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दुर्दशा से द्वैत सत्ता की ओर - सुदीप दत्त

श्रेया जायसवाल•01 मई 202612 मिनट पठन61 बार पढ़ा गया
मजदूर संगठनों और ट्रेड यूनियनों का कार्य मजदूरों के भीतर यह चेतना विकसित करना है कि एकजुट लड़ाई के माध्यम से मजदूर वर्ग अपने द्वारा उत्पादित अधिशेष का थोड़ा और हिस्सा मालिक वर्ग से छीन सकता है।
दुर्दशा से द्वैत सत्ता की ओर - सुदीप दत्त

" दुर्दशा से द्वैत सत्ता की ओर " 

- सुदीप दत्त

इस बार का मई दिवस एक असाधारण समय के संधि-काल पर हमारे सामने आया है, जब भारत का मजदूर वर्ग एक नई शक्ति के साथ खड़ा हो रहा है। उत्तर और मध्य भारत के औद्योगिक क्षेत्रों में एक के बाद एक विद्रोह की लहरों ने मजदूर आंदोलन के प्रति अब तक की हताशा और अविश्वास को तोड़कर, देश के इतिहास में वीरता की नई गाथाएं लिखना शुरू कर दिया है। यह लड़ाई एक तरफ जहाँ पूंजीपतियों के दिल में खौफ पैदा कर रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य (सत्ता) के मन में गहरी चिंता जगा रही है। असहनीय कष्ट और असीमित वंचना के बीच भी औद्योगिक मजदूर अपने अस्तित्व का एहसास मजबूती से करा रहे हैं—वे मारुति मजदूर आंदोलन के इतिहास की याद दिला रहे हैं।

इन स्वतःस्फूर्त आंदोलनों ने ट्रेड यूनियनों और समाज के सामने कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर दिए हैं। 'लुडाइट आंदोलन' की स्मृतियाँ और 'स्वतःस्फूर्त आंदोलन बनाम संगठित आंदोलन' का विवाद फिर से सामने आ रहा है। करोड़ों औद्योगिक मजदूरों के काम के घंटों के खिलाफ 'आठ घंटे काम' की मांग मई दिवस के महत्व को नए सिरे से रेखांकित कर रही है। भारत का संगठित मजदूर आंदोलन इन लड़ाइयों के साथ रहकर आंदोलन की इस नई शक्ति को समझने और इसे और व्यापक रूप देने की कोशिश कर रहा है।

पृष्ठभूमि: आक्रोश का प्राथमिक कारण मजदूरी

आंदोलन का पहला चरण मुख्य रूप से तेल रिफाइनरियों, इस्पात संयंत्रों और सरकारी परियोजनाओं में काम करने वाले उन निर्माण श्रमिकों के बीच शुरू हुआ, जो बड़ी कॉर्पोरेट ठेका कंपनियों के तहत काम करते हैं। बाद में यह आंदोलन मानेसर, गुड़गाँव, नोएडा, फरीदाबाद, नीमराना सहित विभिन्न निजी विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्रों में फैल गया। इस चरण में अस्थायी औद्योगिक मजदूरों ने नेतृत्वकारी भूमिका निभाई।

आंदोलन के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

अत्यधिक कम मजदूरी: वेतन मात्र ₹ 9,000 से ₹ 11,000 प्रति माह है।

शोषणकारी कार्य स्थितियां: काम के लंबे घंटे, ओवरटाइम का पैसा न मिलना, कानूनी सुविधाओं का अभाव और ठेकेदारों का अमानवीय अत्याचार।

न्यूनतम मजदूरी का संकट: कानूनन न्यूनतम मजदूरी का अर्थ वह आय है, जिससे एक श्रमिक और उसका परिवार कम से कम जीवित रह सके। लेकिन भारत की विशाल असंगठित श्रम व्यवस्था में बहुत कम श्रमिकों को यह मजदूरी मिल पाती है।

