आद्यंत असांप्रदायिक अब्बासउद्दीन
बंगाल की पावन माटी और लोक-संस्कृति के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सीमाओं, संकीर्णताओं और मजहबी दीवारों को लांघकर सीधे जनमानस के हृदय में अमर हो गए। जन-गीतों के पुरोधा अब्बासउद्दीन अहमद एक ऐसा ही अनूठा और ऐतिहासिक नाम है। उनका संपूर्ण जीवन और उनकी अनमोल संगीत-साधना इस बात की जीवंत गवाही है कि वे केवल एक समुदाय के गायक नहीं थे, बल्कि आद्यंत (शुरुआत से अंत तक) एक सच्चे मानवतावादी और पूरी तरह से असांप्रदायिक चेतना के धनी व्यक्तित्व थे।
कूचबिहार के ग्रामीण अंचलों की मिट्टी से महकते परंपरागत 'भवैया' और 'चटका' लोकगीतों को जब अब्बासउद्दीन जी ने अपनी मखमली आवाज़ दी, तो उसमें केवल सुरों का आरोह-अवरोह नहीं, बल्कि बल्कि आम लोगों के सुख-दुख और सदियों पुरानी लोक-संस्कृति की गूँज थी। आगे चलकर जब उन्होनें काजी नजरुल इस्लाम जी के रचे भजनों, कीर्तनों और इस्लामिक गीतों (नात) को भी समान आत्मीयता से सुरबद्ध किया, तब उनका यही स्वर विराट संस्कृति का वह मजबूत स्तम्भ बन गया जिसने सुरों के माध्यम से सांप्रदायिक बंधनों को हमेशा-हमेशा के लिए ढहा दिया। कला की इसी जनपक्षधरता और उनकी दृढ़ धर्मनिरपेक्ष छवि का ही यह ऐतिहासिक प्रभाव था कि चांगराबान्धा के लोक-कलाकारों से लेकर पूरे क्षेत्र के हिंदू और मुसलमान, दोनों ही उन्हें समान रूप से अपना पथ-प्रदर्शक और सांस्कृतिक 'दीक्षागुरु' मानते थे। उनके जन्मदिन 27 अक्टूबर पर उनका सादर स्मरण करते हुए सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत है बांग्ला आलेख का यह हिन्दी अनुवाद - केशव कुमार भट्टड़
आद्यंत असांप्रदायिक अब्बासउद्दीन
~ सुखबिलास बर्मा~

उन्होंने बंगाली संगीत में एक बिल्कुल नई धारा के गीतों को गाया था, जिसे उन्होंने काज़ी साहब (काज़ी नज़रुल इस्लाम) के सहयोग से 'इस्लामी संगीत' के नाम से स्थापित किया, जिसमें उन्होंने काज़ी साहब की रचनाओं को अपनी आवाज़ दी थी। रूढ़िवादी मुस्लिम समाज में संगीत के प्रति प्रचलित भ्रामक विचारों तथा धर्म व धार्मिक ग्रंथों (शास्त्र) की दुहाई देकर संगीत पर प्रतिबंध लगाने के प्रयासों को चुनौती देते हुए, और मुस्लिम समुदाय को सही दिशा दिखाने के लिए काज़ी नज़रुल इस्लाम ने "ओ मोन रमज़ानेर ओई रोज़ार शेषे एलो खुशीर ईद" और "इस्लामेर एई सौदा लये एलो नबीन सौदागर" जैसे प्रसिद्ध इस्लामी गीत लिखे। अब्बासउद्दीन ने सन 1932 में एचएमवी (HMV) रिकॉर्ड पर इन गीतों को रिकॉर्ड किया, जिनके जारी होते ही चारों ओर तहलका मच गया।

