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भारत में मीडिया की स्वतंत्रता खोती जा रही है और यह निचले स्तर पर पहुँच गई है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 में 180 देशों की सूची में भारत फिसलकर 157वें स्थान पर आ गया है। 2025 में यह 151वें स्थान पर था। मात्र एक वर्ष में छह पायदान की गिरावट! अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठन 'रिपोर्टर्स सैन्स फ्रैंटियर्स (आरएसएफ) द्वारा वृहस्पतिवार को जारी सर्वेक्षण रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पूरी दुनिया में मीडिया पर हमले बढ़ रहे हैं, जिसके कारण मीडिया अपनी स्वतंत्रता खोता जा रहा है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि वर्तमान समय में मीडिया की स्वतंत्र भूमिका में जैसी गिरावट देखी जा रही है, वैसी पिछले 25 वर्षों में नहीं देखी गई।
भारत में मीडिया की स्वतंत्रता के संकट पर आरएसएफ की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस स्थिति के लिए नरेंद्र मोदी सरकार जिम्मेदार है। 2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने राज्य की शक्ति का उपयोग करके मीडिया की स्वतंत्र भूमिका को कम किया है। आवाज दबाने के लिए विभिन्न कानून लाए गए हैं। यदि मीडिया सत्ता पक्ष का विरोध करता है, तो उसे हाशिए पर धकेल दिया जाता है। राजनीतिक विरोध के कारण सरकारी विज्ञापनों के अवसरों से वंचित किया गया है। स्वतंत्र विचार व्यक्त करने वाले पत्रकारों पर शारीरिक हमले बढ़े हैं। सत्ता विरोधी पत्रकारों को पुलिस प्रताड़ना का शिकार होना पड़ रहा है। यहाँ तक कि उन्हें यूएपीए (UAPA) के तहत जेल में बंद किया जा रहा है। इसलिए रिपोर्ट में कहा गया है, 'मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत में मीडिया पर अब व्यावहारिक रूप से आपातकाल लागू है।'
पिछले तीन दशकों में मीडिया की तकनीक की दुनिया में बहुत बदलाव आए हैं। समाचार पत्रों के साथ-साथ अब चैनल और सोशल मीडिया भी आ गए हैं। समाचारों के प्रस्तुतीकरण के तरीकों में भी कई बदलाव हुए हैं। इस दौरान बड़े मीडिया घरानों पर कॉर्पोरेट कब्जे और सरकार का नियंत्रण बढ़ा है। स्वतंत्र रूप से अपनी राय व्यक्त करने की मीडिया की जो भूमिका थी, वह धीरे-धीरे कम होती जा रही है। आरएसएफ (RSF) के सर्वेक्षण ने कॉर्पोरेट मीडिया की स्वतंत्र भूमिका पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसमें नियंत्रण मुक्त और स्वतंत्र मीडिया के मामले में शीर्ष पर रहने वाले देशों के नामों का उल्लेख किया गया है, जिनमें नॉर्वे, नीदरलैंड, डेनमार्क, स्वीडन और एस्तोनिया शामिल हैं।
दूसरी ओर, स्वतंत्रता खोकर पायदान में नीचे गिरने वाले देशों में भारत के साथ सऊदी अरब, ईरान, उत्तर कोरिया, चीन और एरिट्रिया शामिल हैं। रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में मीडिया की गुणवत्ता में भारी गिरावट देखी गई है। वे अपनी स्वीकार्यता और विश्वसनीयता लगातार खो रहे हैं। यह देखा गया है कि 180 देशों में से 100 देशों का मीडिया स्वतंत्रता सूचकांक में सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया है। मीडिया की स्वतंत्रता खोने के कारण अपराध की प्रवृत्ति बढ़ रही है और सामाजिक लोकतांत्रिक मूल्यों का पतन हो रहा है।
मुख्य रूप से बड़े कॉर्पोरेट मीडिया घरानों के मामले में यह रुझान पूरी दुनिया में देखा गया है। अमेरिकी मीडिया में यह प्रवृत्ति काफी स्पष्ट रूप से दिखाई दी है, जिस कारण वहाँ मीडिया की स्वतंत्रता खतरे में है। पिछले एक साल में मीडिया स्वतंत्रता सूचकांक में अमेरिका का स्थान सात पायदान नीचे गिरा है। दक्षिण अमेरिका के विभिन्न देशों में भी मीडिया स्वतंत्रता सूचकांक में गिरावट दर्ज की गई है।
जहाँ भारत मीडिया स्वतंत्रता सूचकांक में गिरकर 157वें स्थान पर पहुँच गया है, वहीं इसके पड़ोसी देश इस पैमाने पर बेहतर स्थिति में हैं। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान का स्थान 153वाँ, भूटान का 150वाँ, बांग्लादेश का 152वाँ, श्रीलंका का 134वाँ और नेपाल का 84वाँ है।
रिपोर्ट में इस बात की व्याख्या की गई है कि कैसे कॉर्पोरेट जगत ने मीडिया पर कब्जा करके उसकी स्वतंत्रता को कम किया है। इसमें कहा गया है कि मोदी के करीबी कॉर्पोरेट समूह मुकेश अंबानी की रिलायंस ने 70 बड़े मीडिया घरानों को खरीद लिया है। अब वे रिलायंस और मोदी के हितों में समाचार प्रसारित करते हैं। पत्रकारों को स्वतंत्र और निर्भीक होकर समाचार देने का कोई अधिकार नहीं है। अंबानी की तरह ही मोदी के करीबी अडानी समूह ने एनडीटीवी (NDTV) को खरीद लिया है। इसके परिणामस्वरूप, एनडीटीवी की स्वतंत्र और मौलिक भूमिका समाप्त हो गई है। एनडीटीवी का काम अब मोदी के हितों में खबरें दिखाना है। आरएसएफ (RSF) की रिपोर्ट में अंबानी-अडानी द्वारा मीडिया पर कब्जा करके उसकी स्वतंत्रता को खत्म करने के विभिन्न तथ्यों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।
मीडिया के प्रति मोदी सरकार के दृष्टिकोण की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि यह सरकार मीडिया की स्वतंत्रता में विश्वास नहीं करती है। इसीलिए मोदी स्वयं कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस (पत्रकार सम्मेलन) नहीं करते हैं। मोदी केवल अपने पसंदीदा पत्रकारों को ही साक्षात्कार देते हैं, जहाँ प्रश्न और उत्तर पहले से तय होते हैं। जो पत्रकार मोदी और भाजपा विरोधी खबरें प्रकाशित करते हैं, उन्हें विभिन्न प्रकार के उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। इस बात का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत एक ऐसा देश है जहाँ पत्रकारिता का पेशा सबसे अधिक खतरे में है। पत्रकारों को हमेशा शासक की नाराजगी और दबाव का सामना करते हुए काम करना पड़ता है। इसके बदले में अधिकांश पत्रकारों को न तो उचित वेतन मिलता है और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा।
साभार - गणशक्ति
अपलोडर: श्रेया जायसवाल
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अपलोडर: श्रेया जायसवाल • प्रकाशित: 01 मई 2026 • 5 मिनट पठन