क्षेत्रीय विषमता: जीवन यापन की लागत समान होने के बावजूद नोएडा और गुड़गांव में श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी दिल्ली की तुलना में बहुत कम है। इसलिए अधिकांश मजदूरों को अतिरिक्त समय तक काम करना पड़ता है। परिवार के एक से ज्यादा सदस्यों को सिर्फ जिंदा रहने के लिए काम करना पड़ता है।

बाजार में वस्तुओं की कीमतें बढ़ने पर मजदूरों  की वास्तविक मजदूरी की रक्षा के लिए 'परिवर्तनशील महंगाई भत्ते'  की कानूनी व्यवस्था है। लेकिन अधिकांश मामलों में इसे बहुत देरी से या बहुत कम बढ़ाया जाता है। कई राज्यों में तो वर्षों से मजदूरी का संशोधन ही नहीं हुआ है और आवश्यक वस्तुओं के नए खर्चों को इसमें शामिल नहीं किया गया है, जिससे मजदूरों का जीवन और भी कठिन हो गया है।

इसके बाद रसोई गैस का संकट पैदा हुआ। ईरान युद्ध से पहले जहाँ एक मजदूर परिवार का औसत ईंधन खर्च लगभग ₹1,000 था, वह खुदरा बाजार में बढ़कर ₹3,000-₹4,000 हो गया। बाहर से खरीदे गए पके हुए भोजन की कीमत भी लगभग दोगुनी हो गई। पहले से ही कम मजदूरी और न्यूनतम उपभोग में जीवन यापन कर रहे मजदूरों के लिए यह अचानक हुई मूल्यवृद्धि एक भयानक आघात बनकर आई। स्थिति को संभालने के लिए तत्काल मजदूरी बढ़ाना आवश्यक था, लेकिन शासक वर्ग वेतन नहीं बढ़ाता। परिणामस्वरूप, इस विशाल क्षेत्र के श्रमिकों के लिए न्यूनतम जीवन निर्वाह का खर्च उठाना भी असंभव हो गया। आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में इस वृद्धि और वेतन न बढ़ने के कारण, पूंजीपतियों ने काम के घंटे, उत्पादकता या श्रम की तीव्रता बढ़ाए बिना ही अधिक अधिशेष (Surplus) वसूलना शुरू कर दिया। मजदूर वर्ग की अपने जीवन और श्रम शक्ति को पुनरुत्पादित करने की क्षमता लगातार घटने लगी।

वास्तव में, मजदूर वर्ग के जीवन का क्षय करके ही यह अधिशेष निचोड़ा जा रहा था। नतीजतन, यह व्यावहारिक रूप से सामाजिक पुनरुत्पादन का एक गहरा संकट बन गया। एलपीजी  संकट उस विस्फोट का तात्कालिक कारण बना। इस स्थिति में मजदूरों के पास केवल दो ही रास्ते खुले थे—जन-विद्रोह या सामूहिक पलायन। इस जन-विद्रोह के साथ-साथ दिल्ली-एनसीआर और सूरत के औद्योगिक क्षेत्रों से बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों का वापस लौटना उसी दोहरी वास्तविकता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

सामान्यतः पूंजीवाद का अपना नियम यह है कि मजदूर वर्ग को एक 'वर्ग' के रूप में जीवित रखा जाए ताकि श्रम की आपूर्ति निरंतर बनी रहे। वहीं, मजदूर संगठनों और ट्रेड यूनियनों का कार्य मजदूरों के भीतर यह चेतना विकसित करना है कि एकजुट लड़ाई के माध्यम से मजदूर वर्ग अपने द्वारा उत्पादित अधिशेष का थोड़ा और हिस्सा मालिक वर्ग से छीन सकता है। अर्थात, पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर ही मजदूर वर्ग के अस्तित्व और पुनरुत्पादन के लिए कुछ अतिरिक्त जगह बनाई जा सके।

