सीपीआइ (एम) के पोलिट ब्यूरो सदस्य और पश्चिम बंगाल के सचिव मोहम्मद सलीम ने कोलकाता प्रेस क्लब द्वारा आयोजित " मीट द प्रेस " कार्यक्रम में तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और चुनाव आयोग तीनों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी और भाजपा मिलकर बंगाल के लोकतंत्र, संस्कृति और संवैधानिक ढांचे पर व्यवस्थित हमला कर रहे हैं।
मोहम्मद सलीम ने कहा कि तृणमूल और भजपा की बयानबाजी एक-दूसरे की पूरक है। एक तरफ तृणमूल भ्रष्टाचार, काडर राज और तुष्टीकरण की राजनीति करती है, तो दूसरी तरफ भाजपा सांप्रदायिक विभाजन फैलाकर फायदा उठाती है। उन्होंने टीएमसी को भाजपा और आरएसएस का “साइडकिक” (सहायक) बताया तथा कहा कि ममता बनर्जी ने ही बंगाल में भाजपा को आमंत्रित किया है। दोनों पार्टियाँ जनता की असली समस्याओं – बेरोजगारी, रोजगार की खोज में बाहर जाते स्थानीय युवा, शिक्षा-स्वास्थ्य की ध्वस्त व्यवस्था, महंगाई और रोजगार संकट आदि से ध्यान हटाने के लिए मंदिर-मस्जिद और सांप्रदायिक एजेंडे का इस्तेमाल कर रही हैं। इनकी बयानबाज़ी जनता का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण कर आपसी लाभ के बंटवारे के लिए है। कैसे भी हो, वोट आपस में बांट लेना ही एकमात्र रणनीति है इनकी। जनता इसे समझ चुकी है।
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पश्चिम बंगाल । विधानसभा चुनाव 2026
वाममोर्चा एक ठोस विकल्प है। 1977 दोहराया जा सकता है।
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पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए चुनाव दो चरणों में हो रहे हैं – पहला चरण 23 अप्रैल 2026 और दूसरा चरण 29 अप्रैल 2026 को। मतगणना 4 मई 2026 को होगी। यह चुनाव बंगाल की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है, जहाँ सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC), भाजपा (BJP) और वामपंथी मोर्चा (CPI(M) के नेतृत्व में) के बीच त्रिकोणीय मुकाबला देखा जा रहा है।
वाममोर्चा इस चुनाव को मुख्य रूप से जन-जीवन की समस्याओं - बेरोजगारी, महंगाई, मजदूर-किसान संकट, महिलाओं की सुरक्षा और सांप्रदायिक विभाजन के खिलाफ लड़ाई के रूप में देख रहा है। वाम मोर्चा का स्पष्ट मत है कि तृणमूल और भाजपा दोनों पूंजीवादी ताकतों की सेवा कर रही हैं तथा बंगाल की जनता को एक असली, जन-केन्द्रित विकल्प की आवश्यकता है।
चुनावी प्रचार के दौरान वोटर लिस्ट संशोधन (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हुआ। लाखों नामों को सूची से हटा दिया गया, जिसे वामपंथी दलों ने लोकतंत्र पर हमला बताया। इसके अलावा, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और हिंसा की घटनाएँ भी बढ़ीं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा पर लगातार हमला बोला और केंद्र सरकार पर बंगाल में हस्तक्षेप का आरोप लगाया। उन्होंने “परिवर्तन” की बात करने वालों को चेतावनी दी और तृणमूल की जीत का भरोसा जताया।
सुभेंदु अधिकारी एवं भाजपा नेताओं ने “परिवर्तन” का नारा दिया तथा तृणमूल शासन में कानून-व्यवस्था की विफलता और भ्रष्टाचार पर जोर दिया। उन्होंने दावा किया कि इस बार बंगाल में सत्ता परिवर्तन अवश्यम्भावी है। नरेंद्र मोदी सहित बीजेपी के छोटे बड़े नेता बंगाल में डेरा डाले हुए हैं। मतदाताओं को प्रभावित करने के प्रयास किये जा रहे हैं। वोटर खामोश है और समय का इंतज़ार कर रहा है।
वहीं सीपीआइ (एम) के पोलिट ब्यूरो सदस्य और पश्चिम बंगाल के सचिव मोहम्मद सलीम ने कोलकाता प्रेस क्लब द्वारा आयोजित " मीट द प्रेस " कार्यक्रम में तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और चुनाव आयोग तीनों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी और भाजपा मिलकर बंगाल के लोकतंत्र, संस्कृति और संवैधानिक ढांचे पर व्यवस्थित हमला कर रहे हैं।
