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इस विश्व कप ने हमें क्या दिया? ~शमीक लाहिड़ी

केशव कुमार भट्टड़•19 जुलाई 202613 मिनट पठन100 बार पढ़ा गया

2026 का विश्व कप केवल एक ट्रॉफी की रेस नहीं, बल्कि फुटबॉल के नक्शे पर अफ्रीका और एशिया जैसी शक्तियों (ग्लोबल साउथ) के आत्मसम्मान और उनकी तेज रफ्तार की एक ऐतिहासिक गवाही है। एक समय जिन महाद्वीपों के संसाधनों और इंसानों को यूरोप ने गुलाम बनाया, आज उन्हीं के बच्चे यूरोपीय फुटबॉल और स्कोरबोर्ड पर राज कर के इतिहास का कर्ज ब्याज समेत चुका रहे हैं। फुटबॉल के चारों ओर आज भले ही अरबों डॉलर, एआई , डेटा और कॉर्पोरेट विज्ञापनों की दीवार खड़ी कर दी गई हो, लेकिन बाजार आज भी आम इंसानों और बच्चों के फुटबॉल से जुड़े असीमित सपनों को खरीद नहीं पाया है। यह खेल भू-राजनीति और शक्तिशाली पासपोर्टों की असमान दुनिया को मैदान पर कुछ घंटों के लिए बराबर कर देता है, जहाँ अंततः ताकत हमेशा नहीं जीतती और छोटी टीमें भी इतिहास बदल देती हैं।

इस विश्व कप ने हमें क्या दिया?     ~शमीक लाहिड़ी

इस विश्व कप ने हमें क्या दिया? ~शमीक लाहिड़ी

दक्षिण के पैरों की आहट, एक ट्रॉफी की ओर बढ़ते 48 देशों की कहानी? कुछ गोल? कुछ नए नायक?

नहीं! इस विश्व कप ने हमें एक आईना दिया।

उस आईने में दुनिया ने खुद को देखा। देखा कि भू-अर्थव्यवस्था का नक्शा और फुटबॉल का नक्शा एक नहीं हैं। देखा कि सीमाएं, अप्रवासन , पासपोर्ट, कॉर्पोरेट, कर्ज, इतिहास और यादें—सब कुछ किसी न किसी तरह एक गेंद के भीतर निवास करते हैं। और सबसे बड़ी बात, इस विश्व कप ने हमें याद दिलाया कि 'ग्लोबल साउथ' (दुनिया का दक्षिणी हिस्सा) अभी भी जीवित है। और अब वह पहले से कहीं ज्यादा तेज दौड़ सकता है।

सालों तक विश्व कप यूरोप और दक्षिण अमेरिका की जागीर था। बाकी सब मेहमान थे। अफ्रीका का काम था बहादुरी से हारना। एशिया का काम था अनुभव हासिल करना। छोटे देशों का काम था बड़ों के लिए गोलों की संख्या बढ़ाना। इनके लिए पहले से ही एक संवाद लिखा होता था—'उन्होंने बहुत अच्छी लड़ाई लड़ी।' फुटबॉल के शब्दकोश में इस वाक्य का अर्थ था—वे हार गए।

इस विश्व कप ने उस शब्दकोश के कुछ पन्ने फाड़ दिए हैं।

2026 विश्व कप के 48 टीमों के टूर्नामेंट में अफ्रीका की 9 टीमों को पहली बार सीधे जगह मिली। कई लोगों ने कहा था कि इससे विश्व कप का स्तर गिरेगा। लेकिन इसका जवाब मैदान पर मिला। मोरक्को ने नीदरलैंड को विदा किया। पराग्वे ने जर्मनी को रोका। डीआर कांगो ने नॉकआउट दौर में अपनी उपस्थिति की घोषणा की। अल्जीरिया, मिस्र, घाना, सेनेगल, केप वर्डे—अब विश्व कप के पर्यटक नहीं हैं। वे सिर्फ कहानी के पात्र नहीं हैं। वे कहानी के लेखक बनने आए हैं।

