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बुलडोजर के सामने एक और रात पर कब्जा - कलतान दासगुप्ता

श्रेया जायसवाल•02 जून 20268 मिनट पठन12 बार पढ़ा गया

भाजपा असल में कॉर्पोरेट पूंजी के हितों के साथ ही चलती है। यह पार्टी कॉर्पोरेट घरानों और व्यापारियों के भारी-भरकम पैसे से चल रही है। भाजपा ने जिनका नमक खाया है, उनका गुणगान करने के लिए ही वह स्टेशन परिसर, प्लेटफॉर्म और रेलवे के अधीन आने वाली खाली जमीनें उद्योगपतियों के हाथों में सौंपना चाहती है। हमारी मांग है कि विधानसभा में तुरंत इन गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के लोगों के पेट पर लात मारने वाली व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई जाए। विधानसभा में इस लापरवाह हॉकर बेदखली के खिलाफ और उनके वास्तविक पुनर्वास के मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए। रेल हॉकर समस्या को लेकर रेलवे अधिकारियों, रेल हॉकर संगठनों के प्रतिनिधियों और राज्य सरकार के प्रतिनिधियों के बीच एक त्रिपक्षीय बैठक बुलाई जानी चाहिए।

बुलडोजर के सामने एक और रात पर कब्जा  - कलतान दासगुप्ता

बुलडोजर के सामने एक और रात पर कब्जा

कलतान दासगुप्ता

पश्चिम बंगाल: रात का रेलवे स्टेशन। पूरे दिन जीवन और आजीविका के लिए संघर्ष करने वाले थके हुए लोगों को ट्रेनें एक-एक करके उतार रही हैं। ट्रेन से उतरते ही स्टेशन से थोड़ी-बहुत खरीदारी पूरी कर हर कोई अपने घर की ओर भागने लगता है। लेकिन उस दिन, रास्ते से गुजरने वाले थके हुए लोगों को भी स्टेशन पर उतरकर कुछ पल के लिए ठिठकना पड़ा था। वे हैरान होकर देख रहे थे कि शांत होने के बजाय रेलवे स्टेशन पर मानो नए सिरे से रात जाग रही है। हॉकरों की आँखों में नींद नहीं है। वे रात पर कब्जा करने (रात जागकर विरोध करने) की तैयारी कर रहे हैं। वे अपनी आजीविका के आखिरी सहारे, यानी अपनी दुकान की रखवाली कर रहे हैं। मानो सुबह की रोशनी फूटने से पहले आजीविका की यह छोटी सी जगह उजड़ न जाए। इलाके के कॉमरेड और सह-योद्धा भी उनके साथ हैं। रेलवे लाइन के किनारे सबने मिलकर रात के भोजन—भात, दाल और आलू चोखा का इंतजाम किया है! बंगाल के लोगों के वजूद के दस्तावेज के रूप में एक और रात पर कब्जा।

एक दुकान को तोड़ना सिर्फ टिन, तिरपाल या लकड़ी तोड़ना नहीं है, बल्कि यह एक बच्चे के स्कूल जाने के सपने, बूढ़े माता-पिता की दवा खरीदने की क्षमता, रसोई में गर्म चावल की खुशबू की चाहत और एक श्रमजीवी परिवार के हर दिन संघर्ष करके जीने के आखिरी आश्रय को तोड़ना है।

2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही बैंक, बीमा, कोयला खदान और टेलीकॉम उद्योगों के साथ-साथ रेलवे का इस्तेमाल भी अडानी, अंबानी, टाटा और बिड़ला के मुनाफे के लिए शुरू कर दिया गया है। विवेक देबरॉय समिति की सिफारिशों पर रेलवे के निजीकरण का काम शुरू हुआ। पश्चिम बंगाल में सत्ता संभालने के कुछ ही दिनों के भीतर, रेलवे के निजीकरण के काम को और तेज करने के लिए मोदी सरकार के रेल मंत्रालय ने स्टेशनों पर गरीब हॉकरों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है। हॉकरों की बेदखली में राज्य की भाजपा सरकार रेल मंत्रालय का सक्रिय सहयोग कर रही है, क्योंकि राज्य पुलिस के सहयोग के बिना रेलवे कभी भी हॉकरों को नहीं हटा सकता। राज्य की भाजपा सरकार ने आरएसएस के निर्देशानुसार अपने काम की प्राथमिकताएं चुनी हैं। हॉकरों की दुकानें तोड़ी जा रही हैं, लेकिन आज तक एक भी बंद स्कूल का ताला नहीं टूटा।

