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चुनाव आयोग के आंकड़ों में स्पष्ट: अधिक मतदान करने के बावजूद निर्वाचित प्रतिनिधियों में पिछड़ी महिलाएं

केशव कुमार भट्टड़•11 मई 20264 मिनट पठन44 बार पढ़ा गया
पश्चिम बंगाल की 293 सदस्यीय विधानसभा में महिला विधायक 37 हैं, जो 12.62 प्रतिशत है। तमिलनाडु की 234 सदस्यीय विधानसभा में निर्वाचित महिला विधायकों की संख्या मात्र 23 है, यानी 9.83 प्रतिशत।केरल में स्थिति और भी खराब है—140 सदस्यीय विधानसभा में केवल 11 महिला विधायक निर्वाचित हुई हैं। अर्थात, महिलाएं मतदान में जितनी आगे हैं, सत्ता के ढांचे में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी उतना ही सीमित है।
चुनाव आयोग के आंकड़ों में स्पष्ट: अधिक मतदान करने के बावजूद निर्वाचित प्रतिनिधियों में पिछड़ी महिलाएं

चुनाव आयोग के आंकड़ों में स्पष्ट

अधिक मतदान  करने के बावजूद निर्वाचित प्रतिनिधियों में पिछड़ी महिलाएं

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निजी प्रतिनिधि: नई दिल्ली, 10 मई- हाल के विधानसभा चुनावों में एक बार फिर यह देखा गया कि देश के आम लोगों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया में 

भाग लेने का उत्साह अभी भी प्रबल है। चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुदुचेरी में 

भारी संख्या में लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया। विशेष रूप से महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकांश राज्यों में महिला मतदाताओं की भागीदारी 

पुरुषों की तुलना में अधिक रही।लेकिन इसके साथ ही एक और वास्तविकता भी सामने आई है—मतदान में महिलाओं की भारी उपस्थिति के 

बावजूद, निर्वाचित प्रतिनिधियों में उनकी संख्या अभी भी बहुत कम है।

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पश्चिम बंगाल में इस बार मतदान की उच्चतम दर रिकॉर्ड की गई है। गणना पूरी हुई 293 सीटों पर कुल मतदान 93.71 प्रतिशत रहा। 

6.81 करोड़ से अधिक मतदाताओं में से 6.38 करोड़ से अधिक लोगों ने वोट दिया। महिला मतदाताओं की भागीदारी 93.8 प्रतिशत थी, 

जबकि पुरुष मतदाताओं की उपस्थिति 92.06 प्रतिशत रही। हालांकि, फलता निर्वाचन क्षेत्र में पुनर्मतदान होने के कारण उस केंद्र के 

आंकड़े अभी इस डेटा में शामिल नहीं किए गए हैं।

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तमिलनाडु में भी मतदान की दर उल्लेखनीय थी। वहां 5.74 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 4.8 करोड़ वोट पड़े। कुल मतदान दर 85.01 

प्रतिशत रही। महिला मतदाताओं की भागीदारी 86.2 प्रतिशत थी, जो पुरुषों के 83.77 प्रतिशत की तुलना में स्पष्ट रूप से अधिक है। यही 

स्थिति असम में भी रही। वहां अंतिम मतदान दर 85.74 प्रतिशत रही। राज्य में 2.15 करोड़ से अधिक वोट पड़े। महिला मतदाताओं की 

उपस्थिति 86.53 प्रतिशत थी और पुरुषों की 84.95 प्रतिशत।

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केरल में भी महिला मतदाताओं की भागीदारी पुरुषों से आगे निकल गई। राज्य में कुल मतदान दर 78.11 प्रतिशत रही। महिला मतदाताओं 

की भागीदारी 81.17 प्रतिशत थी, जबकि पुरुषों की मतदान दर 74.9 प्रतिशत रही। पुदुचेरी में भी यही रुझान देखा गया। वहां कुल मतदान 

दर 89.82 प्रतिशत रही और महिला मतदाताओं की भागीदारी 91.39 प्रतिशत तक पहुंच गई।

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ये आंकड़े महज संख्या नहीं हैं। इनके माध्यम से यह स्पष्ट हो गया है कि देश का महिला समाज तेजी से राजनीतिक प्रक्रिया में अधिक सक्रिय 

रूप से जुड़ रहा हैं। संसदीय लोकतंत्र में अपनी राय व्यक्त करने के मामले में वे पहले की तुलना में कहीं अधिक जागरूक और संगठित हैं। 

लेकिन इसके विपरीत, राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों के चयन के मामले में महिलाओं के प्रति अनिच्छा अभी भी स्पष्ट है।

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तमिलनाडु की 234 सदस्यीय विधानसभा में निर्वाचित महिला विधायकों की संख्या मात्र 23 है, यानी 9.83 प्रतिशत। पश्चिम बंगाल की 293

 सदस्यीय विधानसभा में महिला विधायक 37 हैं, जो 12.62 प्रतिशत है। केरल में स्थिति और भी खराब है—140 सदस्यीय विधानसभा में 

केवल 11 महिला विधायक निर्वाचित हुई हैं। अर्थात, महिलाएं मतदान में जितनी आगे हैं, सत्ता के ढांचे में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी 

उतना ही सीमित है।

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तीसरे लिंग (थर्ड जेंडर) के प्रतिनिधित्व के मामले में भी तस्वीर अत्यंत निराशाजनक है। तमिलनाडु और केरल से केवल दो थर्ड जेंडर 

उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था। दोनों हार गए और उनकी जमानत जब्त हो गई। यानी, राजनीतिक व्यवस्था का तथाकथित 'समावेशी' 

चरित्र वास्तव में अभी भी हाशिए के लोगों के लिए नहीं खुल पाया है।

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चुनावी व्यवस्था का व्यापक बुनियादी ढांचा भी इस चुनाव में स्पष्ट हुआ। पश्चिम बंगाल में सर्वाधिक 85,092 मतदान केंद्र बनाए गए 

थे। तमिलनाडु में 75,064 और असम में 31,490 मतदान केंद्र थे। मतदाताओं की भारी संख्या को चुनावी प्रक्रिया के दायरे में लाने 

के लिए इस ढांचे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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उम्मीदवारों की संख्या के लिहाज से तमिलनाडु सबसे अधिक प्रतिस्पर्धी राज्य था। 234 केंद्रों पर कुल 4,023 उम्मीदवारों ने चुनाव 

लड़ा। यानी प्रति निर्वाचन क्षेत्र औसतन 17 उम्मीदवार। एक निर्वाचन क्षेत्र में तो अधिकतम 79 उम्मीदवार तक थे। पश्चिम बंगाल में 

293 सीटों पर 2,920 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा। बड़े राज्यों में केरल में उम्मीदवारों की संख्या 

सबसे कम थी, जहाँ 140 सीटों पर 883 उम्मीदवार थे।

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नोटा (NOTA) वोट की दर भी तुलनात्मक रूप से कम रही। तमिलनाडु में कुल वोटों का केवल 0.4 प्रतिशत नोटा पड़ा। 

असम में यह दर सर्वाधिक 1.23 प्रतिशत थी। पश्चिम बंगाल में नोटा वोट 0.78 प्रतिशत, पुदुचेरी में 0.77 प्रतिशत और 

केरल में 0.57 प्रतिशत पड़े।

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। साभार। 

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चुनाव आयोग के आंकड़ों में स्पष्ट: अधिक मतदान करने के बावजूद निर्वाचित प्रतिनिधियों में पिछड़ी महिलाएं

प्रकाशित: 11 मई 2026 • 4 मिनट पठन

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