मोहम्मद सलीम ने कहा कि तृणमूल और भजपा की बयानबाजी एक-दूसरे की पूरक है। एक तरफ तृणमूल भ्रष्टाचार, काडर राज और तुष्टीकरण की राजनीति करती है, तो दूसरी तरफ भाजपा सांप्रदायिक विभाजन फैलाकर फायदा उठाती है। उन्होंने टीएमसी को भाजपा और आरएसएस का “साइडकिक” (सहायक) बताया तथा कहा कि ममता बनर्जी ने ही बंगाल में भाजपा को आमंत्रित किया है। दोनों पार्टियाँ जनता की असली समस्याओं – बेरोजगारी, रोजगार की खोज में बाहर जाते स्थानीय युवा, शिक्षा-स्वास्थ्य की ध्वस्त व्यवस्था, महंगाई और रोजगार संकट आदि से ध्यान हटाने के लिए मंदिर-मस्जिद और सांप्रदायिक एजेंडे का इस्तेमाल कर रही हैं। इनकी बयानबाज़ी जनता का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण कर आपसी लाभ के बंटवारे के लिए है। कैसे भी हो, वोट आपस में बांट लेना ही एकमात्र रणनीति है इनकी। जनता इसे समझ चुकी है।
वोटर लिस्ट संशोधन पर मोहम्मद सलीम ने चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा कि जो पार्टी पूरी, स्वच्छ वोटर सूची नहीं बना सकती, उसे निष्पक्ष चुनाव कराने का अधिकार कैसे दिया जा सकता है ? उन्होंने चेतावनी दी कि वाम मोर्चा इस मुद्दे पर अदालत जा सकता है।
मोहम्मद सलीम ने “बंगाल बचाओ” के नारे के तहत अभियान चलाते हुए जोर दिया कि बंगाल को तृणमूल की मनमानी और भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति दोनों से बचाना है। उन्होंने कहा कि TMC और BJP की यह मिलीभगत जनता को डराने और विभाजित करने की रणनीति है, जिसे वामपंथी शक्तियाँ जन-मुद्दों पर आधारित संघर्ष से पराजित करेंगी।
तृणमूल और भाजपा के बीच का संघर्ष वास्तव में दो पूंजीवादी ताकतों के बीच सत्ता के लिए आपसी लड़ाई है। तृणमूल ने पिछले वर्षों में लोक कल्याणकारी योजनाओं का नाम लेकर सत्ता बनाए रखी, लेकिन भ्रष्टाचार, हिंसा और औद्योगिक विकास की कमी ने जनता में गहरा असंतोष पैदा किया है। लोक कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार का खुला खेल जारी है।
दूसरी ओर, भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और केंद्र की शक्ति का उपयोग कर बंगाल पर कब्जा करना चाहती है। दोनों दलों की बयानबाजी एक-दूसरे की पूरक साबित होती है – तृणमूल भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण की राजनीति करती है, जबकि भाजपा उसी अस्थिरता का फायदा उठाकर सांप्रदायिक एजेंडा आगे बढ़ाती है। दोनों ही जनता की मूल समस्याओं – बेरोजगारी, विस्थापन, किसानों की दयनीय स्थिति, मजदूरों का संकट, शिक्षा-स्वास्थ्य का निजीकरण और महिलाओं की सुरक्षा आदि जनपक्षीय विषयों से ध्यान हटाने में व्यस्त हैं। यह मिलीभगत से खेला जा रहा छद्म युद्ध है।
बंगाल की उन्नति, बंगाल का विकास केवल वामपंथी, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और जन-केन्द्रित विकल्प से ही संभव है, जो भूमि सुधार, मजदूर अधिकार, रोजगार सृजन और सामाजिक न्याय पर आधारित हो। मोहम्मद सलीम समेत वाम नेताओं ने बार-बार कहा है कि “न टीएमसी, न भाजपा – जनता की सरकार - ही बंगाल की असली जरूरत है।"
2026 का पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव बंगाल की जनता के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। यह चुनाव केवल सत्ता बदलने का नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति को सांप्रदायिक और व्यक्तिवादी एजेंडे से मुक्त कर जन-मुद्दों पर लाने का अवसर है।
मोहम्मद सलीम के बयानों से स्पष्ट है कि वाम मोर्चा तृणमूल और भाजपा दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू मानता है। जनता के सामने ठोस विकल्प रखते हुए वाम शक्तियाँ अपनी जड़ें मजबूत कर रही हैं, और बंगाल की राजनीति में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
अभी चुनाव परिणाम आने बाकी हैं, लेकिन वाम मोर्चा की कोशिश है कि बंगाल में “मंदिर-मस्जिद की राजनीति नहीं, रोजगार और न्याय की राजनीति” का नारा चुनावों के केंद्र में रहे।
चुनाव आयोग द्वारा घोषित कार्यक्रम के अनुसार दो चरणों में मतदान होना है। पहले चरण में उच्च मतदान दर्ज किया गया, लगभग 93%। इतने ज्यादा मतदान ने एक संभावना तो जगा दी है - 1977 दोहराया जा सकता है।
वाम की जनसभाओं और पदयात्राओं में उमड़ती भीड़ भी एक संकेत दे रही है। वाम की ताकत बढ़नी तय है। जादवपुर विश्वविद्यालय में एसएफआई की ताज़ा-तरीन धमाकेदार जीत ने बता दिया है कि सिक्का पलट रहा है।
काउंट डाउन शुरू हो चुका है। दूसरे चरण के मतदान के दरवाजे पर राज्य खड़ा है। वोटर के विवेक पर भरोसा है। वोट जरूर दें। बीजेपी के निर्देश पर ज्ञानेश कुमार ने समझा दिया है कि आपका वोट कितना कीमती है ? आप सभी को शुभकामनाएं।
