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कालजयी प्रेमचंद - श्रेया जायसवाल

अपराजिता•31 जुलाई 20263 मिनट पठन21 बार पढ़ा गया

प्रेमचंद ने हिन्दुस्तान की सही तस्वीर अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से ही उजागर किया है । वे कालजयी लेखक थे । उन्होंने अपनी रचनाओं में जिन समस्याओं को उठाया था । वह आज भी हमारे समाज में विद्यमान है । प्रेमचंद ने पाप पुण्य के राक्षस और देवता नहीं रचे । उन्होंने उस धड़कन को सुना जो करोड़ों किसानों के दिल में हो रही थी ।

कालजयी प्रेमचंद

श्रेया जायसवाल

कलम के सिपाही प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस शहर से चार मील दूर लमही गाँव में हुआ था । जब वे आठ साल के थे तो उनकी माता का देहांत हो गया।पिता ने पन्द्रह साल की उम्र में उनका विवाह करवा दिया । विवाह के एक साल बाद ही पिता भी चल बसे । प्रेमचंद के ऊपर पाँच लोगों की जिम्मेदारी आ गयी । उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। पैसे के अभाव में उन्हें अपनी पुस्तकें बेचनी पड़ी। उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी पढ़ाई जारी रखी ।प्रेमचंद गाँव में रहते थे ,ट्यूशन करते थे।अपने गाँव से दूर बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव पांच मील जाते थे और घर आकर रात को कुप्पी जलाकर खुद पढ़ने बैठते थे । जीवन की इन्हीं विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की ।

प्रेमचंद ने हिन्दुस्तान की सही तस्वीर अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से ही उजागर किया है । वे कालजयी लेखक थे । उन्होंने अपनी रचनाओं में जिन समस्याओं को उठाया था । वह आज भी हमारे समाज में विद्यमान है । प्रेमचंद ने पाप पुण्य के राक्षस और देवता नहीं रचे । उन्होंने उस धड़कन को सुना जो करोड़ों किसानों के दिल में हो रही थी ।

तमाम कठिनाइयों और बाधाओं को पार करती हुई भारतीय जनता से प्रेमचंद कहते हैं -' यह अंत नहीं है और आगे बढ़ो , और आगे बढ़ो जब तक कि रंगभूमि में विजय न हो, जब तक कि देश का कायाकल्प न हो ,जब तक की इस कर्मभूमि में गबन और गोदान के होरी और रमानाथ का त्रस्त होना बंद न हो।'

(रंगभूमि) सूरदास प्रेमचंद के उन पात्रों में है जो जिंदगी को एक संघर्ष समझते हैं और कितनी भी कठिनाइयाँ पड़े ,उनके सामने पीठ दिखाना नहीं जानते ।सूरदास का चरित्र मिठुआ से उसकी बातचीत में बहुत अच्छी तरह झलकता है ----

मिठुआ--- दादा ,अब हम रहेंगे कहाँ ?

सूरदास---दूसरा घर बनाएँगे .

मिठुआ --और जो कोई फिर आग लगा दे ?

सूरदास- तो फिर बनाएँगे .

मिठुआ --और फिर लगा दे ?

सूरदास -- तो हम फिर बनाएँगे.

मिठुआ--और जो कोई हजार बार लगा दे?

सूरदास --तो हम हजार बार बनाएँगे

मिठुआ - और जो कई सौ लाख बार लगा दे ?

सूरदास-- तो हम सौ लाख बार बनाएंगे "।

सूरदास हिंदुस्तान के उन किसानों में है जिनमें रचने की,निर्माण करने की तीव्र आकांक्षा है।

'कर्मभूमि' उपन्यास में प्रेमचंद ने पहली बार मजदूरों और विद्यार्थियों को एक साथ अंग्रेजों का मुकाबला करते दिखाया है । जब प्रेमचंद की पत्नी ने पूछा कि क्रांति हुई तो आप किसका साथ देंगे ,तब प्रेमचंद ने कहा --" मजदूरों और काश्तकारों का । मैं पहले ही सबसे कह दूँगा कि मैं तो मजदूर हूँ तुम फावड़ा चलाते हो ,मैं कलम चलाता हूंँ ।हम दोंनों बराबर हैं ।"

जब प्रेमचंद मृत्यु शय्या पर पड़े थे तब उन्होंने जैनेन्द्र से कहा था कि --" जैनेन्द्र, लोग ऐसे समय याद किया करते हैं ईश्वर,मुझे भी याद दिलायी जाती है, पर अभी तक मुझे ईश्वर को कष्ट देने की जरुरत नहीं मालूम हुई है । "

यह प्रेमचंद का मनुष्यत्व था जो मृत्यु को देखकर भी मुस्करा रहा था। प्रेमचंद की जीवन कथा एक दूसरे महान लेखक की याद दिलाती है जिसका जीवन इतने कटु अनभवों से भरा हुआ था कि उसने अपना नाम ही गोर्की रख लिया था ।जिस साल प्रेमचंद का देहावसान हुआ उसी साल गोर्की का भी । शान्तिप्रिय द्विवेदी ने लिखा है --" गोर्की की भांति ही उन्होने छुटपन से ही कठिनाइयों की कड़वी घूँट पी थी।उनका दुख उनके लिए अमृत बन गया "।

31 जुलाई,2026

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प्रकाशित: 31 जुलाई 2026 • 3 मिनट पठन

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