक खास बैठक हुई। इसमें कुछ चुनिंदा हिन्दुस्तानी शामिल हुए। सभी ने देश की आजादी के लिए तन, मन, धन न्योछावर करने का प्रण लिया। इन्हीं दिनों पंजाब के जलावतन देशभक्त भगतसिंह वहां पहुंचे। धड़ाधड़ जलसे होने लगे, उपदेश होने लगे। काम से काम चलता गया। मैदान तैयार हो गया। फिर अखबार की जरूरत महसूस होने लगी। 'गदर' नामक अखबार निकाला गया। इसका प्रथम अंक नवम्बर, 1913 में निकाला गया। इसके सम्पादकीय विभाग में कर्तारसिंह भी थे। आपकी कलम में अथाह जोश था। सम्पादकीय विभाग के लोग अखबार को हैण्ड प्रेस पर छापते थे। कर्तारसिंह क्रांतिपसन्द मतवाले नौजवान थे। प्रेस चलाते हुए थक जाने पर वे गीत गाया करते थे।
सेवा देश दी जिन्दड़िए बड़ी औखी, गल्लां करनीआं ढेर सुखल्लीयां ने। जिन्नां देशसेवा विच पैर पाया, उन्नां लक्ख मुसीबतां झल्लियां ने।
(देश सेवा करनी बहुत मुश्किल है, जबकि बातें करना खूब आसान है। जिन्होंने देशसेवा के रास्ते पर कदम उठा लिया वे लाख मुसीबतें झेलते हैं।)
कर्तारसिंह जिस लगन से परिश्रम करते थे उससे सभी की हिम्मत बढ़ जाती थी। भारत को किस तरह आजाद कराया जाए, यह किसी और को पता चले या नहीं, और किसी ने इस सवाल पर सोचा हो या नहीं, लेकिन कर्तारसिंह ने इस सवाल पर बहुत कुछ सोच रखा था। इसी दौरान आप न्यूयार्क में विमान कम्पनी में भर्ती हो गए और वहीं दिल लगाकर काम सीखने लगे।
सितम्बर, 1914 में कामागाटामारू जहाज को अत्याचारी गोरे साम्राज्यवादियों के हाथ से अवर्णनीय यातनाएं झेलने पर वैसे ही लौटना पड़ा। तब हमारे कर्तारसिंह क्रांतिप्रिय गुप्ता और एक अमेरिकी अराजकतावादी जैक को साथ लेकर जापान आए और कोबे में बाबा गुरदित्तसिंह जी से मिलकर सब बातचीत की। युगान्तर आश्रम, सानफ्रांसिस्को के गदर प्रेस में 'गदर और गदर की गूंज' और अन्य बहुत-सी पुस्तकें छापकर बांटी जाती रहीं। दिनोंदिन प्रचार बढ़ता गया। जोश बढ़ता गया। फरवरी, 1914 में स्टाकरन के पब्लिक जलसे में आजादी का झण्डा लहराया गया और आजादी और बराबरी के नाम पर कसमें खाई गईं। इस जलसे के मुख्य वक्ताओं में कर्तारसिंह भी थे। सभी ने घोषणा की कि वह अपने खून-पसीने की कमाई एक कर देश की आजादी के संघर्ष में लगा देंगे। इसी तरह दिन गुजरते रहे। अचानक यूरोप में प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ने की खबर आई। वे खुशी से फूले नहीं समाते थे। एकदम सभी गाने लगे-
चलो चलें देश के लिए युद्ध करने, यही आखिरी वचन व फरमान हो गए।
