जन समाचार मंच

सीपीआइ (एम) के पोलिट ब्यूरो सदस्य और पश्चिम बंगाल के सचिव मोहम्मद सलीम ने कोलकाता प्रेस क्लब द्वारा आयोजित " मीट द प्रेस " कार्यक्रम में तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और चुनाव आयोग तीनों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी और भाजपा मिलकर बंगाल के लोकतंत्र, संस्कृति और संवैधानिक ढांचे पर व्यवस्थित हमला कर रहे हैं। .
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पश्चिम बंगाल । विधानसभा चुनाव 2026
वाममोर्चा एक ठोस विकल्प है। 1977 दोहराया जा सकता है।
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पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए चुनाव दो चरणों में हो रहे हैं – पहला चरण 23 अप्रैल 2026 और दूसरा चरण 29 अप्रैल 2026 को। मतगणना 4 मई 2026 को होगी। यह चुनाव बंगाल की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है, जहाँ सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC), भाजपा (BJP) और वामपंथी मोर्चा (CPI(M) के नेतृत्व में) के बीच त्रिकोणीय मुकाबला देखा जा रहा है।
वाममोर्चा इस चुनाव को मुख्य रूप से जन-जीवन की समस्याओं - बेरोजगारी, महंगाई, मजदूर-किसान संकट, महिलाओं की सुरक्षा और सांप्रदायिक विभाजन के खिलाफ लड़ाई के रूप में देख रहा है। वाम मोर्चा का स्पष्ट मत है कि तृणमूल और भाजपा दोनों पूंजीवादी ताकतों की सेवा कर रही हैं तथा बंगाल की जनता को एक असली, जन-केन्द्रित विकल्प की आवश्यकता है।
चुनावी प्रचार के दौरान वोटर लिस्ट संशोधन (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हुआ। लाखों नामों को सूची से हटा दिया गया, जिसे वामपंथी दलों ने लोकतंत्र पर हमला बताया। इसके अलावा, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और हिंसा की घटनाएँ भी बढ़ीं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा पर लगातार हमला बोला और केंद्र सरकार पर बंगाल में हस्तक्षेप का आरोप लगाया। उन्होंने “परिवर्तन” की बात करने वालों को चेतावनी दी और तृणमूल की जीत का भरोसा जताया।
सुभेंदु अधिकारी एवं भाजपा नेताओं ने “परिवर्तन” का नारा दिया तथा तृणमूल शासन में कानून-व्यवस्था की विफलता और भ्रष्टाचार पर जोर दिया। उन्होंने दावा किया कि इस बार बंगाल में सत्ता परिवर्तन अवश्यम्भावी है। नरेंद्र मोदी सहित बीजेपी के छोटे बड़े नेता बंगाल में डेरा डाले हुए हैं। मतदाताओं को प्रभावित करने के प्रयास किये जा रहे हैं। वोटर खामोश है और समय का इंतज़ार कर रहा है।
वहीं सीपीआइ (एम) के पोलिट ब्यूरो सदस्य और पश्चिम बंगाल के सचिव मोहम्मद सलीम ने कोलकाता प्रेस क्लब द्वारा आयोजित " मीट द प्रेस " कार्यक्रम में तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और चुनाव आयोग तीनों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी और भाजपा मिलकर बंगाल के लोकतंत्र, संस्कृति और संवैधानिक ढांचे पर व्यवस्थित हमला कर रहे हैं।
