जन समाचार मंच


उत्तरपाड़ा, पश्चिम बंगाल: कोलकाता के उत्तरी छोर पर बसे प्रमुख उपनगरीय इलाके उत्तरपाड़ा की एक गर्म और उमस भरी दोपहर - राजा जॉयकृष्ण लाइब्रेरी के मैदान में बच्चे फुटबॉल खेल रहे थे, जबकि उनकी माताएं आपस में बातचीत करते हुए धैर्यपूर्वक इंतजार कर रही थीं। तभी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] की नेता मीनाक्षी मुखर्जी तरुण संघ के परिसर में पहुंचीं। उत्साहित माताओं ने वाम मोर्चे की विधानसभा उम्मीदवार का गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने एक स्वर में कहा, “हमें बहुत खुशी है कि आप हमसे मिलने आई हैं।”
जोशीली युवा नेता, जिन्हें इन माताओं ने पहले टीवी पर आरजी कर आंदोलन का नेतृत्व करते हुए देखा था और जो अनीस खान हत्या के बाद विरोध प्रदर्शन के चलते जेल भी जा चुकी हैं, ने अपने परिचित अंदाज में जवाब दिया। उन्होंने कहा, “हम दिन के समय तरुण संघ जैसे स्थानों पर नियमित रूप से आते हैं, क्योंकि ये उत्तरपाड़ा की महत्वपूर्ण विरासत और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं।” अपने विरोधियों पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने जोड़ा कि वे भी ऐसे क्लबों में आते हैं, लेकिन “रात के अंधेरे में काम सेट करने के लिए—यही फर्क है” , इस पर महिलाओं ने सहमति जताई।
पूरा उत्तरपाड़ा–कोतरंग क्षेत्र दो नगरपालिकाओं और तीन पंचायतों में फैला है। पंचायत चुनावों में कथित गड़बड़ियों के बावजूद वामपंथियों ने सीटें जीती हैं और एक ग्राम पंचायत का संचालन भी कर रहा है, जबकि दूसरी में भी उसकी भागीदारी है। हालांकि, दोनों नगरपालिकाएं वर्ष 2000 से तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नियंत्रण में हैं। इसके चलते भाई-भतीजावाद के आरोप बढ़े हैं और सड़कों, जल आपूर्ति तथा कचरा प्रबंधन की स्थिति बिगड़ती गई है। कई मायनों में उत्तरपाड़ा एक नागरिक आपदा का रूप ले चुका है। दूसरी ओर, नगरपालिका कर लगातार बढ़ते जा रहे हैं, जिससे आम नागरिकों पर भारी बोझ पड़ रहा है। कई लोगों को अपनी जमीन बेचकर गांवों की ओर पलायन करना पड़ा है, जहां कर का दबाव अपेक्षाकृत कम है।
उभरते फुटबॉल खिलाड़ियों के कई अभिभावकों को ऐसा लगा मानो मीनाक्षी पहले ही जीत चुकी हैं। उन्होंने उनसे जर्जर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर ध्यान देने की अपील की। महामाया शिशु मातृ मंगल केंद्र, कोन्नगर का पितंबर केंद्र और ग्राम पंचायत के अधीन ग्रामीण अस्पताल—सभी खराब हालत में हैं। उन्होंने कहा, “सिर्फ सफेदी कर देने और नीला रंग कर देने से कोई स्वास्थ्य केंद्र कामकाजी नहीं बन जाता।”

