जन समाचार मंच

-रसेल अज़ीज़ ( लेखक आई आई टी खड़गपुर के पूर्व विद्यार्थी हैं)
जब पूरा बंगाल भीषण अशांति के दौर से गुजर रहा था (लोग कह रहे थे कि गांव-गांव और मुहल्ले-मुहल्ले में कम्युनिस्टों को खत्म करने का अभियान चल रहा है), उस सत्तर के दशक में वाटगंज शांति का एक द्वीप था। इसका कारण यह था कि वहां कोई कम्युनिस्ट था ही नहीं, इसलिए मारने के लिए भी कोई नहीं बचा था।
वहीं एक किशोर था, जिसकी साइकिल चलाने की बहुत इच्छा थी। लेकिन अभावों से भरे घर में स्कूल की किताबों के पैसे नहीं थे, तो साइकिल भला कहां से आती! हालांकि, उसने गौर किया था कि हफ्ते में एक दिन, मोहल्ले के बिस्कुट वाले की दुकान के सामने बाहर के मोहल्ले के कुछ बुजुर्ग लोग अपनी साइकिलें खड़ी कर किसी घर में ओझल हो जाते थे। वे साइकिलें बिस्कुट वाले की जिम्मेदारी में रहती थीं। उन्हीं खड़ी साइकिलों पर पैडल मारकर वह किशोर अपनी साइकिल चलाने की साप्ताहिक इच्छा पूरी कर लेता था।
लेकिन इसकी एक 'कीमत' चुकानी पड़ती थी। उन बाहरी मेहमानों में से एक बुजुर्ग को हाथ पकड़कर ट्राम तक छोड़ने जाना पड़ता था। जिन्हें वह छोड़ने जाता था, वे काफी वृद्ध थे और बहुत धीरे-धीरे चलते थे। अक्सर वह लड़का धैर्य खोकर कहता, "थोड़ा जल्दी चलिए, ट्राम निकल जाएगी! फिर अगली ट्राम के लिए बहुत देर तक खड़ा रहना पड़ेगा।" कभी-कभी वह यह भी कहता, "ये ट्राम कंडक्टर बड़े दुष्ट होते हैं। देख लेने पर भी गाड़ी नहीं रोकते, फुर्र से निकल जाते हैं। और अगर हम इस मुहल्ले से चढ़ते हैं, तो हंगामा करके उतार भी देते हैं!"
वह बुजुर्ग व्यक्ति सब सुनते, मुस्कुराते और टूटी-फूटी बंगाली में कहते, "बेटा, जितना जल्दी हो सके चल रहा हूँ। क्या अब मैं तुम्हारी तरह जवान रहा?"
एक दिन ट्राम की पटरी तक पहुँचने से ठीक पहले एक ट्राम सामने से निकल गई। लड़के ने बुजुर्ग से कहा, "देखा आपने! अगर थोड़ा और तेज चलते तो ट्राम मिल जाती।" लेकिन आश्चर्य! सेकंड क्लास के कंडक्टर ने बुजुर्ग को देखते ही फौरन घंटी बजाई। देखते ही देखते ट्राम अचानक रुक गई और ड्राइवर भी अपनी घंटी बजाने लगा।
फर्स्ट क्लास के यात्री मुड़-मुड़कर और मुंह बनाकर देख रहे थे कि खाली सड़क पर आखिर ट्राम रुकी क्यों? उनमें से कुछ ने ड्राइवर को आवाज भी दी। लेकिन तब तक कंडक्टर ट्राम से नीचे उतर आए। आधी आस्तीन की कमीज पहने और बगल में फोलियो बैग दबाए उस बुजुर्ग को सलाम ठोककर, बड़े सम्मान के साथ ट्राम में चढ़ाया और बिठाया। उसके बाद ही ट्राम रवाना हुई। लड़का तो हैरान रह गया! ट्राम के कंडक्टरों ने इस व्यक्ति को इतना सम्मान दिया! वह निश्चित रूप से कोई बहुत बड़ा आदमी होगा। एक बार पूछा तक नहीं!
अगले हफ्ते जब वह बुजुर्ग फिर मिले, तो किशोर का पहला सवाल था, "चचा, तुम्हारा नाम क्या है?" जवाब मिला, "मोहम्मद इस्माइल"। किशोर ने फिर पूछा, "तुम ऐसा क्या करते हो कि कंडक्टरों ने तुम्हें बुलाकर चढ़ाया?" मोहम्मद इस्माइल ने उत्तर दिया, "मैं ट्राम मजदूरों की यूनियन में था। यूनियन समझते हो?" किशोर बोला, "हाँ, यूनियन मतलब सब मिलकर शोषण नहीं होने देंगे।" मोहम्मद इस्माइल हंस पड़े।
ये वही मोहम्मद इस्माइल थे, जिन्होंने सुहरावर्दी के 'डायरेक्ट एक्शन डे' के आह्वान पर विक्टोरिया कॉलेज के महिला हॉस्टल की ओर बढ़ रहे 'मुस्लिम गार्ड' के दंगाइयों को कॉलेज के गेट पर ही रोक दिया था। उन्होंने मध्य कोलकाता के कुछ मजदूरों को इकट्ठा कर महज ईंटों और लाठियों से दंगाइयों का मुकाबला किया था। संख्या में ज्यादा होने के बावजूद मजदूर प्रतिरोध के सामने दंगाई दुम दबाकर भागने पर मजबूर हो गए थे। बाद में मोहम्मद इस्माइल एक दिग्गज ट्रेड यूनियन नेता और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सबसे कुशल संगठकों में से एक बने।
पुनश्च: खिदिरपुर का वाटगंज।
एक छोटे से कमरे में संगठनात्मक चर्चा के दौरान, मोहम्मद इस्माइल ने एक और दिग्गज ट्रेड यूनियन नेता जुड़न गांगुली से उस लड़के का परिचय पूछा, जो हर हफ्ते उन्हें ट्राम तक छोड़ने जाता था। जुड़न गांगुली ने बताया कि वह 14 नंबर के अजीजुल का बेटा है। अजीजुल को चिंता रहती थी कि कहीं उनका बेटा आवारा लड़कों की संगत में न पड़ जाए और उन्होंने यह बात उनसे साझा की थी।उस लड़के का नाम था मोहम्मद सलीम।इस्माइल ने सुनकर कहा था, "उसे कुछ किताबें देना।"

