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बहरामपुर, पश्चिम बंगाल: पुल नहीं बने, क्लासरूम में शिक्षक नहीं हैं, बुनकरों के पास खरीदार नहीं हैं और किसानों को पशु चिकित्सा की सुविधा नहीं मिल रही है। मुर्शिदाबाद जिले के इस खरग्राम विधानसभा क्षेत्र में वामपंथी उम्मीदवार ध्रुबज्योति साहा सिर्फ सीट के लिए नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की 15 साल की उपेक्षा और भाजपा के 10 साल के झूठे वादों के खिलाफ लड़ रहे हैं।
जब किसी क्षेत्र के लोगों को बार-बार झूठ बोल दिया जाता है, तो वहाँ एक खास तरह की चुप्पी छा जाती है। खरग्राम में भी यही चुप्पी है, जो हर रोज बसों के शोर से टूटती है। ये बसें युवाओं को ले जाती हैं — चेन्नई के निर्माण स्थलों पर, सूरत के कारखानों में या किसी भी ऐसी जगह जहाँ उन्हें अपने जिले से ज्यादा मजदूरी मिल सके। पीछे छूट जाते हैं उनकी पत्नियाँ, बच्चे और बुजुर्ग माता-पिता। छूट जाते हैं वो करघे जो अब नहीं चलते और वो नहरें जिनमें अब पानी नहीं बहता। वे इसलिए जाते हैं क्योंकि यहाँ रहना और भी मुश्किल हो गया है।
चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, हर मोड़ पर एक सवाल पूछा जा रहा है — कौन जिम्मेदार है ? किसने खरग्राम को इस हाल में पहुँचने दिया ? यहाँ की हैंडलूम सहकारी समिति बर्बाद हो चुकी है, सरकारी अस्पताल में स्टाफ नहीं है, जूनियर हाई स्कूलों को सेकेंडरी स्कूल में नहीं बदला गया, क्लासरूम खाली पड़े हैं — छात्रों की कमी से नहीं, बल्कि शिक्षकों की कमी से।
वाम मोर्चा के उम्मीदवार ध्रुबज्योति साहा इस चुप्पी के बीच एक जवाब लेकर आ रहे हैं। इस क्षेत्र में यह असामान्य बात है कि लोग उनकी बात सुन रहे हैं।
क्षेत्र पूरी तरह खोखला हो चुका है
खरग्राम की जरूरतों की सूची राजनीतिक घोषणा-पत्र जैसी नहीं, बल्कि आरोप-पत्र जैसी लगती है। दो महत्वपूर्ण नदी पुल — झिल्ली-पुरादांगा पुल और यादवपुर-जाफरपुर पुल — या तो बने ही नहीं या बंद पड़े हैं। इससे गाँव बाजार और अस्पताल से कट गए हैं। मुर्शिदाबाद की रेशम उद्योग, जो सदियों पुराना है और हजारों बुनकर परिवारों को रोजगार देता था, अब सरकारी सहायता न मिलने के कारण खत्म होने की कगार पर है। डेयरी किसान दूध इतने सस्ते दामों पर बेच रहे हैं कि उनका खर्च भी नहीं निकलता। जब मवेशी बीमार पड़ते हैं तो पास में पशु अस्पताल तक नहीं है। सिंचाई नहरें गाद से भर गई हैं या उपेक्षा के कारण बेकार हो गई हैं।
शिक्षा की स्थिति और भी खराब है। पूरे क्षेत्र में जूनियर हाई स्कूलों को सेकेंडरी स्कूल में नहीं बदला गया। इससे किशोरों को या तो बहुत दूर जाना पड़ता है या पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। नगर कॉलेज का विस्तार रुक गया है। सरकारी नौकरियाँ योग्यता के आधार पर नहीं भरी जा रही हैं, बल्कि राजनीतिक सिफारिश पर दी जा रही हैं। योग्य युवा या तो इंतजार कर रहे हैं या बस पकड़कर दूसरे राज्य चले जा रहे हैं।
“मनरेगा से 600 रुपये रोज की मजदूरी पर 100 दिन का काम मिलना चाहिए था। खरग्राम में यह सिर्फ कागजों पर मौजूद है।”