सलीम ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी असल में आरएसएस के इशारे पर दलाल की भूमिका निभाती आ रही है। दरअसल, इस राज्य से वामपंथी राजनीति के दायरे को सिकोड़ना ही आरएसएस का मुख्य उद्देश्य था। राज्य में आज भले ही तृणमूल कांग्रेस नहीं है, लेकिन वामपंथी आज भी मैदान में हैं और भविष्य में भी रहेंगे।
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

"जब आग लगती है, तो वह धर्म नहीं देखती, हिंदू-मुस्लिम का भेद किए बिना सभी के घरों को जलाकर खाक कर देती है। बीजेपी की बुलडोजर राजनीति के खतरे से भी कोई नहीं बचेगा। सभी इसके शिकार होंगे। इसलिए प्रतिरोध की लड़ाई में सभी लोगों को एकजुट होना होगा।"
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

हर उस व्यक्ति तक पहुँचना होगा जो मेहनतकश है, सताया हुआ है या प्रताड़ित है। भाजपा ने एसआईआर (SIR) के नाम पर एक बड़े वर्ग के लोगों से उनका मताधिकार छीन लिया है। इन सभी लोगों को एकजुट करना होगा। उनके मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों को वापस लाना होगा। जनता की रोटी-रोजी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और पीने के पानी जैसी स्थानीय मांगों को पूरा कराने के लिए संघर्ष करना होगा। भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एकता, भाईचारा और रोजगार के लिए लड़ना होगा। बुलडोजर राज के खिलाफ लाल झंडा पहले ही उठ खड़ा हुआ है। उन्होंने डर का माहौल बढ़ाया है, लेकिन हम चाहते हैं कि जनता का यह डर टूटे। अन्याय के खिलाफ खड़े होकर हक के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी।
सीपीआई (एम)पश्चिम बंगाल के सचिव
14 जून 2026

पेपर माफिया बेलगाम। जिम्मेदार कौन ?
नीट प्रश्नपत्र लीक के पीछे एक अत्यंत संगठित गिरोह होने की बात जांचकर्ता मान रहे है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि प्रश्नपत्र राजस्थान, हरियाणा, केरल, जम्मू- काश्मीर, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में फैल गया था पूरा काम अत्यंत संगठित तरीके से होता है । प्रश्नपत्र विभिन्न चरणों में अलग-अलग स्तरों पर बेचे जाते हैं ये सीधे छात्रों को नहीं बेचे जाते। प्रश्नपत्र बेचने के लिए अलग 'थोक' और 'खुदरा' बाजार होते हैं। किसी भी परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक गिरोह में 100 करोड़ रुपये से अधिक के लेनदेन की संभावना है।
केशव कुमार भट्टड़ • 12 मई 2026

सीबीआई ने आरोपी की पहचान पीवी कुलकर्णी के रूप में की है। जांच में सामने आया है कि कुलकर्णी न केवल रसायन शास्त्र (Chemistry) के प्रोफेसर थे, बल्कि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था 'एनटीए' के एक प्रभावशाली अधिकारी भी थे। इसी पद पर रहने के कारण प्रश्नपत्रों तक उनकी आसान पहुंच थी।
केशव कुमार भट्टड़ • 15 मई 2026

पश्चिम बंगाल के रानीगंज से हाल ही में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति गायब कर दिए जाने पर प्रोफेसर जेता सांकृत्यायन की विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आई है। जेता सांकृत्यायन अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं। राहुल सांकृत्यायन और उनकी पत्नी डॉ. कमला सांकृत्यायन (जो स्वयं एक लेखिका और विद्वान थीं) के बेटे हैं। उन्होंने उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय (North Bengal University) और सिक्किम यूनिवर्सिटी (गंगटोक) में लंबे समय तक अर्थशास्त्र विभाग में अपनी सेवाएं दी हैं। प्रो. जेता सांकृत्यायन अपने पिता महापंडित राहुल सांकृत्यायन के साहित्यिक और ऐतिहासिक योगदान को संजोने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं।
केशव कुमार भट्टड़ • 17 जुलाई 2026
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