कर्तारसिंह ने देश लौटने का जोरों से प्रचार किया। फिर स्वयं जहाज पर सवार होकर कोलम्बो (श्रीलंका) पहुंच गए। इन दिनों अमेरिका से पंजाब आनेवाले प्रायः डिफेंस आफ इण्डिया कानून (डी.आई.आर.) की पकड़ में आ जाते थे। बहुत कम सही-सलामत पहुंच पाते थे। कर्तारसिंह सही-सलामत आ गए। बड़े जोरों से काम शुरू हुआ। संगठन की कमी थी, लेकिन किसी तरह वह पूरी की गई। दिसम्बर, 1914 में मराठा नौजवान विष्णु गणेश पिंगले भी आ गए। इनकी कोशिश से श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल और रासबिहारी पंजाब आए। कर्तारसिंह हर समय हर जगह पहुंचते। आज मोगा में गुप्त मीटिंग है। आप वहां भी हैं। कल लाहौर के विद्यार्थियों में प्रचार हो रहा है, आप फिर प्रथम पंक्ति में हैं। अगले दिन फिरोजपुर छावनी के सैनिकों से गठजोड़ हो रहा है। फिर हथियारों के लिए कलकत्ता जा रहे हैं। रुपए की कमी का प्रश्न उठने पर आपने डाका डालने की सलाह दी। डकैती का नाम सुनते ही बहुत से लोग स्तम्भित रह गए, लेकिन आपने कह दिया कि कोई भय नहीं है। भाई परमानन्द भी डकैती से सहमत हैं। उनसे पुष्टि करवाने की जिम्मेदारी आप पर डाली गई। अगले दिन बगैर उनसे मिले ही कह दिया, "पूछ आया हूं, वे सहमत हैं।" वे यह सहन नहीं कर सकते थे कि केवल रुपए की कमी से विद्रोह की तैयारी में देरी हो।
एक दिन वे डकैती डालने एक गांव गए। कर्तारसिंह नेता थे। डकैती चल रही थी। घर में एक बेहद खूबसूरत लड़की भी थी। उसे देखकर एक पापी आत्मा का मन डोल गया। उसने जबरदस्ती लड़की का हाथ पकड़ लिया। लड़की ने घबराकर शोर मचा दिया। कर्तारसिंह एकदम रिवाल्वर तानकर उसके नजदीक पहुंच गए और उस आदमी के माथे पर पिस्तौल रखकर उसे निहत्था कर दिया। फिर कड़ककर बोले, "पापी। तेरा अपराध बहुत गम्भीर है। तुम्हें सजाए-मौत मिलनी चाहिए, लेकिन हालात की मजबूरी से तुम्हें माफ किया जाता है। फौरन इस लडकी के पांवों में गिरकर माफी मांग कि हे बहिन। मुझे माफ कर दो। और फिर इसकी माता जी के पैर छूकर कह कि माता जी, मैं इस पतन के लिए माफी चाहता हूं। यदि वे तुम्हें माफ कर दें तो तुम्हें जिन्दा छोड़ दिया जाएगा वरना गोली से उड़ा दिया जाएगा।" उसने ऐसा ही किया। बात अभी ज्यादा नहीं बढ़ी थी। यह देखकर मां-बेटी की आंखें भर आयीं। मां ने कर्तारसिंह को प्यार भरे लहजे में कहा, "बेटा! ऐसे धर्मात्मा और सुशील नौजवान होकर आप इस काम में किस तरह शामिल हुए?" कर्तारसिंह का भी दिल भर आया और कहा, "मां जी! रुपए के लालच में हमने यह काम शुरू नहीं किया। अपना सबकुछ दांव पर लगाकर डकैती