मोहम्मद सलीम ने कहा कि तृणमूल और भजपा की बयानबाजी एक-दूसरे की पूरक है। एक तरफ तृणमूल भ्रष्टाचार, काडर राज और तुष्टीकरण की राजनीति करती है, तो दूसरी तरफ भाजपा सांप्रदायिक विभाजन फैलाकर फायदा उठाती है। उन्होंने टीएमसी को भाजपा और आरएसएस का “साइडकिक” (सहायक) बताया तथा कहा कि ममता बनर्जी ने ही बंगाल में भाजपा को आमंत्रित किया है। दोनों पार्टियाँ जनता की असली समस्याओं – बेरोजगारी, रोजगार की खोज में बाहर जाते स्थानीय युवा, शिक्षा-स्वास्थ्य की ध्वस्त व्यवस्था, महंगाई और रोजगार संकट आदि से ध्यान हटाने के लिए मंदिर-मस्जिद और सांप्रदायिक एजेंडे का इस्तेमाल कर रही हैं। इनकी बयानबाज़ी जनता का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण कर आपसी लाभ के बंटवारे के लिए है। कैसे भी हो, वोट आपस में बांट लेना ही एकमात्र रणनीति है इनकी। जनता इसे समझ चुकी है।
वोटर लिस्ट संशोधन पर मोहम्मद सलीम ने चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा कि जो पार्टी पूरी, स्वच्छ वोटर सूची नहीं बना सकती, उसे निष्पक्ष चुनाव कराने का अधिकार कैसे दिया जा सकता है ? उन्होंने चेतावनी दी कि वाम मोर्चा इस मुद्दे पर अदालत जा सकता है।
मोहम्मद सलीम ने “बंगाल बचाओ” के नारे के तहत अभियान चलाते हुए जोर दिया कि बंगाल को तृणमूल की मनमानी और भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति दोनों से बचाना है। उन्होंने कहा कि TMC और BJP की यह मिलीभगत जनता को डराने और विभाजित करने की रणनीति है, जिसे वामपंथी शक्तियाँ जन-मुद्दों पर आधारित संघर्ष से पराजित करेंगी।
तृणमूल और भाजपा के बीच का संघर्ष वास्तव में दो पूंजीवादी ताकतों के बीच सत्ता के लिए आपसी लड़ाई है। तृणमूल ने पिछले वर्षों में लोक कल्याणकारी योजनाओं का नाम लेकर सत्ता बनाए रखी, लेकिन भ्रष्टाचार, हिंसा और औद्योगिक विकास की कमी ने जनता में गहरा असंतोष पैदा किया है। लोक कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार का खुला खेल जारी है।
दूसरी ओर, भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और केंद्र की शक्ति का उपयोग कर बंगाल पर कब्जा करना चाहती है। दोनों दलों की बयानबाजी एक-दूसरे की पूरक साबित होती है – तृणमूल भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण की राजनीति करती है, जबकि भाजपा उसी अस्थिरता का फायदा उठाकर सांप्रदायिक एजेंडा आगे बढ़ाती है। दोनों ही जनता की मूल समस्याओं – बेरोजगारी, विस्थापन, किसानों की दयनीय स्थिति, मजदूरों का संकट, शिक्षा-स्वास्थ्य का निजीकरण और महिलाओं की सुरक्षा आदि जनपक्षीय विषयों से ध्यान हटाने में व्यस्त हैं। यह मिलीभगत से खेला जा रहा छद्म युद्ध है।
बंगाल की उन्नति, बंगाल का विकास केवल वामपंथी, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और जन-केन्द्रित विकल्प से ही संभव है, जो भूमि सुधार, मजदूर अधिकार, रोजगार सृजन और सामाजिक न्याय पर आधारित हो। मोहम्मद सलीम समेत वाम नेताओं ने बार-बार कहा है कि “न टीएमसी, न भाजपा – जनता की सरकार - ही बंगाल की असली जरूरत है।"
2026 का पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव बंगाल की जनता के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। यह चुनाव केवल सत्ता बदलने का नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति को सांप्रदायिक और व्यक्तिवादी एजेंडे से मुक्त कर जन-मुद्दों पर लाने का अवसर है।
मोहम्मद सलीम के बयानों से स्पष्ट है कि वाम मोर्चा तृणमूल और भाजपा दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू मानता है। जनता के सामने ठोस विकल्प रखते हुए वाम शक्तियाँ अपनी जड़ें मजबूत कर रही हैं, और बंगाल की राजनीति में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
