विचार का दमन असंभव: 

जियागंज से कोलकाता तक 'बर्बरता' के विरुद्ध जन-आक्रोश 

– केशव भट्टड़

श्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद का माहौल हिंसा, मारपीट, तोड़-फोड़ और भ्रामक राजनीतिक बयानबाजी से भरा हुआ है। सुभेन्दु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी की नई सरकार 9 मई को अस्तित्व में आने वाली है, ठीक आज, जब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का जन्मदिन (25 बैसाख) बंगाल में मनाया जा रहा है। यह संयोग सिर्फ तारीख का नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और वर्तमान राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक गहरी विडंबना का है। यह 'कल, आज और कल' की कहानी है – जहां वाम-अतीत की सामूहिक संघर्ष से हासिल विकास (और उसके बाद 15 सालों के अनवरत भ्रष्टतन्त्र के शासन) की यादें ,वर्तमान की हिंसा और इसकी कोख से जनम लेते भविष्य की अनिश्चितता एक साथ उभर रही हैं।

प्रतीकों से डरता सत्ता का अहंकार

किसी भी समाज की सभ्यता का पैमाना इस बात से तय होता है कि वह अपने विरोधियों और उनके प्रतीकों के प्रति कितना उदार है। लेकिन हाल के वर्षों में भारत ने एक ऐसी 'असभ्यता' का उदय देखा है, जहाँ वैचारिक मतभेदों का उत्तर विमर्श से नहीं, बल्कि हथौड़ों और बुलडोजरों से दिया जा रहा है। मुर्शिदाबाद के जियागंज में 5 मई 2026 को व्लादिमीर लेनिन की प्रतिमा को जिस बर्बरता से खंडित किया गया, वह केवल एक पत्थर की मूर्ति पर हमला नहीं, बल्कि उस वैश्विक वैचारिक चेतना पर प्रहार है जिसने साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारत समेत पूरी दुनिया को साहस दिया था।

 

बीजेपी के देवों की सदा ताल ठोंकती ‘युद्ध देहिं’ मानसिकता की तृप्ति के लिए किसी असुर का निर्माण करते रहना जरूरी है , अन्यथा उनके ढोल की पोल खुल जाएगी। पाकिस्तान, बांग्लादेश, मुसलमान, घुसपेठिए, रोहींगया, दलित, पिछड़े, किसान-मजदूर, महिला, नेहरू, कांगी, वामी. . . उनकी गढ़ी गई शत्रु सूची का अंत नहीं। लेनिन के प्रति यह 'चिढ़' दरअसल उसी गढ़ी गई स्मृति के युद्ध (War of Memory) का हिस्सा है। अमेरिका-इजराइल के अंगूठे तले दबी दक्षिणपंथी बीजेपी की राजनीति के लिए लेनिन को 'अपराधी' साबित करना इसलिए जरूरी है ताकि वे उनके द्वारा दिए गए समानता और आर्थिक न्याय के विचारों को कमजोर कर सकें। यह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था और दर्शन को खारिज करने का प्रयास है जो पूंजीवाद और पारंपरिक सामाजिक ढांचों को चुनौती देता है। वे जुल्म का विरोध सिखातें है, इसलिए लेनिन बड़े अपराधी हैं।

 

जियागंज (मुर्शिदाबाद) में 5 मई 2026 की रात लेनिन की मूर्ति तोड़े जाने की घटना के बाद कोलकाता के धर्मतल्ला क्षेत्र में वाममोर्चा (मुख्यतः सीपीएम के नेतृत्व में) द्वारा निकाला गया विशाल जुलूस लेनिन मूर्ति से शुरू होकर क्षेत्र के बाजार – विशेषकर हॉकर इलाके (जहां हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय बड़ी संख्या में रहते, काम करते हैं) से गुजरते हुए वापस लेनिन मूर्ति तक लौटा। जुलूस सिर्फ लेनिन की मूर्ति तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उन जगहों से भी गुजरा जहाँ हॉकरों की दुकानें तोड़ी गईं थी , जबरन दुकानें बंद कराई गईं थी और बुलडोजर चलाया गया था। यह जुलूस सिर्फ राजनीतिक विरोध ही नहीं , बल्कि पोस्ट-पोल हिंसा, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और गणतांत्रिक विरासत पर हमले के खिलाफ एक सामूहिक नाराजगी की बुलंद आवाज भी बना।

