भारत के संविधान में हर किसी को अपनी आस्था और विचारधारा के अनुसार जीने का अधिकार है। राज्य स्तर पर और एक ही राज्य के विभिन्न समुदायों के बीच कई तरह की परंपराएं, त्योहार, लोकचार और शास्त्रचार हैं, जिनका अपना ऐतिहासिक संदर्भ है। इसके साथ कुछ देशज परंपराएं भी हैं। जो लोग धर्म आधारित फासीवादी राजनीति करते हैं, वे अपनी सोच को दूसरों पर थोपना चाहते हैं, जो लोकतंत्र के पूरी तरह खिलाफ है। हमारे देश में कोई शाकाहारी है तो कोई मांसाहारी; हमारी एक मिश्रित संस्कृति है। इस विविधता को स्वीकार करना ही लोकतंत्र की नींव है, लेकिन बीजेपी इसे तोड़ना चाहती है। इसके खिलाफ हम उन सभी विचारशील लोगों को एकजुट करने का प्रयास कर रहे हैं जो सवाल पूछने की हिम्मत रखते हैं और लोकतांत्रिक भावना से विरोध में खड़े होना चाहते हैं। यदि व्यापक वामपंथी एकता और उसके दायरे को नहीं बढ़ाया गया, तो हम पर चारों तरफ से हो रहे हमलों का मुकाबला नहीं किया जा सकेगा। गुंडों, पुलिस-प्रशासन और कानूनों के नए-नए रूपों के जरिए हमले हो रहे हैं—लेनिन, नेताजी, राहुल सांकृत्यायन, कोई भी इससे अछूता नहीं है।
मोहम्मद सलीम
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
सिलीगुड़ी में प्रेस कॉन्फ्रेंस में मोहम्मद सलीम
डीलिमिटेशन के नाम पर बीजेपी चला रही है 'जेरीमैंडरिंग'
मोहम्मद सलीम

अनिंदिता दत्ता, सिलीगुड़ी:
चुनाव जीतने के लिए क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण (डीलिमिटेशन) के नाम पर भारतीय जनता पार्टी 'जेरीमैंडरिंग' (चुनावी क्षेत्रों में अपनी सुविधा अनुसार हेरफेर) कर रही है। यह आरोप सीपीआई (एम) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने लगाया है। सोमवार को सिलीगुड़ी स्थित पार्टी के जिला कार्यालय 'अनिल विश्वास भवन' में एक पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि एसआईआर के नाम पर गैर-तार्किक तरीके से कई लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। अब नगर निगम/नगरपालिका चुनावों से पहले डीलिमिटेशन के नाम पर चुनाव जीतने के लिए कहीं बीजेपी समर्थकों को एक वार्ड में ज्यादा संख्या में शामिल किया जा रहा है, तो कहीं विपक्षी समर्थकों के वोटों को अलग-अलग वार्डों में बांट दिया जा रहा है। किसी कानूनी आयोग या तर्कसंगत प्रक्रिया का पालन किए बिना सीटों का पुनर्गठन हो रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों के जरिए दलीय सुविधा और राजनीतिक लाभ पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है।
दो सौ साल पहले अमेरिका में सत्तारूढ़ दल द्वारा चुनाव जीतने के उद्देश्य से किए गए अतार्किक सीट पुनर्गठन की आलोचना करते हुए वहां के समाचार पत्रों ने 'जेरीमैंडरिंग' शब्द का प्रयोग किया था। पश्चिम बंगाल में एसआईआर में कई वैध मतदाताओं के नाम हटाए जाने के बाद, अब नगर निकायों के डीलिमिटेशन में भी सलीम ने यही आरोप उठाया है। उन्होंने कहा कि डीलिमिटेशन एक राजनीतिक, प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया है। जब विधानसभा या लोकसभा का डीलिमिटेशन होता है, तो आयोग के गठन में विभिन्न राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व रहता है और उसकी अध्यक्षता कोई न्यायाधीश करते हैं। लेकिन यहां एकतरफा फैसले लिए जा रहे हैं। बीजेपी ने राजस्थान में भी इसी तरह जेरीमैंडरिंग की थी, जहां एक सीट पर एक हजार मतदाता थे तो दूसरी सीट पर चार हजार। हमने प्रशासनिक अधिकारियों से मांग की है कि जनसंख्या के अनुपात में वार्ड तय किए जाएं, भौगोलिक संतुलन बनाए रखा जाए, एक ही क्षेत्र के निवासियों को यथासंभव एक साथ रखा जाए और जनता की सुविधा का ध्यान रखा जाए। बीजेपी को जिताने के लिए मनमर्जी से नक्शे पर लकीरें नहीं खींची जा सकतीं। सुनवाई के दौरान सीपीआई(एम) इस पूरी अपारदर्शिता का विरोध करेगी।
