जन समाचार मंच



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साहित्य और संस्कृति जगत से जुड़े लोगों ने अपनी श्रद्धा ज्ञापित की।
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शुरुआत: कॉलेज में अध्यापन के साथ-साथ, उन्होंने सत्तर के दशक में अविभाजित 24 परगना जिले में लोक कलाकार शाखा के माध्यम से अपने सांस्कृतिक सफर की शुरुआत की। दिवंगत तरुण गुप्त अविभाजित 24 परगना जिले के सह-सचिव थे।
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नेतृत्व: 1985 में पुरुलिया के 8वें राज्य सम्मेलन में वे राज्य समिति के सदस्य चुने गए। इसके बाद 1989 के बालुरघाट सम्मेलन में उन्हें राज्य सचिव मंडल का सदस्य बनाया गया।
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मार्गदर्शक: 2017 में कोलकाता के मोहित मैत्र मंच पर आयोजित 17वें राज्य सम्मेलन में, उन्होंने युवा पीढ़ी को आगे बढ़ाने की मिसाल पेश करते हुए स्वेच्छा से राज्य समिति छोड़ दी। तब से अपने अंतिम समय तक वे राज्य सलाहकार मंडल के सदस्य के रूप में मार्गदर्शन देते रहे।
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एक बहुमुखी व्यक्तित्वतरूण गुप्त (1944-2026)। केवल एक कुशल संगठक ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन अभिनेता और गायक भी थे। संगठन को मजबूत आधार देने में उनकी भूमिका अग्रणी रही। कई नाट्य दलों और सांस्कृतिक संस्थाओं के साथ उनके गहरे जुड़ाव ने जन नाट्य आंदोलन (People's Theatre Movement) को विस्तार देने में महत्वपूर्ण सहायता की।
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हम उनकी पत्नी गीताली दी, पुत्र सायन और उनके पूरे परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करते हैं।
साथ ही, उनके संघर्ष के सभी साथियों के प्रति भी हम अपनी गहरी सहानुभूति प्रकट करते हैं जिनके साथ उनकी स्मृतियों का एक लंबा सिलसिला जुड़ा है। उनका जाना वर्तमान सांस्कृतिक आंदोलन के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
भारतीय गण नाट्य संघ, पश्चिम बंगाल स्वर्गीय तरूण गुप्त के योगदान को हमेशा याद रखेगा।
'वाम की आवाज' और हम सब तरुण गुप्त के परिजनों और इप्टा परिवार के सदस्यों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करते हैं।
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तरूण गुप्त अमर रहें।
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अपलोडर: VKA-FD9RRG • प्रकाशित: 12 मई 2026 • 3 मिनट पठन

पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का साहित्य और सिनेमा के प्रति गहरा और ऐतिहासिक योगदान रहा है। उन्होंने ऋत्विक घटक के दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेज को सहेजकर प्रकाशित करवाया तथा 'रूपकला केंद्र' जैसी संस्था के माध्यम से युवाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण दिलाया। जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों का उत्साहवर्धन करने से लेकर कोलकाता फिल्म फेस्टिवल में विश्वस्तरीय सिनेमा को बढ़ावा देने तक, वे सदैव तत्पर रहे। राजनीति की व्यस्तताओं के बीच भी कला, विचारों और आम जनता की रुचि को बेहतर बनाने के प्रति उनका यह समर्पण अतुलनीय था। सौम्य राजनीतिक व्यक्तित्व के धनी बुद्धदेव भट्टाचार्य के आम जनता की रुचियों को समृद्ध करने के लिए सदैव तत्पर रहने वाले एक सचेतन पहलू को याद कर रहें हैं प्रो. संजय मुखोपाध्याय। पढ़ें मूल बांग्ला देशहितैषी (06.09.2024) में छपे आलेख ''आम जनता की पसंद और सोच को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था' का हिन्दी अनुवाद।
28 अगस्त 2026

फिल्म 'चिटगाँव’ चमत्कृत करती है| मास्टर दा सूर्य सेन की भूमिका में एकमात्र मनोज वाजपई को छोड़कर कोई भी ‘स्टार’ अभिनेता या अभिनेत्री इस फिल्म में नहीं है| फिल्म में ‘झुंकु ’, सुबोध रॉय के बचपन का नाम, की भूमिका में दिलजाद हवाले ने सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया है| एक बुझी-बुझी-सी आँखों वाला किशोर जिसकी दोनों आँखों में दुनिया भर का अबोध-आश्चर्य भरा है – उन्ही आँखों से वह समाज को बदलने का सपना देखता है| किशोरी क्रांतिकारी प्रीतिलता की भूमिका में वेगा तमोटिया ने प्रभावित किया| कोई व्यावसायिक मसाला, लटके झटके भी नहीं है| फिल्म में कैमरे का काम और संगीत का व्यवहार खूब ही जोरदार तरीके से लिया गया है| दर्शक के हिसाब से यह फिल्म हिंदी फिल्म जगत में मील का पत्थर है| इस तरह की शुद्ध देश-प्रेम से भरपूर संपूर्ण अंतिम फिल्म कौन सी थी, कब देखी, याद नहीं| सामाजिक दायित्व-बोध न होने पर ऐसी फ़िल्में बनाना असंभव है|
27 अगस्त 2026

सुबोध राय (झुंकु राय) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे युवा क्रांतिकारियों में से एक थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्होंने मास्टरदा सूर्यसेन के नेतृत्व में 1930 के चटगांव शस्त्रागार छापे और जलालाबाद युद्ध में वीरतापूर्वक भाग लिया। कम उम्र में सेलुलर जेल (काला पानी) की कठिन सजा काटने के बाद भी उनका राष्ट्रप्रेम डिगा नहीं। आजादी के बाद उन्होंने पेंशन या अन्य सरकारी सुविधाएं लेने से इनकार कर सादगीपूर्ण जीवन बिताया। उनका निष्कलंक और त्यागमय जीवन भावी पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा। चटगांव आंदोलन पर बनी बॉलीवुड फिल्म 'Chittagong' (2012) की कहानी मुख्य रूप से युवा झुंकु राय (सुबोध राय) के जीवन और उनके दृष्टिकोण पर ही आधारित है।
26 अगस्त 2026

केशव कुमार भट्टड़ • 13 अप्रैल 2026
श्रेया जायसवाल • 22 मई 2026

प्रश्न पूछना ही नागरिक का धर्म है- भारत का लोकतंत्र आज एक संधिकाल से गुजर रहा है। यदि सूचनाओं को छिपाकर जनता के जनादेश को बदलने का प्रयास किया जाता है, तो यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होगा।
श्रेया जायसवाल • 19 अप्रैल 2026
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