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क्यों पश्चिम बंगाल में वामपंथ के revival से आंखें मूंदे बैठे हैं हमारे 'साहसी यू ट्यूबर्स'
यूट्यूब पर एक बड़ी संख्या ऐसे यूट्यूबर्स की है जो अपने को बहुत ही लोकतांत्रिक मानते हैं। उसमें अभिसार शर्मा हैं ,पुण्य प्रसून वाजपेयी हैं, अजित अंजुम हैं। ऐसे बहुत सारे नाम हैं लेकिन पश्चिम बंगाल के मामले में इन सबका रवैया बेहद एक पक्षीय रहता है। पता नहीं क्यों यह 2026 के बदलते हुए बंगाल को देखने में असमर्थ साबित हो रहे हैं। जिस तरह से पश्चिम बंगाल में जनता का बड़ा हिस्सा , ख़ासकर युवाओं का , वाम मोर्चे को अपना भरपूर समर्थन ही नहीं दे रहा है बल्कि वाम मोर्चे के प्रत्याशियों के साथ दिन रात जी तोड़ मेहनत कर रहा है और जनता से एक बड़ा अच्छा रिस्पॉन्स इस बार वाम मोर्चा को मिल रहा है। इस बारे में इन साहसी यूट्यूबर्स की प्रतिक्रिया आपको देखने को नहीं मिलेगी। ममता जी की छांव में पिछले वर्षों में बीजेपी का विरोध करते हुए यह 'बहुत न्यूट्रल' यूट्यूबर्स काफ़ी पुष्पित पल्लवित भी हुए हैं। शायद इसीलिए अपने यूट्यूब चैनल में वामपंथ का ज़िक्र करना आवश्यक नहीं समझते । लेकिन मैं इनको यह सूचित कर देना चाह रहा हूँ कि इस बार का पश्चिम बंगाल का चुनाव 2011, 2016 और 2021 का विधान सभा चुनाव नहीं है। तृणमूल कांग्रेस से लोगों का बड़े पैमाने पर मोहभंग हुआ है। उसकी लूट, अराजकता और गुंडागर्दी का प्रतिवाद बड़े पैमाने पर वहाँ की जनता कर रही है। साथ ही भारतीय जनता पार्टी की सांप्रदायिक राजनीति में पश्चिम बंगाल की जनता का कोई यक़ीन नहीं है। इसलिए पश्चिम बंगाल के अंदर बिलकुल अलग क़िस्म का माहौल बन रहा है और जैसे जैसे मतदान की तारीख़ नज़दीक आएगी, वामपंथ की राजनीति और मज़बूत होकर आगे बढ़ने की संभावना है। जब पश्चिम बंगाल के नतीजे आएंगे तो मेरी आज की इस पोस्ट का आकलन तब आप लोग करिएगा। मुझे बड़ी खुशी होगी।
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अपलोडर: VKA-X5K56V • प्रकाशित: 16 अप्रैल 2026 • 2 मिनट पठन

श्रेया जायसवाल • 09 मई 2026

29 अप्रैल को चुनावों की व्यस्तता के बीच एक महत्वपूर्ण खबर शायद हममें से कई लोगों की नजरों से बच गई। उसी दिन, भारत के सबसे प्रमुख तर्कवादी विचारकों में से एक नरेंद्र दाभोलकर की गोली मारकर हत्या करने के आरोप में यूएपीए (UAPA) कानून के तहत दोषी ठहराए गए और उम्रकैद की सजा पाए मुख्य आरोपियों में से एक शरद कलासकर को बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस रंजितसिंह भोसले की डिवीजन बेंच ने जमानत दे दी। नरेंद्र दाभोलकर की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी — यह एक विचारधारा, एक आंदोलन और एक बौद्धिक परंपरा पर सीधा हमला था। दाभोलकर की हत्या का तरीका — मोटरसाइकिल सवार दो लोगों द्वारा गोलियां चलाना — भारत में इसके बाद हुए कई प्रगतिशील तर्कवादी शख्सियतों की हत्याओं के 'तरीके' (मोडस ऑपरेंडी) से मेल खाता है। गोविंद पानसरे (जानलेवा हमला: 16 फरवरी 2015, मृत्यु: 20 फरवरी 2015), एम. एम. कलबुर्गी (हत्या: 30 अगस्त 2015) और गौरी लंकेश (हत्या: 5 सितंबर 2017) - इन सभी की हत्याओं में भी ऐसा ही पैटर्न देखा गया। कहा जा रहा है कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि एक सुसंगठित नेटवर्क की ओर इशारा करती है, जो प्रगतिशील तर्कवादी आवाजों को खामोश करना चाहता है। नरेंद्र दाभोलकर को क्यों मरना पड़ा ? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए सिर्फ कानूनी प्रक्रिया को ही नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक-सामाजिक ताने-बाने को देखना होगा, जहाँ अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरपंथ और राजनीतिक स्वार्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
केशव कुमार भट्टड़ • 25 मई 2026

जिस तरह रेणु के "मैला आँचल" में मेरीगंज नायक की भूमिका में है वैसे ही मृणाल सेन की अधिकांश फिल्मों में कलकत्ता शहर नायक की भूमिका में दिखाई देता है।
श्रेया जायसवाल • 14 मई 2026
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