दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश की वर्तमान पीढ़ी के आंदोलन का एक मुख्य मुद्दा शिक्षा की बदहाल स्थिति भी था। जंतर-मंतर से ही देश के शैक्षणिक संस्थानों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी ने देशभर के विद्यालयों का ऑडिट करने की घोषणा की। इस राज्य में भी स्कूली शिक्षा की बदहाली की असली तस्वीर सामने लाने के लिए एसएफआई (SFI) ने राज्यभर में 'स्कूल बचाओ, मूल बचाओ' आंदोलन शुरू किया है। इस बीच, राज्य सरकार इन चार हजार स्कूलों का बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी में है।
पश्चिम बंगाल में चार हजार स्कूल बेचने की जोरदार तैयारी
नवान्न से स्कूल शिक्षा विभाग को निर्देश

पश्चिम बंगाल की सरकार राज्य के चार हजार से अधिक शून्य छात्र-संख्या (स्टूडेंट-लेस) वाले स्कूलों की संपत्ति बेचने जा रही है।
नवान्न ने जिलाधिकारियों (DMs) को उन सभी सरकारी स्कूलों के घर-मकान से लेकर जमीन-जायदाद से जुड़ी पूरी जानकारी जुटाने का निर्देश दिया है, जिनमें एक भी छात्र नहीं है। शून्य छात्र वाले विद्यालयों की संपूर्ण संपत्ति की जानकारी जुटाने के साथ-साथ, भविष्य में इस विशाल सरकारी संपत्ति को पीपीपी (PPP) मॉडल के तहत निजी हाथों में सौंपने के लिए जिलाधिकारियों को 'पुनरुद्धार परियोजना' (रिवाइवल प्रोजेक्ट) तैयार करने का निर्देश दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप, शून्य छात्र वाले स्कूलों में छात्रों को वापस लाकर उन्हें बचाने के बजाय, राज्य सरकार ने सरकारी स्कूलों की इस विशाल संपत्ति को बेचने का लक्ष्य तय किया है।
नवान्न के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "शून्य छात्र वाले सरकारी विद्यालयों की वर्तमान स्थिति का सत्यापन करने का निर्देश दिया गया है। स्कूलों के क्लासरूम, स्कूल भवन और अन्य संपत्तियों के साथ-साथ स्कूलों की जमीन का भी मूल्यांकन करने को कहा गया है। हमारा प्राथमिक प्रयास इन स्कूलों की विशाल संपत्ति का अधिकतम उपयोग करना होगा। आवश्यकता पड़ने पर पीपीपी मॉडल का ही पालन किया जाएगा।"

पिछले अगस्त में ही केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से देशभर की स्कूली शिक्षा के आंकड़े जारी किए गए थे। वर्ष 2025-26 के यूडाइज प्लस (UDISE+) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल के 4,133 विद्यालयों में एक भी छात्र नहीं है। इन विद्यालयों से 19 हजार से अधिक शिक्षक जुड़े हुए हैं। अगस्त महीने में ये आंकड़े मिलने के बाद राज्य की नई सरकार ने कोई इंतजार नहीं किया। 100 दिनों के भीतर ही मुख्यमंत्री सचिवालय से विद्यालय शिक्षा विभाग को एक पत्र भेजा गया था। गत 21 अगस्त को भेजे गए उस पत्र में 'जीरो एनरोलमेंट' (शून्य नामांकन) वाले स्कूलों की चल-अचल संपत्ति का मूल्यांकन कर सरकार को लिखित रिपोर्ट भेजने के लिए कहा गया था।
राज्य में विश्वविद्यालयों की पढ़ाई और अनुसंधान कार्य को ठप्प करने के लिए राज्य विधानसभा के विशेष सत्र के माध्यम से हाल ही में राज्य की भाजपा सरकार ने कानून में संशोधन किया है। कुछ दिन पहले ही राज्य के विद्यालय शिक्षा विभाग के एक कार्यक्रम में आकर मुख्यमंत्री ने बताया था, "पिछले 15 वर्षों में इस राज्य की स्कूली शिक्षा राष्ट्रीय स्तर पर 31वें स्थान पर चली गई है। इसे देश के शीर्ष 10 राज्यों की सूची में लाने में कम से कम तीन साल का समय लगेगा।" और उसी राज्य में सरकार इस बात पर विचार-विमर्श कर रही है कि शून्य छात्र वाले चार हजार से अधिक सरकारी स्कूलों की संपत्ति को कैसे बेचा जाए।
मुख्यमंत्री सचिवालय से पत्र मिलने के बाद, बीते बुधवार को राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव ने राज्य के सभी जिलाधिकारियों और कोलकाता नगर निगम के आयुक्त को एक दिशा-निर्देश भेजा है। इस निर्देशिका में क्या कहा गया है?
जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जिला स्तर पर चार सदस्यीय समिति गठित करने की बात कही गई है। जिलाधिकारी के अलावा जिला शिक्षा अधिकारी (DEO), जिला स्कूल शिक्षा निरीक्षक (DI) और काम की सुविधा के लिए जिलाधिकारी किसी अन्य अधिकारी को इस समिति का सदस्य बना सकते हैं। जिला स्तर पर गठित इस समिति का पहला काम जिला स्तर पर शून्य छात्र वाले स्कूलों का प्रत्यक्ष (ऑन-साइट) निरीक्षण करना होगा और सभी पहलुओं की जांच करके विद्यालयों की संपूर्ण संपत्ति का 'स्टॉक टेकिंग' (लेखा-जोखा) करना होगा।
प्रथम चरण में चार हजार विद्यालयों की संपत्ति का मिलान करने के बाद, दूसरे चरण में भूमि और स्कूल भवन की वर्तमान स्थिति को देखकर उसका हिसाब-किताब लगाना और साथ ही स्कूल के अधीन भूमि के क्षेत्रफल और उसके वर्तमान बाजार मूल्य का मूल्यांकन करना शामिल है।

