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नोयडा में श्रमिक विरोध: मई दिवस के इतिहास से ज़मीनी हकीकत तक

श्रेया जायसवाल•01 मई 20264 मिनट पठन27 बार पढ़ा गया
नोयडा की यह तस्वीर पूरे भारत के कामकाजी वर्ग की समग्र स्थिति का एक स्पष्ट प्रतिबिंब है। भारत के कुल श्रम बल का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा असंगठित क्षेत्र से जुड़ा है। इन करोड़ों लोगों के पास न तो नौकरी की स्थायी सुरक्षा है, और न ही स्वास्थ्य बीमा, प्रोविडेंट फंड या पेंशन जैसी न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा। कोरोना महामारी के बाद से इस क्षेत्र में श्रमिकों की स्थिति और भी भयानक हो गई है।
नोयडा में श्रमिक विरोध: मई दिवस के इतिहास से ज़मीनी हकीकत तक

 नोयडा में श्रमिक विरोध: मई दिवस के इतिहास से ज़मीनी हकीकत तक

राजधानी दिल्ली के करीब स्थित नोयडा भारत के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में से एक है। आईटी पार्क, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्यालयों से लेकर अनगिनत गारमेंट्स और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के कारण नोयडा वर्तमान में रोजगार का एक बड़ा केंद्र बन गया है। लेकिन इन चमकती हुई ऊँची इमारतों और विशाल कारखानों की आड़ में शोषण का एक गहरा इतिहास छिपा है। हाल के दिनों में नोयडा में हुए सिलसिलेवार श्रमिक प्रदर्शन न केवल एक विशेष क्षेत्र की समस्या हैं, बल्कि ये पूरे भारत के कामकाजी वर्ग के वर्तमान संकट का एक छोटा रूप हैं। 

नोयडा के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों का असंतोष कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में यह आक्रोश और भी तीव्र हो गया है। इसके प्रधान कारण हैं — बकाया वेतन न देना, बिना किसी पूर्व सूचना या कानूनी मुआवजे के अचानक छंटनी, अमानवीय रूप से काम के लंबे घंटे और सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी प्रदान न करना। विशेष रूप से दिहाड़ी या कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले श्रमिकों की स्थिति सबसे दयनीय है।

बहुत कारखानों में श्रमिकों के मौलिक अधिकारों, जैसे सुरक्षित कार्य वातावरण, शुद्ध पेयजल और स्वच्छता संबंधी नियमों का पालन नहीं किया जाता है। जब जीवित रहने की न्यूनतम माँगें बार-बार अधिकारियों द्वारा अनदेखी की जाती हैं, तब श्रमिक मज़बूरी में काम बंद कर सड़कों पर उतर आते हैं। कई बार पुलिसिया हस्तक्षेप या प्रबंधन के दबाव में ये विरोध प्रदर्शन अस्थायी रूप से शांत तो हो जाते हैं, लेकिन शोषण के मूल कारण अनसुलझे ही रह जाते हैं।

नोयडा की यह तस्वीर पूरे भारत के कामकाजी वर्ग की समग्र स्थिति का एक स्पष्ट प्रतिबिंब है। भारत के कुल श्रम बल का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा असंगठित क्षेत्र से जुड़ा है। इन करोड़ों लोगों के पास न तो नौकरी की स्थायी सुरक्षा है, और न ही स्वास्थ्य बीमा, प्रोविडेंट फंड या पेंशन जैसी न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा। कोरोना महामारी के बाद से इस क्षेत्र में श्रमिकों की स्थिति और भी भयानक हो गई है। बचत खत्म हो जाने के कारण, कई लोग बहुत कम मजदूरी पर काम करने के लिए मजबूर हैं।इसके साथ ही वर्तमान में 'गिग इकोनॉमी' का बोलबाला भी जुड़ गया है। डिलीवरी बॉय, राइड-शेयरिंग ऐप के ड्राइवर या अस्थायी कर्मचारी के रूप में कार्यरत लाखों युवक-युवतियों को वास्तव में कर्मचारी के रूप में कानूनी मान्यता ही नहीं मिलती। कॉर्पोरेट भाषा में उन्हें 'पार्टनर' कहा जाता है, जिसके कारण श्रम कानून के दायरे में आने वाली सुविधाएँ उनकी पहुँच से बाहर रह जाती हैं।

देश में रोजमर्रा वस्तुओं की कीमतें छलांग लगाकर बढ़ रही हैं, लेकिन उसके साथ तालमेल बिठाते हुए श्रमिकों की मजदूरी नहीं बढ़ रही है। इसके परिणामस्वरूप उनकी वास्तविक आय कम हो रही है और जीवन स्तर लगातार गिर रहा है। इसके साथ ही, सरकार द्वारा लाए गए नए श्रम कोड को लेकर भी श्रमिक संगठनों में बहुत गुस्सा है। उनके अनुसार, यह नई नियमावली ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ यानी व्यापार करने की सुगमता को प्रोत्साहित करने के चक्कर में नियोगकारियों के हाथों में बहुत अधिक शक्ति सौंप दी है, जिससे कारण श्रमिकों के अधिकारों के और अधिक हनन होने की आशंका पैदा हो गई है।

सीटू शुरू से ही इस कानून का विरोध करती आ रही है। पूरे देश में वे आंदोलन के लिए सड़कों पर उतरे हैं । जिस तरह श्रम कोड काम की कोई गारंटी नहीं देता, उसी तरह यह श्रमिकों के उन अधिकारों को भी छीन रहा है जो उन्हें प्राप्त थे। ट्रेड यूनियन बनाने का कोई अधिकार नहीं रह गया है। अर्थात, उन्हें पूंजीपतियों या मालिक वर्ग के हाथों की कठपुतली बनकर रहना होगा।

लेकिन 'हेय मार्केट' के श्रमिक आंदोलन ने पूरी दुनिया के श्रमिक आंदोलन को रास्ता दिखाया था। आठ घंटे की काम की मांग के लिए वह लड़ाई आज भी दुनिया के श्रमिक आंदोलनों के बीच एक उल्लेखनीय घटना है। 1886 के उस आंदोलन के परिणामस्वरूप दिन में आठ घंटे का काम करने का कानून बना था। लेकिन वर्तमान समय में भाजपा, अडानी और अंबानियों के इशारे पर उस कानून को खत्म करना चाहती है। श्रम कोड में आठ घंटे काम का कोई जिक्र ही नहीं है। मालिक पक्ष अपनी इच्छानुसार किसी भी श्रमिक से काम करा सकेगा। आज भारत में यह लड़ाई श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा की है।

नोयडा का श्रमिक विरोध हमारी आँखों में उंगली डालकर यह दिखाता है कि केवल जीडीपी में वृद्धि या बड़े-बड़े कल-कारखानों की स्थापना ही वास्तविक विकास का पैमाना नहीं हो सकती। उद्योगों का विकास तभी सार्थक होगा, जब इसके पीछे के शिल्पकार, जिनके पसीने पर यह अर्थव्यवस्था टिकी है, एक सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन जी सकेंगे।

साभार: गणशक्ति 

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नोयडा में श्रमिक विरोध: मई दिवस के इतिहास से ज़मीनी हकीकत तक

प्रकाशित: 01 मई 2026 • 4 मिनट पठन

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