लोक संगीत की दुनिया के प्रसिद्ध गायक और प्रचारक अब्बासुद्दीन अहमद को संगीत जगत की कई प्रतिष्ठित हस्तियों ने विभिन्न नामों से सम्मानित किया है। पंकज मल्लिक ने अपने संस्मरण ग्रंथ 'आमार जुग आमार गान' (मेरे युग के मेरे गीत) में लिखा है, "अब्बास उद्दीन ग्रामीण लोकगीतों के अद्वितीय कलाकार थे... उन्होंने अपना जीवन बंगाल के लोक संगीत को समर्पित कर दिया।" हेमाङ्ग बिस्वास ने उन्हें 'बंगाल के लोक संगीत का अमर कलाकार' कहा। बांग्ला के प्रसिद्ध पल्लीकवि (ग्रामीण जीवन के कवि) जसीमउद्दीन ने उन्हें 'अंजना तीरे खंजना पाखी' (अंजना नदी के तट का खंजन पक्षी) की उपाधि दी। उनके समर्पित जीवनीकारों में से एक प्रोफेसर अबुल अहसान चौधरी ने उन्हें 'सुरेर चारण' कहा। अपनी प्रिय पत्नी लुत्फुन्नेसा अब्बास के लिए वे बस एक 'पंछी' थे; उन्होंने अपनी पत्नी को लिखे अधिकांश पत्रों का अंत 'तोमार पाखी' (तुम्हारा पंछी) लिखकर ही किया। मैंने भी अब्बासउद्दीन पर 'सोपान' द्वारा प्रकाशित मेरी किताब को नाम दिया 'गानेर पाखी अब्बासउद्दीन' (सॉन्गबर्ड अब्बासउद्दीन/गीतों का पंछी अब्बासउद्दीन)। एक विहंग की तरह ही उन्होंने लोकगीतों को , विशेष रूप से 'भावैया' और 'चटका' को विश्वभर में फैला दिया।
'अब्बासउद्दीन स्मृति समिति' के हम सदस्यों ने 27 अक्टूबर 2001 को रवींद्र सदन में उनके जन्म शती समारोह और 2002 में कोलकाता मैदान में 'अब्बास मेला' के उद्घाटन समारोह की शुरुआत मेरे संगीत निर्देशन में मिनती अधिकारी के लिखे गीत से की —
सोनार एक पंखी आसिलो रे -
सोनार एक पंखी आसिलो गाँओ बलरामपुरे। आब्बास उद्दीन नामटि ताहार जानिलो संसारे रे।।
सेइ पंखिक जनम दिलो हीरामन मा’य। जाफ़र आलि आब्बा ताँके दानापानी दैय रे।।
[ सोने का इक पंछी आया रे -
गाँव बलरामपुर में इक सोने का पंछी आया रे। अब्बास उद्दीन नाम उनका दुनिया ने जाना रे ।।
उस पंछी को जनम दिया माँ हीरामन ने। अब्बा जाफ़र अली ने दाना-पानी दिया रे ।।]
प्रारंभिक जीवन और परिवेश
उत्तर-पूर्व में भारत के अधीन सहयोगी रियासत कूचबिहार के तुफानगंज महकमे के अंतर्गत कालजानी नदी के किनारे बसे बलरामपुर गाँव में 27 अक्टूबर 1901 को लोक संगीत के 'पंछी' अब्बास उद्दीन ने जन्म लिया। अपनी किताब 'स्मृतिर पट' (यादों का झरोखा) में, पल्लीकवि - ‘ग्रामीण अंचल के कवि’- जसीमुद्दीन (1904–76) कूच बिहार का वर्णन करते हुए उसे ‘परियों की कहानियों की धरती’ बताते हैं—
"कूचबिहार बंगाल के छोर पर बसी एक छोटी-सी रियासत थी , जहाँ लोग-बाग - 'दूधों नहाते, पूतों फलते' - चैन की बंशी बजाते थे । उनके खेत-खलिहान धन-धान्य से भरे थे। यह पूरा देश भवाईया गीतों और मनसामंगल की कथाओं से गुंजायमान था । यहाँ के लोगों के दिलों के सबसे करीब—और सबसे ज्यादा आदर पाने वाले—न तो जिन्ना थे , ना गांधी थे और ना ही नेहरू थे। वे मात्र जिस एक शख्स को सबसे ज्यादा चाहते थे , वे थे 'राजा बहादुर'—यानी कूच बिहार के महाराजा। राजा बहादुर केवल इंसान नहीं थे —वे इंसानी रूप में मानो कोई देवता थे । उनके राज्य में न तो किसी चीज़ की कमी थी और न ही शिकायत की कोई वजह। पिछले अकाल के दौरान, जब पूरे बंगाल में लाखों लाखों लोग मरे , तब भी कूचबिहार राज्य धन-धान्य से भरा रहा।" 