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इस भयानक तूफान का मुकाबला करना होगा - अलकेश दास

श्रेया जायसवाल•27 मई 202612 मिनट पठन28 बार पढ़ा गया

चाय बेचने वाले प्रधानमंत्री के राज में आज चाय बेचने वाले ही रेलवे स्टेशनों पर प्रताड़ित हैं। झालमुड़ी प्रेमी प्रधानमंत्री के राज में झालमुड़ी वालों पर रेल पुलिस का हमला सबसे पहले हुआ है। राज्य के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री, कुछ समय पहले जब विपक्ष के नेता थे, तब उन्होंने हॉकरों को बेदखल करने के खिलाफ सबसे आगे रहने की बात कही थी। हम उस भूमिका की निरंतरता चाहते हैं। यदि वे एक अधिक जिम्मेदार पद पर रहकर यह भूमिका निभाएंगी, तो रेल हॉकरों पर यह हमला बंद हो सकता है। सरकार चाहे तो रेल हॉकरों को उजाड़ सकती है, इरादा सही होने पर इसे रोक भी सकती है। पश्चिम बंगाल में जब वाम मोर्चा सरकार थी, तब उन्होंने यह भूमिका निभाई थी, इसलिए रेल हॉकरों पर आंच तक नहीं आई थी। तृणमूल कांग्रेस सरकार ने भी कॉर्पोरेट के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। राज्य में सरकार बदलने के बाद अब इस सरकार के सामने गरीब हॉकरों के साथ खड़े होने का अवसर आया है।

इस भयानक तूफान का मुकाबला करना होगा  - अलकेश दास

इस भयानक तूफान का

मुकाबला करना होगा

- अलकेश दास

देश का विभाजन, बंगाल का विभाजन। एक अस्वाभाविक राजनीतिक परिस्थिति में लोगों को पलायन करना पड़ा। एक देश से दूसरे देश में। अपना घर-बार छोड़कर नई जमीन की तलाश में। बाढ़ के तिनके की तरह लोग झुंड के झुंड आकर खाली जमीनों, सड़कों, स्टेशनों और पेड़ों के नीचे जमा होने लगे। स्टेशन यानी रेलवे स्टेशन—जो काफी ऊँचे स्थान पर होते हैं, जहाँ बरसात का पानी जमा नहीं होता। वहीं से शुरुआत हुई घर में बनी अगरबत्ती, कागज के लिफाफे (ठोंगे), अचार, भुने हुए पापड़ आदि बेचने की। और इन्हीं चीजों को लेकर पेट पालने की खातिर ट्रेनों में फेरी लगाने का सिलसिला शुरू हुआ। ट्रेन यात्रा में 'झालमुड़ी' की शुरुआत भी उसी समय से हुई। लक्ष्मी की पांचाली (धार्मिक पुस्तक), पंचांग, गोपाल भांड़ की रसदार कहानियों की किताबें, वर्णपरिचय (वर्णमाला की किताब), दाद का मरहम या विषहरी (सांप के जहर की दवा)—ये सब इन रेल हॉकर्स (फेरीवालों) के हाथों ही लोकप्रिय हुए। सामान बेचने की कला (वाकपटुता) और नियमित यात्रियों के साथ बने भरोसे ने इनके बीच एक गहरा रिश्ता कायम कर दिया। देश के विभाजन के इतिहास के साथ पैदा हुई यह रेल हॉकरी (फेरी लगाना) बंगालियों के लिए एक पुरानी याद (नॉस्टेल्जिया) है। इस समाज, संस्कृति, इतिहास और भूगोल के अध्ययन के बिना रेल हॉकर के अस्तित्व को नहीं समझा जा सकता।

उस समय रेल में यात्री कम थे। यात्रियों की जेब में पैसे और ताकत भी कम थी। तब रेल हॉकरों को यह खोजना पड़ता था कि यात्रियों की पसंद और जरूरत क्या है, और वे उन्हीं चीजों की आपूर्ति करते थे। इस तरह उनकी बिक्री बढ़ी। वाम मोर्चा सरकार के समय लोगों की क्रय शक्ति बढ़ी। इसके साथ ही रेल हॉकरों की दुकानें और सामान भी बढ़े। फिर इस पर कॉर्पोरेट पूँजी यानी महाधनी लोगों की नजर पड़ गई। कौन नहीं जानता कि यही महाधनी लोग सरकारी नीतियों को नियंत्रित करते हैं।