एक समय था जब छोटे देश महाशक्तियों के खिलाफ खेलने उतरते थे, तो कैमरे उनकी आंखों में डर ढूंढते थे। इस बार कैमरों ने डर दूसरी तरफ ढूंढा। क्योंकि फुटबॉल कभी-कभी इतिहास से भी ज्यादा न्यायप्रिय होता है। इतिहास में उपनिवेशवादियों की अक्सर जीत हुई है। फुटबॉल में कभी-कभी उपनिवेशित भी जीतते हैं। अफ्रीका का यह उदय केवल फुटबॉल का उदय नहीं है। यह इतिहास का प्रतिशोध भी है। एक समय अफ्रीका से सोना लूटा गया था। हीरे निकाल लिए गए थे। रबर, कोबाल्ट, यूरेनियम निकाल लिए गए थे। और इंसानों को गुलाम बनाकर ले जाया गया था। आज उन्हीं के बच्चे फुटबॉलर बनकर यूरोप के स्टेडियमों में लौट आए हैं। वे इतिहास की किताबों में नहीं लौटे हैं। वे स्कोरबोर्ड पर लौटे हैं। जिस महाद्वीप के संसाधनों से यूरोप ने औद्योगिक क्रांति खड़ी की थी, उसी महाद्वीप के बच्चे आज यूरोपीय फुटबॉल की सबसे मूल्यवान संपत्ति हैं।

इतिहास की एक अजीब आदत होती है। वह कभी-कभी ब्याज समेत कर्ज लौटाता है।

फ्रांस की जर्सी में अफ्रीका की धड़कन सुनाई देती है। इंग्लैंड की जर्सी में कैरेबियाई सागर की लहरें हैं। नीदरलैंड की जर्सी में सूरीनाम की नदी है। बेल्जियम की जर्सी में कांगो की लंबी परछाई है। पुर्तगाल की जर्सी में अफ्रीका के पुराने उपनिवेशों की यादें हैं। यूरोप के स्टेडियमों में जिन गोलों का जश्न मनाया जाता है, उनकी जड़ें शायद हजारों किलोमीटर दूर किसी रेगिस्तान में, किसी बंदरगाह शहर में, किसी शरणार्थी शिविर में या किसी अप्रवासी मोहल्ले में होती हैं। फुटबॉल कभी-कभी इतिहास का सबसे सच्चा संग्रह होता है। वह भूलता नहीं है। वह बस इंतजार करता है। एक समय यूरोप अफ्रीका की ओर लूटपाट करने के लिए जहाज भेजता था। आज अफ्रीका के बच्चे यूरोप के लिए विश्व कप में गोल कर रहे हैं। जिस महाद्वीप के सोने से बैंक बने थे, उसी महाद्वीप के बच्चों के पैरों से अब ट्रॉफी के सपने बुने जा रहे हैं। कोई इसे वैश्वीकरण कहता है। कोई इसे प्रवासन कहता है। कोई इसे श्रम बाजार कहता है।

