भाजपा के खिलाफ भी तेजी से गुस्सा बढ़ रहा है, लड़ाई में उतरें

जिस तरह तृणमूल-कांग्रेस के खिलाफ लोगों के गुस्से का पहाड़ खड़ा हो गया था, ठीक उसी तरह भाजपा के खिलाफ भी लोगों का असंतोष तेजी से बढ़ रहा है। शनिवार को जलपाईगुड़ी में सीपीआई (एम) की एक कार्यकर्ता बैठक में पार्टी के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि तृणमूल-कांग्रेस की विदाई तो हो गई, लेकिन राज्य के लोगों की समस्याएँ खत्म नहीं हुईं। 'आपदा' गई तो 'विपत्ति' आ गई है। नई भाजपा सरकार मेहनतकश लोगों के हितों के खिलाफ काम कर रही है, उनके खिलाफ भी जनता का गुस्सा तेजी से बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में मजदूर, किसान, खेत मजदूर, चाय बागान श्रमिक, हॉकर और छोटे व्यापारियों सहित सभी मेहनतकश लोगों को एकजुट कर संघर्ष की तैयारी करनी होगी।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन का इस्तेमाल कर तृणमूल-कांग्रेस ने भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और आतंक की राजनीति चलाई है। इसी वजह से चुनाव में लोगों ने तृणमूल-कांग्रेस को नकार दिया। लेकिन तृणमूल-कांग्रेस की विदाई का मतलब समस्याओं का समाधान नहीं है। तृणमूल-कांग्रेस वास्तव में कोई राजनीतिक दल नहीं था; कुछ भ्रष्ट लोगों ने ममता बनर्जी का 'फैन क्लब' बनाकर खुद की लूट-खसोट की प्रक्रिया को सुरक्षित करने के लिए एक कंपनी बनाई थी। चुनाव में हारने के बाद अब वे सड़कों पर नजर नहीं आ रहे हैं। लोगों ने उन्हें कीड़े-मकोड़ों की तरह झाड़कर फेंक दिया है। अब मेहनतकश लोगों के हितों की रक्षा के लिए वामपंथियों को ही लड़ना होगा। विभाजन की राजनीति के खिलाफ एकजुट जन-प्रतिरोध खड़ा करना होगा।
शनिवार को जलपाईगुड़ी शहर के रवींद्र भवन में सीपीआई (एम)की जलपाईगुड़ी जिला समिति द्वारा बुलाई गई इस कार्यकर्ता बैठक की अध्यक्षता पार्टी की राज्य समिति के सदस्य सलिल आचार्य ने की। इस अवसर पर राज्य सचिव मंडल के सदस्य जियाउल आलम, जिला सचिव पीयूष मिश्रा सहित अन्य नेता और जिले के विभिन्न हिस्सों से आए कार्यकर्ता उपस्थित थे।
बैठक में जियाउल आलम ने कहा "जनता तृणमूल-कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार और तानाशाही का अंत चाहती थी। लेकिन नई सरकार भी हॉकरों को हटाने, रेलवे कॉलोनियों और झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में बुलडोजर चलाकर बेदखली अभियान चला रही है, जिससे गरीब लोगों की आजीविका अनिश्चितता के मुहाने पर पहुँच गई है। जो सरकार मजदूरों और किसानों के वोटों से चुनी गई है, वही सरकार अब कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता देकर गरीबों को उजाड़ रही है। बड़े पूँजीपतियों को फायदा पहुँचाने की नीति का क्रूर असर हॉकरों को हटाए जाने में साफ दिख रहा है।"
तृणमूल-कांग्रेस और भाजपा के राजनीतिक रुख के बारे में मोहम्मद सलीम ने कहा कि लंबे समय से दोनों दल एक-दूसरे पर हमला करने का नाटक करके इस राज्य में विभाजन की राजनीति को मजबूत करते आ रहे हैं। धार्मिक ध्रुवीकरण, जातीय विभाजन और डर का माहौल बनाकर उन्होंने चुनावी फायदा उठाया है। लेकिन वास्तव में इस राजनीति के कारण आम जनता को ही नुकसान हुआ है। चुनाव से पहले तरह-तरह के वादे किए गए, लेकिन सत्ता में आते ही गरीबों, कामगारों और हाशिए के लोगों पर प्रशासनिक हमले शुरू हो गए हैं। सांप्रदायिक नफरत फैलाकर लोगों की असली समस्याओं को छिपाने की कोशिश की जा रही है।
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हिंदू, मुस्लिम, आदिवासी, राजबंशी, नेपाली, मतुआ समेत सभी गरीब लोगों की समस्याएँ एक जैसी हैं। बेरोजगारी, महँगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का संकट तथा आजीविका की अनिश्चितता आज सभी की समस्या बन चुकी है। इसलिए मतभेद की राजनीति नहीं, बल्कि वर्ग-आधारित एकजुट आंदोलन ही इस हमले का सही जवाब हो सकता है।
शारदा, नारदा और शिक्षक भर्ती घोटाले सहित विभिन्न वित्तीय घोटालों का जिक्र करते हुए सलीम ने कहा कि लूटा गया पैसा बरामद कर पीड़ित लोगों को वापस लौटाने की माँग को तेज करना होगा। उन्होंने भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की। कॉर्पोरेट संस्कृति के आक्रमण के कारण बंगाल की अपनी लोक संस्कृति, भवाईया, सारीगान, आदिवासी संस्कृति और विभिन्न क्षेत्रीय परंपराएं लगातार सिमटती जा रही हैं। लोगों की अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपरा की रक्षा का संघर्ष भी जन आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सभा में नेताओं ने कहा कि पशुपालन से जुड़े बड़ी संख्या में लोग वर्तमान में अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं। मवेशियों की खरीद-बिक्री, परिवहन और विभिन्न प्रशासनिक प्रतिबंधों के कारण कई छोटे व्यापारियों और पशुपालकों की आजीविका प्रभावित हो रही है।जिले की वर्तमान राजनीतिक और सांगठनिक स्थिति पर जिला सचिव पीयूष मिश्रा ने कहा कि चाय बागान क्षेत्र, डुआर्स के इलाके, कृषि क्षेत्र, शहरों और ग्रामीण इलाकों के बड़ी संख्या में लोग अपनी समस्याओं को लेकर वामपंथी नेतृत्व से संपर्क कर रहे हैं।चाय श्रमिकों की मजदूरी, किसानों की बढ़ती लागत, युवाओं का रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं का संकट, शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और नदियों से बालू-पत्थर उठाने वाले श्रमिकों की समस्याएं—हर क्षेत्र में लोगों का असंतोष बढ़ रहा है। इन लोगों को संघर्ष से जोड़ना ही इस समय मुख्य काम है।
.
.
साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...