लेकिन बेलगाम मुनाफे के लालच में पूँजी, पूँजीवाद के अपने ही नियमों को विकृत कर देती है और मजदूर के जीवन की पुनरुत्पादन क्षमता को नष्ट करने लगती है। फलस्वरूप, पूरी तरह से संगठित वर्ग के रूप में विकसित न हो पाने के बावजूद, इन मजदूरों के पास अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहे एक सामाजिक समूह के रूप में विद्रोह के रास्ते पर उतरने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। लड़ाई के मैदान में कम मजदूरी वाले, संकटग्रस्त, प्रवासी और अनियमित मजदूर का यह विशाल हिस्सा खुद को एक 'वर्ग' के रूप में पहचानना शुरू कर देता है।

यह पूँजी के आक्रमण के विरुद्ध जीवित रहने की स्वाभाविक प्रवृत्ति पर आधारित एक वर्ग है—साथ ही यह एक ऐसे 'समुदाय' की तरह है जो अपने संचार नेटवर्क, साझा जीवन अनुभवों, स्मृतियों, सपनों और संस्कृति का उपयोग करके एक-दूसरे से जुड़ जाता है। इसीलिए यह आंदोलन दावानल की तरह फैल गया। सोशल मीडिया के माध्यम से इसकी चिंगारी उत्तर और मध्य भारत के विस्तृत क्षेत्रों में फैल गई। सोशल मीडिया 'सामूहिक मजदूर' की कल्पना को वास्तविक रूप देने का तकनीकी माध्यम बन गया। आधुनिक मजदूर वर्ग ने उस व्यक्ति-केंद्रित माध्यम को जनआंदोलन के हथियार में बदलकर यह दिखा दिया कि क्यों वह जनता का सबसे अग्रणी क्रांतिकारी हिस्सा है।

शासक वर्ग ने सोचा था कि अनियमित मजदूरों की संख्या बढ़ाकर और ट्रेड यूनियनों का दमन करके वे इस विस्तृत औद्योगिक क्षेत्र में जुझारू मजदूर आंदोलनों को रोक पाएंगे। लेकिन वास्तव में, उन्होंने आधुनिक भारत के सबसे लड़ाकू मजदूर वर्ग को जन्म दिया है—जो सबसे अधिक लाभदायक और देश की अर्थव्यवस्था के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण  क्षेत्रों में काम करते हैं, फिर भी सब कुछ से वंचित हैं। ये इक्कीसवीं सदी के वे सर्वहारा हैं, जिनके पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के अलावा कुछ नहीं है और जीतने के लिए पूरी दुनिया है। आज के पूँजीवाद ने उत्पादन प्रक्रिया को तोड़कर और पूँजी को विभिन्न 'वैल्यू चेन' व ब्रांडों में बिखेर दिया है, ताकि कारखानों पर आधारित बड़े और एकजुट संगठन न बन सकें। लेकिन मजदूरों ने एक ही कंपनी की कई इकाइयों में एक साथ आंदोलन खड़ा करके पूँजी की उस रणनीति के खिलाफ जवाबी हमला बोल दिया है। यह मजदूर वर्ग की चेतना और उनकी स्वाभाविक प्रवृत्तियों के मिले-जुले प्रतिरोध का एक नया रूप है।

पूँजी की प्रतिक्रिया: भारी दबाव के कारण हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकार को जल्दबाजी में हस्तक्षेप करना पड़ा और वे लगभग ₹2,000 ₹ 3,000 की वेतन वृद्धि घोषित करने पर मजबूर हुईं। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह वृद्धि मुख्य रूप से एलपीजी संकट के कारण पैदा हुए आय और न्यूनतम जीवन निर्वाह खर्च के अंतर को भरने के समान ही है। लेकिन अधिकांश मामलों में यह वृद्धि अभी तक लागू ही नहीं हुई है। इसके विपरीत, मालिक पक्ष काम का दबाव और श्रम की तीव्रता बढ़ाकर अधिशेष (Surplus) शोषण को और बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