2018 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित अपनी पुस्तक 'द मॉर्टल गॉड: इमेजिनिंग द सॉवरेन इन कोलोनियल इंडिया' में, प्रोफेसर मिलिंद बनर्जी महोदय ने भी 'राजा बहादुर' (सर्वोच्च शासक) को मानव रूप में देवता मानना — राजशाही की इस खास विशेषता पर विस्तार से चर्चा की हैं।
अपनी पुस्तक "आमार शिल्पी जीबनेर कथा" ('माई आर्टिस्ट लाइफ') में अब्बासउद्दीन बचपन में अपने मन पर प्रकृति के गहरे प्रभाव का स्मरण करते हुए लिखते हैं कि उनका बचपन प्राकृतिक दृश्यों की सुंदरता , ग्रामीण संगीत और संस्कृति तथा गाँव की सरलता और सादगी भरे जीवन के बीच बीता। वे लिखते हैं:
"हमारे घर के पूर्व की ओर क्षितिज तक फैला हुआ खेत - उसके पार बहती थी कालजानी नदी। मानसून के दौरान मैं उसकी अद्भुत सुंदरता को हैरानी-से निहारता रहता। पूरा खेत धान की हरी फसल से भर जाता और जब भी पूरब की हवा बहती , धान में लहरें हिलोरे लेने लगती । "
उन्होंने बलरामपुर स्कूल से प्राथमिक शिक्षा पूरी की, जहाँ उनकी स्कूल की पोशाक एक चौड़ी धोती और शर्ट हुआ करती थी। इसके बाद उन्होंने तुफानगंज हाई स्कूल से संस्कृत का अध्ययन किया और व्याकरणतीर्थ की उपाधि प्राप्त की। अपने संगीत प्रेम के बारे में वे बताते हैं:
"मुझे बचपन से ही गाने और वाद्य यंत्र बजाने का बहुत शौक था। मुझे जात्रा (पारंपरिक बंगाली लोक नाट्य) मंडलियों से भी गहरा लगाव था। तेज गति-से बहने वाली पहाड़ी नदी 'तोरसा' के किनारे भैंस चराने वाले अपनी भैंस की पीठ पर सवार होकर 'दोतारा' बजाते और गाते हुए झुंड को आगे ले जाते थे। बचपन में ही उनकी गाई धुनें मेरी अपनी आवाज़ में बस गई थीं।"
'पागारू' नामक एक बुजुर्ग गायक के भवैया गीत, जिन्हें वे दोतारा की धुन पर गाते थे, अब्बासुद्दीन को बहुत भाते थे। उनकी गायन शैली असाधारण थी। 'पागारू' के गीतों का उनके बालमन पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसके अलावा, 'धलाई मियां' और 'पेनकेतु बर्मन' जैसे 'अधिया' कृषि श्रमिकों के भवैया गायन सत्र अक्सर उनके घर पर आयोजित होते थे। उन्होंने इन सत्रों में शामिल होकर गाना सीखा, जिसमें हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों के लोग समान रूप से भाग लेते थे। यह कूचबिहार राज्य की सांस्कृतिक परंपरा थी। यहाँ की अधिकांश आबादी 'राजबंशी' समुदाय की थी। इस समुदाय के एक हिस्से ने इस्लाम अपना लिया, जिन्हें 'नस्यो शेख' कहा जाने लगा। हालाँकि, नया धर्म अपनाने के बावजूद, उन्होंने अपनी मूल संस्कृति की बाकी सभी बातें बनाए रखीं और आज भी वे राजबंशियों के साथ बहुत घुल-मिलकर रहते हैं। शादी के बाद भी उनकी संगीत के प्रति दीवानगी कैसी थी, इस बारे में बेगम साहिबा लुत्फुन्नेसा ने लिखा है।