डालने आए हैं। हथियार खरीदने के लिए रुपए की जरूरत है। वह कहां से लाएं? मां जी, इसी महान काम के लिए आज इस काम पर मजबूर हुए हैं।" इस समय पर यह दृश्य बड़ा दर्दनाक था। मां ने फिर कहा, "इस लड़की की शादी करनी है। इसके लिए कुछ छोड़ जाओ तो अच्छा है।" इसके बाद उन्होंने अपना सारा धन मां के सामने रख दिया और कहा, "जितना चाहें ले लें।" कुछ पैसा रखकर मां ने बाकी सारा रुपया कर्तारसिंह की झोली में डाल दिया और आशीर्वाद दिया, 'जाओ बेटा, तुम्हें सफलता मिले।" डकैती जैसे भयानक काम में शामिल होकर भी कर्तारसिंह का दिल कितना भावनामय, पवित्र व विशाल था, यह इस घटना से जाहिर है।
फरवरी, 1915 में विद्रोह की तैयारी थी। पहले सप्ताह आप पिंगले और दूसरे दो-तीन साथियों के साथ आगरा, कानपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, मेरठ व अन्य कई स्थानों पर मत और विद्रोह के लिए उनसे मेलमिलाप कर आए। आखिर वह दिन करीब आने लगा, जिसका बड़ी देर से इन्तजार हो रहा था। 21 फरवरी, 1915 भारत में विद्रोह का दिन नियत हुआ था। इसी के अनुसार तैयारी हो रही थी। लेकिन इसी समय उनकी आशाओं के वृक्ष की जड़ में बैठा एक चूहा उसे कुतर रहा था। चार-पांच दिन पहले सन्देह हुआ कि किरपालसिंह की गद्दारी से सब ध्वस्त हो जाएगा। इसी आशंका से कर्तारसिंह ने रासबिहारी बोस से विद्रोह की तारीख 21 की बजाय 19 फरवरी करने के लिए कहा। ऐसा होने पर भी इसकी भनक किरपालसिंह को मिल गई। इस क्रांतिकारी दल में एक गद्दार का होना कितने खतरनाक परिणाम का कारण बना। रासबिहारी और कर्तारसिंह भी कोई उचित प्रबन्ध न होने से अपना भेद छिपा नहीं पाए। इसका कारण भारत के दुभर्भाग्य के सिवाय और क्या हो सकता है?
कर्तारसिंह पिछले फैसले के अनुसार पचास-साठ साथियों के साथ फिरोजपुर जा पहुंचे। अपने साथी सैनिक हवलदार से मिले और विद्रोह की बात की। लेकिन किरपालसिंह ने तो पहले ही सारा मामला बिगाड़ दिया था। हिन्दुस्तानी सिपाही निहत्थे कर दिए गए। धड़ाधड़ गिरफ्तारियां होने लगीं। हवलदार ने सहायता करने से इन्कार कर दिया। कर्तारसिंह की कोशिश असफल रही। निराश हो लाहौर आए। पंजाब-भर में गिरफ्तारियों का चक्कर तेज हो गया। अब साथी भी टूटने लगे। ऐसी स्थिति में रासबिहारी बोस मायूस होकर लाहौर के एक मकान में लेटे हुए थे। कर्तारसिंह भी वहीं आकर एक चारपाई पर दूसरी ओर मुंह फेर लेट गए। परस्पर कोई बात नहीं की, लेकिन चुपचाप ही एक-दूसरे के दिल की हालत समझ गए। इनकी हालात का अनुमान हम क्या लगा सकते हैं!