रेलवे को अडानी और अंबानी जैसे उद्योगपतियों के मुनाफे का शिकारगाह बनाने के लिए ही मोदी ने 2014 में सत्ता में आते ही 'विवेक देवरॉय समिति' का गठन किया था। इस समिति से यह सिफारिश कराई गई कि रेल सेवाओं का निजीकरण किया जाए और रेलवे स्टेशनों को अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) पर निजी हाथों में सौंप दिया जाए। एक-एक करके इन सभी शर्तों को पूरा किया जा रहा है और रेल हॉकरों की बलि दी जा रही है।

बाजार में ऐसा माहौल बना दिया गया है मानो सब कुछ रेलवे बोर्ड ही कर रहा है। लेकिन इस रेलवे बोर्ड का गठन रेल मंत्री और रेल मंत्रालय करते हैं। इसके मुखिया रेल मंत्री होते हैं। इसलिए रेलवे बोर्ड की नीति असल में केंद्र सरकार की ही नीति है। केंद्र सरकार भाजपा के नेतृत्व में चल रही है। वही भाजपा अब राज्य सरकार चलाने के नेतृत्व में आई है। 4 मई को जब मतगणना के दिन परिणाम भाजपा के पक्ष में साफ होने लगे, तभी से रेलवे स्टेशनों पर हॉकरों को हटाने के नोटिस चिपकाने की होड़ मच गई। पिछले तीन हफ्तों से युद्ध चल रहा है—रेलवे प्रशासन और रेल हॉकरों के बीच।

रोजी-रोटी और पेशे को बचाने की लड़ाई

रेलवे प्रशासन 'हॉकर-मुक्त' रेलवे स्टेशन चाहता है। उनके तर्क कुछ इस प्रकार हैं:

1) सुरक्षा: रेलवे प्रशासन का कहना है कि यात्रियों की सुरक्षा के लिए रेल हॉकरों को हटाना जरूरी है। जबकि हकीकत यह है कि सुबह-सुबह या देर रात खाली स्टेशनों या ट्रेन के डिब्बों में यात्री रेल पुलिस से ज्यादा रेल हॉकरों को सुरक्षित मानते हैं। रेलवे प्रशासन का कहना है कि रेल हॉकर यात्रियों को नशीला पदार्थ खिलाकर उनका सब कुछ लूट लेते हैं। जबकि घटना इसके बिल्कुल उलट है। आरपीएफ या जीआरपी थाने के बाहर जिन अपराधियों की तस्वीरें लगी होती हैं, उनमें से एक भी रेल हॉकर नहीं होता। बल्कि ऐसे कई अपराधियों को खुद रेल हॉकरों ने पकड़कर पुलिस के हवाले किया है—इसके ढेरों उदाहरण हैं।

2) आग: प्लेटफॉर्म पर कहीं भी आग लगे, उसका ठीकरा रेल हॉकरों के सिर फोड़ दिया जाता है। अब स्टेशनों पर चूल्हा जलाने की मनाही कर दी गई है। धधकती हुई आग लेकर ट्रेन की 'पैंट्री कार' दौड़ सकती है, तो स्टेशन पर चूल्हा रखने में क्या दोष है? रेलवे स्टेशन के चूल्हे से आज तक कोई दुर्घटना नहीं हुई है। बल्कि यात्रियों को ताजा और गर्म खाना मिला है।

