कॉमरेड डॉ. एस. पी. कश्यप - मार्क्सवादी दर्शन और जनसंघर्षों को जीवन का ध्येय बनाने वाले अनूठे शिक्षक - को नमन! वे एक मेधावी इतिहासकार, समर्पित कम्युनिस्ट और मार्क्सवादी विचारधारा के सहज शिक्षक थे। 19 वर्ष की उम्र से अध्यापन शुरू करने वाले कश्यप जी ने जीवन भर जनसंघर्षों और सांगठनिक दायित्वों को प्राथमिकता दी। प्राचार्य पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर उन्होंने खुद को पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में समर्पित कर दिया। उन्होंने सरल भाषा में जटिल मार्क्सवादी सिद्धांतों को कई पीढ़ियों के कार्यकर्ताओं तक पहुँचाया। आज साम्प्रदायिकता और सामाजिक चुनौतियों के दौर में उनकी वैचारिक विरासत अत्यधिक प्रासंगिक और प्रेरणादायी है।
जन्मदिवस पर विशेष (15 सितम्बर 1941 – 23 अप्रैल 2021)
कॉमरेड डॉ. एस. पी. कश्यप: इतिहास, मार्क्सवाद और संघर्ष के शिक्षक
~ नवाब उद्दीन ~

23 अप्रैल 2021 को कोरोना संक्रमण के कारण जब कॉमरेड डॉ. एस. पी. कश्यप हमारे बीच नहीं रहे, तो वामपंथी आंदोलन ने न केवल एक समर्पित कम्युनिस्ट, बल्कि एक गंभीर इतिहासकार, उत्कृष्ट शिक्षक और दूरदर्शी मार्क्सवादी विचारक को खो दिया। 15 सितम्बर 1941 को झाँसी (उत्तर प्रदेश) में जन्मे कॉमरेड कश्यप के पिता डाक विभाग में कार्यरत थे। स्थानांतरण के चलते उनकी इंटर तक की शिक्षा झाँसी में और उच्च शिक्षा आगरा कॉलेज से पूरी हुई। आज उनके जन्मदिवस पर उनके जीवन और वैचारिक यात्रा को याद करना बेहद प्रासंगिक है।
अध्यापन की शुरुआत और अनोखा प्रसंग
वे बचपन से ही बेहद मेधावी थे। इसी प्रतिभा के दम पर मात्र 19 वर्ष की उम्र में उन्हें आर.बी.एस. कॉलेज, आगरा में अध्यापन का अवसर मिल गया। उनकी नियुक्ति से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग वे खुद सुनाते थे-कॉलेज के प्राचार्य उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें रखना चाहते थे, जबकि प्रबंधन किसी अन्य को नियुक्त करना चाहता था। अंततः दोनों को नियुक्ति मिली और वेतन आधा-आधा बाँट दिया गया।
प्रगतिशील वातावरण और वैचारिक मोड़
आर.बी.एस. कॉलेज का बौद्धिक वातावरण उनके विकास में मील का पत्थर साबित हुआ। वहाँ डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. रोशन सिंह, आर. पी. तिवारी, डॉ. बी. के. सिंह और जनवादी लेखक संघ के संस्थापक महासचिव प्रो. चन्द्रबली सिंह जैसे दिग्गज मार्क्सवादी विचारक कार्यरत थे। इसी दौर में वे अपने छात्र व आगे चलकर ‘लोकलहर’ के संपादक बने कॉमरेड राजेन्द्र शर्मा के संपर्क में आए। कॉलेज के माहौल और साथियों के जुड़ाव ने उन्हें मार्क्सवादी विचारधारा की ओर मोड़ा, जिसने उन्हें समाज को समझने का वैज्ञानिक नजरिया दिया।
शोधकार्य से कम्युनिस्ट पार्टी का सफर
वर्ष 1974 के आसपास उन्होंने पीएच.डी. के लिए शोध शुरू किया, जिसका विषय कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) का कार्यक्रम था। शोध के सिलसिले में वे कोलकाता स्थित पार्टी कार्यालय गए और पार्टी साहित्य व दस्तावेजों का गहन अध्ययन किया। आपातकाल के बाद वे औपचारिक रूप से भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सदस्य बन गए और उनका जीवन पूरी तरह आंदोलन को समर्पित हो गया।
दिन में कॉलेज, रात में मार्क्सवाद की कक्षाएँ
पार्टी से जुड़ने के बाद उनकी सक्रियता आगरा और आसपास के ग्रामीण इलाकों तक फैल गई। दिन में कॉलेज में पढ़ाना और रात में कार्यकर्ताओं के बीच मार्क्सवाद की कक्षाएँ लेना उनकी दिनचर्या बन गया। बाद में उन्होंने कॉमरेड सव्यसाची के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में वैचारिक शिक्षा का व्यापक अभियान चलाया। 1978 में वे आगरा जिला सचिव बने और आपातकाल के बाद संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।
उत्तर प्रदेश में पार्टी पुनर्गठन में योगदान
1980 से पहले उत्तर प्रदेश में पार्टी संगठन दो भागों में बँटा हुआ था। दोनों को मिलाकर जब एक राज्य कमेटी बनाई गई, तो कानपुर सम्मेलन में संगठन को धार देने के लिए 8 युवा साथियों को राज्य कमेटी में शामिल किया गया। इनमें कॉमरेड एस. पी. कश्यप के साथ कॉमरेड विजय शान्त, डी. पी. सिंह, गुलाम सिंह, विजय रावत, डी. पी. त्रिपाठी, बाबू नन्दन राय और अलवेल सिंह शामिल थे।
प्राचार्य पद से पूर्णकालिक कार्यकर्ता तक
वरिष्ठता और योग्यता के आधार पर जब उन्हें महाविद्यालय के प्राचार्य पद की जिम्मेदारी सौंपी गई, तो उन्होंने इसे निष्ठापूर्वक निभाया। लेकिन उनकी पहली प्राथमिकता हमेशा पार्टी ही रही। महज दो साल बाद, 58 वर्ष की उम्र में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ले ली और पार्टी के राज्य केंद्र पर पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में आ गए। इसके बाद उन्होंने पूरे देश के हिंदी भाषी क्षेत्रों में वैचारिक प्रशिक्षण शिविर चलाए।

