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संसदीय इतिहास का वो 'मौन' अध्याय: जब मोहम्मद सलीम की चुनौती पर लोकसभा में दो मिनट का सन्नाटा छा गया था

केशव कुमार भट्टड़•19 मई 20267 मिनट पठन97 बार पढ़ा गया
प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलासा: पश्चिम बंगाल माकपा के सचिव और पूर्व सांसद मोहम्मद सलीम ने मुजफ्फर अहमद भवन (राज्य सचिवालय) में एक सवाल के जवाब में संसद का एक बेहद दिलचस्प ऐतिहासिक संस्मरण साझा किया। उन्होंने बताया कि उनके स्कूली दिनों में बिना किसी राजनीतिक विवाद के 'वंदे मातरम' और 'जन गण मन' सहित कई देशभक्ति गीत गाए जाते थे, जिससे बच्चों में सच्चे मूल्यबोध का निर्माण होता था। उन्होंने बताया कि वंदे मातरम के पहले दो पदों को लेकर हुए विवाद पर 80 के दशक में वामपंथी नेता सरोज मुखर्जी ने एक ऐतिहासिक बुकलेट लिखी थी, जो मुजफ्फर अहमद भवन की लाइब्रेरी में आज भी सुरक्षित है। उन्होंने वर्तमान के उन नेताओं पर निशाना साधा जो साधारण बांग्ला का शपथ-पत्र भी अटक-अटक कर पढ़ते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग वंदे मातरम के कठिन संस्कृतनिष्ठ शब्दों को देख कर भी नहीं पढ़ सकते। 2000 के दशक में जब भाजपा ने वंदे मातरम पर राजनीति शुरू की, तो सांसद रहते हुए मोहम्मद सलीम ने लोकसभा में चुनौती दी थी कि भाजपा का कोई एक सदस्य इसे गाकर सुना दे तो वे इस्तीफा दे देंगे। नतीजा यह हुआ कि पूरी संसद में दो मिनट तक सन्नाटा पसर गया था और कोई भाजपा सदस्य खड़ा नहीं हुआ, जिसे अगले दिन 'टाइम्स ऑफ इंडिया' ने प्रमुखता से छापा था।

संसदीय इतिहास का वो 'मौन' अध्याय: 

जब मोहम्मद सलीम की चुनौती पर लोकसभा में दो मिनट का सन्नाटा छा गया था 

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कोलकाता: राजनीति में 'राष्ट्रवाद' एक ऐसा वाद्य यंत्र है जिसे हर पार्टी अपने-अपने हिसाब से बजाती है। लेकिन जब इस वाद्य यंत्र के सुरों की असली परीक्षा ली जाए, तो कभी-कभी बड़े-बड़े उस्ताद भी 'मौन व्रत' धारण कर लेते हैं। ऐसा ही एक बेहद दिलचस्प और ऐतिहासिक संस्मरण 17 मई को कोलकाता के मुजफ्फर अहमद भवन (माकपा राज्य कार्यालय) में देखने-सुनने को मिला। अवसर था एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का, जहाँ पश्चिम बंगाल माकपा के सचिव और पूर्व सांसद मोहम्मद सलीम पत्रकारों के  सवालों का जवाब दे रहे थे। वंदेमातरम् से जुड़े एक सवाल पर सलीम ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में अतीत का वो पन्ना खोला, जिसने वर्तमान राजनीति के खोखलेपन पर गहरा और चुटीला तंज कस दिया।

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प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए मोहम्मद सलीम। 17 मई 2026 | मुजफ्फर अहमद भवन (सचिवालय,कोलकाता,पश्चिम बंगाल)

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1 . प्राइमरी स्कूल की प्रार्थना: जहाँ देशभक्ति और जीवन मूल्य का निर्माण होता था।

आजकल राष्ट्रभक्ति सिखाने के लिए बकायदा कोरस और व्हॉट्सएप यूनिवर्सिटी की कक्षाएं चलती हैं, लेकिन मोहम्मद सलीम ने याद दिलाया कि उनके ज़माने में ऐसा नहीं था। अपने बचपन को याद करते हुए उन्होंने कहा:

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"जब मैं प्राइमरी और हाई स्कूल में पढ़ता था, तब पश्चिम बंगाल में कभी कांग्रेस की सरकार थी तो कभी संयुक्त मोर्चा (यूनाइटेड फ्रंट) की। उस समय सुबह स्कूल की प्रार्थना सभा में जाकर हम सब खड़े होते थे। कोई दबाव नहीं था, उसे हम सहज भाव से 'प्रार्थना' कहते थे।"