दरे-तदवीर पर सर फोड़ना शेवः रहा अपना, वसीले हाथ ही ना आए किस्मत आजमाई के।
(हमारा काम भाग्य के दर पर सर फोड़ना ही रहा, लेकिन भाग्य आजमाने के साधन ही हाथ नहीं आए।)
उनकी तो यही ख्वाहिश थी कि कहीं लड़ाई हो और वे अपने देश के लिए लड़ते-लड़ते प्राण दे दें। फिर सरगोधा के नजदीक चक्क नम्बर पांच में आ गए। फिर विद्रोह का चर्चा छेड़ दिया। वहीं पकड़े गए। जंजीरों में जकड़े गए। निर्भीक विद्रोही कर्तारसिंह को लाहौर स्टेशन पर लाया गया। पुलिस कप्तान से कहा, "मिस्टर टामकिन, कुछ खाना तो लाइए।" वह कितना मस्त-मौला था! इस आकर्षक व्यक्तित्व को देखकर दोस्त व दुश्मन सब खुश हो जाते थे। गिरफ्तारी के समय वे बहुत खुश थे। प्रायः कहा करते थे, "वीरता और हिम्मत से मरने पर मुझे विद्रोही की उपाधि देना। कोई याद करे तो विद्रोही कर्तारसिंह कहकर याद करे।" मुकदमा चला। उस समय कर्तारसिंह की आयु कुल साढ़े अठारह वर्ष थी। सबसे कम आयु के अपराधी आप ही थे लेकिन जज ने इनके सम्बन्ध में यह लिखा- 'वह इन अपराधियों में, सबसे खतरनाक अपराधियों में एक है। अमेरिका की यात्रा के दौरान और फिर भारत में इस षड्यन्त्र का ऐसा कोई हिस्सा नहीं जिसमें उसने महत्त्वपूर्ण भूमिका न निभाई हो।'
एक दिन आपके बयान देने की बारी आई। आपने सबकुछ मान लिया। आप क्रांतिकारी बयान देते रहे। जज कलम दांतों के नीचे दबाए देखता रहा। एक शब्द न लिखा। बाद में इतना कहा, "कर्तारसिंह, अभी आपका बयान लिखा नहीं गया। आप सोच-समझ कर बयान दें। आप जानते हैं कि आपके बयान का क्या परिणाम हो सकता है?" देखने वाले कहते हैं कि जज के इन शब्दों पर कर्तारसिंह ने बड़ी मस्तानी अदा से केवल इतना कहा, "फांसी ही तो चढ़ा देंगे, और क्या? हम इससे नहीं डरते।" इस दिन अदालत की कार्रवाई समाप्त हो गई। अगले दिन फिर कर्तारसिंह का अदालत में बयान शुरू हुआ। पहले दिन जजों का कुछ ऐसा विचार था कि कर्तारसिंह भाई परमानन्द के इशारे पर ऐसा बयान दे रहे हैं, लेकिन वह विद्रोही कर्तारसिंह के दिल की गहराइयों में नहीं उतर सकते थे। कर्तारसिंह का बयान अधिक जोरदार, अधिक जोशीला ओर पहले दिन की तरह ही इकबालिया था। आखिर में आपने कहा, "अपराध के लिए मुझे उम्रकैद की सजा मिलेगी या फांसी। लेकिन मैं फांसी को प्राथमिकता दूंगा, ताकि फिर जन्म लेकर जब तक हिन्दुस्तान आजाद नहीं हो, तब तक मैं बार-बार जन्म लेकर फांसी पर लटकता रहूंगा। यही मेरी अन्तिम इच्छा है..."
आपकी वीरता से जज बहुत प्रभावित हुए, लेकिन उन्होंने विशाल दिलवाले दुश्मन की तरह आपकी वीरता को वीरता न कहकर बेशर्मी के शब्दों में याद किया। कर्तारसिंह को सिर्फ गालियां ही नहीं, मौत की सजा भी मिली। आपने मुस्कराते हुए जजों को धन्यवाद दिया। कर्तारसिंह फांसी की कोठरी में कैद थे। आपके दादा ने आकर कहा, "कर्तारसिंह, जिनके लिए मर रहे हो, वे तुम्हें गालियां देते हैं। तुम्हारे मरने से देश को कुछ लाभ होगा, ऐसा भी दिखाई नहीं देता।" कर्तारसिंह ने बहुत धीमे से पूछा - "दादा जी, फलां रिश्तेदार कहां है?"
"प्लेग से मर गया।"
"फलां कहां है?"
