"ठाकुर राम सिंह - काले पानी की यातनाओं से लेकर जन-संघर्ष तक, आजादी और अधिकारों के लिए समर्पित रहा जिनका जीवन " - अजमेर में जन्मे महान क्रांतिकारी थे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में 'डोगरा शूटिंग केस' के तहत काले पानी (अंडमान जेल) की कठोर सजा काटी। आजादी के बाद वे कम्युनिस्ट पार्टी और किसान सभा से जुड़कर आजीवन गरीबों व किसानों के अधिकारों के लिए संघर्षरत रहे। उन्होंने आगरा को अपनी कर्मभूमि बनाया और संजय प्लेस में ऐतिहासिक 'शहीद स्मारक' व पुस्तकालय का निर्माण कराया। सादगी पसंद ठाकुर साहब 98 वर्ष की आयु तक क्रांतिकारी विचारों और सामाजिक न्याय के प्रतीक बने रहे। आगरा का शहीद स्मारक, पुस्तकालय-वाचनालय, उनके द्वारा प्रकाशित स्मारिकाएं और उनसे जुड़े लोगों की स्मृतियां आज भी उनके संघर्ष की कहानी कहती हैं। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है। महान क्रांतिकारी ठाकुर राम सिंह को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि।
"काले पानी की यातनाओं से लेकर जन-संघर्ष तक, आजादी और अधिकारों के लिए समर्पित रहा जिनका जीवन।"
महान क्रांतिकारी ठाकुर राम सिंह (11 अप्रैल 1911-16 सितम्बर 2009):
संघर्ष, सादगी और स्मृतियों में
महान क्रांतिकारी और डोगरा शूटिंग केस में काले पानी की सजा पाने वाले ठाकुर राम सिंह, जिन्हें सभी लोग ठाकुर साहब के नाम से पुकारते थे, का जीवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष, त्याग और समर्पण की अद्भुत गाथा है। ठाकुर साहब का 16 सितम्बर 2009 को 98 वर्ष की आयु में निधन हुआ। स्वतंत्रता के बाद आगरा उनकी कर्मभूमि और संघर्षभूमि बना रहा। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करना उस पीढ़ी के संघर्षों और विचारों को याद करना है, जिसने देश की आजादी के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।
ठाकुर साहब का जन्म 11 अप्रैल 1911 को राजस्थान के अजमेर जनपद के दौलतबाग रोड इलाके में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। 4 साल की उम्र में ही उन्हें पशु चराने के काम में लगा दिया गया। साथ ही एक छोटे स्कूल में भर्ती कर दिया गया। बाद में डीएवी कॉलेज में पढ़ने लगे। स्कूल में व्यायाम शिक्षक क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े थे और आर्य समाजी थे। उन्हीं के प्रभाव में ठाकुर साहब राजनीतिक गतिविधियों में जाने लगे। 1927 में उनके व्यायाम शिक्षक रामचन्द्र गंगा प्रसाद पाण्डेय बम प्रशिक्षण में घायल हो गए और ठाकुर साहब उनकी सेवा में लग गए।
1928 में उन्होंने पंडित नेहरू के अजमेर आगमन पर उनकी सभा में भाग लिया। उन्हें होटल में पंडित जी के साथ वॉलंटियर बनाकर लगाया गया और उनके बहुत नजदीक रहने का अवसर मिला। बाबा नरसिंह के कहने पर वे यूथ कांग्रेस में सक्रिय हुए, किन्तु वे सत्याग्रह आंदोलन से सहमत नहीं थे। इसलिए कांग्रेस का रास्ता छोड़कर 1930 में हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। पुलिस उनकी तलाश में थी। अपने गुरु पाण्डेय जी पर पुलिस अत्याचार की सूचना ने उन्हें विचलित कर दिया। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपने आपको क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए समर्पित कर दिया। 5 मई 1934 को मेरठ जिले में बहने वाली हिंडन नदी के किनारे एक आश्रम में आजादी के कुछ दीवाने एकत्र हुए। अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों का मुंहतोड़ जवाब देने और देश को आजाद कराने के उद्देश्य से हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन सेना नामक संगठन का गठन किया गया। राम सिंह को अजमेर और ग्वालियर क्षेत्र का काम देखने की जिम्मेदारी दी गई। उस समय उनकी उम्र मात्र 23 वर्ष रही होगी।