इसके साथ ही, आंदोलनकारी मजदूरों और संगठकों पर अभूतपूर्व राजकीय दमन शुरू हो गया है। सैकड़ों मजदूरों और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है, और कई मामलों में उनकी स्थिति के बारे में कोई जानकारी भी नहीं दी गई है। राज्य, पूँजी को स्पष्ट संदेश देना चाहता है कि भविष्य के किसी भी विद्रोह को बेरहमी से कुचल दिया जाएगा और इस क्षेत्र में पूँजी का पूर्ण वर्चस्व फिर से स्थापित किया जाएगा।

इस आंदोलन में नया क्या है? इस घटनाक्रम को समझने के लिए सबसे पहले 12 फरवरी 2026 की आम हड़ताल के महत्व का उल्लेख करना आवश्यक है। देशव्यापी प्रचार और व्यापक जन-लामबंदी के माध्यम से यह हड़ताल 'लेबर कोड'  के खिलाफ भारतीय मजदूर वर्ग का एक शक्तिशाली विरोध था। गौर करने वाली बात यह है कि इस हड़ताल के दौरान और उसके तुरंत बाद चारों ओर कई स्वतःस्फूर्त आंदोलन फैल गए।

पिछले दो दशकों में भारत में एक विशेष प्रवृत्ति देखी गई है। सरकारी रिपोर्टें बताती हैं कि विशिष्ट कारखानों या संस्थानों में होने वाली आर्थिक हड़तालें कम हुई हैं, लेकिन 'आम हड़ताल' (General Strike) अधिक निरंतर, भागीदारीपूर्ण और जुझारू हो गई है। पहली नज़र में यह पारंपरिक धारणा के विपरीत लगता है, क्योंकि आमतौर पर माना जाता है कि कई छोटी आर्थिक हड़तालों की लहर पर ही राजनीतिक आम हड़ताल खड़ी होती है।

लेकिन वास्तविकता यह है कि बिखरी हुई वैल्यू चेन, असंख्य छोटी उत्पादन इकाइयों और भारी संख्या में अनियमित मजदूरों की उपस्थिति के कारण, नियोजित कारखाना-आधारित आर्थिक हड़तालों के माध्यम से सीधे तौर पर सामूहिक मांगों को मनवाना अधिकांश मामलों में लगभग असंभव होता जा रहा था। ऐसी स्थिति में, 'आम हड़ताल' समष्टिगत मजदूरों के विभिन्न हिस्सों को अपने क्षोभ और वंचना को व्यक्त करने का अवसर देती है। यह वास्तव में मजदूरों के वास्तविक जीवन के आक्रोश की एक शक्तिशाली अभिव्यक्ति है। लेकिन अब तक ये आम हड़तालें मुख्य रूप से रक्षात्मक स्तर तक ही सीमित थीं।हालाँकि, एक बात स्पष्ट हो गई थी कि पूँजीवाद अब एक विशाल फैली हुई व्यवस्था है, जिसके प्रत्येक महत्वपूर्ण बिंदु पर मनुष्यों का जीवंत श्रम छिपा हुआ है। फलस्वरूप, सबसे कमजोर जगह पर की गई एक हड़ताल भी पूरी व्यवस्था में जबरदस्त आघात पैदा कर सकती है।

द्वैत सत्ता की ओर:

इसके बाद एक के बाद एक विस्फोटक हड़तालें शुरू हुईं। ये स्वतःस्फूर्त और स्वशासित आंदोलन थे, जिनमें स्थापित ट्रेड यूनियनों का कोई पूर्व-नियोजित नेतृत्व नहीं था। इसीलिए ये आंदोलन राज्य के बाध्यकारी ढांचे से बाहर निकलकर राज्य तंत्र को एक ज़ोरदार धक्का देते हैं। राज्य की दमनकारी प्रतिक्रिया ने ही यह सिद्ध कर दिया है कि सरकारें इस प्रकार के औद्योगिक आंदोलनों के लिए तैयार नहीं थीं। वास्तव में, इन हड़तालों ने बुर्जुआ व्यवस्था की समग्र वैधता को चुनौती दे दी है।उस अर्थ में, हम एक अभूतपूर्व स्थिति में रह रहे हैं। 'आम हड़ताल' निरंतर और अधिक सार्वभौमिक होती जा रही है, जो पूरे मजदूर वर्ग की आर्थिक मांगों को सामने ला रही है। वहीं दूसरी ओर, ये स्वशासित संस्थान-आधारित आर्थिक हड़तालें भी धीरे-धीरे राजनीतिक चरित्र ग्रहण कर रही हैं। इन दोनों प्रवृत्तियों का मिलन वर्तमान समय में हड़ताल के इर्द-गिर्द एक लेनिनवादी 'द्वैत सत्ता' (Dual Power) विकसित होने की संभावना पैदा कर रहा है।

स्वशासन और संगठन का यह द्वंद्वात्मक संबंध ही भविष्य की उस 'द्वैत सत्ता' के भ्रूण की रक्षा कर सकता है। ट्रेड यूनियनों और मजदूरों के राजनीतिक संगठनों का कार्य इस शक्ति की लोकतांत्रिक चेतना और स्वतःस्फूर्त ऊर्जा को आत्मसात करना है। साथ ही, मजदूरों के बीच सामाजिक परिवर्तन की राजनीति को भी सुनियोजित तरीके से फैलाना है। आंदोलन के स्वरूप का लचीलापन और उसके सार  की स्पष्ट राजनीतिक चेतना पर आधारित द्वंद्वात्मक एकता ही पूँजीवादी राज्य को चुनौती दे सकती है और मजदूर वर्ग के कई नए स्वशासित संस्थानों के निर्माण की संभावना का मार्ग खोल सकती है।

इतिहास पूरी तरह से खुद को नहीं दोहराता, लेकिन इतिहास से शिक्षा ली जाती है। मई दिवस के इतिहास और वर्तमान समय के बीच गहरा साम्य है। आर्थिक संकट और मंदी के बीच ही दुनिया को हिला देने वाले मई दिवस का जन्म हुआ था। 1881 से 1884 के बीच अमेरिका में प्रति वर्ष 500 से भी कम हड़तालें और तालाबंदी हुई थीं, जिनमें लगभग 1.5 लाख मजदूरों ने भाग लिया था। 1885 में यह संख्या बढ़कर लगभग 700 हो गई और 1886 में हड़तालों की संख्या बढ़कर 1572 हो गई। इसमें लगभग 6 लाख मजदूरों ने हिस्सा लिया और 11,562 संस्थान इसमें शामिल हुए।

1 मई की हड़ताल सबसे तीव्र शिकागो में थी, जो उस समय के जुझारू श्रमिक आंदोलन का एक प्रमुख केंद्र था। आंदोलन तब तक पूरी तरह से राजनीतिक रूप से विकसित नहीं हुआ था, फिर भी वह अत्यंत लड़ाकू था क्योंकि मजदूर न केवल कार्य स्थितियों में सुधार चाहते थे, बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था को भी चुनौती देना चाहते थे। क्रांतिकारी मजदूर संगठनों के समर्थन से वह आंदोलन और भी शक्तिशाली हो गया। 'सेंट्रल लेबर यूनियन' और अन्य मजदूर संगठनों की समग्र एकता के आधार पर, इस हड़ताल से कुछ समय पहले ही एक स्वशासित 8 घंटे काम का एसोसिएशन' बनाया गया था। वास्तव में, यह हड़ताल के भीतर एक प्रकार की 'द्वैत सत्ता' की शुरुआत थी—राज्य के सीधे नियंत्रण के बाहर श्रमिकों का अपना संगठन, जो राज्य को ही चुनौती देगा। उसी दिन मजदूर आंदोलन के भविष्य की दिशा मूर्त हो गई थी।