"हैजे से मर गया।"
"तो क्या आप चाहते हैं कि कर्तारसिंह महीनों बिस्तर पर पड़ा रहे और पीड़ा से दुखी किसी रोग से मरे! क्या उस मौत से यह मौत हजार गुना अच्छी नहीं?" दादा चुप हो गए।
आज फिर सवाल उठता है कि उनके मरने से क्या लाभ हुआ ? वह किसलिए मरे ? इसका जवाब बिल्कुल स्पष्ट है। देश के लिए मरे। उनका आदर्श ही देश-सेवा के लिए लड़ते हुए मरना था। वे इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहते थे। मरना भी गुमनाम रहकर चाहते थे।
चमन जारे मुहब्बत में, उसी ने बागबानी की,
जिसने मिहनत को ही मिहनत का समर जाना।
नहीं होता है मुहताजे नुमाइश फैज़ शबनम का,
अंधेरी रात में मोती लुटा जाती है गुलशन में।
डेढ़ साल तक मुकदमा चला। 16 नवम्बर, 1915 का दिन था, जब उन्हें फांसी पर लटका दिया गया। उस दिन भी हमेशा की तरह खुश थे। इनका वजन दस पौण्ड बढ़ गया था। 'भारत माता की जय' कहते हुए वे फांसी के तख्ते पर झूल गए।
['चाँद' (फाँसी अंक) नवम्बर 1928]
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'भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज'- चमनलाल
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प्रकाशित: 24 मई 2026 • 13 मिनट पठन

सलीम ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी असल में आरएसएस के इशारे पर दलाल की भूमिका निभाती आ रही है। दरअसल, इस राज्य से वामपंथी राजनीति के दायरे को सिकोड़ना ही आरएसएस का मुख्य उद्देश्य था। राज्य में आज भले ही तृणमूल कांग्रेस नहीं है, लेकिन वामपंथी आज भी मैदान में हैं और भविष्य में भी रहेंगे।
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

"जब आग लगती है, तो वह धर्म नहीं देखती, हिंदू-मुस्लिम का भेद किए बिना सभी के घरों को जलाकर खाक कर देती है। बीजेपी की बुलडोजर राजनीति के खतरे से भी कोई नहीं बचेगा। सभी इसके शिकार होंगे। इसलिए प्रतिरोध की लड़ाई में सभी लोगों को एकजुट होना होगा।"
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

हर उस व्यक्ति तक पहुँचना होगा जो मेहनतकश है, सताया हुआ है या प्रताड़ित है। भाजपा ने एसआईआर (SIR) के नाम पर एक बड़े वर्ग के लोगों से उनका मताधिकार छीन लिया है। इन सभी लोगों को एकजुट करना होगा। उनके मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों को वापस लाना होगा। जनता की रोटी-रोजी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और पीने के पानी जैसी स्थानीय मांगों को पूरा कराने के लिए संघर्ष करना होगा। भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एकता, भाईचारा और रोजगार के लिए लड़ना होगा। बुलडोजर राज के खिलाफ लाल झंडा पहले ही उठ खड़ा हुआ है। उन्होंने डर का माहौल बढ़ाया है, लेकिन हम चाहते हैं कि जनता का यह डर टूटे। अन्याय के खिलाफ खड़े होकर हक के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी।
सीपीआई (एम)पश्चिम बंगाल के सचिव
14 जून 2026