इतिहास के शब्दकोश में इसका एक और नाम भी है—'वापसी'।

लेकिन यह विश्व कप सिर्फ विद्रोह की कहानी नहीं है। यह डॉलर की भी कहानी है। एक समय फुटबॉल गरीब लोगों की सबसे बड़ी विलासिता थी। कपड़े की गेंद। दो ईंटें। थोड़ा सा खाली स्थान। बस, खेल शुरू। गेंद सस्ती थी, लेकिन सपने बहुत महंगे थे। फुटबॉल आज भी आम लोगों का खेल है। आज भी मजदूरों का खेल है। किसानों का खेल है। आज भी शरणार्थियों का खेल है। आज भी बंदरगाह शहरों के, पहाड़ी गांवों के, रेगिस्तानों के, झुग्गियों के, कस्बों के, कूचबिहार-कोलकाता-काकद्वीप के एक टुकड़े मैदान से लेकर कैसाब्लांका की गलियों तक करोड़ों लोगों का खेल है। आज उसी खेल के चारों ओर अरबों डॉलर की दीवार खड़ी कर दी गई है। फीफा की चार साल की व्यावसायिक आय अब कई अरब डॉलर तक पहुंच चुकी है। विश्व कप के प्रसारण अधिकार, स्पॉन्सरशिप, स्ट्रीमिंग, डिजिटल कंटेंट, लाइसेंसिंग—सब मिलाकर फुटबॉल अब दुनिया के सबसे बड़े मनोरंजन उद्योगों में से एक है। एक गोल अब सिर्फ गोल नहीं है। वह एक विज्ञापन भी है। एक ब्रांड है। बाजार मूल्य से उसे नापा जाता है। शेयरधारक की मुस्कान है। सट्टेबाजी क्लबों में शराब के फव्वारे हैं।

एक समय क्लब मजदूरों का समुदाय हुआ करते थे। आज कई क्लब निवेश फंडों की संपत्ति हैं। एक समय प्रशंसक टीमें बनाते थे। आज कई बार टीमें प्रशंसक बनाती हैं। एक समय स्टेडियम शहर की आत्मा होते थे। आज वे कॉर्पोरेट आतिथ्य का बाजार हैं। एक समय जर्सी के सीने पर क्लब की भावना, प्यार और सपने देखने का प्रतीक होता था। आज वहां किसी कंपनी का नाम होता है।

एक समय फुटबॉलर शहर के नायक होते थे। आज वे बहुराष्ट्रीय ब्रांडस के दूत हैं। फुटबॉल आज भी गरीबों का सपना है। लेकिन इसका मालिकाना हक धीरे-धीरे अमीरों के हाथों में जा रहा है। जिस खेल का जन्म बंदरगाह शहरों में, खनन क्षेत्रों में, कारखानों की छुट्टी की दोपहर में हुआ था, वही खेल आज इन्वेस्टमेंट बैंक, डेटा एनालिटिक्स और कॉर्पोरेट कंसल्टेंसी फर्मों की भाषा में बोलना सीख रहा है। दीर्घा (गैलरी) के लोग हालांकि अब भी गाते हैं। लेकिन खेल का हिसाब बहुत पहले ही स्प्रेडशीट पर जा चुका है। एक समय स्काउट्स खिलाड़ियों की आंखों को देखते थे। आज वे उनके डेटा का विश्लेषण एआई से करते हैं।

एक समय कोच हिम्मत नापते थे। आज सॉफ्टवेयर दौड़ की रफ्तार नापता है। एक समय प्रशंसक इंसान था। आज वह भी डेटा है। उसकी पसंद—डेटा है। उसकी आदत—डेटा है। उसकी क्रय शक्ति—डेटा है। इक्कीसवीं सदी के फुटबॉल में डेटा भी एक तरह का तेल है। और जिसके हाथ में तेल होता है, सत्ता भी कई बार उसी के हाथ में चली जाती है।

इस विश्व कप ने हमें एक और सच्चाई की याद दिलाई है। फुटबॉल और राजनीति अलग-अलग महाद्वीप नहीं हैं। फीफा लंबे समय से कहता आ रहा है—राजनीति मैदान से बाहर रहे। लेकिन इतिहास जानता है, फुटबॉल कभी मैदान के भीतर सीमित नहीं रहा। मुसोलिनी यह जानते थे। फ्रैंको यह जानते थे। पिनोशे यह जानते थे। सैन्य जुंटा भी यह जानते थे। कॉर्पोरेट्स भी यह जानते हैं। देश भी यह जानते हैं। फीफा भी जानता है। क्योंकि दुनिया की सबसे लोकप्रिय भाषा को कोई भी राजनीति से बाहर नहीं रखना चाहता।

