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न्यूज़क्लिक मामला! स्वतंत्र और जनपक्षीय मीडिया पर सरकार का हमला!कानून का घोर दुरुपयोग!

केशव कुमार भट्टड़•12 जून 202611 मिनट पठन130 बार पढ़ा गया

मामले का नाम: M/s PPK Newsclick Studio Pvt. Ltd. बनाम दिल्ली राज्य एवं अन्य।

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जून 2026 में, दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की बेंच ने न्यूज़क्लिक को बड़ी राहत दी। अदालत ने कहा कि शेयर मूल्यांकन, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और फंड के इस्तेमाल से जुड़े आरोप कोई आपराधिक मामला (जैसे धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात) नहीं बनाते हैं। आधारभूत आरोप ही खारिज होने के कारण ईडी का मनी लॉन्ड्रिंग का मामला भी स्वतः रद्द कर दिया गया।

स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता को कोर्ट का संरक्षण

न्यूज़क्लिक पर हमला 2020-21 के आसपास हुआ — ठीक उस समय जब सरकार की कुछ नीतियों को लेकर विश्व स्तर पर सवाल उठ रहे थे। ऐसे में यह संयोग नहीं, बल्कि चुनींदा निशाना था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कहा कि 'न्यूज़क्लिक' पर लगे सारे आरोप बेबुनियाद थे। ताज्जुब करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर कोई ऊपरी सीमा (कैप) नहीं थी, फिर भी ED ने छापेमारी की! विदेशी निवेश पूरी तरह कानून के अनुसार था।

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धूर्तता इस बात में है कि सत्ता "राष्ट्रीय सुरक्षा" और "मनी लॉन्ड्रिंग" जैसे गंभीर शब्दों का इस्तेमाल करके असहमति की आवाज को कुचलने की कोशिश करती है। जब कोर्ट कहता है कि "कोई शिकायतकर्ता नहीं, कोई धोखा नहीं, कोई अपराध नहीं", तब साफ हो जाता है कि पूरा मामला राजनीतिक प्रतिशोध और वैकल्पिक मीडिया को डराने का था।

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स्वतंत्र पत्रकारिता को केंद्र सरकार द्वारा प्रभावित करने के लिए चुनौती देना लोकतंत्र के लिए खतरा है — चाहे वो न्यूज़क्लिक हो या कोई और। लेकिन उसी के साथ, विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता भी जरूरी है। असली मुद्दा यह है कि कानून का चयनात्मक इस्तेमाल (selective application) हो रहा है। जो सत्ता के अनुकूल है, उसे छूट। जो आलोचना करता है, उसके खिलाफ पूरा तंत्र सक्रिय।

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हाईकोर्ट ने कानून की गरिमा बचाई, लेकिन सवाल बाकी है — कितने ऐसे केस हैं जो कोर्ट तक नहीं पहुँच पाते? और कितनी बार ED जैसी एजेंसियों को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है?

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ED की कार्यवाही न सिर्फ बुरी नीयत वाली थी, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता पर सीधा हमला थी। यह नियमानुसार एक आर्थिक फैसला था, कोई अपराध नहीं था। पुलिस और ईडी का पूरा मामला कानून का घोर दुरुपयोग था, जिसे कोर्ट ने रद्द कर दिया।

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यह फैसला सिर्फ न्यूज़क्लिक की जीत नहीं, बल्कि असहमति के अधिकार की जीत है।

न्यूज़क्लिक मामला! स्वतंत्र और जनपक्षीय मीडिया पर सरकार का हमला!कानून का घोर दुरुपयोग!

न्यूज़क्लिक मामला

स्वतंत्र और जनपक्षीय मीडिया पर सरकार का हमला!

