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अपने पिता और उनकी रचनाओं के बारे में बात करना मुझे कभी बहुत सुखकर नहीं लगा। मुझे हमेशा यह अच्छा लगता रहा कि उनकी रचनाओं के बारे में दूसरे लोग बात करें। लेकिन जब मई दिवस आता है तो मुझे बार बार उनकी वह रचनाएं याद आ जाती हैं जिसके केंद्र में थे औद्योगिक मज़दूर। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हिन्दी साहित्य में एक नई धारा के जनक के तौर पर हमारे पिताजी का योगदान रहा है और हमेशा रहेगा। और यह धारा थी औद्योगिक मज़दूरों के जीवन पर आधारित बेहद मांसल कहानियों की। पिताजी की सारी कहानियों का संचयन छोटे भाई संजय जोशी ने अपने प्रकाशन "नवारुण" के माध्यम से "शेखर जोशी कथा समग्र" के रूप में किया है। इस पुस्तिका के खंड दो "साथ के लोग" में कुल ग्यारह रचनाएँ हैं जिनमें औद्योगिक जीवन के विभिन्न स्वरूप मिलते हैं। इसमें "हमारा कोहिनूर" कारख़ाने की स्मृतियों पर आधारित संस्मरण है। "हेड मैंसेजर मंटू" और "जी हुजूरिया" यह शब्दचित्र हैं। इस खंड को कोई पाठक पढ़ना शुरू करता है तो जैसे उसे किसी कारखाने में दाख़िल होने का प्रवेश पत्र प्राप्त हो जाता है।इन कहानियों की विकास प्रक्रिया भी बेहद रोचक है। औद्योगिक जीवन पर शेखर जी की पहली कहानी "उस्ताद" (प्रकाशन वर्ष 1956) एक अप्रेंटिस और उसके उस्ताद के रिश्तों पर आधारित कहानी है, जहाँ उस्ताद अपने शागिर्दों को बहुत कुछ सिखाते हैं लेकिन वॉल टैमिंग बांधना नहीं सिखाते। लेकिन बाद में उन्हें अपनी ग़ल्ती का एहसास होता है और जब कहानी का नायक शहर छोड़कर दूसरे शहर जाने के लिए रेलगाड़ी में बैठा होता है, उस समय आधी रात अपनी गलती को सुधारने के लिए ट्रेन छूटने के पांच मिनट पहले आकर अपने शागिर्द को वॉल टैमिंग बाँधने का गुर सिखा कर जैसे अपनी गलती का प्रायश्चित करते हैं। उस्ताद के ठीक उलट "आशीर्वचन" है जिसमें एक कारीगर श्यामलाल अपनी नौकरी का आख़िरी दिन कारखाने में घूम घूमकर बिताता है। कारखाने में बिताए अपने पुराने दिनों को याद करता है। उन पुराने अधिकारियों को याद करता है जिन्हें कारीगरों के काम की क़द्र थी। लेकिन विदाई समारोह में देर हो जाने के कारण श्याम लाल अपनी पूरी बात अपने सहकर्मियों से नहीं कह पाता। आशीर्वचन कहानी की आख़िरी पंक्तियाँ बेहद प्रभावशाली हैं "जो सोचा था वो न कर पाने का उसे कोई मलाल नहीं रहा.....क्या होगा कुछ कह कर भी? हमारा कुरुक्षेत्र था, हमने लड़ा। इनका कुरुक्षेत्र ये लड़ेंगे। जीना है तो लड़ना है।..........