राष्ट्रीय

" क्रांतिकारी आंदोलन की पहली अग्नि-कन्या शहीद प्रीतिलता वाद्देदार "

श्रेया जायसवाल05 मई 20262 मिनट पठन66 बार पढ़ा गया
" देश की आजादी की लड़ाई में नारियों और पुरुषों के बीच भेदभाव से मुझे तकलीफ हुई थी।जब हमारे भाई देश को आजाद कराने की लड़ाई में उतर सकते हैं तो हम बहनें क्यों पीछे रहेंगी।इतिहास में बहुत सारे उदाहरण है ,राजपूत नारियाँ वीरता के साथ युद्ध के मैदान में युद्ध करने एवं देश को आजाद कराने और महिलाओं की मर्यादा की रक्षा के लिए शत्रु का प्राण तक ले लेने में उन्हें दुविधा नहीं होती थी।ऐसी नारियों की वीरगाथाएँ इतिहास के पन्नों से भरी पड़ी हैं।..."
" क्रांतिकारी आंदोलन की पहली  अग्नि-कन्या  शहीद प्रीतिलता वाद्देदार "

क्रांतिकारी प्रीतिलता वाद्देदार की 115 वीं जयंती पर श्रद्धांजलि ! 

" क्रांतिकारी आंदोलन की पहली 

अग्नि-कन्या  शहीद प्रीतिलता वाद्देदार "

क्रांतिकारी आंदोलन की पहली महिला शहीद  प्रीतिलता वाद्देदार का जन्म 5 मई 1911 में  चटगांव में हुआ था । अंग्रेजी शासकों के अत्याचार से देश को आजाद कराने के लिए उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर यूरोपियन क्लब पर हमला कर दिया।पुलिस के आने से पहले प्रीतिलता ने पोटेशियम सायनाइड खाकर अपने प्राण त्याग दिए।पुलिस को शव मिलने पर पता चला कि पुरुष के वेश में एक महिला क्रांतिकारी थी।उनके पाकेट से एक लिखित बयान मिला।जिसमें प्रीतिलता ने लिखा था- " देश की आजादी की लड़ाई में नारियों और पुरुषों के बीच भेदभाव से मुझे तकलीफ हुई थी।जब हमारे भाई देश को आजाद कराने की लड़ाई में उतर सकते हैं तो हम बहनें क्यों पीछे रहेंगी।इतिहास में बहुत सारे उदाहरण है ,राजपूत नारियाँ वीरता के साथ युद्ध के मैदान में युद्ध करने एवं देश को आजाद कराने और महिलाओं की मर्यादा की रक्षा के लिए शत्रु का प्राण तक ले लेने में उन्हें दुविधा नहीं होती थी।ऐसी नारियों की वीरगाथाएँ इतिहास के पन्नों से भरी पड़ी हैं। फिर क्यों आज की भारतीय महिलाएँ विदेशी गुलामी की जंजीरों से अपने देश को आजाद कराने के लिए इस युद्ध में क्यों शामिल नहीं हो सकती ? जब बहनें भाइयों के साथ सत्याग्रह आंदोलन में शामिल हो सकती हैं तब क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल होने में क्या परेशानी है ? दुनिया के क्रांतिकारी आंदोलन में बहुत सारी महिलाएँ शामिल हुई थी।तब क्यों भारतीय महिलाएँ इस क्रांतिकारी रास्ता को अन्याय महसूस करेंगी ।आज महिलाओं ने शपथ लिया है, हमारे देश की बहनें खुद को कमजोर न समझे। क्रांतिकारी महिला हजारों मुसीबतों और बाधाओं को पार कर इस क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल होंगी और इसके लिए खुद को तैयार करना होगा।- इसी उम्मीद के साथ आज मैं अपना आत्मबलिदान कर रही हूँ ।"

                       प्रीतिलता वाद्देदार 

                     23 सितम्बर,1932

अपलोडर: श्रेया जायसवाल

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प्रश्नपत्र लीक:'नीट' रद्द । जिम्मेदार कौन ?

