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ध्रुवीकरण के बावजूद पश्चिम बंगाल में वामपंथियों ने छोड़ी अपनी छाप: एम.ए. बेबी

श्रेया जायसवाल04 मई 20263 मिनट पठन45 बार पढ़ा गया
"राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथी ताकतों की मजबूती आवश्यक है। देश के गरीबों और हाशिए पर रहने वाले लोगों के हक के लिए केवल वामपंथी ही असली लड़ाई लड़ते हैं।"
ध्रुवीकरण के बावजूद पश्चिम बंगाल में वामपंथियों ने छोड़ी अपनी छाप: एम.ए. बेबी

ध्रुवीकरण के बावजूद पश्चिम बंगाल में 

वामपंथियों ने छोड़ी अपनी छाप: एम.ए. बेबी

सीपीआई(एम) के महासचिव  एम.ए. बेबी ने दिल्ली के ए.के. गोपालन भवन में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "पश्चिम बंगाल में तीव्र राजनीतिक ध्रुवीकरण के बावजूद वामपंथी कई सीटों पर अपनी ताकत बढ़ाने में सफल रहे हैं।"

उन्होंने विभिन्न राज्यों की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि केरल में भाजपा की हार, पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत और तेलंगाना में टीवीके (TVK) का एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरना महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्टालिन की टीवीके से हार पर चिंता व्यक्त की और नोट किया कि असम में भाजपा अपनी सत्ता बरकरार रखने में सफल रही है।

बेबी ने कहा, "केरल में दस साल बाद वामपंथियों को हार का सामना करना पड़ा है। केंद्र सरकार की विभिन्न बाधाओं के बावजूद उन्होंने लोगों के विकास के लिए काम करना जारी रखा था। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों में गुस्सा था। इसके अलावा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, दोनों दलों द्वारा भारी खर्च और एसआईआर (SIR) जैसे कारक प्रभावी रहे। इस ध्रुवीकरण के बीच भी वामपंथियों ने राज्य में अपना वोट बैंक सुरक्षित रखा है। एक अंतराल के बाद अब बंगाल विधानसभा में वामपंथी प्रतिनिधि मौजूद होंगे। पश्चिम बंगाल में तीव्र ध्रुवीकरण के बीच 35 सीटों पर वामपंथियों का वोट शेयर बढ़ा है, हालांकि हम और बेहतर नतीजों की उम्मीद कर रहे थे।"

चिंता जताते हुए सीपीआई(एम) नेता ने कहा, "असम, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी के परिणाम कट्टर दक्षिणपंथी ताकतों के उभार का संकेत दे रहे हैं, जिसे देश के लिए खतरा माना जा रहा है।"

उन्होंने आगे कहा, "जिन लोगों ने वामपंथियों पर भरोसा जताया है, हम उनका सम्मान करते हैं। हम जनमत को स्वीकार करते हैं और जनता की मांगों के लिए अपना संघर्ष जारी रखेंगे। देश के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखने के लिए हमारी लड़ाई चलती रहेगी।"

बेबी ने जानकारी दी कि राज्यों के चुनावी परिणामों, विशेषकर केरल के नतीजों पर पार्टी की केंद्रीय समिति और पोलिटब्यूरो  में विस्तार से चर्चा की जाएगी।

पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि बंगाल में 'बंगाल बचाओ' और अन्य कार्यक्रमों को जनता का अच्छा समर्थन मिला है। केरल के संदर्भ में उन्होंने कहा कि वहां आमतौर पर हर पांच साल में सरकार बदल जाती है, लेकिन पिछले दस वर्षों में वामपंथी सरकार ने विकास के अभूतपूर्व कार्य किए हैं, जिसके परिणामस्वरूप आज केरल गरीबी मुक्त है।

अंत में उन्होंने जोर देकर कहा, "राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथी ताकतों की मजबूती आवश्यक है। देश के गरीबों और हाशिए पर रहने वाले लोगों के हक के लिए केवल वामपंथी ही असली लड़ाई लड़ते हैं।"

अपलोडर: श्रेया जायसवाल

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प्रश्नपत्र लीक:'नीट' रद्द । जिम्मेदार कौन ?