हॉल में बैठे हुए होनहार नयी पीढ़ी के कारीगरों की मोहनी सूरत उसकी आँखों के आगे तैर गई।" अलग - अलग वर्गों के पात्रों के दृष्टिकोण से भी शेखर जी की औद्योगिक मज़दूरों संबंधी कहानियों को वर्गीकृत किया जा सकता है। जहाँ "बदबू" एक नौजवान श्रमिक के दृष्टिकोण को, उसके प्रतिरोध को सामने रखती है, वही "सीढ़ियाँ" एक वर्कशॉप ऑफ़िसर की अपने अधीनस्थों के साथ अनौपचारिक न हो पाने की विडंबना का चित्रण है। यांत्रिकता के बीच अ यांत्रिकता यानी मानवीय मूल्य खोजना ही जैसे शेखर जी का अभीष्ट रहा है। औद्योगिक मज़दूरों के जीवन पर कहानियाँ लिखते हुए भी वह कहीं फ़ार्मूलाबद्ध लेखन नहीं करते। दरअसल शेखर जी श्रम के आत्म सम्मान को लेकर बेहद सजग थे। यदि श्रमिकों के आत्म सम्मान पर कोई चोट होती है, तो वह उसको बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। "सीढ़ियाँ" कहानी में वर्कशॉप ऑफ़िसर के मुँह से निकला एक ग़लत वाक्य पूरे श्रमिक समुदाय को बेहद नागवार गुज़रता है। इस कथा में टी- ब्रेक के दौरान कामगारों द्वारा कैंटीन में जाकर चाय पीने में ज़्यादा वक़्त बर्बाद होते देखते हुए मैनेजमेंट अलग-अलग शॉप में ट्रॉलियों से चाय भेजने की व्यवस्था करता है ताकि लोग अपने अपने ठिकानों पर रहते हुए ही चाय ले सकें, लेकिन श्रमिकों को यह सुझाव बहुत रास नहीं आता।"सीढ़ियाँ" कहानी का craft इतने रोचक तरीक़े से रचा गया है कि यह कहानी मज़दूरों और उनके अधिकारी के द्वंद्व के बहाने मनुष्य के मनोविज्ञान को बेहद ख़ूबसूरत तरीक़े से सामने लाती है। औद्योगिक मज़दूरों पर लिखी इन कहानियों में कही श्रमिकों का मुखर विरोध है तो कहीं परिवार के भीतर ही अपने सहकर्मियों के बारे में कुछ अन्यथा कह दिए जाने पर भी स्वाभिमान पर चोट पड़ने की पीड़ा का ख़ूबसूरत चित्रण।
"डांगरी वाले" शेखर जी की ऐसी ही एक कहानी है जिसकी कथा-भूमि वर्कशॉप के भीतर ना होकर एक श्रमिक परमेश्वर के घर की है। परमेश्वर के मंझले लड़के नरेश के विवाह की तैयारियों की बात घर में चल रही थी।
“तभी दावत की बात चली। पैंट कोट पहन कर पंगत में बैठना बहुत असुविधाजनक होता है, यह राय नरेश ने दी। उसे सबसे पहले अपने दोस्तों का ख़याल आया होगा।
'बुफ़े में खाने की बर्बादी नहीं होती। जिसे जितना लेना हो, जो कुछ लेना हो, ले और मज़े से खाए।' दयाल ने अपनी किफ़ायतसारी जतलाई।
तभी नरेश ने अपने उतावलेपन में वह बात कह दी थी जो परमेश्वर के मन में कहीं गहरे पैठ गई।
'बुफ़े ठीक है लेकिन बुफ़े में बाबू के डांगरी वाले साथियों का हाल ख़राब हो जाएगा। प्लेट चम्मच में खडे़-खड़े खा पाना उनके बस का नहीं। बेचारों का पेट भी नहीं भरेगा।'