उसी इतिहास को याद करते हुए, इस मई दिवस पर भारत का मजदूर वर्ग नई रणनीति और नई लड़ाई का रास्ता बनाने की शपथ ले रहा है—तैयारी हो रही है एक ऐसे नए मजदूर आंदोलन और संगठन की दिशा में, जो 'द्वैत सत्ता' के क्रियान्वयन और उसके प्रयोग के माध्यम से इस निर्मम बुर्जुआ व्यवस्था की वैधता को जड़ से चुनौती देगा और समाज को बदलने का रास्ता खोल देगा—न केवल जीवित रहने के लिए, बल्कि एक सम्पूर्ण और गरिमामय जीवन के लक्ष्य के लिए।

(लेखक सी आई टी यू के अखिल भारतीय अध्यक्ष हैं)

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दुर्दशा से द्वैत सत्ता की ओर - सुदीप दत्त

प्रकाशित: 01 मई 2026 • 12 मिनट पठन

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‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

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'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

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दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

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संसाधन

शहीद ए आजम भगत सिंह के विचार - संकलनकर्ता श्रेया जायसवाल (PDF)

'तुम्हारी क्षय' - राहुल सांकृत्यायन (PDF)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (Link)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (PDF)

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल की वेब साइट (बांग्ला) (Link)

भाजपा क्यों है जनता की दुश्मन ? (PDF)

द लेफ्ट व्यूज - द पीपल्स लेंस (अंग्रेजी) (Link)

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा (PDF)

पुरानी फिल्मों में होता था संदेश - सीताराम येचुरी (Link)

मैं नास्तिक क्यों हूँ ? - शहीद-ए-आजम भगतसिंह (PDF)

वाममोर्चा घोषणापत्र। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-2026 (PDF)

मार्क्सवादी पथ पत्रिका (बांग्ला) (Link)

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राज्य

मुखौटा हट गया है, अब लड़ाई असली चेहरे से है - मोहम्मद सलीम

सलीम ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी असल में आरएसएस के इशारे पर दलाल की भूमिका निभाती आ रही है। दरअसल, इस राज्य से वामपंथी राजनीति के दायरे को सिकोड़ना ही आरएसएस का मुख्य उद्देश्य था। राज्य में आज भले ही तृणमूल कांग्रेस नहीं है, लेकिन वामपंथी आज भी मैदान में हैं और भविष्य में भी रहेंगे।

मोहम्मद सलीम

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव

17 जून 2026

राज्य

हिंदू-मुस्लिम सभी बुलडोजर के शिकार होंगे: मोहम्मद सलीम

"जब आग लगती है, तो वह धर्म नहीं देखती, हिंदू-मुस्लिम का भेद किए बिना सभी के घरों को जलाकर खाक कर देती है। बीजेपी की बुलडोजर राजनीति के खतरे से भी कोई नहीं बचेगा। सभी इसके शिकार होंगे। इसलिए प्रतिरोध की लड़ाई में सभी लोगों को एकजुट होना होगा।"

मोहम्मद सलीम

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव

17 जून 2026

राज्य

बुलडोजर नीति के खिलाफ भी लड़ेंगे वामपंथी: मोहम्मद सलीम

हर उस व्यक्ति तक पहुँचना होगा जो मेहनतकश है, सताया हुआ है या प्रताड़ित है। भाजपा ने एसआईआर (SIR) के नाम पर एक बड़े वर्ग के लोगों से उनका मताधिकार छीन लिया है। इन सभी लोगों को एकजुट करना होगा। उनके मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों को वापस लाना होगा। जनता की रोटी-रोजी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और पीने के पानी जैसी स्थानीय मांगों को पूरा कराने के लिए संघर्ष करना होगा। भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एकता, भाईचारा और रोजगार के लिए लड़ना होगा। बुलडोजर राज के खिलाफ लाल झंडा पहले ही उठ खड़ा हुआ है। उन्होंने डर का माहौल बढ़ाया है, लेकिन हम चाहते हैं कि जनता का यह डर टूटे। अन्याय के खिलाफ खड़े होकर हक के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी।