पेपर माफिया बेलगाम। जिम्मेदार कौन ? नीट प्रश्नपत्र लीक के पीछे एक अत्यंत संगठित गिरोह होने की बात जांचकर्ता मान रहे हैं। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि प्रश्नपत्र राजस्थान, हरियाणा, केरल, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में फैल गया था। पूरा काम अत्यंत संगठित तरीके से होता है। प्रश्नपत्र विभिन्न चरणों में अलग-अलग स्तरों पर बेचे जाते हैं। ये सीधे छात्रों को नहीं बेचे जाते। प्रश्नपत्र बेचने के लिए अलग 'थोक' और 'खुदरा' बाजार होते हैं। किसी भी परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक गिरोह में 100 करोड़ रुपये से अधिक के लेनदेन की संभावना है।

केशव कुमार भट्टड़12 मई 2026

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न्यूज़क्लिक मामला! स्वतंत्र और जनपक्षीय मीडिया पर सरकार का हमला!कानून का घोर दुरुपयोग!

मामले का नाम: M/s PPK Newsclick Studio Pvt. Ltd. बनाम दिल्ली राज्य एवं अन्य।

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जून 2026 में, दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की बेंच ने न्यूज़क्लिक को बड़ी राहत दी। अदालत ने कहा कि शेयर मूल्यांकन, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और फंड के इस्तेमाल से जुड़े आरोप कोई आपराधिक मामला (जैसे धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात) नहीं बनाते हैं। आधारभूत आरोप ही खारिज होने के कारण ईडी का मनी लॉन्ड्रिंग का मामला भी स्वतः रद्द कर दिया गया।

स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता को कोर्ट का संरक्षण

न्यूज़क्लिक पर हमला 2020-21 के आसपास हुआ — ठीक उस समय जब सरकार की कुछ नीतियों को लेकर विश्व स्तर पर सवाल उठ रहे थे। ऐसे में यह संयोग नहीं, बल्कि चुनींदा निशाना था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कहा कि 'न्यूज़क्लिक' पर लगे सारे आरोप बेबुनियाद थे। ताज्जुब करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर कोई ऊपरी सीमा (कैप) नहीं थी, फिर भी ED ने छापेमारी की! विदेशी निवेश पूरी तरह कानून के अनुसार था।

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धूर्तता इस बात में है कि सत्ता "राष्ट्रीय सुरक्षा" और "मनी लॉन्ड्रिंग" जैसे गंभीर शब्दों का इस्तेमाल करके असहमति की आवाज को कुचलने की कोशिश करती है। जब कोर्ट कहता है कि "कोई शिकायतकर्ता नहीं, कोई धोखा नहीं, कोई अपराध नहीं", तब साफ हो जाता है कि पूरा मामला राजनीतिक प्रतिशोध और वैकल्पिक मीडिया को डराने का था।

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स्वतंत्र पत्रकारिता को केंद्र सरकार द्वारा प्रभावित करने के लिए चुनौती देना लोकतंत्र के लिए खतरा है — चाहे वो न्यूज़क्लिक हो या कोई और। लेकिन उसी के साथ, विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता भी जरूरी है। असली मुद्दा यह है कि कानून का चयनात्मक इस्तेमाल (selective application) हो रहा है। जो सत्ता के अनुकूल है, उसे छूट। जो आलोचना करता है, उसके खिलाफ पूरा तंत्र सक्रिय।

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हाईकोर्ट ने कानून की गरिमा बचाई, लेकिन सवाल बाकी है — कितने ऐसे केस हैं जो कोर्ट तक नहीं पहुँच पाते? और कितनी बार ED जैसी एजेंसियों को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है?

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ED की कार्यवाही न सिर्फ बुरी नीयत वाली थी, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता पर सीधा हमला थी। यह नियमानुसार एक आर्थिक फैसला था, कोई अपराध नहीं था। पुलिस और ईडी का पूरा मामला कानून का घोर दुरुपयोग था, जिसे कोर्ट ने रद्द कर दिया।

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यह फैसला सिर्फ न्यूज़क्लिक की जीत नहीं, बल्कि असहमति के अधिकार की जीत है।

केशव कुमार भट्टड़12 जून 2026