3) भोजन की गुणवत्ता: इसके सबसे बड़े प्रमाण पत्र देने वाले खुद यात्री हैं। यात्री रेल हॉकर का खाना पसंद करते हैं, इसीलिए वे बार-बार उनके पास आते हैं। ट्रेन के भीतर या प्लेटफॉर्म पर सस्ता और अच्छा खाना रेल हॉकर ही उपलब्ध कराते हैं। चार पूड़ी, साथ में सब्जी, प्याज, खीरा, कासुंदी (ससों की चटनी) और टोमैटो सॉस—सिर्फ बीस रुपये में। आज भी रेलवे स्टेशनों पर 5 रुपये वाली छोटी चाय टिकी हुई है। स्टेशन पर जो रेलवे से मान्यता प्राप्त दुकानें हैं, उनके सामानों की गुणवत्ता जांचने की क्या व्यवस्था है? स्टेशन के बाहर जो दुकानें पूड़ी, कचौड़ी, समोसे आदि बेचती हैं, क्या सरकार वहाँ भोजन की गुणवत्ता जांचने की व्यवस्था रखती है? रेलवे की यह 'जितने दोष, सब नंद घोष के' (यानी बलि का बकरा बनाने की) नीति असल में रेल हॉकरों का गला घोंटकर नामी ब्रांडेड खाद्य कंपनियों को जगह देने के लिए है।

4) कचरा (कूड़ा-कचरा): रेलवे प्रशासन का कहना है कि रेल हॉकरों के कारण स्टेशनों पर कचरा जमा हो रहा है। रेलवे प्रशासन ने स्टेशनों पर जिन चमचमाती दुकानों को मंजूरी दी है, क्या उनके खाने के पैकेट और रैपर कचरे के रूप में जमा नहीं हो रहे हैं? रेलवे सेवा यात्रियों के लिए है, बाहरी लोगों के लिए नहीं। तो क्या रेलवे यात्रियों के लिए भोजन, पानी आदि की व्यवस्था बंद कर देना चाहता है? यह तो चतुर भेड़िये और मेमने की प्यास बुझाने वाली कहानी की तरह सिर्फ अपना स्वार्थ सिद्ध करने का बहाना है।

5) सौंदर्यीकरण: क्या रेल हॉकर्स के स्टॉल सुंदरता के खिलाफ हैं? रेल हॉकर तो खुद सुंदर और व्यवस्थित रहना चाहते हैं। वे एक ही तरह के छोटे-छोटे स्टॉल बनाना चाहते हैं। लेकिन इसमें बाधा तो खुद रेलवे प्रशासन है। वे रेल हॉकरों की दुकानों में किसी भी तरह के बदलाव के खिलाफ हैं और तुरंत धमकी देते हैं। उनकी तरफ से कोई वैकल्पिक प्रस्ताव भी नहीं दिया जाता।

6) अवैध: 1989 से पहले रेलवे स्टॉल या रेल हॉकरी के लिए कानून था। लेकिन जब से कॉर्पोरेट की 'शार्क जैसी नजर' रेलवे के हॉकर स्टॉलों पर पड़ी, तब से 'इंडियन रेलवे एक्ट 1989' लागू कर दिया गया। इसकी धारा 144, 145 और 147 में कहा गया कि रेल हॉकरी अवैध है। कानूनी या गैर-कानूनी की परिभाषा से नहीं, बल्कि इसे मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। जीवन रक्षा के लिए पेशे का अधिकार एक आम नागरिक का शाश्वत अधिकार है।

एक समय शरणार्थियों के अधिकारों पर भी सवाल उठाए गए थे। उन्हें बेघर और बिना नागरिकता के रखने का प्रयास लंबे समय तक चला। उन पर दूसरों की जमीन पर अवैध कब्जा करने का आरोप था। इसके बाद, वाम मोर्चा सरकार के समय से 'जो जहाँ है' (इन-सी टू) वहीं उसे जमीन का मालिकाना हक देने की प्रक्रिया शुरू की गई। जो चीज कभी अवैध थी, मानवीय कारणों से लगभग तीन दशकों के बाद वह कानूनी बन गई। कानून इंसान के लिए है, इंसान कानून के लिए नहीं। जो लोग लंबे समय से रेल यात्रियों की सेवा, सुरक्षा और जरूरतों को पूरा कर रहे हैं, उनके पेशे पर हमला क्यों होना चाहिए?