अपलोडर: श्रेया जायसवाल
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अपलोडर: श्रेया जायसवाल • प्रकाशित: 24 अप्रैल 2026 • 4 मिनट पठन

सलीम ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी असल में आरएसएस के इशारे पर दलाल की भूमिका निभाती आ रही है। दरअसल, इस राज्य से वामपंथी राजनीति के दायरे को सिकोड़ना ही आरएसएस का मुख्य उद्देश्य था। राज्य में आज भले ही तृणमूल कांग्रेस नहीं है, लेकिन वामपंथी आज भी मैदान में हैं और भविष्य में भी रहेंगे।
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

"जब आग लगती है, तो वह धर्म नहीं देखती, हिंदू-मुस्लिम का भेद किए बिना सभी के घरों को जलाकर खाक कर देती है। बीजेपी की बुलडोजर राजनीति के खतरे से भी कोई नहीं बचेगा। सभी इसके शिकार होंगे। इसलिए प्रतिरोध की लड़ाई में सभी लोगों को एकजुट होना होगा।"
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

हर उस व्यक्ति तक पहुँचना होगा जो मेहनतकश है, सताया हुआ है या प्रताड़ित है। भाजपा ने एसआईआर (SIR) के नाम पर एक बड़े वर्ग के लोगों से उनका मताधिकार छीन लिया है। इन सभी लोगों को एकजुट करना होगा। उनके मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों को वापस लाना होगा। जनता की रोटी-रोजी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और पीने के पानी जैसी स्थानीय मांगों को पूरा कराने के लिए संघर्ष करना होगा। भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एकता, भाईचारा और रोजगार के लिए लड़ना होगा। बुलडोजर राज के खिलाफ लाल झंडा पहले ही उठ खड़ा हुआ है। उन्होंने डर का माहौल बढ़ाया है, लेकिन हम चाहते हैं कि जनता का यह डर टूटे। अन्याय के खिलाफ खड़े होकर हक के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी।
सीपीआई (एम)पश्चिम बंगाल के सचिव
14 जून 2026

श्रेया जायसवाल • 09 मई 2026

29 अप्रैल को चुनावों की व्यस्तता के बीच एक महत्वपूर्ण खबर शायद हममें से कई लोगों की नजरों से बच गई। उसी दिन, भारत के सबसे प्रमुख तर्कवादी विचारकों में से एक नरेंद्र दाभोलकर की गोली मारकर हत्या करने के आरोप में यूएपीए (UAPA) कानून के तहत दोषी ठहराए गए और उम्रकैद की सजा पाए मुख्य आरोपियों में से एक शरद कलासकर को बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस रंजितसिंह भोसले की डिवीजन बेंच ने जमानत दे दी। नरेंद्र दाभोलकर की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी — यह एक विचारधारा, एक आंदोलन और एक बौद्धिक परंपरा पर सीधा हमला था। दाभोलकर की हत्या का तरीका — मोटरसाइकिल सवार दो लोगों द्वारा गोलियां चलाना — भारत में इसके बाद हुए कई प्रगतिशील तर्कवादी शख्सियतों की हत्याओं के 'तरीके' (मोडस ऑपरेंडी) से मेल खाता है। गोविंद पानसरे (जानलेवा हमला: 16 फरवरी 2015, मृत्यु: 20 फरवरी 2015), एम. एम. कलबुर्गी (हत्या: 30 अगस्त 2015) और गौरी लंकेश (हत्या: 5 सितंबर 2017) - इन सभी की हत्याओं में भी ऐसा ही पैटर्न देखा गया। कहा जा रहा है कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि एक सुसंगठित नेटवर्क की ओर इशारा करती है, जो प्रगतिशील तर्कवादी आवाजों को खामोश करना चाहता है। नरेंद्र दाभोलकर को क्यों मरना पड़ा ? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए सिर्फ कानूनी प्रक्रिया को ही नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक-सामाजिक ताने-बाने को देखना होगा, जहाँ अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरपंथ और राजनीतिक स्वार्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
केशव कुमार भट्टड़ • 25 मई 2026

जिस तरह रेणु के "मैला आँचल" में मेरीगंज नायक की भूमिका में है वैसे ही मृणाल सेन की अधिकांश फिल्मों में कलकत्ता शहर नायक की भूमिका में दिखाई देता है।
श्रेया जायसवाल • 14 मई 2026
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