कानून का घोर दुरुपयोग:

न्यूज़क्लिक और प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ विदेशी फंडिंग के मामले में FIR तथा ED का केस रद्द किया दिल्ली हाई कोर्ट ने।

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नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने न्यूज़ पोर्टल न्यूज़क्लिक और उसके प्रधान संपादक (एडिटर-इन-चीफ) प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ विदेशी फंडिंग के आरोप में दर्ज आर्थिक अपराध शाखा (Economic Offences Wing/EOW) की प्राथमिकी (प्रथम सूचना रिपोर्ट/First information Report/ FIR) तथा प्रवर्तन निदेशालय ( Enforcement Directorate/ED) के प्रवर्तन मामले की सूचना रिपोर्ट (ECIR) को पूरी तरह रद्द कर दिया है।

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जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि अगर प्राथमिकी में लगाए गए सारे आरोपों को पूरी तरह सही मान लिया जाए, तब भी भारतीय दंड संहिता (Indian Panel Code/IPC) की धारा 406 और 420 के अपराध के जरूरी तत्व नहीं बनते। कोर्ट ने कहा कि ऐसी प्राथमिकी को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का घनघोर/गलीच दुरुपयोग (Gross Abuse Of The Process Of Law) के सिवा कुछ नहीं है। इसलिए कोर्ट ने आर्थिक अपराध शाखा (Economic offenses Wing, EOW) की प्राथमिकी (FIR) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की प्रवर्तन मामले की सूचना रिपोर्ट ( Enforcement Case Information Report, ECIR) दोनों रद्द कर दिए।

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जज ने फैसला देते हुए कहा, “मूल अपराध (predicate offence) वाली प्राथमिकी रद्द हो जाने पर ECIR भी अपने आप रद्द हो जाता है। इसलिए पूरा ECIR रद्द किया जाता है। एक बार ECIR रद्द हो जाने के बाद उसकी कॉपी मांगना व्यर्थ हो जाता है।”

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कोर्ट ने आगे टिप्पणी की कि ED की यह पूरी कार्यवाही न सिर्फ भ्रष्ट नीयत वाली (मालाफ़ायड) थी, बल्कि याचिकाकर्ताओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता पर मनमाना हमला तथा शक्तियों (पॉवर) का घोर दुरुपयोग था।

यह प्राथमिकी अगस्त 2020 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार की शिकायत पर दर्ज की गई थी। इसमें आरोप था कि न्यूज़क्लिक को अमेरिका की कंपनी वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी (Worldwide Media Holdings LLC) से 9.59 करोड़ रुपये प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के रूप में मिले थे। आरोप था कि शेयरों को कृत्रिम रूप से ज्यादा मूल्य देकर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की ऊपरी सीमा (कैप) से बचने की कोशिश की गई और फंड का बड़ा हिस्सा सैलरी, कंसल्टेंसी फीस व अन्य खर्चों के बहाने वापस बाहर निकाल (साइफन) लिया गया। जांच के बाद प्राथमिकी (FIR) की कॉपी ED को भेजी गई और उसके आधार पर ECIR दर्ज किया गया।

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केस रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह स्वीकार किया गया है कि Worldwide Media Holdings LLC ने न्यूज़क्लिक की कंपनी PPK Newsclick Studio Pvt. Ltd. में कुल 4.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर(US$) का निवेश तीन किस्तों में (प्रत्येक 1.5 मिलियन US$) करने पर सहमति जताई थी, जिसके बदले कुल 23.07% शेयर दिए जाने थे। पहली किस्त 11 अप्रैल 2018 को मिल गई थी।

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न्यूज़क्लिक का पक्ष था कि ऑनलाइन समाचार प्रकाशन में FDI के लिए कोई सरकारी अनुमति की जरूरत नहीं थी। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि न्यूज़क्लिक ने 2017 में ही सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार को पत्र लिखकर प्रिंट मीडिया और ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नीति को लेकर स्पष्टता मांगी थी।