पहली यूपीए सरकार के समय पश्चिम बंगाल रेलवे हॉकर्स यूनियन के तत्कालीन नेता नेपालदेब भट्टाचार्य की पहल पर, सांसद बासुदेव आचार्य की मदद से 45 लोकसभा सांसदों को लेकर रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के साथ उनके कक्ष में एक बैठक की गई थी। उन्होंने रेल हॉकरों के लाइसेंस की मांग को स्वीकार भी कर लिया था। लेकिन इसे लागू करने से पहले ही रेल मंत्री बदल गए। इसके बाद इस राज्य (पश्चिम बंगाल) से लगातार तीन रेल मंत्री बने, लेकिन रेल हॉकरों के भाग्य में लाइसेंस नहीं जुड़ सका।

7) विकास: कहा जा रहा है कि रेल हॉकर विकास के बाधक हैं। यह बिल्कुल गलत बात है। रेल हॉकर रेलवे के उस विकास के पूरी तरह पक्ष में हैं जो यात्री साधारण की सेवा, सुरक्षा से जुड़ा है। इसके व्यावहारिक रूप से कई उदाहरण हैं। रेलवे प्रशासन के साथ चर्चा करके और उनकी सलाह पर ही रेल हॉकरों ने अपने स्टॉल छोटे किए हैं। रेलवे के किसी भी विकास कार्य की जगह पर यदि रेल हॉकरों के स्टॉल थे, तो उन्हें उपयुक्त वैकल्पिक स्थानों पर स्थानांतरित (शिफ्ट) कर दिया गया। इसके चलते रेल ब्रिज, ठंडे पानी की मशीनें, पानी के नल, यात्रियों के बैठने की जगह आदि तमाम विकास कार्यों के लिए रेल हॉकरों ने आत्मत्याग किया है। वे आज भी विकास में रंअपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं, लेकिन बिना उचित पुनर्वास के कभी नहीं।

8) अमृत भारत स्टेशन: राज्य में इस तरह के 109 स्टेशन बनेंगे, जो हवाई अड्डे की तर्ज पर होंगे। इन चमचमाते स्टेशनों के विकास के पीछे भी स्थानीय रेलवे प्रशासन के साथ चर्चा करके रेल हॉकर्स ने अपना योगदान दिया है। लेकिन रेलवे प्रशासन पूरी तरह से 'हॉकर-मुक्त' स्टेशन चाहता है। विकास हो, लेकिन कभी भी गरीब रेल हॉकरों की रोजी-रोटी की कीमत पर नहीं। रेलवे प्रशासन को उचित विकल्प की तलाश में आगे बढ़ना ही होगा।

9) यात्री सुविधा (सुख-सुविधा): रेलवे प्रशासन का तर्क है कि रेल हॉकरों के कारण यात्री प्लेटफॉर्म पर चल नहीं पाते। यह सभी स्टेशनों पर लागू नहीं होता। हालांकि, कुछ स्टेशन ऐसे जरूर हैं जहाँ समस्या है, लेकिन चर्चा के माध्यम से इसे सुलझाया जा सकता है। पर क्या रेलवे प्रशासन वाकई इसमें रुचि रखता है? अगर ऐसा होता, तो रात के अँधेरे में सियालदह, सियालदह साउथ और मेमरी में कायरों की तरह रेल पुलिस ने क्यों धावा बोला? शेवड़ाफुली, श्रीरामपुर, बैंडेल आदि स्टेशनों पर क्रूरतापूर्वक हमला करके रेल हॉकरों को हटा दिया गया है। असल में, मुँह से यात्री सुविधा की बात कहकर ये लोग इलाका खाली कराना चाहते हैं, ताकि वहाँ भारी मुनाफे के लिए व्यावसायिक स्टॉल लगाकर पूँजीपति शार्क को संतुष्ट किया जा सके।

समाधान का रास्ता

रेल हॉकरों का एक बहुत बड़ा हिस्सा बेहद गरीब (गरीब से भी गरीब) है। इनकी रोजी-रोटी की रक्षा करनी होगी। रेल हॉकर बेदखल अभियान को बंद घोषित करके बातचीत के माध्यम से समस्या के समाधान की ओर बढ़ना होगा। वास्तविकता के आधार पर रेलवे प्रशासन को लचीला रुख अपनाना होगा। यदि दुकानों में सुधार करना है, उन्हें एक जैसा बनाना है, एक जैसी पोशाक पहननी है, सौंदर्यीकरण, साफ-सफाई और स्वास्थ्य की रक्षा में भूमिका निभानी है, तो रेल हॉकर अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। उनके लिए कम ब्याज या बिना ब्याज के बैंक लोन की व्यवस्था की जा सकती है। इस मामले में राज्य सरकार भी अपनी भूमिका निभा सकती है।

