सुबोध राय (झुंकु राय) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे युवा क्रांतिकारियों में से एक थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्होंने मास्टरदा सूर्यसेन के नेतृत्व में 1930 के चटगांव शस्त्रागार छापे और जलालाबाद युद्ध में वीरतापूर्वक भाग लिया। कम उम्र में सेलुलर जेल (काला पानी) की कठिन सजा काटने के बाद भी उनका राष्ट्रप्रेम डिगा नहीं। आजादी के बाद उन्होंने पेंशन या अन्य सरकारी सुविधाएं लेने से इनकार कर सादगीपूर्ण जीवन बिताया। उनका निष्कलंक और त्यागमय जीवन भावी पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा। चटगांव आंदोलन पर बनी बॉलीवुड फिल्म 'Chittagong' (2012) की कहानी मुख्य रूप से युवा झुंकु राय (सुबोध राय) के जीवन और उनके दृष्टिकोण पर ही आधारित है।
चटगांव विद्रोह के महान युवा नायक:
अदम्य साहस, अडिग निष्ठा, निःस्वार्थ त्याग से भरे क्रांतिवीर सुबोध राय (झुंकु)
- केशव भट्टड़
क्रांतिकारी सुबोध राय (जिन्हें प्यार से "झुंकु राय" भी कहा जाता था) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे युवा योद्धाओं में से एक थे। वे 1930 के ऐतिहासिक चटगांव शस्त्रागार छापे (Chittagong Armoury Raid) के सबसे कम उम्र के प्रतिभागी थे।
प्रारंभिक जीवन
सुबोध राय का जन्म 1916 में अविभाजित बंगाल के चटगांव (वर्तमान बांग्लादेश) में एक समृद्ध परिवार में हुआ था। उनके पिता एक प्रसिद्ध वकील थे। बचपन से ही मेधावी छात्र होने के बावजूद, वह अपनी रिश्तेदार और महान महिला क्रांतिकारी कल्पना दत्त के माध्यम से प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्यसेन (मास्टरदा) के संपर्क में आए और क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल हो गए।
चटगांव शस्त्रागार छापा (1930)
18 अप्रैल 1930 को मास्टरदा सूर्यसेन के नेतृत्व में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ चटगांव में सशस्त्र विद्रोह हुआ। इस ऐतिहासिक छापे में भाग लेते समय सुबोध राय की उम्र मात्र 14 वर्ष थी। छापे के बाद ब्रिटिश सेना के साथ हुए प्रसिद्ध 'जलालाबाद पहाड़ी युद्ध' में सुबोध राय ने निडरता से भाग लिया। पुलिस द्वारा पकड़े जाने के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने उनसे मास्टरदा और अन्य साथियों का पता उगलवाने के लिए अमानवीय यातनाएं दीं, लेकिन उन्होंने अपना मुंह नहीं खोला।
काला पानी (सेलुलर जेल) की सजा
अदालत ने उन्हें राजद्रोह के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई। 1934 में उन्हें अंडमान की कुख्यात सेलुलर जेल (काला पानी) भेज दिया गया। वे इतनी कम उम्र में सेलुलर जेल भेजे जाने वाले सबसे युवा बंदियों में से एक थे।
मार्क्सवादी विचारधारा और बाद का जीवन
सेलुलर जेल में बंद रहने के दौरान सुबोध राय अन्य वरिष्ठ क्रांतिकारियों के संपर्क में आए और मार्क्सवादी साहित्य का गहन अध्ययन किया। 1940 में रिहा होने के बाद वे पूर्णकालिक रूप से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) में शामिल हो गए। 1964 में पार्टी के विभाजन के बाद वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) से जुड़े और पश्चिम बंगाल राज्य कमेटी के लंबे समय तक सदस्य रहे। उन्होंने राष्ट्रीय अभिलेखागार से शोध करके "Communism in India: Unpublished Documents" नामक एक ऐतिहासिक पुस्तक का संपादन भी किया।
जीवनशैली और निधन
स्वतंत्रता के बाद सुबोध राय ने कभी स्वतंत्रता सेनानी पेंशन या सरकारी लाभ स्वीकार नहीं किए। उन्होंने अपना पूरा जीवन कोलकाता के अलीमुद्दीन स्ट्रीट स्थित पार्टी कार्यालय के एक छोटे से कमरे में अत्यंत सादगी के साथ बिताया। 26 अगस्त 2006 को 90 वर्ष की आयु में कोलकाता में उनका निधन हो गया। भारत ने न केवल चटगांव क्रांति का अंतिम साक्षी खो दिया, बल्कि निष्ठा और निस्वार्थ सेवा का एक जीता-जागता प्रतीक भी खो दिया। क्रांतिवीर झुंकु राय का जीवन हमें सिखाता है कि देशप्रेम उम्र का मोहताज नहीं होता और सच्चा राष्ट्रधर्म बिना किसी पद या पुरस्कार की लालसा के चुपचाप देश की सेवा करना है।
भारत माता के इस अमर सपूत और क्रांतियों के संवाहक सुबोध राय को हमारा शत्-शत् नमन।
चटगांव आंदोलन पर बनी बॉलीवुड फिल्म 'Chittagong' (2012) की कहानी मुख्य रूप से युवा झुंकु राय (सुबोध राय) के जीवन और उनके दृष्टिकोण पर ही आधारित है। पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।
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