इस विश्व कप में ईरान उस सच्चाई का एक असहज करने वाला स्मारक बन गया था। ईरान खेला था। लेकिन ईरान को सिर्फ प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ नहीं खेलना था। उन्हें सीमाओं के खिलाफ भी खेलना था। वीजा के खिलाफ भी। सुरक्षा नीतियों के खिलाफ भी। राजनीति के खिलाफ भी। मैदान पर प्रतिद्वंद्वी ग्यारह खिलाड़ी थे। मैदान के बाहर प्रतिद्वंद्वी और भी कई थे। अमेरिकी अप्रवासन और सुरक्षा नीति के कारण ईरानी प्रशंसकों, पत्रकारों और प्रतिनिधियों के आने-जाने और ठहरने को लेकर कई तरह की बाधाएं खड़ी की गई थीं। ईरान के खिलाफ दंडात्मक रुख अपनाने में फीफा बहुत तेज था। लेकिन जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से फीफा के फैसले पर आपत्ति जताई, तो वह दृढ़ता काफी हद तक गायब होती दिखी। जो रेड कार्ड कभी सिद्धांतों का प्रतीक लगता था, वह सत्ता के गलियारों में जाकर फीका पड़ गया। नियमों की भाषा तब सबके लिए समान नहीं रही। एक बार फिर साबित हुआ—फुटबॉल की कानून की किताब भी कभी-कभी भू-राजनीति के शब्दकोश से निर्देश उधार लेती है।

स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है—अगर विश्व कप वास्तव में सबका है, तो क्या दुनिया के सभी पासपोर्ट बराबर हैं?

अगर यह वास्तव में फुटबॉल का विश्व कप है, तो क्या दुनिया के सभी नागरिक इस उत्सव में समान रूप से भाग ले सकते हैं? फीफा कहता है, फुटबॉल किसी को बाहर नहीं करता। लेकिन दुनिया के हवाई अड्डे हमेशा वह भाषा नहीं समझते। वीजा कार्यालय भी नहीं समझते। सीमा रक्षक भी नहीं समझते। और फीफा भी आंखें मूंदे रहता है। नतीजतन, कई बार राजनीति बिना टिकट के ही स्टेडियम में घुस जाती है।

फुटबॉल के मैदान की गेंद का आकार गोल है। लेकिन दुनिया का नक्शा अभी भी असमान है। कोई शक्तिशाली पासपोर्ट के साथ पैदा होता है। कोई प्रतिबंधों के साथ पैदा होता है। कोई स्पॉन्सर के साथ पैदा होता है। कोई संदेह के साथ पैदा होता है। कोई वैश्विक बाजार के केंद्र में पैदा होता है। कोई उसके छोर पर पैदा होता है। हालांकि, अब भी फुटबॉल कभी-कभी इस असमान दुनिया को कुछ घंटों के लिए बराबर कर देता है। शायद इसी वजह से लोग आज भी उससे प्यार करते हैं।

इस विश्व कप ने एक और बात दिखाई है। अगर फुटबॉल पूरी तरह से अर्थव्यवस्था के नियमों का पालन करता, तो सबसे अमीर देश ही हमेशा विश्व चैंपियन बनता। तब स्टेडियमों की जरूरत ही नहीं होती। एक बहीखाता ही काफी होता। लेकिन फुटबॉल की खूबसूरती यह है—वह अर्थव्यवस्था के हिसाब-किताब को नहीं मानता। वह जीडीपी को नहीं मानता। वह बाजार मूल्य को नहीं मानता। वह इतिहास को भी नहीं मानता। और इन्हीं सब कारणों से, फुटबॉल आज भी खतरनाक महाशक्तियों के लिए एक चुनौती है।