बेगम साहिबा लुत्फुन्नेसा (Lutfunnessa) ने लिखा है -
शादी के बाद भी संगीत के प्रति उनका शौक ज़रा भी कम नहीं हुआ: जब भी मौका मिलता, वह परिवार की बैलगाड़ी तैयार करवाते और जहाँ भी 'बिशहरी', 'खोनाई', 'महुआ' या 'अलीबाबा' जात्रा (लोक-नाट्य) होती, वहीं चले जाते। पूरी रात वहीं रुककर वह गीत-संगीत और जात्रा का आनंद लेते और अगली सुबह घर लौट आते।
अब्बासउद्दीन लिखते हैं -
"यही कारण है कि इस परिवेश में सांप्रदायिक सद्भाव की कभी कोई कमी नहीं रही। सन् 1981 में, जब मैं बालूरघाट का जिला मजिस्ट्रेट था, कलकत्ता के एक संगठन ने मुझसे भवैया गीतों में सांप्रदायिक सद्भाव विषय पर एक संगोष्ठी में बोलने का अनुरोध किया। तब मैंने उन्हें बताया कि भवैया गीतों में सांप्रदायिक वैमनस्य का कोई प्रसंग मिलता ही नहीं है, क्योंकि कूचबिहार में कभी ऐसी द्वेषपूर्ण घटनाएं हुईं ही नहीं, जिसके कारण किसी गीतकार को इस विषय पर अलग से गीत रचने की आवश्यकता पड़ी हो।"
कलकत्ता आगमन और संगीत यात्रा
अपने किशोरावस्था और युवावस्था के दिन ऐसे माहौल में बिताने के बाद, अब्बास अपने दोस्त शैलेन रॉय की शादी में शामिल होने के लिए कलकत्ता गए। वहाँ उनकी मुलाकात कई लोगों से हुई—जिनमें के. मल्लिक, काज़ी नज़रुल इस्लाम और जसीमुद्दीन जैसे धर्मनिरपेक्ष विचारों वाले लोग, और साथ ही कई हिंदू गायक, संगीतकार और संगीत प्रेमी शामिल थे। उन्होंने ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड के लिए गाने रिकॉर्ड किए, जिनमें शैलेन रॉय का लिखा गीत "कोन बिरोहिर नयन जोले बादल झोरे गो" और उस दौर के कई अन्य आधुनिक गाने शामिल थे। इस तरह उनके लिए ग्रामोफ़ोन रिकॉर्डिंग की दुनिया के रास्ते खुल गए। इसके बाद उन्होंने जसीमउद्दीन द्वारा रचित कई प्रसिद्ध गीत गाए, जैसे: आमार गोलार हार खुले ने ओगो ललिते [हे ललिता, मेरे गले का हार उतार लो], प्राण सोखिरे ओई शोन कोदम्ब तोलाय बंशी बाजाय के [हे प्राणों की सखी, सुनो तो कंदब के पेड़ के नीचे कौन वंशी बजा रहा है], आमार हाड़ काला कोर्लाम रे [मैंने अपनी हड्डियाँ काली (घिसकर बेहाल) कर ली हैं], आमाय भासाइलि रे, आमाय डुबाइलि रे, ओकुल दरियाय बुझी कुल नाइ रे [मुझे बहा दिया, मुझे डुबो दिया, इस असीम दरिया का शायद कोई किनारा नहीं है], ओ आमार दरदी, आगे जानले तोर भाँगा नौकाय चोड़ताम ना [हे मेरे