जियागंज (मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल) में लेनिन की प्रतिमा का खंडन केवल एक 'तोड़-फोड़' की घटना मात्र नहीं थी। यह विजेता पक्ष द्वारा पराजित के अपमान का एक सीधा प्रयास था। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव परिणामों के बाद उन्मादी भीड़ ने रात के अंधेरे में इस मूर्ति को तोड़ डाला । यह कृत्य सीधे तौर पर 2018 में त्रिपुरा के बेलोनिया में हुई घटना की याद दिलाता है, जहाँ चुनाव जीतने के बाद इसी तरह लेनिन की मूर्ति ढहा दी गई थी।

2. यह विरोध क्यों "जरूरी" था?

  • प्रतिशोध की राजनीति का प्रतिकार: मनोविज्ञान का एक पहलू 'सिम्बॉलिक डोमिनेशन' (प्रतीकात्मक प्रभुत्व) भी है। जियागंज की घटना यह दर्शाती है कि राजनीति अब नीतियों से हटकर 'व्यक्तिगत नफरत' और 'प्रतीकों के विनाश' तक पहुँच गई है। यदि समाज इस पर चुप रहता, तो यह मान लिया जाता कि सत्ता का अर्थ "विपक्ष के हर निशान को मिटाना" है।
  • सांस्कृतिक बहुलवाद की रक्षा: बंगाल की मिट्टी में मार्क्स, लेनिन और चे ग्वेरा जैसे विचारकों को स्थान मिलता रहा है। जियागंज में मूर्ति गिराना इस बहुलवादी संस्कृति पर प्रहार था। विरोध प्रदर्शनों ने यह स्पष्ट किया कि बंगाल की जनता इस 'बुलडोजर संस्कृति' या 'विनाशकारी राजनीति' को सहज स्वीकार नहीं करेगी।
  • असहमति के अधिकार की रक्षा: लेनिन की मूर्ति गिराना केवल पत्थर को तोड़ना नहीं था, बल्कि एक विचारधारा को 'अवैध' घोषित करने की कोशिश थी। विरोध इसलिए जरूरी था ताकि यह संदेश दिया जा सके कि लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन दूसरे के अस्तित्व को मिटा देने की 'तालिबानी मानसिकता' को स्वीकार नहीं किया जाएगा। 
  • इतिहास और संस्कृति का बचाव: लेनिन भारतीय क्रांतिकारियों (भगत सिंह, सूर्य सेन) के लिए प्रेरणा स्रोत रहे हैं। विरोध के जरिए समाज ने यह दर्ज कराया कि आप इतिहास को अपनी सुविधा के अनुसार 'मिटा' या 'पुनर्लेखित' (Rewrite) नहीं कर सकते।
  • हिंसा के सामान्यीकरण को रोकना: लेनिन की मूर्ति गिराना या उन्हें अपमानित करना दरअसल भाजपा के चुनाव जीतने का एक हिंसक प्रदर्शन था । यदि बड़े पैमाने पर विरोध न होता, तो यह संदेश जाता कि चुनाव जीतने के बाद हारने वाले पक्ष के प्रतीकों को नष्ट करना एक 'सामान्य प्रक्रिया' है।