क्योंकि फुटबॉल लोगों को समानता का सपना दिखाता है। क्योंकि फुटबॉल लोगों को विश्वास दिलाता है कि छोटे भी जीत सकते हैं। क्योंकि फुटबॉल लोगों को सिखाता है कि सत्ता हमेशा विजयी नहीं होती। सीमाएं हमेशा अंतिम बात नहीं होतीं। और इतिहास हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलता।

डीआर कांगो का एक बच्चा अब भी सपना देखता है। केप वर्डे का एक द्वीप अब भी विश्वास करता है। कैसाब्लांका की किसी गली में अब भी गोलपोस्ट बनाने के लिए दो ईंटें ही काफी हैं। डाकार की किसी सड़क पर अब भी गेंद लुढ़क जाती है। अल्जीयर्स की किसी छत पर अब भी शाम फुटबॉल की आवाज के साथ ढलती है। कूचबिहार-कोलकाता-काकद्वीप की किसी गली या मैदान में अब भी दोपहर के बाद की धूप फुटबॉल के लिए ठहर जाती है।

कॉर्पोरेट्स प्रसारण अधिकार खरीद सकते हैं। स्टेडियम का नाम खरीद सकते हैं। जर्सी का सीना खरीद सकते हैं। एल्गोरिदम खरीद सकते हैं। डेटा खरीद सकते हैं। लेकिन वे अभी तक सपनों के मालिक नहीं बने हैं। क्योंकि ग्लोबल साउथ में अभी भी ऐसे बहुत से लोग हैं, जो नहीं जानते कि बाजार मूल्य क्या होता है! नहीं जानते कि स्पॉन्सरशिप क्या होती है! नहीं जानते कि प्रसारण अधिकार क्या होता है! वे सिर्फ इतना जानते हैं कि गेंद को लात मारने पर वह लुढ़क जाती है। और उस लुढ़कती हुई गेंद के पीछे भागते-भागते इंसान कभी-कभी अपनी आजादी तक पहुंच जाता है।

किसी भी विश्व कप का सबसे बड़ा उपहार ट्रॉफी नहीं, बल्कि कई चीजों की यादें होती हैं। वह याद दिलाता है—ग्लोबल साउथ अभी भी बोल सकता है। अफ्रीका, एशिया, मध्य पूर्व अब सिर्फ कच्चे माल के महाद्वीप नहीं हैं, बल्कि फुटबॉल के भी एक नए केंद्र हैं। अप्रवासियों के बच्चे अब भी इतिहास लिख सकते हैं। छोटे झंडे अब भी बड़े झंडों के बगल में खड़े हो सकते हैं। कॉर्पोरेट अभी सब कुछ नहीं खरीद पाए हैं।

गेंद अभी भी गोल है। और गोल गेंद की एक पुरानी आदत है। वह हमेशा सत्ता के पैरों के पास जाकर नहीं रुकती। कभी वह मोरक्को की तरफ लुढ़क जाती है। कभी कांगो की तरफ। कभी केप वर्डे की तरफ। कभी किसी ऐसे बच्चे की तरफ, जो अब भी विश्वास करता है कि दुनिया को पैरों की मदद से भी बदला जा सकता है। क्योंकि माराडोना-मेसी के पैर उनके लिए एक सपना हैं। क्योंकि फुटबॉल ग्लोबल साउथ के पैरों की भी आहट है। और ग्लोबल साउथ के पैरों की आहट काफी जोर से सुनाई दे रही है। इतिहास के लंबे गलियारे में, अंततः, वही आवाज बहुत दूर तक पहुंच रही है।