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मोहम्मद सलीम ने बताया कि उन दिनों स्कूलों में देशभक्ति का कोई एक तय 'एजेंडा' नहीं था। दिन के हिसाब से स्वतंत्रता आंदोलन के समय के अलग-अलग गीत गाए जाते थे। कभी 'जन गण मन' होता* , तो कभी 'वंदे मातरम' । कभी द्विजेंद्रलाल राय का प्रसिद्ध गीत 'धनधान्य पुष्पे भरा आमादेर एइ बसुन्धरा' गूँजता, तो कभी 'ए देश आमार ए देश'।

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असम की मौजूदा हिमंत बिस्वा शर्मा सरकार की राजनीति पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि उस दौर में स्कूलों में 'आमार सोनार बांग्ला, आमी तोमाय भालोबासी'* भी गाया जाता था। ये सारे समूह गान बच्चों को इसलिए सिखाए जाते थे ताकि बचपन से ही उनके भीतर देश और देश के लोगों के प्रति कुछ वास्तविक नैतिक मूल्य (Values) और मूल्यबोध विकसित हो सके—जैसा कि दुनिया के हर सभ्य देश में होता है। तब देशभक्ति सीखी जाती थी, थोपी नहीं जाती थी।

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2 . सौ साल पुरानी बहस और सरोज मुखर्जी की वो 'पुस्तिका'

वंदेमातरम को लेकर मचे समकालीन हंगामे पर गहरा तंज कसते हुए मोहम्मद सलीम ने इतिहास का चश्मा उतारा और वर्तमान पीढ़ी को थमा दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वंदे मातरम के पहले दो पदों को हमारे देश के संविधान ने 'राष्ट्रीय गीत' (National Song) के रूप में स्वीकार किया है। लेकिन यह सहमति रातों-रात नहीं बनी थी।

. 

इस मुद्दे पर आज से 100 साल पहले कांग्रेस के अधिवेशनों में और फिर संविधान सभा (Constituent Assembly) में लंबी और गंभीर बहसें हो चुकी हैं। इस पर दस्तावेज़ों के अंबार लगे हैं। मोहम्मद सलीम ने मुजफ्फर अहमद भवन की लाइब्रेरी की तरफ इशारा करते हुए कहा:

. 

"80  के दशक में, जब भाजपा नई-नई बनी थी और तृणमूल कांग्रेस का तो जन्म भी नहीं हुआ था, तब  वामपंथी नेता सरोज मुखर्जी ने इस वंदे मातरम विवाद पर एक बेहद प्रामाणिक बुकलेट (पुस्तिका) लिखी थी। वह इस लाइब्रेरी में आज भी मौजूद है, कोई भी लाकर पढ़ सकता है। उस समय राष्ट्रीय स्तर पर बहस के बाद ही यह तय हुआ था कि इसके शुरुआती दो पद पूरी तरह देशात्मबोधक (देशभक्ति से ओत-प्रोत) हैं, इसलिए इन्हें स्वीकार करने में कोई असुविधा या आपत्ति नहीं होनी चाहिए।"

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3 . "जो सरल बांग्ला नहीं पढ़ सकते, वो संस्कृतनिष्ठ वंदेमातरम क्या खाक गाएँगे!"

बातचीत का सबसे चुटीला और पैना हिस्सा तब आया जब मोहम्मद सलीम ने वर्तमान जनप्रतिनिधियों की भाषाई योग्यता और उनके 'छद्म राष्ट्रवाद' को एक ही तराजू पर तौल दिया। उन्होंने बेहद आक्रामक और हास्यपूर्ण लहजे में कहा कि आज के कई नेताओं की राष्ट्रभक्ति सिर्फ नारों तक सीमित है।

. 

"आज जो विधायक  और सांसद एक सीधी-सरल बांग्ला में लिखा हुआ शपथ-पत्र तक ठीक से नहीं पढ़ पाते, जहाँ कोई  संयुक्त अक्षर आते ही गाड़ी थम जाती है और वे अटकने लगते हैं; वहाँ मैं चुनौती दे सकता हूँ कि वंदे मातरम में जो 'तत्सम' और क्लिष्ट संस्कृत शब्द हैं, उन्हें तो वे देखकर भी नहीं पढ़ पाएँगे—बिना देखे ज़ुबानी गाना तो बहुत दूर की बात है!"

. 

4 . जब लोकसभा में हुआ 'टू मिनट साइलेंस' का चमत्कार

अपनी बात को प्रामाणिक साबित करने के लिए मोहम्मद सलीम ने इस सदी की शुरुआत (2000 के दशक) का एक ऐसा ऐतिहासिक संस्मरण सुनाया, जिसे सुनकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में हंसी की लहर उठ गई। 

. 