उत्तरपाड़ा के सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में डॉक्टरों, नर्सों और सहायक कर्मचारियों की भारी कमी है। निजी स्वास्थ्य सुविधाएं भी सीमित हैं, जिससे लोगों को इलाज के लिए लगभग 40 मील दूर कोलकाता जाना पड़ता है। यह दो घंटे की यात्रा खासकर गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए बेहद कठिन साबित होती है।
कानून-व्यवस्था की स्थिति भी बिगड़ गई है। बच्चों के साथ छेड़छाड़ की घटनाओं ने चिंता बढ़ा दी है, जिनमें हाल के दो मामले शामिल हैं—एक बंद फैक्ट्री परिसर में और दूसरा एक प्राथमिक विद्यालय में। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर सड़क के खंभों पर लगे सीसीटीवी कैमरे काम कर रहे होते, तो इन घटनाओं को रोका जा सकता था। इस पर सवाल उठाने पर नगरपालिका अध्यक्ष ने कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों से कहा, “पहले आधार कार्ड और सिम कार्ड दीजिए, फिर हम सिस्टम चलाएंगे।”
पार्टी के जिला नेता नीलाचल दास ने कहा कि उत्तरपाड़ा में बदलाव आसन्न है। सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या तेजी से घट रही है। इस वर्ष भद्रकाली हाई स्कूल से केवल 26 छात्र माध्यमिक परीक्षा में शामिल हो रहे हैं। राज्य के अन्य हिस्सों की तरह यहां भी स्कूली शिक्षा की उपेक्षा हो रही है।
उत्तरपाड़ा में नियमों को अक्सर तोड़ा-मरोड़ा जाता है। तृणमूल कांग्रेस द्वारा संचालित नगरपालिका ने कथित तौर पर संकरी गलियों में भी जी+3 (तीन मंजिला) इमारतों की अनुमति दे दी है, जिससे कई निर्माण नगर नियमों का उल्लंघन करते हुए हो रहे हैं।
मीनाक्षी ने कहा, “यहां बेरोजगारी एक गंभीर समस्या है। इस औद्योगिक क्षेत्र में एक के बाद एक फैक्ट्रियां बंद हो गई हैं। उत्तरपाड़ा की हिंदुस्तान मोटर्स फैक्ट्री का क्या हुआ? हजारों मजदूरों की नौकरियां चली गईं और उनके परिवार संकट में हैं। हमने मांग की है कि उस फैक्ट्री की जमीन से जुड़े भ्रष्ट सौदों को रोका जाए। नए उद्योग लाने होंगे ताकि स्थानीय युवाओं को रोजगार मिल सके। केवल ऊंची आवासीय इमारतें बनाना समाधान नहीं है।”
अपने अभियान के दौरान ‘लेफ्ट व्यूज़’ ने उनसे कुछ सवाल किए:
1) आप रोज़ बहुत लोगों से मिल रही हैं। अनुभव कैसा रहा ?
“मैंने लोगों का दर्द और संघर्ष करीब से देखा है। इंसाफ यात्रा, आरजी कर आंदोलन और हाल की ‘बांग्ला बचाओ यात्रा’ जैसे आंदोलनों में हमने पूरे राज्य में लोगों को सड़कों पर उतरते देखा। यहां उत्तरपाड़ा में मुझे एहसास हुआ कि संस्कृति को जिंदा रखने वाले मेहनतकश लोग ही हैं। जो लोग अपने हाथों से काम करते हैं, जो मेहनत से जीवन यापन करते हैं—वही असली बदलाव लाएंगे।
आज ही मैं एक मैदान में गई, जहां 120–125 बच्चे एथलेटिक्स का अभ्यास करते हैं। कोच कोई फीस नहीं लेते। हाल ही में माताओं ने मिलकर 50 रुपये का योगदान देने का फैसला किया। माता-पिता बच्चों को प्रेम से लाते हैं, और कोच भी प्रेम से सिखाते हैं। एक समय यह मैदान जमीन माफियाओं के कब्जे में जाने वाला था, लेकिन सामूहिक प्रयास से इसे बचाया गया। यही मेहनतकश लोगों की संस्कृति है—एकता, सहयोग और सामूहिक संकल्प की संस्कृति।”
2) आपके विरोधियों के बारे में क्या कहेंगी ?
“उत्तरपाड़ा में अनगिनत क्लब, पुस्तकालय और स्कूल हैं, लेकिन हर एक पर खतरा मंडरा रहा है। इन्हें बचाना बेहद जरूरी है। यहां एक खास तरह की राजनीति चल रही है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) धर्म आधारित राजनीति को बढ़ावा देती है—जो पहले पश्चिम बंगाल की पहचान नहीं थी। अब लगता है कि तृणमूल ने भी इसके लिए जगह बना दी है। एक पक्ष जितना झूठ फैलाता है, दूसरा भी उतना ही करता है। इससे राजनीति अपनी जड़ों और संस्कृति से कट जाती है।”
3) लोग आपके अभियान पर कैसी प्रतिक्रिया दे रहे हैं?
“लोग बदलाव का हिस्सा बनना चाहते हैं। हमारे घोषणापत्र में बताया गया है कि यहां की 12 लाइब्रेरियों में लाइब्रेरियन नहीं हैं और सरकारी सहयोग का अभाव है। 17 स्कूल बंद हो चुके हैं और 12 प्राथमिक स्कूलों के विलय की योजना है। प्यारीमोहन कॉलेज और उत्तरपाड़ा गवर्नमेंट हाई स्कूल जैसी संस्थाएं भी गंभीर स्थिति में हैं। लोग बेहतर सार्वजनिक परिवहन की मांग कर रहे हैं। टोटो और ऑटो चालकों को लगातार परेशान किया जाता है। हम उनसे कह रहे हैं कि वे वसूली के आगे न झुकें। सफाई कर्मचारियों का भारी शोषण हो रहा है। उन्हें 315 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं, लेकिन अगर वे एक-दो दिन भी काम से चूक जाएं, तो उनका मासिक औसत घटकर 250 रुपये प्रतिदिन रह जाता है। यह शोषण अस्वीकार्य है।”
4) अवैध निर्माण व्यापक हैं। आपका रुख क्या है?
“यह एक गहरी समस्या है। अवैध निर्माण से अधिक मुनाफा कमाने के लिए बेतहाशा सबमर्सिबल पंप का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे गंगा के पास होने के बावजूद भूजल स्तर गिर रहा है। जमीन धंस रही है, हरियाली खत्म हो रही है और रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं। फैक्ट्रियां बंद हो गई हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था गिर चुकी है, और अब पीने का पानी भी खत्म हो रहा है। संसाधनों की लूट कैसे की जाती है—इस पर तृणमूल कांग्रेस ‘मास्टरक्लास’ दे सकती है।”
मीनाक्षी को जल्दी थी, क्योंकि उन्हें शाम को दो वार्डों में लोगों से मिलना था। उनके साथ चलने के लिए पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थक लाल झंडों और बैनरों के साथ तैयार खड़े थे। जब उनसे पश्चिम बंगाल में भाजपा–तृणमूल की द्विध्रुवीय राजनीति के खिलाफ वामपंथ के संघर्ष पर अंतिम टिप्पणी मांगी गई, तो उन्होंने कहा:
क्या यह लेख उपयोगी था?
प्रकाशित: 22 अप्रैल 2026 • 7 मिनट पठन

