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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में प्रमुख राजनीतिक दलों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भारी खर्च किया है। Google Ads Transparency Centre और Meta Ad Library के आंकड़ों के अनुसार, 15 मार्च से 27 अप्रैल 2026 के बीच भाजपा (BJP) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने संयुक्त रूप से डिजिटल विज्ञापनों पर लगभग 31.57 करोड़ रुपये खर्च किए। इस अवधि में भाजपा ने कुल 16.98 करोड़ रुपये खर्च किए, जिसमें Google पर 12.53 करोड़ रुपये (8,405 विज्ञापन) और Meta (Facebook तथा Instagram) पर 4.45 करोड़ रुपये शामिल हैं। वहीं, TMC और उसके सहयोगी संगठन Indian Political Action Committee (IPAC) ने 14.59 करोड़ रुपये खर्च किए, जिसमें Google पर 10.55 करोड़ रुपये और Meta पर 4.04 करोड़ रुपये शामिल हैं।कांग्रेस (INC) और वाम मोर्चा (Left Front/CPI(M)) का डिजिटल खर्च नगण्य रहा। CPI(M) ने Meta पर मात्र 2.96 लाख रुपये खर्च किए, जबकि कांग्रेस का बंगाल में डिजिटल विज्ञापन खर्च लगभग शून्य के बराबर था। चार राज्यों (बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु) की व्यापक अवधि में कांग्रेस का कुल डिजिटल खर्च 5 करोड़ रुपये से भी कम रहा।बंगाल चुनाव 2026:
डिजिटल चुनाव प्रचार खर्च में भाजपा सबसे आगे, तृणमूल टक्कर में
लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस लगभग गायब

कोलकाता, 30 अप्रैल 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में राजनीतिक दलों ने डिजिटल प्रचार पर भारी खर्च किया है। Google और Meta के पारदर्शिता आंकड़ों के अनुसार, 15 मार्च से 27 अप्रैल 2026 तक भाजपा (BJP) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने मिलकर 31.57 करोड़ रुपये डिजिटल विज्ञापनों पर खर्च किए। इसमें भाजपा का खर्च 16.98 करोड़ रुपये रहा, जिसमें Google पर 12.53 करोड़ रुपये (8,405 विज्ञापन) और Meta (फेसबुक और इंस्टाग्राम) पर 4.45 करोड़ रुपये शामिल हैं। TMC और उसके सहयोगी Indian Political Action Committee (IPAC) ने 14.59 करोड़ रुपये खर्च किए, जिसमें Google पर 10.55 करोड़ रुपये और Meta पर 4.04 करोड़ रुपये शामिल हैं। कांग्रेस (INC) और वाम मोर्चा (Left Front/CPI(M)) का डिजिटल खर्च नगण्य रहा। CPI(M) ने Meta पर मात्र 2.96 लाख रुपये खर्च किए, जबकि कांग्रेस का बंगाल में डिजिटल विज्ञापन खर्च लगभग शून्य के बराबर था। चार राज्यों (बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु) की व्यापक अवधि में कांग्रेस का कुल डिजिटल खर्च 5 करोड़ रुपये से भी कम रहा।
विशेषज्ञों के अनुसार, भाजपा ने डिजिटल माध्यम से व्यापक पहुंच बनाने पर जोर दिया, जबकि TMC ने IPAC जैसे तृतीय-पक्ष नेटवर्क के माध्यम से अपने प्रचार को मजबूत किया। एक व्यापक अवधि (25 जनवरी से 24 अप्रैल) में भाजपा ने पश्चिम बंगाल समेत चार राज्यों में डिजिटल विज्ञापनों पर 40 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए, जिसमें बंगाल पर सबसे अधिक फोकस रहा।
डिजिटल बनाम ऑफलाइन प्रचार