यह विश्व कप सिर्फ सत्ता की कहानी नहीं है। यह असमानता की कहानी भी है। अफ्रीका का मार्च जितना आश्चर्यजनक था, वहीं एशिया के लिए यह विश्व कप आत्म-आलोचना का एक आईना था। जापान और दक्षिण कोरिया को छोड़कर एशिया के अधिकांश देश अभी तक यूरोप और दक्षिण अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा करने लायक ढांचा, घरेलू लीग, दीर्घकालिक योजना या फुटबॉल संस्कृति विकसित नहीं कर पाए हैं। सिर्फ पैसा बहाने से फुटबॉल नहीं बनता; फुटबॉल मैदान पर, मोहल्लों में, स्कूलों में, क्लबों में, कोच के धैर्य और समर्थकों के विश्वास से बनता है। जापान और दक्षिण कोरिया इसी रास्ते पर कई सालों से चल रहे हैं। एशिया के बाकी देशों के सामने अभी भी वह लंबा रास्ता उपेक्षित पड़ा हुआ है।

आज 19 जुलाई है। अर्जेंटीना बनाम स्पेन। एक ऐसा फाइनल, जो सिर्फ दो टीमों की लड़ाई नहीं है; बल्कि दो फुटबॉल-दर्शनों का आमना-सामना है। एक तरफ लैटिन अमेरिका की कल्पना, भावना और अप्रत्याशित सुंदरता है। दूसरी तरफ यूरोपीय अनुशासन, गति, संगठन, सटीक गणित और आधुनिकता की वास्तुकला है। कौन जीतेगा, इसका जवाब 90 या 120 मिनट के पास है। लेकिन उससे पहले ही हम सभी के पास जीत लेने का मौका है—खेल का आनंद। क्योंकि अंत में ट्रॉफी किसी एक देश के हाथ में जाती है, लेकिन फुटबॉल की खूबसूरती सबके पास रह जाती है।

फाइनल को लेकर, टीमों को लेकर बहस चलेगी, पसंदीदा खिलाड़ी के नाम पर चीख-पुकार भी होगी, गोल होने पर 600 करोड़ दुनियावासियों के साथ शोर भी मचेगा, और हार का दर्द भी बांटना होगा। लेकिन इन सब से पहले यह याद रखना होगा—फुटबॉल हम सबका है।

फुटबॉल दुनिया का सबसे खूबसूरत खेल है, क्योंकि यह अभी पूरी तरह से बाजार के कब्जे में नहीं गया है। आज भी किसी बच्चे का नंगा पैर गेंद को इस तरह छू सकता है, जिसकी भविष्यवाणी कोई एल्गोरिदम पहले से नहीं कर सकता। आज भी किसी गली में दो ईंटों का गोलपोस्ट अरबों डॉलर के स्टेडियम से भी कहीं बड़ा सपना बुनता है। आज भी दीर्घा (गैलरी) के लोगों के गीत कॉर्पोरेट विज्ञापनों से कहीं ज्यादा सच्चे हैं। कॉर्पोरेट्स शायद प्रसारण अधिकार खरीद सकते हैं। स्टेडियम का नाम खरीद सकते हैं। जर्सी का सीना खरीद सकते हैं। खिलाड़ी का बाजार मूल्य तय कर सकते हैं। लेकिन उन्होंने अभी तक इंसानी विस्मय को नहीं खरीदा है। नहीं खरीदा है उस पल को, जब कोई बच्चा पहली बार गेंद को लात मारकर यह विश्वास करता है कि—दुनिया को बदलना भी शायद संभव है।

इसी वजह से फुटबॉल आज भी आम लोगों का खेल है। आज भी मजदूरों का खेल है। किसानों का खेल है। आज भी शरणार्थियों का खेल है। आज भी बंदरगाह शहरों के, पहाड़ी गांवों के, रेगिस्तानों के, झुग्गियों के, कस्बों के, कूचबिहार-कोलकाता-काकद्वीप के एक टुकड़े मैदान से लेकर कैसाब्लांका की गलियों तक करोड़ों लोगों का खेल है।

