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फिलीस्तीनी कवयित्री फ़दवा तूकान की कविता

श्रेया जायसवाल•27 मई 20263 मिनट पठन23 बार पढ़ा गया

यरूशलम बढ़ रहा है

दुख और दर्द के कँटीले रास्तों पर।

यरूशलम, कराह रहा है

दोराहे पर खड़ा

यरूशलम ख़ून आलूदा है

ज़ुल्म व सितम के हाथों

और

दुनिया ख़ामोश है!

दर्द को लेकर

दुनिया बेहिस हो चुकी है

सूरज की आँखों में सूराख़ हो गया है

और दुनिया!

दुनिया मेरे ख़ुदा!

उसने एक भी शमा रौशन नहीं की

उसने आँसुओं की बूँद भी नहीं गिरायी

जो धो डालता

यरूशलम के ज़ख़्मी बदन को।

फिलीस्तीनी कवयित्री फ़दवा तूकान की कविता

फ़दवा तूकान ​फ़िलिस्तीनी

कवयित्री के लिए

इज़रायल के रक्षामंत्री जनरल मोशे दयान ने कहा था कि इस कवयित्री की एक-एक पंक्ति बीस कमांडो पर भारी पड़ती है। इसके बाद फ़दवा के लिखने, छपने, पढ़ने पर रोक लगा दी गयी। जेल जाना, पूछताछ और कई तरह के अत्याचारों को सहती फ़दवा अपने देश में जमीं रहीं जब तक उन्हें मौत की सजा नहीं सुनायी गयी। वह मौत नहीं जंग चाहती थीं। इसलिए शरणार्थी बनना मंज़ूर कर लिया। 1917 में नेबुलुस में पैदा हुई फ़दवा पहले गीत, संगीत और घुमक्कड़ी की शौक़ीन थीं। पिता चाहते थे कि फ़दवा अपने भाई इब्राहीम तुकान की तरह विरोधी कविताएँ लिखें, मगर उन्हें यह मंज़ूर न हुआ। 1967 में जब फ़िलिस्तीन की करारी हार हुई तो फ़दवा ख़्वाबों से जागीं और एक कविता ‘मैं हरगिज़ नहीं रोऊँगी ‘लिखी और अपनी शायरी का अंदाज़ बदल लिया। उनके कई संग्रह ‘एक दिन, ‘उसे मैंने पा लिया,‘ ‘मुझे मुहब्बत दो,’ ‘अकेले दुनिया की छत पर,’ ‘ रात और शहसवार’ हैं। उनकी आत्म-कथा ‘पहाड़ी रास्ता बेढब रास्ता ‘।

फ़दवा का देहांत 2003 में हुआ। )

फ़दवा तूकान की कविता

अनुवाद - नासिरा शर्मा

ईसा मसीह

ख़ुदा

सारे जहाँ के मालिक!

इस साल

यरूशलम की ज़िंदगी

सलीब पर टाँगी जा रही है।

आज आपका दिन है!

सारी घंटियाँ मेरे ख़ुदा,

ख़ामोश हैं।

वह बजती रही थीं!

वह बजती रही थीं!

दो हज़ार वर्ष के लंबे समय तक

लेकिन

अब वह ख़ामोश हो चुकी हैं

सारे गुम्बद सियाह

अँधेरे ने उन्हें अपने आग़ोश में छुपा लिया है!

यरूशलम बढ़ रहा है

दुख और दर्द के कँटीले रास्तों पर।

यरूशलम, कराह रहा है

दोराहे पर खड़ा

यरूशलम ख़ून आलूदा है

ज़ुल्म व सितम के हाथों

और

दुनिया ख़ामोश है!

दर्द को लेकर

दुनिया बेहिस हो चुकी है

सूरज की आँखों में सूराख़ हो गया है

और दुनिया!

दुनिया मेरे ख़ुदा!

उसने एक भी शमा रौशन नहीं की

उसने आँसुओं की बूँद भी नहीं गिरायी

जो धो डालता

यरूशलम के ज़ख़्मी बदन को।

गुनाह का परिंदा!

ऊपर पंख तौलता हुआ उड़ा

यरूशलम की पाकीज़गी पर

और छोड़ गया धब्बा।

मेरे ख़ुदा!

यरूशलम की अज़मत!

दर्द की घंटियों से

बादलों घिरी सियाह रातों से

ग़म की गहराइयों से

कराहता यरूशलम आपके

पास आया है।

रहम,

मेरे ख़ुदा रहम!

यरूशलम पर

उसकी पाकीज़गी पर

रहम!

रहम मेरे ख़ुदा

रहम!

(नासिरा शर्मा: हिंदी की प्रसिद्ध कथाकार।ईरान की विशेषज्ञ। पिछले करीब चार दशकों से ईरान के साहित्य _संस्कृति को अपने लेखों और अनुवाद के जरिए हिंदी के पाठकों को परिचित कराती रही हैं।)

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फिलीस्तीनी कवयित्री फ़दवा तूकान की कविता

प्रकाशित: 27 मई 2026 • 3 मिनट पठन

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