पेपर माफिया बेलगाम। जिम्मेदार कौन ? नीट प्रश्नपत्र लीक के पीछे एक अत्यंत संगठित गिरोह होने की बात जांचकर्ता मान रहे हैं। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि प्रश्नपत्र राजस्थान, हरियाणा, केरल, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में फैल गया था। पूरा काम अत्यंत संगठित तरीके से होता है। प्रश्नपत्र विभिन्न चरणों में अलग-अलग स्तरों पर बेचे जाते हैं। ये सीधे छात्रों को नहीं बेचे जाते। प्रश्नपत्र बेचने के लिए अलग 'थोक' और 'खुदरा' बाजार होते हैं। किसी भी परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक गिरोह में 100 करोड़ रुपये से अधिक के लेनदेन की संभावना है।

केशव कुमार भट्टड़12 मई 2026

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न्यूज़क्लिक मामला! स्वतंत्र और जनपक्षीय मीडिया पर सरकार का हमला!कानून का घोर दुरुपयोग!

मामले का नाम: M/s PPK Newsclick Studio Pvt. Ltd. बनाम दिल्ली राज्य एवं अन्य।

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जून 2026 में, दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की बेंच ने न्यूज़क्लिक को बड़ी राहत दी। अदालत ने कहा कि शेयर मूल्यांकन, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और फंड के इस्तेमाल से जुड़े आरोप कोई आपराधिक मामला (जैसे धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात) नहीं बनाते हैं। आधारभूत आरोप ही खारिज होने के कारण ईडी का मनी लॉन्ड्रिंग का मामला भी स्वतः रद्द कर दिया गया।

स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता को कोर्ट का संरक्षण

न्यूज़क्लिक पर हमला 2020-21 के आसपास हुआ — ठीक उस समय जब सरकार की कुछ नीतियों को लेकर विश्व स्तर पर सवाल उठ रहे थे। ऐसे में यह संयोग नहीं, बल्कि चुनींदा निशाना था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कहा कि 'न्यूज़क्लिक' पर लगे सारे आरोप बेबुनियाद थे। ताज्जुब करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर कोई ऊपरी सीमा (कैप) नहीं थी, फिर भी ED ने छापेमारी की! विदेशी निवेश पूरी तरह कानून के अनुसार था।

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धूर्तता इस बात में है कि सत्ता "राष्ट्रीय सुरक्षा" और "मनी लॉन्ड्रिंग" जैसे गंभीर शब्दों का इस्तेमाल करके असहमति की आवाज को कुचलने की कोशिश करती है। जब कोर्ट कहता है कि "कोई शिकायतकर्ता नहीं, कोई धोखा नहीं, कोई अपराध नहीं", तब साफ हो जाता है कि पूरा मामला राजनीतिक प्रतिशोध और वैकल्पिक मीडिया को डराने का था।

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स्वतंत्र पत्रकारिता को केंद्र सरकार द्वारा प्रभावित करने के लिए चुनौती देना लोकतंत्र के लिए खतरा है — चाहे वो न्यूज़क्लिक हो या कोई और। लेकिन उसी के साथ, विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता भी जरूरी है। असली मुद्दा यह है कि कानून का चयनात्मक इस्तेमाल (selective application) हो रहा है। जो सत्ता के अनुकूल है, उसे छूट। जो आलोचना करता है, उसके खिलाफ पूरा तंत्र सक्रिय।

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हाईकोर्ट ने कानून की गरिमा बचाई, लेकिन सवाल बाकी है — कितने ऐसे केस हैं जो कोर्ट तक नहीं पहुँच पाते? और कितनी बार ED जैसी एजेंसियों को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है?

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ED की कार्यवाही न सिर्फ बुरी नीयत वाली थी, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता पर सीधा हमला थी। यह नियमानुसार एक आर्थिक फैसला था, कोई अपराध नहीं था। पुलिस और ईडी का पूरा मामला कानून का घोर दुरुपयोग था, जिसे कोर्ट ने रद्द कर दिया।

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यह फैसला सिर्फ न्यूज़क्लिक की जीत नहीं, बल्कि असहमति के अधिकार की जीत है।

केशव कुमार भट्टड़12 जून 2026