राज्य प्रशासन के एक अधिकारी के अनुसार, चार सदस्यीय समिति से यह सुझाव देने को कहा गया है कि इन सरकारी विद्यालयों के बेकार पड़े भवनों, भूमि और अन्य सभी बुनियादी ढांचों का उपयोग स्थानीय लोगों के हित में कैसे किया जा सकता है। इसमें ऐसे सरकारी प्रशिक्षण केंद्र और स्वास्थ्य केंद्र शामिल किए गए हैं जिन्हें स्थानीय लोग स्वीकार कर सकें, साथ ही इसे पशु संसाधन विकास विभाग के केंद्रों से भी जोड़ा गया है। ऐसा भी हो सकता है कि स्कूल बंद करके उसकी जमीन पर मवेशी केंद्र (कैटल सेंटर) बना दिया जाए!
हालांकि, यदि जिलाधिकारी के नेतृत्व वाली चार सदस्यीय समिति को लगता है कि वर्तमान में शून्य छात्र वाले विद्यालयों को पुनः पठन-पाठन के योग्य बनाना संभव है, तो उसे इसकी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा गया है। लेकिन राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया, "शून्य छात्र वाले विद्यालयों को पुनः सरकारी विद्यालय के रूप में चलाने की सरकार की कोई योजना नहीं है। आने वाले दिनों में इन्हें पीपीपी मॉडल के तहत निजी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को सौंपने पर विचार किया जा रहा है।"
कुल मिलाकर, जिला स्तरीय समिति को अगले 30 दिनों के भीतर रिपोर्ट तैयार कर राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग को भेजने का निर्देश दिया गया है। चार हजार से अधिक शून्य छात्र वाले विद्यालयों की रिपोर्ट मिलने के बाद विद्यालय शिक्षा विभाग अपनी योजना राज्य सरकार को सौंपेगा। इसके बाद राज्य सरकार समीक्षा कर तय करेगी कि इन शून्य छात्र वाले विद्यालयों का भविष्य क्या होगा।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश की वर्तमान पीढ़ी के आंदोलन का एक मुख्य मुद्दा शिक्षा की बदहाल स्थिति भी था। जंतर-मंतर से ही देश के शैक्षणिक संस्थानों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी ने देशभर के विद्यालयों का ऑडिट करने की घोषणा की। इस राज्य में भी स्कूली शिक्षा की बदहाली की असली तस्वीर सामने लाने के लिए एसएफआई (SFI) ने राज्यभर में 'स्कूल बचाओ, मूल बचाओ' आंदोलन शुरू किया है। इस बीच, राज्य सरकार इन चार हजार स्कूलों का बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी में है।
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साभार:बांग्ला दैनिक गणशक्ति
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