विचारधारा का अपराधीकरण: एक मनोवैज्ञानिक कुंठा

दक्षिणपंथी राजनीति, विशेषकर बीजेपी समर्थकों का लेनिन के प्रति यह 'आक्रामक मनोविज्ञान' उनकी अपनी वैचारिक सीमाओं को दर्शाता है। जब वे वामपंथी नेताओं पर भ्रष्टाचार, दंगाबाज़ी या अघोषित आय जैसे नैतिक आरोप लगाने में विफल रहते हैं, तो वे उनके वैचारिक स्तंभों को 'अपराधी' घोषित करने का सहारा लेते हैं। जियागंज में मूर्ति तोड़ना उस गहरी हीन भावना का परिणाम है, जहाँ 'स्वदेशी' के नाम पर अंतर्राष्ट्रीय महानता को छोटा दिखाने की कोशिश की जाती है, जहाँ तर्क की जगह शारीरिक बल का प्रयोग किया जाता है।

 

ऐतिहासिक सत्य: तिलक, भगतसिंह और मास्टर दा सूर्यसेन

लेनिन को 'विदेशी' बताकर खारिज करने वाले भूल जाते हैं कि भारत की आजादी के महानायकों ने लेनिन के विचारों में उपनिवेशवाद के विरुद्ध एक अचूक हथियार पाया था। वे भूल जाते हैं कि लेनिन वह व्यक्तित्व थे जिन्होंने 1908 में बाल गंगाधर तिलक को दी गई देशद्रोही की सजा की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा की थी। बाल गंगाधर तिलक ने लेनिन के उदय और रूसी क्रांति का स्वागत करते हुए इसे दमित वर्ग की जीत बताया था। जिनके विचारों को आत्मसात करते हुए भगतसिंह ने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमा था। लेनिन को अपमानित करना दरअसल भगतसिंह की उस अंतिम इच्छा का भी अपमान है, जिसमें वे मृत्यु से क्षण भर पहले लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे, जो उनकी अंतिम बौद्धिक प्रेरणा थी। चटगाँव विद्रोह के महानायक मास्टर दा सूर्यसेन और उनके क्रांतिकारी साथी भी रूसी क्रांति और लेनिन के 'संगठनात्मक अनुशासन' से गहरे प्रभावित थे। मास्टर दा का मानना था कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध संगठित सशस्त्र प्रतिरोध के लिए लेनिन की रणनीति एक मार्गदर्शक है। अतः, लेनिन को अपमानित करना दरअसल तिलक की दूरदर्शिता, भगतसिंह की अंतिम इच्छा और मास्टर दा सूर्यसेन के क्रांतिकारी संघर्ष का भी अपमान है।

जियागंज की बर्बरता और कोलकाता का 'ऐतिहासिक प्रतिरोध'

जियागंज में मूर्ति गिराए जाने की घटना ने बंगाल की लोकतांत्रिक रगों में बिजली दौड़ा दी। यह घटना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक चेतावनी बनी कि जब संवाद की जगह हिंसा और प्रतीकों का अपमान ले लेता है, तो वह समाज के मानसिक पतन का संकेत होता है। इस घटना के विरोध में 8 मई 2026 को कोलकाता के चौरंगी विधानसभा के धर्मतल्ला इलाके में वाममोर्चा ने जो विशाल जुलूस निकाला, उसने भारतीय जन-चेतना को एक नई दिशा दी है। कोलकाता के धर्मतल्ला की सड़कों पर उमड़ा वह जनसैलाब केवल ‘एक पार्टी के कार्यकर्ताओं’ का नहीं था, बल्कि वह उन नागरिकों का समूह था जो भारत की 'सांस्कृतिक बहुलता' को बचाने निकले थे।

कोलकाता / जियागंज के प्रतिरोध जुलूस के मायने :

भय का अंत: इस जुलूस ने यह साबित कर दिया कि सत्ता के संरक्षण में पल रही गुंडागर्दी और बर्बरता से जनता डरी नहीं है। चौरंगी की सड़कों पर गूँजते नारों ने आम आदमी में विश्वास पैदा किया कि सड़क पर लोकतंत्र अभी जीवित है। पोस्ट-पोल हिंसा और नई सरकार के आने के माहौल में जुलूस निकालना जोखिम भरा था। इसमें शामिल होना — खासकर मिश्रित समुदाय वाले हॉकर इलाके के लोगों के लिए — साहस बढ़ाने वाला रहा। इससे संदेश गया कि "डरकर चुप रहने से बेहतर है आवाज उठाना"।