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जस्टिस कृष्णा ने कहा कि अप्रैल 2018 में जब निवेश आया, उस समय डिजिटल न्यूज़ मीडिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर कोई ऊपरी सीमा (Cap) नहीं थी। जनवरी 2018 के मंत्रालय के स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन समाचार प्रकाशन पर कोई प्रतिबंध नहीं था। इसलिए न्यूज़क्लिक और Worldwide Media Holdings LLC के बीच 20 मार्च 2018 का निवेश समझौता किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं करता और न ही इसमें कोई 'आपराधिक अपराध' दिखता है।

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कोर्ट ने कहा कि शेयरों की कीमत विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के नियमों के अनुसार तय की गई थी। यह कीमत दोनों पक्षों की बातचीत और आपसी सहमति से तय हुई थी। यह एक शुद्ध आर्थिक फैसला था, जिसमें कोई आपराधिक इरादा नहीं था। मूल्यांकन (Valuation) रियायती नगदी प्रवाह (Discounted Cash Flow/DCF) पद्धति से की गई, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय मूल्यांकन विधि के रूप में स्वीकार्य मानक (Standard) है।

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कोर्ट ने कहा कि भले ही न्यूज़ प्लेटफॉर्म ने कुछ ज्यादा भुगतान या अनावश्यक खर्च किए हों, तब भी इससे कोई अपराध नहीं बनता। इसलिए धनराशि बुरी नियत से निकालने का (फंड साइफन करने का) आरोप टिकता ही नहीं है।

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कोर्ट ने EOW की पहले की रिपोर्ट का हवाला दिया जिसमें भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank Of India/RBI) ने बताया था कि विदेशी पैसा 'स्वचालित मार्ग (ऑटोमेटिक रूट'/Automatic Route का अर्थ है कि भारत में आने वाले विदेशी निवेश के लिए किसी भी विदेशी कंपनी या निवेशक को भारत सरकार या भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से पहले से कोई विशेष अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती है। यह प्रक्रिया विदेशी निवेशकों के लिए निवेश को बेहद सरल और पारदर्शी बनाती है।) से आया था और विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (Foreign Exchange Management Act/FEMA) नियमों के तहत शेयर जारी करने या रिपोर्टिंग में कोई देरी नहीं हुई।

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प्राथमिकी में लगाए गए अपराधों की जांच करते हुए कोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई शिकायतकर्ता नहीं था जिसने धोखा खाने का दावा किया हो। विदेशी निवेशक कंपनी ने कभी नहीं कहा कि उसे धोखा दिया गया। जांच में भी ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जो याचिकाकर्ताओं द्वारा धोखा खाया या नुकसान में आया हो। इसलिए IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी) का अपराध नहीं बनता।

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इसी प्रकार IPC की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) भी लागू नहीं होती, क्योंकि न तो कोई संपत्ति सौंपी गई थी और न ही उसके दुरुपयोग का कोई आरोप था।

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ED ने IPC की धारा 120B (आपराधिक षड्यंत्र) के आधार पर धनशोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) की जांच चलाई थी, लेकिन कोर्ट ने कहा कि सिर्फ निवेश समझौता करना षडयंत्र नहीं माना जा सकता जब तक कोई गैरकानूनी मकसद या तरीका न हो।

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ECIR रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि PMLA (मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम) की धारा 4 के तहत सजा योग्य अपराध का कोई ठोस आरोप या सबूत नहीं था।

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सरकारी जाँच एजेंसियों का कोई भी आरोप और धारा कोर्ट में नहीं टिकी। यह मामला आकाओं के इशारे पर सजाया गया या जाँच एजेंसियों ने लापरवाही की - यह जाँच का विषय है। आखिर जबाबदेही किसकी है ? धन तो जनता का ही है। स्पष्ट है कि बगैर किसी पुख्ता आधार/सबूत के मनमानी कार्रवाई की गई, यह सरकार की बदनीयती ही कही जाएगी।

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क्या था मामला ?