प्रिय, अगर मुझे पहले पता होता, तो मैं तुम्हारी टूटी हुई नाव पर नहीं चढ़ती], तोरा के के जाबि रे जोल आन्ते [तुममें से कौन-कौन पानी भरने जाएगा],नदीर कूल नाइ किनार नाइ रे [नदी का न कोई कूल है और न ही किनारा], ओ बाजान चोल जाई चोल माठे लांगोल बाइते [ओ भाई, चलो खेत में हल जोतने चलें] आदि मन और प्राण को झझकोर देने वाले भटियाली गीत । गाए काजी नजरुल इस्लाम के भटियाली गीत - कुच बरण कोन्या रे तोर मेघ बोरोन केश [हे काले रंग जैसी सुंदर कन्या, तुम्हारे बाल बादलों जैसे काले हैं], गांगे जोआर एलो फिरे [नदी (गंगा) में ज्वार लौट आया है], नदीर नाम सोई अंजना [(हे सखी), उस नदी का नाम अंजना है], बोंधु आजू मोने पोड़े रे आम कुड़ानोर खेला [हे मित्र, आज भी मुझे आम बीनने का खेल याद है]। इनके आलवा गाया गिरिन चक्रवर्ती का नाविक लोकगीत ('सारी गान') - नाओ छाड़िया दे, पाल उड़ाइया दे [नाव को छोड़ दो और उसके पाल हवा में उड़ा दो], जलालउद्दीन के - आरे ओ भाटियाल गांगेर नइया, घोरबाड़ी छाड़ीलाम रे [अरे ओ भाटियाली नदी के नाविक, मैंने अपना घर-बार छोड़ दिया है]। इसके साथ ही उन्होंने कई प्रचलित भटियाली और कनाई शील द्वारा संग्रहीत या फिर प्राचीन लोक-गीतों की परंपरा से जुड़े 'बिछेदी' (विरह-गीत), 'देहत्तत्व' (मानव शरीर के दर्शन पर आधारित गीत), 'गुरुबादी' (आध्यात्मिक गुरु पर केंद्रित गीत), 'मरफती' और 'मुर्शिदी' गीत भी गाए। उस अमर कलाकार के गाए अमर गीतों में से उल्लेखनीय कुछ गीत इस प्रकार हैं - थाकते पार घाटाते तुमी पारेर नइया [हे घाट पर मौजूद, तुम इस पार से उस पार ले जाने वाले नाविक हो], अल्ला मेघे दे पानी दे, [हे अल्लाह, मेघ भेजो और पानी दो], बैठा जोरे बाओ रे बोंधु, माझी बाया जाओ रे [हे मित्र, चप्पू जोर से चलाओ, हे मांझी, नाव खेते हुए आगे बढ़ो], मोयूरपंखी नौका आमार मेघनार पारे बाड़ी [मेरी मयूरपंखी (सुंदर) नाव है और मेघना नदी के तट पर मेरा घर है], ओ मोन गुरु भजो रे ओरे सोनार चाँन [हे मेरे मन, उस सोने के चाँद रूपी गुरु का भजन करो], गुरुर् पोदे प्रेम भक्ति होलो ना मोन हरार काले [जीवन के समय गुरु के चरणों में प्रेम-भक्ति नहीं हो पाई], ओ सुखेर मोयना रे घाटेर पारे [ओ सुख की मैना, घाट के किनारे], जोलेर घाटे कोदमो तोले [जल के घाट पर, कंदब के पेड़ के नीचे], प्राण बोंधुर बिरहे आमार [मेरे प्राणप्रिय मित्र के वियोग में], कोन रोंगे बाइन्धाछो घोरखाना मिछा दुनियार माझे [इस झूठी दुनिया में तुमने किस रंग से अपना घर (शरीर/संसार) बसाया है]। और इसी बीच उनका उल्लेखनीय कीर्तन गीत - "माधोबी बोने बोन्धु छिलो सोई लो, बोन्धु आमार केले सोना कोन बोने लुकाइलो। ["माधवी वन में मेरा पिया था अरी सखी, पिया मेरा सांवला सलोना किस वन में छुप गया है।"]