आरएसएस-बीजेपी की इस राजनीतिक चाल को फासीवादी एजेंडे को सफल बनाने की रणनीति बताते हुए सलीम ने कहा कि हम बीजेपी विरोधी और समान विचारधारा वाले सभी लोगों को एकजुट करके लड़ना चाहते हैं। आगे दुर्गापूजा का त्योहार है, आश्विन की शारदीय सुबह में लोग खुशियों में डूबेंगे। लेकिन इस सरकार के आने के बाद हम देख रहे हैं कि बेदखली के नाम पर बस्ती वासियों, कॉलोनी निवासियों, दुकानदारों और हाकरों वालों के खिलाफ सरकार ने जंग छेड़ दी है। सरकार उत्सव के इन आनंदमय दिनों का संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करना चाहती है। हम वामपंथी शुरू से ही इसके खिलाफ लड़ाई में हैं। बीजेपी हमारे राज्य, यहाँ के लोगों के इतिहास और संस्कृति को नहीं समझती। वह उत्तर भारत के तथाकथित आर्यावर्त की तुलना में पूर्वी भारत के लोगों को हेय दृष्टि से देखती है। बीजेपी सरकार के आने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री ने कहा था कि बंगाल में मानसिकता बदलेगी। अब इस मानसिकता को बदलने के नाम पर वे पहनावे, खान-पान, बोली और आचार-व्यवहार हर चीज के खिलाफ उकसावा दे रहे हैं। जब खुद नहीं कर पा रहे हैं, तो धार्मिक गुरुओं से प्रवचन दिलवा रहे हैं।
सलीम ने कहा कि भारत के संविधान में हर किसी को अपनी आस्था और विचारधारा के अनुसार जीने का अधिकार है। राज्य स्तर पर और एक ही राज्य के विभिन्न समुदायों के बीच कई तरह की परंपराएं, त्योहार, लोकचार और शास्त्रचार हैं, जिनका अपना ऐतिहासिक संदर्भ है। इसके साथ कुछ देशज परंपराएं भी हैं। जो लोग धर्म आधारित फासीवादी राजनीति करते हैं, वे अपनी सोच को दूसरों पर थोपना चाहते हैं, जो लोकतंत्र के पूरी तरह खिलाफ है। हमारे देश में कोई शाकाहारी है तो कोई मांसाहारी; हमारी एक मिश्रित संस्कृति है। इस विविधता को स्वीकार करना ही लोकतंत्र की नींव है, लेकिन बीजेपी इसे तोड़ना चाहती है। इसके खिलाफ हम उन सभी विचारशील लोगों को एकजुट करने का प्रयास कर रहे हैं जो सवाल पूछने की हिम्मत रखते हैं और लोकतांत्रिक भावना से विरोध में खड़े होना चाहते हैं। यदि व्यापक वामपंथी एकता और उसके दायरे को नहीं बढ़ाया गया, तो हम पर चारों तरफ से हो रहे हमलों का मुकाबला नहीं किया जा सकेगा। गुंडों, पुलिस-प्रशासन और कानूनों के नए-नए रूपों के जरिए हमले हो रहे हैं—लेनिन, नेताजी, राहुल सांकृत्यायन, कोई भी इससे अछूता नहीं है।
पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में सलीम ने कहा कि बीजेपी विभिन्न राज्यों में एनसीपीआई जैसे कई दल बनाकर रखती है। कॉर्पोरेट घरानों से मिलने वाले काले धन से वे विधायकों और सांसदों को खरीदते हैं। चुनाव के बाद चाहे जो जीते, वे खरीद-फरोख्त करते हैं। हमने महाराष्ट्र में शिवसेना को इस तरह टूटते देखा, पंजाब में अकाली दल को तोड़ा और यहाँ तृणमूल कांग्रेस को तोड़ रहे हैं। विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद एनसीपीआई के नाम पर बीजेपी के पाले में जमा हो गए हैं। जिन लोगों की अपनी कोई हैसियत या विचारधारा नहीं है और जो केवल वसूली, बालू-तस्करी, मवेशी-तस्करी और कोयला-तस्करी के काले धन के लिए तृणमूल कांग्रेस में गए थे, वे ही अब राजनीति में टिके रहने के लिए बीजेपी के खाते में नाम लिखवा रहे हैं। इन नए फासीवादियों के खिलाफ लड़ाई के लिए वामपंथी ही सभी लोगों को एकजुट करके संघर्ष जारी रखेंगे।
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साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति
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