चाय बेचने वाले प्रधानमंत्री के राज में आज चाय बेचने वाले ही रेलवे स्टेशनों पर प्रताड़ित हैं। झालमुड़ी प्रेमी प्रधानमंत्री के राज में झालमुड़ी वालों पर रेल पुलिस का हमला सबसे पहले हुआ है। राज्य के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री, कुछ समय पहले जब विपक्ष के नेता थे, तब उन्होंने हॉकरों को बेदखल करने के खिलाफ सबसे आगे रहने की बात कही थी। हम उस भूमिका की निरंतरता चाहते हैं। यदि वे एक अधिक जिम्मेदार पद पर रहकर यह भूमिका निभाएंगी, तो रेल हॉकरों पर यह हमला बंद हो सकता है। सरकार चाहे तो रेल हॉकरों को उजाड़ सकती है, इरादा सही होने पर इसे रोक भी सकती है। पश्चिम बंगाल में जब वाम मोर्चा सरकार थी, तब उन्होंने यह भूमिका निभाई थी, इसलिए रेल हॉकरों पर आंच तक नहीं आई थी। तृणमूल कांग्रेस सरकार ने भी कॉर्पोरेट के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। राज्य में सरकार बदलने के बाद अब इस सरकार के सामने गरीब हॉकरों के साथ खड़े होने का अवसर आया है।

रेल हॉकर अपना काम कर रहे हैं। उनके पेट पर लात पड़ी है। इस लड़ाई में उनका एक साथी अपनी जान भी गंवा चुका है। अब वे यह याद नहीं रखना चाहते कि अतीत में किसने कौन सा झंडा (राजनीतिक दल) थामा था, बल्कि उनका पूरा ध्यान अपनी रोजी-रोटी और पेट पालने के साधन को बचाने पर है। उसे बचाना ही होगा। ट्रेनों में घूम-घूम कर सामान बेचने वाला 'रनिंग हॉकर' जानता है कि अगर आज प्लेटफॉर्म के हॉकर को हटाने में वे कामयाब हो गए, तो कल उसकी बारी आएगी। इसलिए सब एक हो रहे हैं। बिधाननगर, दमदम, कल्याणी, जगतदल, मध्यमग्राम, मथुरापुर, आकरा, सोनारपुर, बारुईपुर... एक के बाद एक प्रतिरोध की दीवारें खड़ी हो रही हैं। आरपीएफ जब खदेड़ती है, तो रेल हॉकर भी पलटकर जवाब दे रहे हैं। इस दौर में यह दृश्य नया है। दूर-दराज के रेल हॉकर्स को जैसे ही खबर मिलती है कि किसी स्टेशन पर उच्छेद का नोटिस आया है, वे वहाँ पहुंच जाते हैं। उन्हें पहुंचना ही होगा। पड़ोस के घर में आग लगी है, अगर आज नहीं बुझाई तो कल मेरा घर भी इसकी जद में आ जाएगा—यही भावना इस आंदोलन की असली ताकत (रसद) है।

रेल हॉकर आज अकेले नहीं हैं। अन्य मजदूर भी उनके साथ जुड़ रहे हैं। रेल यात्रियों की तरफ से भी एकजुटता का हाथ बढ़ाया जा रहा है। कानूनी लड़ाई भी इसमें जुड़ रही है। हावड़ा में रेलवे प्रशासन को मुंह की खानी पड़ी है (उनके हाथ जले हैं)। यह लड़ाई लड़नी ही होगी। यह असमान लड़ाई जीतनी ही होगी। यह तूफ़ान भारी है, इसे पार लगाना ही होगा, कश्ती को किनारे तक ले जाना ही होगा।

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साभार : गणशक्ति

दिनांक 27/5/26

(लेखक पूर्व सांसद और पश्चिम बंगाल हाकर्स यूनियन के नेता हैं)

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