इस्लामी संगीत और 'भवैया' की पुनर्स्थापना
इसी दौर में उन्होंने बंगाली संगीत में एक बिल्कुल नई धारा के गीतों को गाया था, जिसे उन्होंने काज़ी साहब (काज़ी नज़रुल इस्लाम) के सहयोग से 'इस्लामी संगीत' के नाम से स्थापित किया, जिसमें उन्होंने काज़ी साहब की रचनाओं को अपनी आवाज़ दी थी। रूढ़िवादी मुस्लिम समाज में संगीत के प्रति प्रचलित भ्रामक विचारों तथा धर्म व धार्मिक ग्रंथों (शास्त्र) की दुहाई देकर संगीत पर प्रतिबंध लगाने के प्रयासों को चुनौती देते हुए, और मुस्लिम समुदाय को सही दिशा दिखाने के लिए काज़ी नज़रुल इस्लाम ने "ओ मोन रमज़ानेर ओई रोज़ार शेषे एलो खुशीर ईद" और "इस्लामेर एई सौदा लये एलो नबीन सौदागर" जैसे प्रसिद्ध इस्लामी गीत लिखे। अब्बासुद्दीन ने सन 1932 में एचएमवी (HMV) रिकॉर्ड पर इन गीतों को रिकॉर्ड किया, जिनके जारी होते ही चारों ओर तहलका मच गया।
इसके बाद काजी साहब ने अब्बास के लिए (बांग्ला में) एक के बाद एक कई इस्लामी गीत लिखे— " मैंने अल्लाह नाम के बीज मन के खेत में अब बो लिए हैं", "यह सुंदर फूल, यह सुंदर फल और नदी का मीठा पानी, हे खुदा यह है आपकी मेहरबानी", "त्रिभुवन के प्यारे मोहम्मद आए रे दुनिया में ","तुम सब आओ और देखो, माँ अमीना की गोद में" इत्यादि।
जिस प्रकार उन्होंने इन गीतों से रिकॉर्ड-जगत में तहलका मचाया था, उसी तरह उनके गीत कॉलेज, स्कूल, सभा समितियों में भी अत्यधिक लोकप्रिय हो गए। लेकिन इसके बावजूद उनके मन को शांति और संतुष्टि नहीं मिल पा रही थी, क्योंकि वे अपने प्राणप्रिय लोकसंगीत— 'भवैया' को रिकॉर्ड नहीं कर पा रहे थे। उस समय की रिकॉर्ड कंपनियां भवैया और चटका गीत रिकॉर्ड करने के लिए सहमत नहीं थी।
इसलिए अब्बासउद्दीन अहमद ने भी जिद पकड़ली कि भवैया नहीं गाने देंगे, तो वे अन्य कोई गीत भी रिकॉर्ड नहीं करेंगे। अंततः नजरुल साहब के विशेष अनुरोध पर 1939 में एचएमवी ने उन्हें इसका अवसर दिया। उन्होंने गाना रिकॉर्ड किया: "कि ओ बोन्धु काजल भोमोरा रे, कुन दिन आसिबेन बोन्धु कयया जाओ कयया जाओ रे।" ("अरे ओ सांवले भँवरे पिया , किस दिन आओगे पिया कहकर जाओ, कहकर जाओ रे") और इसके दूसरे तरफ — "अकी गाड़ियाल भाई हाकाओ गाड़ी तुई चिलमारिर बंदरे रे" ("अरे ओ गाड़ीवान भाई, अपनी गाड़ी चिलमारी बंदरगाह की ओर हाँको रे ")। (लिंक साभार)
इस रिकॉर्ड के रिलीज होने पर जो हलचल मची, उसने इतिहास रच दिया! इसके बाद अब्बासउद्दीन को रोकने वाला कोई नहीं था। उन्होंने अनगिनत भवैया गीत गाए, जिससे पूरा बंगाल झूम उठा। अब्बास साहब भवैया के सच्चे चारण और निर्विवाद सम्राट बन गए।