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म निर्देशक और लेखक सत्यजीत राय ने महानायक उत्तम कुमार के आकस्मिक निधन (24 जुलाई 1980) पर आनंदबाज़ार पत्रिका में 26 जुलाई 1980 को एक बेहद भावुक और ऐतिहासिक आलेख लिखा था, जिसका बांग्ला शीर्षक था - "অস্তমিত নক্ষত্র" - 'अस्तमित नक्षत्र'। यह आलेख 24 जुलाई 2019 को 'अस्तमित उत्तम' (অস্তমিত উত্তম) के नाम से पुनः प्रकाशित हुआ। इस शीर्षक में बहुत ही सुंदर शब्दावली का खेल किया गया , जिसके दो समानांतर अर्थ निकलते हैं: उत्तम कुमार के नाम के संदर्भ में - यहाँ 'उत्तम' का सीधा अर्थ अभिनेता 'उत्तम कुमार' से है। यानी "उत्तम कुमार का अस्त हो जाना (निधन हो जाना)"। बांग्ला और हिन्दी दोनों में 'उत्तम' का गुणवाचक अर्थ 'सर्वश्रेष्ठ' या 'सबसे अच्छा' होता है। इसके अनुसार इस शीर्षक का भावार्थ है—"श्रेष्ठता का ढल जाना" या "एक स्वर्णिम युग का अंत"। अपने इस आलेख में महानायक के निधन के बाद उनकी अभिनय क्षमता का विश्लेषण किया था महान निर्देशक सत्यजीत राय ने। आनंदबाज़ार पत्रिका का आभार व्यक्त करते हुए उत्तम कुमार (03 नवंबर 1926- 24 जुलाई 1980) जन्मशती वर्ष में हिन्दी पाठकों के लिए प्रस्तुत है इस ऐतिहासिक आलेख का हिन्दी में भावानुवाद । भावानुवाद करते समय मूल लेख का भाव, विश्लेषण और महान निर्देशक सत्यजीत राय की भाषा की गंभीरता बनाए रखने की कोशिश की गई है। जन्मशती वर्ष में किवदंती महानायक का सादर स्मरण, श्रद्धांजलि ।
केशव कुमार भट्टड़ • 10 सितंबर 2026

28 सितंबर 2026 - शहीद-ए-आजम भगत सिंह की 119वीं जयंती है। उनका प्रसिद्ध नारा ‘इंकलाब जिंदाबाद’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध आदमी होने की असली तमीज़ और चेतना का महाकाव्य है। यह वर्ष 'नौजवान भारत सभा' का शताब्दी वर्ष और 'शहीद यादगार समिति' का रजत जयंती वर्ष भी है। भगत सिंह की क्रांतिकारी आवाज़ केवल शोर नहीं थी, बल्कि उसके पीछे गहरा अध्ययन, सामाजिक न्याय और विश्व के महान विचारकों का वैचारिक आधार था। साम्राज्यवादी ब्रिटिश हुकूमत ने डरकर 23 मार्च 1931 को उन्हें फाँसी दे दी, लेकिन उनके विचार आज भी अमर हैं। ‘इंकलाब जिंदाबाद’ बाज़ारवाद, शोषण और अन्याय के खिलाफ आम आदमी की चेतना और बदलाव के लिए संघर्ष का प्रतीक है। आज के अवसरवादी राजनीतिक दौर में भगत सिंह के विचार एक न्यायपूर्ण भविष्य गढ़ने की प्रेरणा देते हैं और मशाल बनकर राह दिखाते हैं।
केशव कुमार भट्टड़ • 27 सितंबर 2026

"ठाकुर राम सिंह - काले पानी की यातनाओं से लेकर जन-संघर्ष तक, आजादी और अधिकारों के लिए समर्पित रहा जिनका जीवन " - अजमेर में जन्मे महान क्रांतिकारी थे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में 'डोगरा शूटिंग केस' के तहत काले पानी (अंडमान जेल) की कठोर सजा काटी। आजादी के बाद वे कम्युनिस्ट पार्टी और किसान सभा से जुड़कर आजीवन गरीबों व किसानों के अधिकारों के लिए संघर्षरत रहे। उन्होंने आगरा को अपनी कर्मभूमि बनाया और संजय प्लेस में ऐतिहासिक 'शहीद स्मारक' व पुस्तकालय का निर्माण कराया। सादगी पसंद ठाकुर साहब 98 वर्ष की आयु तक क्रांतिकारी विचारों और सामाजिक न्याय के प्रतीक बने रहे। आगरा का शहीद स्मारक, पुस्तकालय-वाचनालय, उनके द्वारा प्रकाशित स्मारिकाएं और उनसे जुड़े लोगों की स्मृतियां आज भी उनके संघर्ष की कहानी कहती हैं। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है। महान क्रांतिकारी ठाकुर राम सिंह को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि।
नवाब उद्दीन • 16 सितंबर 2026
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