अभी चुनाव परिणाम आने बाकी हैं, लेकिन वाम मोर्चा की कोशिश है कि बंगाल में “मंदिर-मस्जिद की राजनीति नहीं, रोजगार और न्याय की राजनीति” का नारा चुनावों के केंद्र में रहे।
चुनाव आयोग द्वारा घोषित कार्यक्रम के अनुसार दो चरणों में मतदान होना है। पहले चरण में उच्च मतदान दर्ज किया गया, लगभग 93%। इतने ज्यादा मतदान ने एक संभावना तो जगा दी है - 1977 दोहराया जा सकता है।
वाम की जनसभाओं और पदयात्राओं में उमड़ती भीड़ भी एक संकेत दे रही है। वाम की ताकत बढ़नी तय है। जादवपुर विश्वविद्यालय में एसएफआई की ताज़ा-तरीन धमाकेदार जीत ने बता दिया है कि सिक्का पलट रहा है।
काउंट डाउन शुरू हो चुका है। दूसरे चरण के मतदान के दरवाजे पर राज्य खड़ा है। वोटर के विवेक पर भरोसा है। वोट जरूर दें। बीजेपी के निर्देश पर ज्ञानेश कुमार ने समझा दिया है कि आपका वोट कितना कीमती है ? आप सभी को शुभकामनाएं।
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प्रकाशित: 28 अप्रैल 2026 • 7 मिनट पठन

"गुलाम भारत की मुक्ति और एशियाई जन-एकता को दिशा देने वाला लेनिन का क्रांतिकारी दृष्टिकोण।" - बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा बांग्ला में प्रस्तुत यह मूल-आलेख एक तारीखवार ऐतिहासिक-वैचारिक अध्ययन है, जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं औपनिवेशिक मुक्ति-संग्राम के प्रति लेनिन की गहरी विश्लेषणात्मक दृष्टि को रेखांकित करता है। अध्ययन 1900 से 1923 के मध्य रचित लेनिन के निबंधों, पत्रों, नोट्स और भाषणों के आधार पर यह स्पष्ट करता है कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा भारत के आर्थिक शोषण, दमनकारी नीतियों और बंबई के मजदूर आंदोलन की क्रांतिकारी चेतना का गहन मूल्यांकन किया था। लेनिन ने औपनिवेशिक राष्ट्रवाद के मूल लोकतांत्रिक स्वरूप को पहचानते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक सर्वहारा क्रांति और एशियाई जन-एकता से जोड़ा। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के मंच से मानबेंद्रनाथ रॉय के संकीर्णतावादी सिद्धांतों को संशोधित कर लेनिन ने भारतीय कम्युनिस्टों को व्यापक साम्राज्यवादी-विरोधी मंचों में भागीदारी और किसान-मजदूर आंदोलनों को संगठित करने की रणनीतिक दिशा प्रदान की। अंततः, यह आलेख स्थापित करता है कि लेनिन के अनुसार रूस, भारत, चीन आदि देशों का दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का मालिक होना ही संघर्ष के परिणाम को तय करेगा।
कुछ घंटे पहले

"वोट के अधिकार पर हमला बंद करो, लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता बहाल करो!" मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालों और मतदाता सूचियों से नाम छांटने की मनमानी के बीच देश में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। 'इंडियन एक्सप्रेस' के सनसनीखेज खुलासे के बाद सीपीआई (एम) ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर प्रक्रिया को तुरंत रोकने की मांग को लेकर देशव्यापी जन-आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है।
11 अक्टूबर 2026

10 अक्टूबर की सुबह सड़कों का मंजर लोकतंत्र की नहीं, बल्कि एक सीलबंद सैन्य क्षेत्र की गवाही दे रहा था। जब एक सरकार अपने ही नागरिकों को रोकने और घेरने के लिए इतने व्यापक स्तर पर युद्ध जैसी तैयारियाँ करती है, तो स्वयं से यह सवाल पूछना ही होगा - आखिर सरकार किस चीज को दबाने और रोकने की कोशिश कर रही है?