रेलवे अधिकारी इस हॉकर बेदखली के पक्ष में कुछ कमजोर तर्क दे रहे हैं। जैसे—यात्री सुविधाएं, हॉकरों की कानूनी स्थिति का मामला, सौंदर्यीकरण और कचरा, यात्री सुरक्षा तथा भोजन की गुणवत्ता। विभिन्न जगहों पर जब वामपंथी रेल हॉकर नेता बातचीत करने गए, तो रेल अधिकारियों का कहना था कि हॉकरों के कारण ही यात्री प्लेटफॉर्म पर चल-फिर नहीं पाते हैं। जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ जगह की कमी होने के कारण हॉकरों ने अपनी दुकानें रेलवे फेंसिंग (बाड़) के बाहर पहले ही हटा ली थीं। रेलवे अधिकारियों ने यह भी कहा कि रेलवे एक्ट 1989 के तहत रेलवे में हॉकिंग (फेरी लगाना) अवैध है। संविधान ने एक आम इंसान को जीवन और आजीविका की रक्षा के लिए अपनी पसंद का पेशा चुनने का अधिकार दिया है। जो व्यक्ति चोरी या भ्रष्टाचार न करके, अपने माथे का पसीना बहाकर ईमानदारी से कमा रहा है, उस पर यह हमला अमानवीय है। जो कानून इंसान के नागरिक अधिकार छीनता है, उसके खिलाफ लड़ने का अधिकार आम जनता को निश्चित रूप से है।

पहली यूपीए सरकार के समय, रेल हॉकर नेताओं ने तत्कालीन रेल मंत्री के साथ बैठक करके हॉकरों के लिए लाइसेंस की मांग पूरी करवाई थी। इसके बाद रेल मंत्री और सरकार दोनों बदल गए। हर सरकार ने बड़े-बड़े वादे तो किए, लेकिन रेल हॉकरों के बारे में रत्ती भर भी नहीं सोचा। भाजपा अपने आईटी सेल का इस्तेमाल इन कमजोर तर्कों को लोगों के बीच फैलाने के लिए कर रही है। इन दिनों रेल हॉकरों के भोजन की गुणवत्ता पर भी तरह-तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। लेकिन रेलवे स्टेशनों पर बेहद कम कीमत में झालमुड़ी या पूड़ी-सब्जी मिलने की जो व्यवस्था है, अगर वह बंद हो गई तो असल में गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के लोग संकट में पड़ जाएंगे। आज भी स्टेशनों पर लोग 20-30 रुपये में भरपेट खाना खा सकते हैं। अगर रेल हॉकर हट गए और उनकी जगह बड़े-बड़े मॉल या दुकानें बन गईं, तो पेट भरने के लिए बहुत अधिक पैसों की जरूरत होगी। पिछले पांच वर्षों में जिस आम इंसान की मजदूरी ठीक से नहीं बढ़ी, वह इस अतिरिक्त पैसे का इंतजाम कहाँ से करेगा? रेल हॉकर उच्छेद का मतलब यह नहीं है कि प्लेटफॉर्म पर एक भी दुकान नहीं रहेगी। रेल मंत्रालय पहले ही कई बड़ी निजी कंपनियों को प्लेटफॉर्म पर दुकानें खोलने की अनुमति दे चुका है। ऐसे में यात्री सुविधा और भोजन की गुणवत्ता की जांच करने का तर्क कहीं भी नहीं टिकता।

'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' का सबसे चौंकाने वाला प्रचार यह था कि प्रधानमंत्री बचपन में स्टेशन पर चाय बेचते थे। चाय बेचते-बेचते अचानक प्रधानमंत्री बनकर रेलवे को बेच देने की इस प्रवृत्ति को किसी भी कीमत पर रोकना होगा। इस प्रवृत्ति के कारण सबसे ज्यादा संकट में गरीब तबके के लोग हैं, जो रेल हॉकर हैं। नई सरकार के नेता और मंत्री चकाचौंध (रोशनी) में रहेंगे और गरीब रेल हॉकर अंधेरे में डूब जाएंगे, ऐसा होने नहीं दिया जा सकता। भारी जनसमर्थन पाकर जो लोग पश्चिम बंगाल में जनता के प्रतिनिधि बने हैं, वे इस लंबी रात के अंधेरे में कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। काम के वक्त काजी, काम खत्म तो...?

