वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 | Tuesday, 13 October 2026
|
संपर्क: vaamkiaawaz@gmail.comसदस्यता में
वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
लाइव कवरेज
होमताज़ा खबरेंराज्य

वाम की आवाज़

जन समाचार मंच

राज्य

पश्चिम बंगाल चुनाव: खरग्राम में उपेक्षा और पलायन ही मुख्य मुद्दा, वामपंथी उम्मीदवार ध्रुबज्योति साहा बढ़त बना रहे हैं

केशव कुमार भट्टड़•18 अप्रैल 20266 मिनट पठन12 बार पढ़ा गया
चुनावी रैलियों में बदलाव साफ दिख रहा है। 2021 में भाजपा को वोट देने वाले कई लोग अब सीपीआई(एम) के उम्मीदवार से उत्साह के साथ बात कर रहे हैं। जो समुदाय पहले दूर चले गए थे, वे अब बैठक में आ रहे हैं, सवाल पूछ रहे हैं और बातें कर रहे हैं। यह उत्साह 23 अप्रैल को वोट में बदलता है या नहीं, यह देखना बाकी है। लेकिन 15 साल से वादे सुनने और कुछ न मिलने के बाद, लोग फिर से एक दशक पहले सत्ता से बाहर हुई पार्टी की बात सुन रहे हैं — यह शायद मुर्शिदाबाद में इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक विकास है।
पश्चिम बंगाल चुनाव: खरग्राम में उपेक्षा और पलायन ही मुख्य मुद्दा, वामपंथी उम्मीदवार ध्रुबज्योति साहा बढ़त बना रहे हैं

पश्चिम बंगाल चुनाव: खरग्राम में उपेक्षा और पलायन ही मुख्य मुद्दा, वामपंथी उम्मीदवार ध्रुबज्योति साहा बढ़त बना रहे हैं

बहरामपुर, पश्चिम बंगाल: पुल नहीं बने, क्लासरूम में शिक्षक नहीं हैं, बुनकरों के पास खरीदार नहीं हैं और किसानों को पशु चिकित्सा की सुविधा नहीं मिल रही है। मुर्शिदाबाद जिले के इस खरग्राम विधानसभा क्षेत्र में वामपंथी उम्मीदवार ध्रुबज्योति साहा सिर्फ सीट के लिए नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की 15 साल की उपेक्षा और भाजपा के 10 साल के झूठे वादों के खिलाफ लड़ रहे हैं।

जब किसी क्षेत्र के लोगों को बार-बार झूठ बोल दिया जाता है, तो वहाँ एक खास तरह की चुप्पी छा जाती है। खरग्राम में भी यही चुप्पी है, जो हर रोज बसों के शोर से टूटती है। ये बसें युवाओं को ले जाती हैं — चेन्नई के निर्माण स्थलों पर, सूरत के कारखानों में या किसी भी ऐसी जगह जहाँ उन्हें अपने जिले से ज्यादा मजदूरी मिल सके। पीछे छूट जाते हैं उनकी पत्नियाँ, बच्चे और बुजुर्ग माता-पिता। छूट जाते हैं वो करघे जो अब नहीं चलते और वो नहरें जिनमें अब पानी नहीं बहता। वे इसलिए जाते हैं क्योंकि यहाँ रहना और भी मुश्किल हो गया है।

चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, हर मोड़ पर एक सवाल पूछा जा रहा है — कौन जिम्मेदार है ? किसने खरग्राम को इस हाल में पहुँचने दिया ? यहाँ की हैंडलूम सहकारी समिति बर्बाद हो चुकी है, सरकारी अस्पताल में स्टाफ नहीं है, जूनियर हाई स्कूलों को सेकेंडरी स्कूल में नहीं बदला गया, क्लासरूम खाली पड़े हैं — छात्रों की कमी से नहीं, बल्कि शिक्षकों की कमी से। 

वाम मोर्चा के उम्मीदवार ध्रुबज्योति साहा इस चुप्पी के बीच एक जवाब लेकर आ रहे हैं। इस क्षेत्र में यह असामान्य बात है कि लोग उनकी बात सुन रहे हैं।

 क्षेत्र पूरी तरह खोखला हो चुका है

खरग्राम की जरूरतों की सूची राजनीतिक घोषणा-पत्र जैसी नहीं, बल्कि आरोप-पत्र जैसी लगती है। दो महत्वपूर्ण नदी पुल — झिल्ली-पुरादांगा पुल और यादवपुर-जाफरपुर पुल — या तो बने ही नहीं या बंद पड़े हैं। इससे गाँव बाजार और अस्पताल से कट गए हैं। मुर्शिदाबाद की रेशम उद्योग, जो सदियों पुराना है और हजारों बुनकर परिवारों को रोजगार देता था, अब सरकारी सहायता न मिलने के कारण खत्म होने की कगार पर है। डेयरी किसान दूध इतने सस्ते दामों पर बेच रहे हैं कि उनका खर्च भी नहीं निकलता। जब मवेशी बीमार पड़ते हैं तो पास में पशु अस्पताल तक नहीं है। सिंचाई नहरें गाद से भर गई हैं या उपेक्षा के कारण बेकार हो गई हैं।