अपने एक क्रांतिकारी साथी की पुलिस हिरासत में कथित आत्महत्या की घटना से वे बेहद व्यथित हुए। अपने साथी पर अत्याचार करने वाले पुलिस अधिकारी 'डोगरा' को उन्होंने जनवरी 1935 में गोली मार दी। फरवरी 1935 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 12 वर्ष काले पानी की सजा सुनाई गई। 1936 में उन्हें अंडमान जेल भेज दिया गया। 1937 में उनका प्रत्यर्पण हुआ और 1941 में लखनऊ जेल से रिहा हुए। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में वे फिर गिरफ्तार कर लिए गए और देश की आजादी के बाद 1947 में फतेहगढ़ जेल से रिहा हुए। अनेक क्रांतिकारियों के साथ उन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका संघर्ष केवल अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ नहीं था, बल्कि वे ऐसे समाज का सपना देखते थे जिसमें गरीबों, मजदूरों और किसानों को सम्मान और अधिकार मिलें। आजादी के बाद भी उनका संघर्ष जारी रहा और उन्हें 25 महीने से अधिक समय जेल में बिताना पड़ा। गरीबों और मजदूरों की लड़ाई लड़ने के संकल्प के साथ उन्होंने विवाह नहीं किया। क्रांतिकारी विचारों, विशेषकर शहीद भगत सिंह और उनके साथियों के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया।
स्वतंत्रता के बाद वे पहले कांग्रेस से जुड़े, लेकिन जल्द ही उसकी नीतियों से उनका मोहभंग हो गया। पचास के दशक में वे कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े तथा आगरा में जिला सचिव बने। पार्टी विभाजन के समय वे भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) में आए और अंतिम समय तक उससे जुड़े रहे। आगरा के ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय तक उन्होंने किसानों को किसान सभा के माध्यम से संगठित करने का काम किया।
फोटो में शम्भूनाथ आजाद, शिव वर्मा और रोशन लाल गुप्त के साथ ठाकुर राम सिंह

आगरा बना कर्म और संघर्ष की भूमि
स्वतंत्रता के बाद आगरा उनकी कर्मभूमि बना। उन्होंने शहीदों की स्मृति और उनके विचारों को जीवित रखने के लिए निरंतर काम किया। आगरा के संजय प्लेस में अंग्रेजी शासन के समय केंद्रीय कारागार था। सरकार ने उस स्थान को व्यावसायिक मार्केट में बदल दिया। उसी स्थान पर शहीद स्मारक के निर्माण के लिए ठाकुर साहब ने लंबा संघर्ष किया। इसके लिए उन्होंने सरदार भगत सिंह शहीद स्मारक समिति का गठन किया। उनके प्रयासों के बाद कारागार के फांसीघर के स्थान पर शहीद स्मारक का निर्माण हुआ। आज यह स्मारक आगरा के स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और शहीदों की स्मृति का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां उनके द्वारा स्थापित पुस्तकालय और वाचनालय भी शहीदों और क्रांतिकारियों के विचारों के प्रचार-प्रसार का माध्यम रहे हैं। शहीदों के बलिदान की अर्धशती के अवसर पर उन्होंने आगरा में कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किए। इनमें से कई कार्यक्रमों में मुझे स्वयं अनेक महान क्रांतिकारियों से मिलने और उन्हें सुनने का सौभाग्य मिला। इनमें गदर पार्टी के नायक बाबा पृथ्वीसिंह