10 अक्टूबर 2026

किसी भी बड़े घोटाले में अपराधी भले ही व्यक्ति हों, व्यक्तियों का समूह हो, लेकिन "छात्रों का भरोसा टूटना" सरकार की बड़ी असफलता है। सरकार केवल जांच तक सीमित न रहकर, पूरी चयन और सुरक्षा प्रक्रिया का 'रूट कैनाल ट्रीटमेंट' (जड़ से सफाई) करे। यह करना जरूरी है। किसी भी परीक्षा पेपर का लीक होना मतलब सरकारी सुरक्षा को भेद कर परीक्षा पेपर की बिक्री करने वाले गिरोह उसे सही समय पर उड़ा लेते हैं और मुंह-मांगी कीमत पर आगे बेच देते हैं। नीट पेपर का लीक होना सरकार के काम-काज की गंभीरता पर सीधा सवालिया निशान (?) है।
केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

"दबाओगे बर्बरता से जितनी आवाजें, गूँजेगी उतनी ही दूर तक इंकलाब की पुकार।"। नीट (NEET) परीक्षा धांधली और शिक्षा के बाज़ारीकरण के खिलाफ जंतर-मंतर पर चल रहा छात्रों-युवाओं का अहिंसक आंदोलन राज्य सत्ता के सीधे निशाने पर आ गया। सरकार ने फर्जी साजिशें रचकर, संचार बंद कर और बेलगाम पुलिसिया बल प्रयोग से बतर्ज 'जलियाँवाला बाग़' हजारों प्रदर्शनकारी युवाओं को घेर कर बर्बरता से पीटा और आंदोलन को दबंगता से दबाने की कोशिश की, गोदी मीडिया की चुप्पी के बीच स्वतंत्र पत्रकारों पर सत्ता प्रायोजित हमले हुए, और प्रतिक्रिया में 'जंतर-मंतर जेन-जी दमन' से आक्रोशित छात्रों का यह आंदोलन देशभर में फैल गया। तब ब्रिटिश राज के दौरान जलियाँवाला बाग़ में अंधाधुंध गोलियाँ दागी गई थी, अब बीजेपी राज में जंतर-मंतर जेन-जी दमन के दौरान कील लगी लाठियाँ, आँसू गैस, वाटर कैनन, शॉक बेटन, पेलेट गन के साथ-साथ लात-बूटों,थप्पडें और भद्दी गालियाँ दागी गई हैं। तब देश गुलाम था, अब देश आजाद है, दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। तब भी भारत डोला था, अब भी भारत डोला है। तब तारीख थी 13 अप्रैल 1919, अब तारीख थी 20 जुलाई 2026। और शाम होते-होते छात्रों-युवाओं ने जंतर-मंतर पर वापस कब्ज़ा कर यह साबित कर दिया कि कॉर्पोरेटऔर सत्ता गठजोड़ की बर्बरता से विचारों और क्रांति को दबाया नहीं जा सकता। बुरी तरह पुलिस और अर्धसैनिक बलों से मार खाकर भी बंद मुट्ठी तनकर उठी हुई थी। युवा भारत के इस जोश-जुनून-जज्बे को सलाम।
केशव कुमार भट्टड़ • 27 जुलाई 2026

आधुनिक भारतीय राजनीति में सत्ता द्वारा सूचना को नियंत्रित कर भ्रम का माहौल बनाने और उसके कारण लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ते दुष्प्रभावों का एक विश्लेषणात्मक ब्योरा है यह विमर्श । यह प्रायोजित इकोसिस्टम देश के धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताने-बाने को जहरीला बनाकर बुनियादी सवालों (स्वास्थ्य, शिक्षा,रोजगार, पर्यावरण आदि) को हाशिए पर धकेल रहा है। इससे निपटने के लिए नागरिकों के भीतर "डिजिटल एवं मीडिया साक्षरता" के साथ-साथ कड़े कानूनी नियमों का होना बहुत जरूरी है।