शिक्षा की स्थिति और भी खराब है। पूरे क्षेत्र में जूनियर हाई स्कूलों को सेकेंडरी स्कूल में नहीं बदला गया। इससे किशोरों को या तो बहुत दूर जाना पड़ता है या पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। नगर कॉलेज का विस्तार रुक गया है। सरकारी नौकरियाँ योग्यता के आधार पर नहीं भरी जा रही हैं, बल्कि राजनीतिक सिफारिश पर दी जा रही हैं। योग्य युवा या तो इंतजार कर रहे हैं या बस पकड़कर दूसरे राज्य चले जा रहे हैं।

“मनरेगा से 600 रुपये रोज की मजदूरी पर 100 दिन का काम मिलना चाहिए था। खरग्राम में यह सिर्फ कागजों पर मौजूद है।”

मनरेगा योजना को लेकर भी यही हाल है। यह योजना गरीब परिवारों को 100 दिन का काम और 600 रुपये रोज की मजदूरी देने का वादा करती है, लेकिन खरग्राम में यह सिर्फ कागजी योजना बनकर रह गई है। सूक्ष्म वित्त कंपनियाँ इस खालीपन में घुस गई हैं और जरूरतमंद परिवारों को कर्ज के जाल में फँसा रही हैं। बिना सहमति या समझाए घरों में स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि चुनावी वोटर लिस्ट से हजारों नाम काट दिए गए हैं — ज्यादातर मुस्लिम और गरीब समुदायों के लोग। चुनाव आयोग की विशेष समीक्षा (SIR) के बाद कई लोग अब भी मतदान से पहले अदालतों के सामने कतार में खड़े हैं।

 दोनों पार्टियाँ, एक ही निराशा

खरग्राम का चुनावी इतिहास निराशा की कहानी बयान करता है। 2011 के विधानसभा चुनाव में 43.92% वोट वामपंथ को मिले थे। 2016 तक कई वोट तृणमूल कांग्रेस की ओर चले गए और भाजपा सिर्फ 5.57% वोट के साथ हाशिए पर थी। फिर 2021 आया — तृणमूल के खिलाफ गुस्से की लहर पर सवार होकर भाजपा का वोट 32.64% तक पहुँच गया। लोग बदलाव की उम्मीद लेकर भाजपा को वोट दे रहे थे, लेकिन उन्हें मिला सिर्फ SIR प्रक्रिया जिससे उनके समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित हुए, और एक पार्टी जिसका प्रचार विकास के बजाय साम्प्रदायिकता पर ज्यादा आधारित था।

दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस फिर से नए-नए वादों के साथ आई है। लेकिन 15 साल सत्ता में रहने के बाद ये वादे भारी लगते हैं। लोग पूछ रहे हैं — पुल कहाँ हैं? शिक्षक कहाँ हैं? सरकारी अस्पताल अभी भी आधे क्षमता पर क्यों चल रहा है? SIR पर भाजपा का विरोध करते हुए टीएमसी की बातें खोखली लगती हैं, क्योंकि खुद अपने गढ़ में बुनियादी सुविधाओं के लिए उसके पास कोई जवाब नहीं है।

इसी निराशा के बीच ध्रुबज्योति साहा आ रहे हैं। उनका चुनाव प्रचार पूरी तरह ठोस मुद्दों पर आधारित है — पुल, क्लासरूम, सिंचाई, मजदूरी और सम्मान। वामपंथ का खरग्राम में पुराना रिकॉर्ड — उस समय बनाए गए स्कूल-कॉलेज, गाँवों में बिजली, सदार कॉलेज की स्थापना — अब पुरानी याद के रूप में नहीं, बल्कि साबित करने के लिए याद किया जा रहा है कि ईमानदार और जिम्मेदार सरकार क्या कर सकती है।

चुनावी रैलियों में बदलाव साफ दिख रहा है। 2021 में भाजपा को वोट देने वाले कई लोग अब सीपीआई (एम) के उम्मीदवार से उत्साह के साथ बात कर रहे हैं। जो समुदाय पहले दूर चले गए थे, वे अब बैठक में आ रहे हैं, सवाल पूछ रहे हैं और बातें कर रहे हैं। यह उत्साह 23 अप्रैल को वोट में बदलता है या नहीं, यह देखना बाकी है। लेकिन 15 साल से वादे सुनने और कुछ न मिलने के बाद, लोग फिर से एक दशक पहले सत्ता से बाहर हुई पार्टी की बात सुन रहे हैं — यह शायद मुर्शिदाबाद में इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक विकास है।