'डांगरी वाले' कहानी की इस घटना को वरिष्ठ पत्रकार एवं कथाकार नवीन जोशी अपने लेख "हिन्दी के अकेले डांगरी वाले" में रेखांकित करते हैं: "फ़ॉर्मूले के तौर पर नहीं लिखना तो शेखर जोशी की ताक़त है। कई बार उनके मज़दूर क्रांति विरोधी ठहरते हैं। निम्न और निम्न मध्यमवर्गीय इन श्रमिकों में वे सारी मानवीय कमज़ोरियां हैं जो वास्तव में होती हैं। लेकिन वे अपने काम को और हुनर को प्यार करते हैं, उन में आत्म सम्मान कूट-कूट कर भरा है। वे अपनी डांगरी से बहुत प्यार करते हैं । डांगरी का ज़िक्र कई कहानियों में बड़े लाड़ एवं गर्व के साथ आता है-
"कपड़ों की बचत के लिए मोटे झोटे वस्त्रों के ऊपर ड्यूटी जाते हुए डांगरी डाल लेते जो उनके अनुसार सरकारी वर्दी थी। जैसे पुलिस की होती है,मिलिट्री के सिपाही की होती है जिससे उसकी पहचान बनती है।" शेखर जी की क़लम की विशेषता महज़ औद्योगिक मज़दूरों के जीवन, उनके प्रतिरोध, उनकी चालाकियाँ या बेवकूफ़ियां, अफ़सरों की धूर्तता अथवा यांत्रिक वातावरण में अयांत्रिकता/मानवीयता की तलाश तक ही सीमित नहीं है बल्कि एक बात जो उन्हें बेहद ख़ास बनाती है वह है मशीनों का मानवीयकरण। शेखर जी ने कारख़ाने की मशीनों के भीतर उनका संगीत सुना, उनकी गंध को महसूस किया और उसे पूरी चित्रात्मकता से काग़ज़ पर सजीव किया। इस विधा में वह हिंदी के लगभग अकेले कहानीकार हैं। अपने संस्मरण "हमारा कोहिनूर" में वह मशीनों से अपनी रागात्मकता बड़ी ही सजीवता से प्रस्तुत करते हैं ।
..........आर्मर शॉप के दूसरी ओर आरा मिल, बढ़ई शाॅप और सिलाई शॉप थी और दीवार की दूसरी ओर पेंट शॉप। लंबे - भारी लकड़ी के स्लीपर आरा मशीन के ऊपर मिनटों में चिरान होकर सुडौल तख्तों में बदल जाते। दांतेदार तवों या लंबी दांतेदार पट्टियों वाली यह दैत्याकार मशीनें पलक झपकते ही उन भारी स्लीपरों को डबल रोटी की तरह काट देतीं और आरी के दोनों ओर से लकड़ी का बुरादा आटे के ढेर में परिवर्तित हो जाता। लकड़ी के चिरान की भी अपनी एक सोंधी गन्ध होती है। तवे में सेकी जाती रोटियों की ख़ुशबू की तरह और आरा मशीन का अपना संगीत होता है- किसी पहाड़ी झरने की झिर्र झिर्र सा। चिरान किये हुए तख़्ते जब रंधा मशीन में डाले जाते तो धूं धूं खिसकते हुए दूसरी ओर पहुँच जाते। मशीन पर बेलन में लगी ब्लेड पतले छिक्कलों के फूल बिखेरती जाती। लकड़ी की सोंधी गन्ध और मशीनों का संगीत सुनने हम अक्सर आरा मशीन का चक्कर लगा आते।"
आज मई दिवस पर अपने पिता के द्वारा शुरू की गई साहित्य की इस धारा को मैं और मेरे जैसे बहुत से साहित्य प्रेमी पुष्पित पल्लवित देखना चाहते हैं।