निसंदेह, उन्होंने नजरुल द्वारा रचित सांप्रदायिक सद्भाव के गीत भी गाए, जैसे— "हिन्दु आर मुसल्लिम् मोरा दुइ सहोदोर भाइ" (हिंदू और मुसलमान हम दोनों सगे भाई हैं) , "भारतेर दुइ नयन् तारा हिन्दु मुसल्मान्" (भारत के दो नयन तारे हिंदू और मुसलमान हैं), "देश जोनोनीर् समान् प्रियो जुगोल् सन्तान" (देश-जननी की दोनों समान रूप से प्रिय जुड़वां संतानें हैं... )" इत्यादि। इन सभी ऐतिहासिक प्रसंगों को विस्तार से समेटने में अत्यधिक समय और ऊर्जा की आवश्यकता है।
इसी कारण से उनके सम्मान में रची गई 'अब्बास नामा' कविता में कूचबिहार जिले के चैंगराबांधा के कवि, गीतकार और गायक ने कहा है-
कि हिन्दू कि मुसलमान भाई, सगारे ओँय दीक्षागुरु
उयार देखा पथ धरि आइज, करमो हामरा यात्रा शुरू।
आर ना रे भाई ‘अब्बास नामा’ नेकिर जाया नेकनु मेला
नेइकते नेइकते हापसि गेनु, कलम थुइया जिरावं ऐला।
मुइओ एटि श्यास करनु।
चाहे हिंदू भाई हों या मुसलमान भाई, सभी के वे दीक्षा गुरु हैं
उनके दिखाए रास्ते पर चल कर, आज हम करेंगे सफर की शुरुआत
और नहीं रे भाई 'अब्बास नामा', भलाई की खातिर मैंने बहुत कुछ लिखा है,
लिखते-लिखते मेरी साँस फूल गई है, कलम रखकर विश्राम कर लूँ अब ।
मैं भी यहाँ विश्राम लेता हूँ।
*
सुखबिलास बर्मा पश्चिम बंगाल और भारत के एक प्रतिष्ठित लेखक, शोधकर्ता और सेवानिवृत्त आईएएस (IAS) अधिकारी हैं। प्रशासनिक सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद, उन्होंने अपना अधिकांश समय उत्तर बंगाल के इतिहास, लोक-संस्कृति और विशेष रूप से 'भवैया' संगीत के संरक्षण व गहन अकादमिक अनुसंधानों को समर्पित किया है। 'Songbird Abbasuddin', 'Bhawaiya: Ethnomusicological Study' और 'Socio-Political Movements in North Bengal' जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों के लेखक डॉ. बर्मा को उत्तर बंगाल की लोक-संस्कृति और जन-इतिहास को साहित्यिक एवं अकादमिक मंच पर स्थापित करने वाले प्रमुख मार्गदर्शकों (अग्रदूतों) में गिना जाता है।
पल्लीकवि जसिम उद्दीन का गीत लेखक सुखबिलास बर्मा की आवाज में - प्राण सोखिरे ओई शोन कोदम्ब तोलाय बंशी बाजाय के [हे प्राणों की सखी, सुनो तो कंदब के पेड़ के नीचे कौन वंशी बजा रहा है यहाँ लिंक पर क्लिक कर सुन सकते हैं । इस गीत को शुरुआत में अब्बास उद्दीन ने अपनी आवाज दी थी।
सहायक संदर्भ ग्रंथ:
सुरेर चारण अब्बासुद्दीन, लेखक: अबुल अहसान चौधरी (प्रकाशक: सामग्री तालिका, 38/2ए बंगलाबाजार, ढाका 1100, फरवरी 2005)
गानेर पाखी अब्बासुद्दीन (सॉन्गबर्ड अब्बासुद्दीन), लेखक: सुखविलास वर्मा (प्रकाशक: सोपान, 206, बिधान सारणी, कोलकाता 700006)
आलेख साभार बांग्ला पत्रिका 'मार्क्सवादी पथ'। प्रकाशन तिथि: 27 अक्टूबर 2026
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