और इसी कारण से, ग्लोबल साउथ के पैरों की आहट अभी थमी नहीं है। बल्कि और जोर से सुनाई दे रही है। ग्लोबल साउथ का मतलब नक्शे का निचला हिस्सा नहीं है। यह उन लोगों का भूगोल है, जिनके श्रम से दुनिया समृद्ध हुई है, लेकिन संसाधनों और सत्ता के बंटवारे में उन्हें सबसे कम हिस्सा मिला है। इतिहास ने उन्हें कई बार हारा हुआ लिखा है; फुटबॉल कभी-कभी उसी इतिहास को बदल देता है। इतिहास के लंबे गलियारे में, सत्ता के महलों की दीवारों को पार कर, बाजार के कोलाहल को दबाकर वह आवाज आज भी कहती जा रही है, दुनिया को कभी-कभी पैरों की मदद से भी बदला जा सकता है।

लेखक सीपीआई(एम) की केन्द्रीय समिति के सदस्य हैं।
साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति। 19 जुलाई 2026

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इस विश्व कप ने हमें क्या दिया? ~शमीक लाहिड़ी

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जंतर-मंतर जेन-जी दमन : कॉरपोरेट-सत्ता गठजोड़ का बर्बर चेहरा। ~ केशव भट्टड़

"दबाओगे बर्बरता से जितनी आवाजें, गूँजेगी उतनी ही दूर तक इंकलाब की पुकार।"। नीट (NEET) परीक्षा धांधली और शिक्षा के बाज़ारीकरण के खिलाफ जंतर-मंतर पर चल रहा छात्रों-युवाओं का अहिंसक आंदोलन राज्य सत्ता के सीधे निशाने पर आ गया। सरकार ने फर्जी साजिशें रचकर, संचार बंद कर और बेलगाम पुलिसिया बल प्रयोग से बतर्ज 'जलियाँवाला बाग़' हजारों प्रदर्शनकारी युवाओं को घेर कर बर्बरता से पीटा और आंदोलन को दबंगता से दबाने की कोशिश की, गोदी मीडिया की चुप्पी के बीच स्वतंत्र पत्रकारों पर सत्ता प्रायोजित हमले हुए, और प्रतिक्रिया में 'जंतर-मंतर जेन-जी दमन' से आक्रोशित छात्रों का यह आंदोलन देशभर में फैल गया। तब ब्रिटिश राज के दौरान जलियाँवाला बाग़ में अंधाधुंध गोलियाँ दागी गई थी, अब बीजेपी राज में जंतर-मंतर जेन-जी दमन के दौरान कील लगी लाठियाँ, आँसू गैस, वाटर कैनन, शॉक बेटन, पेलेट गन के साथ-साथ लात-बूटों,थप्पडें और भद्दी गालियाँ दागी गई हैं। तब देश गुलाम था, अब देश आजाद है, दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। तब भी भारत डोला था, अब भी भारत डोला है। तब तारीख थी 13 अप्रैल 1919, अब तारीख थी 20 जुलाई 2026। और शाम होते-होते छात्रों-युवाओं ने जंतर-मंतर पर वापस कब्ज़ा कर यह साबित कर दिया कि कॉर्पोरेटऔर सत्ता गठजोड़ की बर्बरता से विचारों और क्रांति को दबाया नहीं जा सकता। बुरी तरह पुलिस और अर्धसैनिक बलों से मार खाकर भी बंद मुट्ठी तनकर उठी हुई थी। युवा भारत के इस जोश-जुनून-जज्बे को सलाम।

केशव कुमार भट्टड़ • 27 जुलाई 2026

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सूचना का नियंत्रित प्रवाह और भारतीय लोकतंत्र का डिजिटल संकट ~केशव भट्टड़