(लेखक प्रसिद्ध कथाकार शेखर जोशी के ज्येष्ठ पुत्र हैं।)
अपलोडर: श्रेया जायसवाल
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अपलोडर: श्रेया जायसवाल • प्रकाशित: 01 मई 2026 • 7 मिनट पठन

सलीम ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी असल में आरएसएस के इशारे पर दलाल की भूमिका निभाती आ रही है। दरअसल, इस राज्य से वामपंथी राजनीति के दायरे को सिकोड़ना ही आरएसएस का मुख्य उद्देश्य था। राज्य में आज भले ही तृणमूल कांग्रेस नहीं है, लेकिन वामपंथी आज भी मैदान में हैं और भविष्य में भी रहेंगे।
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

"जब आग लगती है, तो वह धर्म नहीं देखती, हिंदू-मुस्लिम का भेद किए बिना सभी के घरों को जलाकर खाक कर देती है। बीजेपी की बुलडोजर राजनीति के खतरे से भी कोई नहीं बचेगा। सभी इसके शिकार होंगे। इसलिए प्रतिरोध की लड़ाई में सभी लोगों को एकजुट होना होगा।"
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

हर उस व्यक्ति तक पहुँचना होगा जो मेहनतकश है, सताया हुआ है या प्रताड़ित है। भाजपा ने एसआईआर (SIR) के नाम पर एक बड़े वर्ग के लोगों से उनका मताधिकार छीन लिया है। इन सभी लोगों को एकजुट करना होगा। उनके मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों को वापस लाना होगा। जनता की रोटी-रोजी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और पीने के पानी जैसी स्थानीय मांगों को पूरा कराने के लिए संघर्ष करना होगा। भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एकता, भाईचारा और रोजगार के लिए लड़ना होगा। बुलडोजर राज के खिलाफ लाल झंडा पहले ही उठ खड़ा हुआ है। उन्होंने डर का माहौल बढ़ाया है, लेकिन हम चाहते हैं कि जनता का यह डर टूटे। अन्याय के खिलाफ खड़े होकर हक के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी।
सीपीआई (एम)पश्चिम बंगाल के सचिव
14 जून 2026

श्रेया जायसवाल • 09 मई 2026

29 अप्रैल को चुनावों की व्यस्तता के बीच एक महत्वपूर्ण खबर शायद हममें से कई लोगों की नजरों से बच गई। उसी दिन, भारत के सबसे प्रमुख तर्कवादी विचारकों में से एक नरेंद्र दाभोलकर की गोली मारकर हत्या करने के आरोप में यूएपीए (UAPA) कानून के तहत दोषी ठहराए गए और उम्रकैद की सजा पाए मुख्य आरोपियों में से एक शरद कलासकर को बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस रंजितसिंह भोसले की डिवीजन बेंच ने जमानत दे दी। नरेंद्र दाभोलकर की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी — यह एक विचारधारा, एक आंदोलन और एक बौद्धिक परंपरा पर सीधा हमला था। दाभोलकर की हत्या का तरीका — मोटरसाइकिल सवार दो लोगों द्वारा गोलियां चलाना — भारत में इसके बाद हुए कई प्रगतिशील तर्कवादी शख्सियतों की हत्याओं के 'तरीके' (मोडस ऑपरेंडी) से मेल खाता है। गोविंद पानसरे (जानलेवा हमला: 16 फरवरी 2015, मृत्यु: 20 फरवरी 2015), एम. एम. कलबुर्गी (हत्या: 30 अगस्त 2015) और गौरी लंकेश (हत्या: 5 सितंबर 2017) - इन सभी की हत्याओं में भी ऐसा ही पैटर्न देखा गया। कहा जा रहा है कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि एक सुसंगठित नेटवर्क की ओर इशारा करती है, जो प्रगतिशील तर्कवादी आवाजों को खामोश करना चाहता है। नरेंद्र दाभोलकर को क्यों मरना पड़ा ? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए सिर्फ कानूनी प्रक्रिया को ही नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक-सामाजिक ताने-बाने को देखना होगा, जहाँ अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरपंथ और राजनीतिक स्वार्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
केशव कुमार भट्टड़ • 25 मई 2026

जिस तरह रेणु के "मैला आँचल" में मेरीगंज नायक की भूमिका में है वैसे ही मृणाल सेन की अधिकांश फिल्मों में कलकत्ता शहर नायक की भूमिका में दिखाई देता है।
श्रेया जायसवाल • 14 मई 2026
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