मार्क्सवाद के लोकप्रिय और सरल शिक्षक
कश्यप जी का पसंदीदा विषय 'द्वंद्वात्मक भौतिकवाद' और 'ऐतिहासिक भौतिकवाद' था। इसके अलावा वे साम्प्रदायिकता, जाति प्रश्न और पहचान की राजनीति पर भी बेहद प्रभावशाली कक्षाएँ लेते थे। कठिन से कठिन सैद्धांतिक विषयों को सरल भाषा और व्यावहारिक उदाहरणों से समझाना उनकी सबसे बड़ी खासियत थी। वे कार्यकर्ताओं को केवल जानकारी नहीं देते थे, बल्कि उन्हें सोचने और सवाल करने के लिए प्रेरित करते थे।
अनेक पीढ़ियों का वैचारिक मार्गदर्शन
तीन दशकों से भी अधिक समय तक उन्होंने हिंदी भाषी राज्यों में पार्टी कार्यकर्ताओं की कई पीढ़ियों को वैचारिक रूप से गढ़ा। 2004 में इलाहाबाद सम्मेलन में उन्हें राज्य सचिव चुना गया । हालांकि कॉमरेड राम सुमेर यादव के निधन के कारण वे यह जिम्मेदारी पहले से संभाल रहे थे। उन्होंने 2015 तक इस पद को निभाया और केंद्रीय कमेटी के सदस्य भी रहे।
लेखन और वैचारिक प्रतिबद्धता
उन्होंने साम्प्रदायिकता, पहचान की राजनीति और मार्क्सवादी दर्शन पर अनेक पुस्तिकाएँ और लेख लिखे। उनका मानना था कि मजबूत राजनीतिक संघर्ष के लिए वैचारिक स्पष्टता अनिवार्य है। वे हर सवाल का तार्किक और मार्क्सवादी विश्लेषण पेश करते थे, जिससे उनके साथ हुई कोई भी सामान्य चर्चा एक वैचारिक कक्षा में बदल जाती थी।
इतिहास, मार्क्सवाद और संघर्ष का संगम
कॉमरेड डॉ. एस. पी. कश्यप का जीवन इतिहासकार, शिक्षक और कम्युनिस्ट कार्यकर्ता की त्रिवेणी था। उन्होंने अपने ज्ञान को निजी प्रतिष्ठा का जरिया बनाने के बजाय शोषितों और जनआंदोलनों की आवाज मजबूत करने में लगाया। उन्होंने साबित किया कि मार्क्सवाद सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि समाज बदलने का वैज्ञानिक हथियार है।
आज के दौर में उनकी विरासत की प्रासंगिकता
आज जब साम्प्रदायिकता और सामाजिक विभाजन की ताकतें हावी हो रही हैं, तब कामरेड कश्यप की वैचारिक विरासत और भी प्रासंगिक हो जाती है। उनका जीवन सिखाता है कि जनसंघर्ष केवल नारों से नहीं, बल्कि स्पष्ट विचार और वैज्ञानिक समझ से मजबूत होते हैं।

कॉमरेड डॉ. एस. पी. कश्यप को उनके जन्मदिवस पर लाल सलाम!

नवाब उद्दीन
सीपीआई(एम) उत्तर प्रदेश राज्य कमेटी के सदस्य हैं। वर्तमान में वे पार्टी के राज्य कार्यालय सचिव के साथ-साथ सोशल मीडिया की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। आगरा के रहने वाले नवाब उद्दीन ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) से की। वे जन विज्ञान आंदोलन और आगरा में चलाए गए साक्षरता अभियान में भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं।
इनपुट सौजन्य: डॉ. अशोक सिंह
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