आधुनिक भारतीय राजनीति में सत्ता द्वारा सूचना को नियंत्रित कर भ्रम का माहौल बनाने और उसके कारण लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ते दुष्प्रभावों का एक विश्लेषणात्मक ब्योरा है यह विमर्श । यह प्रायोजित इकोसिस्टम देश के धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताने-बाने को जहरीला बनाकर बुनियादी सवालों (स्वास्थ्य, शिक्षा,रोजगार, पर्यावरण आदि) को हाशिए पर धकेल रहा है। इससे निपटने के लिए नागरिकों के भीतर "डिजिटल एवं मीडिया साक्षरता" के साथ-साथ कड़े कानूनी नियमों का होना बहुत जरूरी है।

जन-आंदोलनों और असहमति का दमन: जब भी छात्र, किसान या नागरिक अपनी जायज़ मांगों के लिए आवाज़ उठाते हैं, तो सत्ता दल का संगठित डिजिटल तंत्र (आईटी सेल्स) उनके मूल मुद्दों पर बहस करने के बजाय उन्हें "टूलकिट", "राजनीतिक मोहरा" या "राष्ट्र-विरोधी" ठहराकर सत्ता हित में आंदोलन की साख बिगाड़ने, उसे संदेहास्पद बनाने और असहमति का गला घोंटने का काम करता है।

भ्रामक तकनीकों का इस्तेमाल: जनमानस को गुमराह करने के लिए कांट-छांट कर बनाए गए क्लिप्ड वीडियो (cropped videos), पुरानी या असंबंधित तस्वीरें और लक्षित चरित्र-हनन (targeted trolling) का सहारा लिया जाता है।

एआई और डीपफेक का नया संकट: तकनीक के आगे बढ़ने के साथ वॉयस क्लोनिंग, एआई-जनरेटेड फर्जी तस्वीरें और डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल करके 'पूर्णतः गढ़े गए सच' (synthesized reality) का निर्माण किया जा रहा है। इसका सबसे खतरनाक पक्ष महिलाओं, पत्रकारों, छात्रों, विपक्षी नेताओं और असहमत नागरिकों का चरित्र-हनन तथा "लायर्स डिविडेंड" (दोषियों द्वारा अपने वास्तविक अपराधों को भी एआई/डीपफेक बताकर मुकर जाना) है।

मीडिया और सत्ता का गठजोड़: डिजिटल वॉर-रूम्स में तैयार भ्रामक हैशटैग्स और प्रायोजित मुद्दों को मुख्यधारा का मीडिया (गोदी मीडिया) बिना किसी फैक्ट-चेक के अपने प्राइम-टाइम शो में जगह देता है, जिसे संस्थागत मौन समर्थन भी दे दिया जाता है।

लोकतंत्र केवल संविधान के पन्नों में जीवित नहीं रहता, वह नागरिकों की जागरूक चेतना में सांस लेता है। जब सत्ता या राजनीतिक दल ब्रॉडकास्टिंग और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी एवं एआई का इस्तेमाल असहमति को दबाने, चरित्र-हनन करने और जनता को गुमराह करने के लिए कर रहे हों, तब 'मीडिया साक्षरता' ही वह लोकतांत्रिक हथियार है जो नागरिकों को अंधभक्त या मोहरा बनने से बचा सकती है। सच को पहचानना और झूठ के कारोबार को खारिज करना ही आज के दौर में सबसे बड़ी देशभक्ति और लोकतांत्रिक कर्तव्य है। इसे रोकने के लिए कड़े कानून की जरूरत है जो तकनीकी पारदर्शिता (जैसे डिजिटल वॉटरमार्किंग), संस्थागत स्वतंत्रता और कड़ी कानूनी जवाबदेही का एक संतुलित ढांचा प्रदान करे। यह तकनीक के विकास को बिना रोके, उसके 'दुष्प्रचार और दमनकारी उपयोग पर पूर्ण विराम' लगाने में सक्षम हो। कानून का उपयोग सत्ता या उसके दल द्वारा जायज असहमति या पत्रकारिता को दबाने के लिए न हो, इसके लिए विशेष प्रावधान भी हो।


केशव कुमार भट्टड़ • 25 जुलाई 2026

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