"गुलाम भारत की मुक्ति और एशियाई जन-एकता को दिशा देने वाला लेनिन का क्रांतिकारी दृष्टिकोण।" - लेखक बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा बांग्ला में प्रस्तुत यह मूल-आलेख एक तारीखवार ऐतिहासिक-वैचारिक अध्ययन है, जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं औपनिवेशिक मुक्ति-संग्राम के प्रति लेनिन की गहरी विश्लेषणात्मक दृष्टि को रेखांकित करता है। अध्ययन 1900 से 1923 के मध्य रचित लेनिन के निबंधों, पत्रों, नोट्स और भाषणों के आधार पर यह स्पष्ट करता है कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा भारत के आर्थिक शोषण, दमनकारी नीतियों और बॉम्बे के मजदूर आंदोलन की क्रांतिकारी चेतना का गहन मूल्यांकन किया था। लेनिन ने औपनिवेशिक राष्ट्रवाद के मूल लोकतांत्रिक स्वरूप को पहचानते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक सर्वहारा क्रांति और एशियाई जन-एकता से जोड़ा। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के मंच से मानबेंद्रनाथ रॉय के संकीर्णतावादी सिद्धांतों को संशोधित कर लेनिन ने भारतीय कम्युनिस्टों को व्यापक साम्राज्यवादी-विरोधी मंचों में भागीदारी और किसान-मजदूर आंदोलनों को संगठित करने की रणनीतिक दिशा प्रदान की। अंततः, यह आलेख स्थापित करता है कि लेनिन के अनुसार रूस, भारत, चीन आदि देशों का दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का मालिक होना ही संघर्ष के परिणाम को तय करेगा।
कुछ मिनट पहले

"वोट के अधिकार पर हमला बंद करो, लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता बहाल करो!" मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालों और मतदाता सूचियों से नाम छांटने की मनमानी के बीच देश में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। 'इंडियन एक्सप्रेस' के सनसनीखेज खुलासे के बाद सीपीआई (एम) ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर प्रक्रिया को तुरंत रोकने की मांग को लेकर देशव्यापी जन-आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है।
11 अक्टूबर 2026

10 अक्टूबर की सुबह सड़कों का मंजर लोकतंत्र की नहीं, बल्कि एक सीलबंद सैन्य क्षेत्र की गवाही दे रहा था। जब एक सरकार अपने ही नागरिकों को रोकने और घेरने के लिए इतने व्यापक स्तर पर युद्ध जैसी तैयारियाँ करती है, तो स्वयं से यह सवाल पूछना ही होगा - आखिर सरकार किस चीज को दबाने और रोकने की कोशिश कर रही है?
10 अक्टूबर 2026

केशव कुमार भट्टड़ • 13 अप्रैल 2026
श्रेया जायसवाल • 22 मई 2026

प्रश्न पूछना ही नागरिक का धर्म है- भारत का लोकतंत्र आज एक संधिकाल से गुजर रहा है। यदि सूचनाओं को छिपाकर जनता के जनादेश को बदलने का प्रयास किया जाता है, तो यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होगा।
श्रेया जायसवाल • 19 अप्रैल 2026
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...