मोहम्मद सलीम

सीपीआई (एम)पश्चिम बंगाल के सचिव

14 जून 2026

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अतिथि लेखन

'बदलाव का कोई शॉर्टकर्ट नहीं होता - गणेश शंकर विद्यार्थी।' अनीश अंकुर की कलम से

हिंदी क्षेत्र के वामपंथी आंदोलन के शलाका पुरुष गणेश शंकर विद्यार्थी के संस्मरणों पर केंद्रित पुस्तक ‘मार्क्सवाद : मेरा संघर्ष पथ’ का हाल ही में प्रकाशन हुआ है। 1 सितंबर को पटना के जमाल रोड स्थित सीपीआई(एम) कार्यालय में पार्टी पोलित ब्यूरो सदस्य अशोक धवले के हाथों लोकार्पण किया जा रहा है। यह पुस्तक गणेश शंकर विद्यार्थी ('गणेश दा') के लगभग आठ दशकों लंबे राजनीतिक और वैचारिक जीवन का दस्तावेज है। एक समृद्ध जमींदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद, उन्होंने सामंती व्यवस्था के खिलाफ वर्गीय चेतना को अपनाया और बिहार में कम्युनिस्ट आंदोलन व स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीपीआई(एम) के बिहार राज्य सचिव के रूप में उन्होंने कठिन दौर में पार्टी का नेतृत्व किया और भूमि आंदोलनों से गरीबों को जोड़ा। अपने अंतिम समय तक वे मार्क्सवादी अध्ययन, आंदोलन और संगठन के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे।

केशव कुमार भट्टड़ • 31 अगस्त 2026

अतिथि लेखन

भोजन और भजन के नाम पर बंगाल की चेतना पर हमला। ~मालिनी भट्टाचार्य~

भोजन की थाली से भजन की हाथताली तक—साझा संस्कृति बचाना ही बंगाल की असली पहचान है !
मालिनी भट्टाचार्य का यह आलेख बंगाली संस्कृति के मुख्य घटकों—खान-पान (भोजन) और पूजा-अर्चना (भजन)—पर हो रहे राजनीतिक व बाजारी हमलों को रेखांकित करता है। इलिश, बकरे और गोमांस पर पाबंदी से लेकर मिड-डे मील में इस्कॉन के प्रवेश तक, यह केवल खान-पान का मुद्दा नहीं बल्कि बंगालियों की बौद्धिक अस्मिता पर प्रहार है। आज कॉर्पोरेट पूंजी और सांप्रदायिक ताकतें मिलकर राज्य की साझा लोक-संस्कृति को बाजारीकरण व अंधविश्वास के ढोंग में धकेल रही हैं। इस खतरनाक सामाजिक-राजनीतिक नागपाश से बंगाली चेतना को मुक्त कराना आज बेहद ज़रूरी है।

केशव कुमार भट्टड़ • 13 सितंबर 2026

अतिथि लेखन

रवींद्रनाथ, फासीवाद और लाल पार्टी - मयूख विश्वास

आज 9 मई भी है, वह दिन जब विश्व मानवता को फासीवादी तांडव से मुक्ति मिली थी। इस संदर्भ में बंगाल की फासीवाद-विरोधी परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण है, और हमारे रवींद्रनाथ ठाकुर इस विरासत के साथ ओत-प्रोत रूप से जुड़े हुए हैं।

श्रेया जायसवाल • 09 मई 2026

वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़

अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ, न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !

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