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न्यूज़क्लिक (NewsClick) मामला डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म 'न्यूज़क्लिक' और उसके संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ पर विदेश से अवैध फंडिंग प्राप्त करने और भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुंचाने के आरोपों से जुड़ा है। इस मामले में कई वर्षों तक जाँच और कानूनी विवाद चला।

वर्ष 2020-21 में दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने एक शिकायत के आधार पर केस दर्ज किया था, जिसमें आरोप लगाया गया कि न्यूज़क्लिक को अमेरिका स्थित संस्थाओं से संदिग्ध विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) प्राप्त हुआ है। बाद में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने धनशोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) का मामला दर्ज किया। साल 2023 में 'न्यूयॉर्क टाइम्स' में छपी एक रिपोर्ट के बाद यह मामला और गरमा गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि न्यूज़क्लिक को अमेरिकी व्यवसायी नेविल रॉय सिंघम के जरिए चीनी कंपनियों से फंडिंग मिली है ताकि वे भारत में चीन के प्रोपेगैंडा का प्रचार कर सकें।

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फंडिंग को 'भारत की संप्रभुता के खिलाफ' मानकर दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने अक्टूबर 2023 में आतंकवाद विरोधी कानून, (UAPA) के तहत केस दर्ज किया और न्यूज़क्लिक के एडिटर प्रबीर पुरकायस्थ को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद मई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी को अवैध घोषित करते हुए उन्हें रिहा करने का आदेश दिया था।

ज्ञात रहे कि मामले की शुरुआत में प्रबीर पुरकायस्थ को जून 2021 में गिरफ्तारी से अस्थायी सुरक्षा मिली थी, जिसे बाद में कई बार बढ़ाया गया। ED ने फरवरी 2021 में न्यूज़क्लिक के कार्यालय और संपादकों के घरों पर छापेमारी की थी।

पीपीके न्यूज़क्लिक स्टूडियो प्रा. ली. (PPK Newsclick Studio Pvt Ltd) पर आरोप था कि उसने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमा से बचने के लिए शेयरों को ज्यादा मूल्य देकर विदेशी निवेश लिया। EOW की प्राथमिकी पर संज्ञान लेते हुए ED ने जांच शुरू की थी।

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मामले का नाम: M/s PPK Newsclick Studio Pvt. Ltd. बनाम दिल्ली राज्य एवं अन्य।

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जून 2026 में, दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की बेंच ने न्यूज़क्लिक को बड़ी राहत दी। अदालत ने कहा कि शेयर मूल्यांकन, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और फंड के इस्तेमाल से जुड़े आरोप कोई आपराधिक मामला (जैसे धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात) नहीं बनाते हैं। आधारभूत आरोप ही खारिज होने के कारण ईडी का मनी लॉन्ड्रिंग का मामला भी स्वतः रद्द कर दिया गया।

स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता को कोर्ट का संरक्षण

न्यूज़क्लिक पर हमला 2020-21 के आसपास हुआ — ठीक उस समय जब सरकार की कुछ नीतियों को लेकर विश्व स्तर पर सवाल उठ रहे थे। ऐसे में यह संयोग नहीं, बल्कि चुनींदा निशाना था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कहा कि 'न्यूज़क्लिक' पर लगे सारे आरोप बेबुनियाद थे। ताज्जुब करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर कोई ऊपरी सीमा (कैप) नहीं थी, फिर भी ED ने छापेमारी की! विदेशी निवेश पूरी तरह कानून के अनुसार था।

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धूर्तता इस बात में है कि सत्ता "राष्ट्रीय सुरक्षा" और "मनी लॉन्ड्रिंग" जैसे गंभीर शब्दों का इस्तेमाल करके असहमति की आवाज को कुचलने की कोशिश करती है। जब कोर्ट कहता है कि "कोई शिकायतकर्ता नहीं, कोई धोखा नहीं, कोई अपराध नहीं", तब साफ हो जाता है कि पूरा मामला राजनीतिक प्रतिशोध और वैकल्पिक मीडिया को डराने का था।