जिन परिवारों के जवान हर मानसून में दूर शहरों की बस पकड़ते हैं, उनके लिए ध्रुबज्योति साहा का वादा बहुत सरल है — वह दिन आए जब खरग्राम के युवाओं को सम्मान के साथ जीने के लिए घर छोड़कर न जाना पड़े। इस चुनाव में भारी-भरकम भाषणों के बीच यह छोटा-सा वादा, ठीक इसी वजह से सबसे ज्यादा असरदार साबित हो सकता है।

आलेख लेफ्ट व्यूज (अंग्रेजी) से अनुदित है।

क्या यह लेख उपयोगी था?

टिप्पणियाँ

0

अपनी राय साझा करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...

पश्चिम बंगाल चुनाव: खरग्राम में उपेक्षा और पलायन ही मुख्य मुद्दा, वामपंथी उम्मीदवार ध्रुबज्योति साहा बढ़त बना रहे हैं

प्रकाशित: 18 अप्रैल 2026 • 6 मिनट पठन

वाम की आवाज़|जन समाचार मंच
विज्ञापन

शेयर करें

सबसे ज्यादा पढ़ी गईं

1

‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

361 क्लिक

2

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

358 क्लिक

3

'उत्तम कुमार': एक नक्षत्र का अस्त हो जाना ~ 'सत्यजीत राय'

338 क्लिक

4

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

333 क्लिक

5

नीट पेपर लीक कांड : केंद्र सरकार की गंभीरता पर '?' है। - केशव भट्टड़

330 क्लिक

विज्ञापन

संसाधन

शहीद ए आजम भगत सिंह के विचार - संकलनकर्ता श्रेया जायसवाल (PDF)

'तुम्हारी क्षय' - राहुल सांकृत्यायन (PDF)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (Link)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (PDF)

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल की वेब साइट (बांग्ला) (Link)

भाजपा क्यों है जनता की दुश्मन ? (PDF)

द लेफ्ट व्यूज - द पीपल्स लेंस (अंग्रेजी) (Link)

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा (PDF)

पुरानी फिल्मों में होता था संदेश - सीताराम येचुरी (Link)

मैं नास्तिक क्यों हूँ ? - शहीद-ए-आजम भगतसिंह (PDF)

वाममोर्चा घोषणापत्र। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-2026 (PDF)

मार्क्सवादी पथ पत्रिका (बांग्ला) (Link)

अभियान कैलेंडर

कोई आगामी ईवेंट नहीं

जुड़े रहने के लिए

रोज़ शाम 7 बजे प्रमुख खबरें सीधे आपके ईमेल पर।

सदस्यता लें
इस लेखक से और
सभी देखें →
विश्लेषण

भारत के बारे में लेनिन ~ बुद्धदेव भट्टाचार्य

"गुलाम भारत की मुक्ति और एशियाई जन-एकता को दिशा देने वाला लेनिन का क्रांतिकारी दृष्टिकोण।" - बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा बांग्ला में प्रस्तुत यह मूल-आलेख एक तारीखवार ऐतिहासिक-वैचारिक अध्ययन है, जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं औपनिवेशिक मुक्ति-संग्राम के प्रति लेनिन की गहरी विश्लेषणात्मक दृष्टि को रेखांकित करता है। अध्ययन 1900 से 1923 के मध्य रचित लेनिन के निबंधों, पत्रों, नोट्स और भाषणों के आधार पर यह स्पष्ट करता है कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा भारत के आर्थिक शोषण, दमनकारी नीतियों और बंबई के मजदूर आंदोलन की क्रांतिकारी चेतना का गहन मूल्यांकन किया था। लेनिन ने औपनिवेशिक राष्ट्रवाद के मूल लोकतांत्रिक स्वरूप को पहचानते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक सर्वहारा क्रांति और एशियाई जन-एकता से जोड़ा। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के मंच से मानबेंद्रनाथ रॉय के संकीर्णतावादी सिद्धांतों को संशोधित कर लेनिन ने भारतीय कम्युनिस्टों को व्यापक साम्राज्यवादी-विरोधी मंचों में भागीदारी और किसान-मजदूर आंदोलनों को संगठित करने की रणनीतिक दिशा प्रदान की। अंततः, यह आलेख स्थापित करता है कि लेनिन के अनुसार रूस, भारत, चीन आदि देशों का दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का मालिक होना ही संघर्ष के परिणाम को तय करेगा।