जन-आंदोलनों और असहमति का दमन: जब भी छात्र, किसान या नागरिक अपनी जायज़ मांगों के लिए आवाज़ उठाते हैं, तो सत्ता दल का संगठित डिजिटल तंत्र (आईटी सेल्स) उनके मूल मुद्दों पर बहस करने के बजाय उन्हें "टूलकिट", "राजनीतिक मोहरा" या "राष्ट्र-विरोधी" ठहराकर सत्ता हित में आंदोलन की साख बिगाड़ने, उसे संदेहास्पद बनाने और असहमति का गला घोंटने का काम करता है।
भ्रामक तकनीकों का इस्तेमाल: जनमानस को गुमराह करने के लिए कांट-छांट कर बनाए गए क्लिप्ड वीडियो (cropped videos), पुरानी या असंबंधित तस्वीरें और लक्षित चरित्र-हनन (targeted trolling) का सहारा लिया जाता है।
एआई और डीपफेक का नया संकट: तकनीक के आगे बढ़ने के साथ वॉयस क्लोनिंग, एआई-जनरेटेड फर्जी तस्वीरें और डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल करके 'पूर्णतः गढ़े गए सच' (synthesized reality) का निर्माण किया जा रहा है। इसका सबसे खतरनाक पक्ष महिलाओं, पत्रकारों, छात्रों, विपक्षी नेताओं और असहमत नागरिकों का चरित्र-हनन तथा "लायर्स डिविडेंड" (दोषियों द्वारा अपने वास्तविक अपराधों को भी एआई/डीपफेक बताकर मुकर जाना) है।
मीडिया और सत्ता का गठजोड़: डिजिटल वॉर-रूम्स में तैयार भ्रामक हैशटैग्स और प्रायोजित मुद्दों को मुख्यधारा का मीडिया (गोदी मीडिया) बिना किसी फैक्ट-चेक के अपने प्राइम-टाइम शो में जगह देता है, जिसे संस्थागत मौन समर्थन भी दे दिया जाता है।
लोकतंत्र केवल संविधान के पन्नों में जीवित नहीं रहता, वह नागरिकों की जागरूक चेतना में सांस लेता है। जब सत्ता या राजनीतिक दल ब्रॉडकास्टिंग और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी एवं एआई का इस्तेमाल असहमति को दबाने, चरित्र-हनन करने और जनता को गुमराह करने के लिए कर रहे हों, तब 'मीडिया साक्षरता' ही वह लोकतांत्रिक हथियार है जो नागरिकों को अंधभक्त या मोहरा बनने से बचा सकती है। सच को पहचानना और झूठ के कारोबार को खारिज करना ही आज के दौर में सबसे बड़ी देशभक्ति और लोकतांत्रिक कर्तव्य है। इसे रोकने के लिए कड़े कानून की जरूरत है जो तकनीकी पारदर्शिता (जैसे डिजिटल वॉटरमार्किंग), संस्थागत स्वतंत्रता और कड़ी कानूनी जवाबदेही का एक संतुलित ढांचा प्रदान करे। यह तकनीक के विकास को बिना रोके, उसके 'दुष्प्रचार और दमनकारी उपयोग पर पूर्ण विराम' लगाने में सक्षम हो। कानून का उपयोग सत्ता या उसके दल द्वारा जायज असहमति या पत्रकारिता को दबाने के लिए न हो, इसके लिए विशेष प्रावधान भी हो।
केशव कुमार भट्टड़ • 25 जुलाई 2026
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