मनरेगा योजना को लेकर भी यही हाल है। यह योजना गरीब परिवारों को 100 दिन का काम और 600 रुपये रोज की मजदूरी देने का वादा करती है, लेकिन खरग्राम में यह सिर्फ कागजी योजना बनकर रह गई है। सूक्ष्म वित्त कंपनियाँ इस खालीपन में घुस गई हैं और जरूरतमंद परिवारों को कर्ज के जाल में फँसा रही हैं। बिना सहमति या समझाए घरों में स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि चुनावी वोटर लिस्ट से हजारों नाम काट दिए गए हैं — ज्यादातर मुस्लिम और गरीब समुदायों के लोग। चुनाव आयोग की विशेष समीक्षा (SIR) के बाद कई लोग अब भी मतदान से पहले अदालतों के सामने कतार में खड़े हैं।
दोनों पार्टियाँ, एक ही निराशा
खरग्राम का चुनावी इतिहास निराशा की कहानी बयान करता है। 2011 के विधानसभा चुनाव में 43.92% वोट वामपंथ को मिले थे। 2016 तक कई वोट तृणमूल कांग्रेस की ओर चले गए और भाजपा सिर्फ 5.57% वोट के साथ हाशिए पर थी। फिर 2021 आया — तृणमूल के खिलाफ गुस्से की लहर पर सवार होकर भाजपा का वोट 32.64% तक पहुँच गया। लोग बदलाव की उम्मीद लेकर भाजपा को वोट दे रहे थे, लेकिन उन्हें मिला सिर्फ SIR प्रक्रिया जिससे उनके समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित हुए, और एक पार्टी जिसका प्रचार विकास के बजाय साम्प्रदायिकता पर ज्यादा आधारित था।
दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस फिर से नए-नए वादों के साथ आई है। लेकिन 15 साल सत्ता में रहने के बाद ये वादे भारी लगते हैं। लोग पूछ रहे हैं — पुल कहाँ हैं? शिक्षक कहाँ हैं? सरकारी अस्पताल अभी भी आधे क्षमता पर क्यों चल रहा है? SIR पर भाजपा का विरोध करते हुए टीएमसी की बातें खोखली लगती हैं, क्योंकि खुद अपने गढ़ में बुनियादी सुविधाओं के लिए उसके पास कोई जवाब नहीं है।
इसी निराशा के बीच ध्रुबज्योति साहा आ रहे हैं। उनका चुनाव प्रचार पूरी तरह ठोस मुद्दों पर आधारित है — पुल, क्लासरूम, सिंचाई, मजदूरी और सम्मान। वामपंथ का खरग्राम में पुराना रिकॉर्ड — उस समय बनाए गए स्कूल-कॉलेज, गाँवों में बिजली, सदार कॉलेज की स्थापना — अब पुरानी याद के रूप में नहीं, बल्कि साबित करने के लिए याद किया जा रहा है कि ईमानदार और जिम्मेदार सरकार क्या कर सकती है।
चुनावी रैलियों में बदलाव साफ दिख रहा है। 2021 में भाजपा को वोट देने वाले कई लोग अब सीपीआई (एम) के उम्मीदवार से उत्साह के साथ बात कर रहे हैं। जो समुदाय पहले दूर चले गए थे, वे अब बैठक में आ रहे हैं, सवाल पूछ रहे हैं और बातें कर रहे हैं। यह उत्साह 23 अप्रैल को वोट में बदलता है या नहीं, यह देखना बाकी है। लेकिन 15 साल से वादे सुनने और कुछ न मिलने के बाद, लोग फिर से एक दशक पहले सत्ता से बाहर हुई पार्टी की बात सुन रहे हैं — यह शायद मुर्शिदाबाद में इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक विकास है।
जिन परिवारों के जवान हर मानसून में दूर शहरों की बस पकड़ते हैं, उनके लिए ध्रुबज्योति साहा का वादा बहुत सरल है — वह दिन आए जब खरग्राम के युवाओं को सम्मान के साथ जीने के लिए घर छोड़कर न जाना पड़े। इस चुनाव में भारी-भरकम भाषणों के बीच यह छोटा-सा वादा, ठीक इसी वजह से सबसे ज्यादा असरदार साबित हो सकता है।
आलेख लेफ्ट व्यूज (अंग्रेजी) से अनुदित है।
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प्रकाशित: 18 अप्रैल 2026 • 6 मिनट पठन

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