कुछ घंटे पहले

राष्ट्रीय

'ज्ञानेश' हटाओ, 'एसआईआर' रोको ~ एम ए बेबी

"वोट के अधिकार पर हमला बंद करो, लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता बहाल करो!" मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालों और मतदाता सूचियों से नाम छांटने की मनमानी के बीच देश में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। 'इंडियन एक्सप्रेस' के सनसनीखेज खुलासे के बाद सीपीआई (एम) ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर प्रक्रिया को तुरंत रोकने की मांग को लेकर देशव्यापी जन-आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है।

11 अक्टूबर 2026

विश्लेषण

क्या अपनी ही जनता से भयभीत है हुकूमत ?

10 अक्टूबर की सुबह सड़कों का मंजर लोकतंत्र की नहीं, बल्कि एक सीलबंद सैन्य क्षेत्र की गवाही दे रहा था। जब एक सरकार अपने ही नागरिकों को रोकने और घेरने के लिए इतने व्यापक स्तर पर युद्ध जैसी तैयारियाँ करती है, तो स्वयं से यह सवाल पूछना ही होगा - आखिर सरकार किस चीज को दबाने और रोकने की कोशिश कर रही है?

10 अक्टूबर 2026

और पढ़ें
सभी देखें →
राज्य

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

पश्चिम बंगाल का राजनीतिक आकाश आज दो ध्रुवों — टीएमसी और भाजपा — के बीच आपसी वोट लाभ के लिए कुटिल योजना से फँसा दिया गया है। SIR , दबंगता, झूठ और पैसे के दम पर लोकतंत्र के अपहरण की पूरी तैयारी है। एक तरफ है राज्य सत्ता की मशीनरी, परिवारवाद और भ्रष्टाचार की संस्कृति। दूसरी तरफ है केंद्र का SIR अटैक, सांप्रदायिक विभाजन, संस्थाओं पर नियंत्रण और विकास के नाम पर ध्रुवीकरण की राजनीति। दोनों ही दल पूंजीवादी-नवउदारवादी मॉडल पर टिके हुए हैं, जो आर्थिक असमानता को बढ़ावा देते हैं, पर्यावरण की उपेक्षा करते हैं और केवल मुनाफे को प्राथमिकता देते हैं। इन नीतियों के कारण किसान, मजदूर, छात्र, युवा और महिलाओं सहित आम नागरिकों की आवाज दब रही है, उनकी चिंताएं उपेक्षित हो रही हैं और उनके हितों को नुकसान पहुंच रहा है। लेकिन लेफ्ट फ्रंट न तो केवल टीएमसी का विकल्प है और न ही केवल भाजपा का। यह उससे कहीं ज्यादा हैं। लेफ्ट फ्रंट एक स्वतंत्र वैचारिक शक्ति है जो न सत्ता की लूट को बढ़ावा देती है और न ही धर्म के नाम पर समाज को बाँटती है। टीएमसी और भाजपा के भ्रष्टाचार तथा सांप्रदायिक कोलाहल से पूरी तरह अलग, लेफ्ट फ्रंट तीसरा रास्ता प्रस्तुत कर रहा है — लोकतंत्र, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित एक प्रगतिशील भविष्य का रास्ता, जिसका नाम है “लेफ्ट फॉर फ्यूचर”।

केशव कुमार भट्टड़ • 13 अप्रैल 2026

राज्य

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

सोशल मीडिया पर समाज के सभी वर्गों के लोग भाजपा सरकार के इस दिशा-निर्देश को लेकर गुस्सा जताने लगे हैं। सत्ता में आने के बाद भ्रष्टाचार, जबरन वसूली और सिंडिकेट को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' नीति के साथ काम शुरू करने का वादा करने वाली सरकार अचानक कर्मचारियों के पीछे क्यों हाथ धोकर पड़ गई है?

श्रेया जायसवाल • 22 मई 2026

राज्य

राष्ट्र तुम किसके हो ? - शमीक लाहिड़ी

प्रश्न पूछना ही नागरिक का धर्म है- भारत का लोकतंत्र आज एक संधिकाल से गुजर रहा है। यदि सूचनाओं को छिपाकर जनता के जनादेश को बदलने का प्रयास किया जाता है, तो यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होगा।

श्रेया जायसवाल • 19 अप्रैल 2026

वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़

अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ, न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !

मुख्य पन्ने
जानकारी
हमारे बारे में
संपादकीय नीति
सुधार नीति
गोपनीयता नीति
संपर्क करें
आर्काइव
अभियान कैलेंडर आर्काइव
© 2026 वाम की आवाज़ — जन संघर्ष का डिजिटल पुरालेखMade for the Movement