  • बौद्धिक साहस: मुर्शिदाबाद और कोलकाता जैसे स्थानों पर लोग जानते थे कि वे सत्ता के विरुद्ध खड़े हैं, फिर भी सड़कों पर उतरना यह दर्शाता है कि भारतीय जनमानस आज भी अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का साहस रखता है।
  • अंतरराष्ट्रीय गरिमा की रक्षा: प्रदर्शनकारियों ने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत की जनता 'रूस में टैगोर की प्रतिमा' का जितना सम्मान करती है, उतनी ही शिद्दत से भारत में लेनिन की गरिमा की रक्षा भी करेगी।
  • वैचारिक स्पष्टता: इस विशाल मार्च ने युवाओं को यह सोचने पर मजबूर किया कि आखिर क्यों एक  क्रांतिकारी की मूर्ति से आज की सत्ताधारी शक्ति इतनी भयभीत है? इसने 'फासीवादी प्रवृत्तियों' को बेनकाब करने का काम किया।

जन-चेतना पर प्रभाव

जियागंज की घटना और उसके बाद के विरोध जुलूसों ने बंगाल की जन-चेतना को झकझोर दिया है। इससे यह संदेश गया है कि:

  • मूर्तियाँ गिर सकती हैं, वैचारिक आधार नहीं: जियागंज में मूर्ति टूटने के बाद जिस तरह से युवाओं और आम लोगों ने सड़कों पर उतरकर लेनिन की तस्वीरें लहराईं, उसने यह साबित कर दिया कि दमन अक्सर विचार को और अधिक मजबूती प्रदान करता है।
  • लोकतांत्रिक सतर्कता: इस घटना ने लोगों को सचेत किया है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है, बल्कि चुनाव के बाद अल्पमत और उसके प्रतीकों के सम्मान की रक्षा करना भी जीत का हिस्सा होना चाहिए।
  • प्रतीकात्मक जागरण: लेनिन की मूर्ति बंगाल के वामपंथी आंदोलन, भूमि सुधार, मजदूर-किसान संघर्ष और धर्मनिरपेक्षता की याद दिलाती है। उसको तोड़ना 'कल' (वाम शासन के 34 साल) को मिटाने की कोशिश था। जुलूस ने इस घटना को स्थानीय मुद्दे से ऊपर उठाकर राज्यव्यापी राजनीतिक संदेश बना दिया — कि यह सिर्फ मूर्ति नहीं, विचारधारा पर हमला है। इससे कई निष्क्रिय समर्थकों और युवाओं में यह चेतना जगी कि सत्ता बदलने के साथ सांस्कृतिक और वैचारिक विरासत को भी नष्ट किया जा रहा है।

पत्थर टूट सकते हैं, विचार नहीं

यदि रूस में टैगोर की प्रतिमा (उदाहरण के लिए उत्तरी मॉस्को के फ्रेंडशिप पार्क (Druzhby Park) में स्थापित ) को कोई क्षति पहुँचाई जाए, तो भारत में जो आक्रोश पैदा होगा, वही आक्रोश आज बंगाल की जनता लेनिन के अपमान पर महसूस कर रही है। बीजेपी और उसके समर्थकों द्वारा की जा रही यह 'बर्बरता' दरअसल उनके वैचारिक पराभव का संकेत है।

धर्मतल्ला के इस ऐतिहासिक विरोध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता के अहंकार में मूर्तियां तो गिराई जा सकती हैं, लेकिन उन पदचिह्नों को नहीं मिटाया जा सकता जिन्हें इतिहास ने अपने रक्त से लिखा है। जियागंज की टूटी मूर्ति आज ‘भाजपा की सत्ता’ की 'असभ्यता' का स्मारक बन गई है, जबकि धर्मतल्ला का जुलूस 'जागृत जन-चेतना' का प्रतीक।