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स्वतंत्र पत्रकारिता को केंद्र सरकार द्वारा प्रभावित करने के लिए चुनौती देना लोकतंत्र के लिए खतरा है — चाहे वो न्यूज़क्लिक हो या कोई और। लेकिन उसी के साथ, विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता भी जरूरी है। असली मुद्दा यह है कि कानून का चयनात्मक इस्तेमाल (selective application) हो रहा है। जो सत्ता के अनुकूल है, उसे छूट। जो आलोचना करता है, उसके खिलाफ पूरा तंत्र सक्रिय।

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हाईकोर्ट ने कानून की गरिमा बचाई, लेकिन सवाल बाकी है — कितने ऐसे केस हैं जो कोर्ट तक नहीं पहुँच पाते? और कितनी बार ED जैसी एजेंसियों को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है?

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ED की कार्यवाही न सिर्फ बुरी नीयत वाली थी, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता पर सीधा हमला थी। यह नियमानुसार एक आर्थिक फैसला था, कोई अपराध नहीं था। पुलिस और ईडी का पूरा मामला कानून का घोर दुरुपयोग था, जिसे कोर्ट ने रद्द कर दिया।

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यह फैसला सिर्फ न्यूज़क्लिक की जीत नहीं, बल्कि असहमति के अधिकार की जीत है।

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यहां एक विडंबना यह भी उभरती है कि पहले मांगने पर जो मंत्रालय स्पष्टीकरण देकर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को नियमानुसार बता रहा है वही मंत्रालय बाद में आपराधिक प्राथमिकी दर्ज करवा रहा है। इससे सरकार के काम-काज के तरीकों का खुलासा होता है। सरकार के पास सलाह के लिए पूरा कानून मंत्रालय और कानून विशेषज्ञ अटॉर्नी जनरल भी है। स्पष्ट है कि सारी कार्रवाई न्यूज़क्लिक को परेशान करने के लिए, डरा कर प्रभावित करने के लिए थी। यह मामला कानून के, जाँच संस्थाओं के दुरुपयोग के क्लासिक मामलों की सूची में स्थान बनाएगा । यह स्पष्ट नहीं है कि कोर्ट ने इस पर अलग-से संज्ञान लिया है या नहीं और न्यूज़क्लिक को हुई प्रताड़ना की भरपाई का आदेश दिया है या नहीं। कोर्ट पर मुकदमों का भार पहले ही ज्यादा है, फर्जी सरकारी मुकदमें उस भार में इजाफा करते हैं। वैसे भी करीब 45 से 50% लंबित मुकदमों में सरकारें ही पक्षकार है।

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केरल में विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री पिनारयी विजयन ने गुरुवार को एक कार्यक्रम में कहा कि न्यूजक्लिक मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए एक बड़ा झटका है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग किया। न्यूज़क्लिक और उसके संपादक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ की गई कार्रवाई आलोचनात्मक पत्रकारिता और लोकतांत्रिक आवाजों को चुप कराने का प्रयास है। श्री विजयन ने कहा कि यह संघ परिवार की फासीवादी राजनीति पर लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता की जीत है।

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यूज़क्लिक संबंधी फैसले का सीपीआई (एम) के पोलिटब्यूरो ने किया स्वागत

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सूत्र: सभी ऑनलाइन। लाइव लॉ.इन (नूपुर थपलियाल), नवभारत टाइम्स, द हिन्दू, स्क्रॉल.इन, द टाइम्स ऑफ इंडिया,लोकमत हिंदी, न्यूज़लांड्री, द इंडियन एक्सप्रेस, बीएनबीलीगल.कॉम (कानूनी सलाहकार) एवं अन्य और यूट्यूब पर उपलब्ध विजुअल कंटेंट्स।

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न्यूज़क्लिक मामला! स्वतंत्र और जनपक्षीय मीडिया पर सरकार का हमला!कानून का घोर दुरुपयोग!

प्रकाशित: 12 जून 2026 • 11 मिनट पठन

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