डिजिटल प्रचार में भाजपा स्पष्ट रूप से आगे रही, लेकिन ऑफलाइन प्रचार (रैलियां, रोड शो, होर्डिंग, बैनर, प्रिंट-टीवी विज्ञापन और बूथ स्तर का कार्य) में TMC की मजबूत पकड़ बनी रही। TMC नेटवर्क ने उसे ग्राउंड-लेवल प्रचार में बढ़त दी।
चुनाव आयोग ने चुनाव के दौरान बंगाल में 430 करोड़ रुपये से अधिक की नकदी, शराब, सोना-चांदी और अन्य सामग्री जब्त की, जो अप्रत्यक्ष रूप से बड़े पैमाने पर ऑफलाइन और अघोषित खर्च की ओर इशारा करता है। कुल चुनावी व्यय में ऑफलाइन हिस्सा डिजिटल से कई गुना अधिक होने की संभावना है।
2021 और 2026 की तुलना
2021 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने डिजिटल और ऑफलाइन दोनों मोर्चों पर भारी खर्च किया था, लेकिन TMC के सामने उसे सफलता नहीं मिली। 2026 में भाजपा ने डिजिटल प्रचार को और मजबूत किया है, जबकि TMC ने IPAC जैसे तृतीय-पक्ष नेटवर्क के जरिए डिजिटल में अपनी उपस्थिति बढ़ाई। कांग्रेस और वाम मोर्चा दोनों चुनावों में डिजिटल खर्च के मामले में काफी पीछे रहे। 2021 में इन दलों का संयुक्त प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा था, और 2026 में भी उनका डिजिटल और संगठनात्मक प्रभाव सीमित दिखा।
चुनाव संहिता का पालन: सवालों के घेरे में
डिजिटल खर्च की पारदर्शिता में सुधार हुआ है, लेकिन surrogate Pages (छद्म पृष्ठों), तृतीय-पक्ष एजेंसियों और अघोषित ऑफलाइन व्यय के जरिए मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) का जबरदस्त उल्लंघन होने की आशंका बनी हुई है। चुनाव आयोग ने 11,000 से अधिक सोशल मीडिया पोस्ट्स पर कार्रवाई की, फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि कुल खर्च का एक बड़ा हिस्सा रिपोर्टिंग से बाहर रह जाता है। कुल चुनावी व्यय में ऑफलाइन घटक डिजिटल से कई गुना अधिक होने की संभावना है, क्योंकि इसमें लॉजिस्टिक्स, मानव संसाधन और भौतिक सामग्री शामिल होती है।
डिजिटल प्रचार के विपरीत, ऑफलाइन प्रचार (रैलियां, रोड शो, होर्डिंग्स, बैनर्स, प्रिंट और टीवी विज्ञापन तथा बूथ-स्तरीय गतिविधियां) के विस्तृत आंकड़े अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। चुनाव आयोग को उम्मीदवारों और दलों द्वारा व्यय रिपोर्ट जमा करने की अंतिम तिथि अभी शेष है। Association for Democratic Reforms (ADR) जैसी संस्थाएं लगातार डिजिटल व्यय की रिपोर्टिंग में मानकीकरण की कमी की ओर इशारा कर रही हैं। जब्त सामग्री के आंकड़े साफ बताते हैं कि चुनावी खर्च की वास्तविक तस्वीर अभी भी अधूरी है।
2026 के चुनाव ने एक बार फिर साबित किया कि पैसा चुनावी प्रचार का बड़ा हथियार बन गया है। डिजिटल युग में पारदर्शिता बढ़ाने के बावजूद, ऑफलाइन खर्च और छिपे हुए नेटवर्क चुनाव संहिता की भावना को चुनौती दे रहे हैं। सच्ची लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खर्च की पूरी पारदर्शिता और सख्त निगरानी जरूरी है, अन्यथा धनबल का प्रभाव आम मतदाता की आवाज को कमजोर करता रहेगा।
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प्रकाशित: 30 अप्रैल 2026 • 5 मिनट पठन

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