आजाद, शहीद भगत सिंह के साथी शिव वर्मा, काकोरी कांड के क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त और रामकृष्ण खत्री, क्रांतिकारी दुर्गा भाभी, विश्वनाथ माथुर, जयदेव कपूर, आजाद हिंद फौज के कर्नल ढिल्लों तथा अंडमान जेल की यातनाएं झेल चुके अनेक क्रांतिकारी शामिल थे। इन समारोहों के अवसर पर अनेक महत्वपूर्ण स्मारिकाओं का प्रकाशन भी हुआ, जिनमें ‘आगरा मंडल के शहीद’, ‘शिव वर्मा अभिनंदन ग्रंथ’, ‘शहीद बलिदान अर्धशती समारोह’, ‘सन 30-31 के शहीद’ और ‘तपोभूमि अंडमान’ प्रमुख हैं। ये आज ऐतिहासिक दस्तावेजों का महत्व रखती हैं। इन प्रयासों ने आगरा में स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास और क्रांतिकारी परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण काम किया। नेशनल बुक ट्रस्ट ने उनके जीवन संघर्ष पर ‘डोगरा शूटिंग और मेरा जीवन संघर्ष’ नाम से उनकी आत्मकथा प्रकाशित की।
बेहद सहज और सरल व्यक्तित्व
इतने रोमांचकारी और साहसपूर्ण जीवन के बावजूद ठाकुर राम सिंह का व्यक्तित्व बेहद सहज, सरल और विनम्र था। उन्हें देखकर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता था कि इस शांत और सामान्य से दिखने वाले व्यक्ति ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ इतना बड़ा साहसिक कदम उठाया था। वे अपने बारे में बहुत कम बताते थे। उनका पूरा जीवन सादगी और समर्पण का उदाहरण था। पैदल चलना, शहर के चक्कर लगाना, अपने साथियों और परिचितों की खोज-खबर रखना और देश के जाने-माने क्रांतिकारियों से संपर्क बनाए रखना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन आगरा के राजामंडी मोहल्ले में एक छोटी-सी कोठरी में सादगी से बिताया। उनसे अक्सर देश, समाज और स्वतंत्रता आंदोलन के विषयों पर जानना दिलचस्प होता था। देश के स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़े अनेक प्रसंगों और क्रांतिकारियों के बारे में उनसे सीधे सुनना अपने आप में एक अनुभव था।

निकट से देखी जीवट, सादगी और समर्पण की मिसाल
मुझे उनके साथ निकट से कार्य करने और उनसे सीखने का अवसर मिला। वे मेरे जैसे तमाम कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा मार्गदर्शक रहे। अपने जीवन और विचारों से वे हमें क्रांतिकारी आंदोलन की परंपरा को आगे बढ़ाने और समाज के गरीब, मजदूर तथा किसान वर्ग के संघर्षों से जुड़े रहने की प्रेरणा देते रहे। उनके साथ बिताए समय को याद करता हूं तो महसूस होता है कि उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सादगी और समर्पण ही थी। इतने लंबे और संघर्षपूर्ण जीवन के बावजूद उनमें किसी तरह का अहंकार नहीं था। वे लगातार काम करते रहे और अपने से अगली पीढ़ी को इतिहास, संघर्ष और विचारों से जोड़ते रहे।
ठाकुर राम सिंह का जीवन केवल स्वतंत्रता आंदोलन के एक क्रांतिकारी अध्याय का नाम नहीं है। वह इस बात की मिसाल है कि आजादी के बाद भी शहीदों के सपनों, उनके विचारों और सामाजिक न्याय की लड़ाई को जीवन का उद्देश्य बनाया जा सकता है। आगरा का शहीद स्मारक, पुस्तकालय-वाचनालय, उनके द्वारा प्रकाशित स्मारिकाएं और उनसे जुड़े लोगों की स्मृतियां आज भी उनके संघर्ष की कहानी कहती हैं। और यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।
महान क्रांतिकारी ठाकुर राम सिंह को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि।
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