रेलवे लाइन के किनारे, चिंतित आँखों के पास, कंधे से कंधा मिलाकर वामपंथी रात जाग रहे हैं। बिराटी, मध्यमग्राम, हालिशहर, जगतदल, दमदम, सोदपुर, बिधाननगर, सोनारपुर, बारुईपुर समेत कई जगहों पर आंदोलन के दबाव में रेलवे अधिकारियों को बेदखली अभियान रोकना पड़ा था। लेकिन हमने देखा कि 'समय दिया जाएगा' का झूठा आश्वासन देकर रात के अंधेरे में दमदम और उत्तरपाड़ा में रेल हॉकरों के खिलाफ वस्तुतः युद्ध की घोषणा कर दी गई। बुलडोजर चला दिए गए। दमदम स्टेशन के हॉकरों से कहा गया था, "अभी कुछ नहीं होगा।" गरीब लोगों ने उस आश्वासन पर भरोसा किया था। लेकिन जैसे ही रात के 11:30 बजे, रेल पुलिस, राज्य पुलिस और केंद्रीय बल उतर आए। बेदखल अभियान शुरू हुआ। सालों से खड़ी की गई आजीविका का आखिरी संबल मलबे में तब्दील कर दिया गया। सीपीआई(एम) और सीटू (CITU) नेताओं ने समय देने के लिए बार-बार अनुरोध किया था। जिस स्टेशन अधिकारी से कुछ देर पहले बात हुई थी, वही हेलमेट पहनकर गरीब लोगों के पेट पर लात मारने का नेतृत्व कर रहा था। सत्ता के बुलडोजर के सामने आँसुओं की कोई कीमत नहीं थी। हमारी मांग है कि जमीनी हकीकत को देखते हुए चर्चा के जरिए इसका समाधान निकाला जाए। मुख्यमंत्री जब विपक्ष के नेता थे, तब हॉकरों को बेदखल या बुलडोजर चलाने को लेकर उन्होंने जो टिप्पणियां की थीं, आज वे उससे 180 डिग्री घूम चुके हैं। अगर राज्य सरकार की इच्छाशक्ति हो, तो हॉकर बेदखली कभी संभव नहीं हो सकता। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार के दौरान रेल हॉकरों पर कोई आंच नहीं आई थी क्योंकि सरकार ने सकारात्मक भूमिका निभाई थी।

भाजपा असल में कॉर्पोरेट पूंजी के हितों के साथ ही चलती है। यह पार्टी कॉर्पोरेट घरानों और व्यापारियों के भारी-भरकम पैसे से चल रही है। भाजपा ने जिनका नमक खाया है, उनका गुणगान करने के लिए ही वह स्टेशन परिसर, प्लेटफॉर्म और रेलवे के अधीन आने वाली खाली जमीनें उद्योगपतियों के हाथों में सौंपना चाहती है। हमारी मांग है कि विधानसभा में तुरंत इन गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के लोगों के पेट पर लात मारने वाली व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई जाए। विधानसभा में इस लापरवाह हॉकर बेदखली के खिलाफ और उनके वास्तविक पुनर्वास के मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए। रेल हॉकर समस्या को लेकर रेलवे अधिकारियों, रेल हॉकर संगठनों के प्रतिनिधियों और राज्य सरकार के प्रतिनिधियों के बीच एक त्रिपक्षीय बैठक बुलाई जानी चाहिए।

पश्चिम बंगाल में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के भयानक कुशासन के खिलाफ जो भाजपा नेता जीतकर आए, उन्होंने इन रेल हॉकरों से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है। इतिहास इस क्रूरता से मुंह मोड़ने को याद रखेगा, क्योंकि संकट के समय ही सच्चे दोस्त की पहचान होती है। इस बीच, भयानक मानसिक प्रताड़ना के कारण दो रेल हॉकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो गए। इस मौत के लिए परोक्ष रूप से केंद्र सरकार जिम्मेदार है, इसे हॉकर भूले नहीं हैं। यह दर्द याद है इसीलिए आक्रामक रेल पुलिस के सामने अपनी जान बचाने की लड़ाई में रेल हॉकर आँखों में आँखें डालकर लड़ रहे हैं। आज एक स्टेशन पर हॉकर बेदखली को रोककर, वे अगली सुबह दूसरे स्टेशन पर हॉकर दोस्तों की मदद करने पहुंच रहे हैं। दिन भर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद वे अपना पेट बचाने के लिए पूरी रात जाग रहे हैं। यह एकजुटता दरअसल एक तीव्र आंदोलन का परिणाम है। हाशिए पर खड़े लोगों के साथ खड़ा होना ही तो सरकार की जिम्मेदारी है। जो हाशिए का इंसान अपने दोनों हाथ उठाकर किसी सरकार को आशीर्वाद दे सकता है, वही इंसान अपने दोनों हाथों से खींचकर उस सरकार को मिट्टी में भी मिला सकता है।

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साभार : गणशक्ति डिजिटल | 2 जून,2026

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बुलडोजर के सामने एक और रात पर कब्जा - कलतान दासगुप्ता

प्रकाशित: 02 जून 2026 • 8 मिनट पठन

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