यह उस समय की बात है जब मोहम्मद सलीम कोलकाता उत्तर-पूर्व सीट से सांसद थे और वामपंथी दल केंद्र की यू पी ए (UPA) सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे थे। उस समय विपक्ष में बैठी भाजपा के विजय मल्होत्रा (जो अब राजनीति से नेपथ्य में जा चुके हैं या दिवंगत हो चुके हैं) ने संसद में वंदे मातरम को अनिवार्य करने का मुद्दा उछाला था। तत्कालीन स्पीकर शिवराज पाटिल ने एक व्यावहारिक रास्ता निकाला और प्रस्ताव पारित किया कि संसद के हर सत्र की शुरुआत 'जन गण मन' (राष्ट्रगान) से होगी और समापन 'वंदे मातरम' (राष्ट्रीय गीत) से होगा। इसमें किसी को आपत्ति नहीं थी।

. 

लेकिन राजनीति तो राजनीति है, भाजपा और उसके तत्कालीन सहयोगी दल तृणमूल कांग्रेस (ममता बनर्जी उस समय एनडीए का हिस्सा थीं, हालांकि सलीम के अनुसार वे अक्सर सदन से नदारद रहती थीं) इस पर सियासत चमकाने से बाज नहीं आ रहे थे। शून्य काल (Zero Hour) के दौरान सदन में भारी हंगामा चल रहा था। तत्कालीन स्पीकर सोमनाथ चटर्जी कुर्सी पर विराजमान थे।

. 

मोहम्मद सलीम ने कहा कि मैं अपने बारे में सार्वजनिक रूप से नहीं बोलता हूँ लेकिन उस समय मैंने खड़े होकर चुनौती दी । तब सलीम ने सदन में गरजते हुए कहा था :

. 

"मैं आज सदन में खड़े होकर खुली चुनौती देता हूँ। यदि एनडीए या भाजपा का कोई भी एक सदस्य खड़ा होकर 'वंदेमातरम' का सिर्फ एक पद (Stanza) सही-सही गाकर सुना दे, तो मैं इसी वक्त संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दूँगा! और अगर वे नहीं गा सकते, तो उनके बदले मैं खुद इसके दो पद गाकर सुनाऊँगा, क्योंकि मैंने इसे बचपन में स्कूल की प्रार्थना में सीखा है और वो अभ्यास जीवन भर याद रहता है। अब भाजपा वाले बताएं कि उनके खेमे से कौन इस्तीफा दे रहा है?"

. 

इस अनोखी चुनौती का जो परिणाम हुआ, उसने अगले दिन इतिहास बना दिया। मोहम्मद सलीम ने मुस्कुराते हुए बताया कि अगले दिन देश के प्रतिष्ठित अखबार 'टाइम्स ऑफ इंडिया' ने अपने पहले पन्ने पर मुख्य सुर्खी (Headlines) छापी थी: "टू मिनट साइलेंस अब्जर्व्ड इन लोकसभा" (लोकसभा में दो मिनट का मौन रखा गया)।

. 

मोहम्मद सलीम ने तंज कसते हुए कहा कि वह दो मिनट का मौन किसी शोक या दुख के कारण नहीं था। स्पीकर ने पूरे दो मिनट का समय दिया था, लेकिन राष्ट्रवाद का सबसे ऊँचा झंडा उठाने वाली भाजपा के किसी भी सदस्य में यह साहस नहीं हुआ कि वह अपनी सीट से खड़ा हो और 'वंदे मातरम' की चार पंक्तियां गाकर अपनी साख बचा सके।

. 

बात का निहितार्थ 
मुजफ्फर अहमद भवन में अपने दिए जबाब से मोहम्मद सलीम ने यह साफ कर दिया कि राजनीति में 'प्रतीकों' की लड़ाई लड़ना बहुत आसान है, लेकिन जब बात 'सामर्थ्य' और 'ज्ञान' पर आती है, तो खोखले नारे बेअसर हो जाते हैं। मोहम्मद सलीम ने वर्तमान नेताओं को आईना दिखाया है कि देशभक्ति चिल्लाने में नहीं, बल्कि बचपन से सीखे गए उन मूल्यों में होती है जो जीवन भर इंसान के व्यवहार और कण्ठ में रचे-बसे रहते हैं। बाकी, जो सरल बांग्ला का संयुक्त अक्षर देखकर काँप जाते हैं, उनके लिए वंदेमातरम वाकई 'दूर की कौड़ी' है!

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संसदीय इतिहास का वो 'मौन' अध्याय: जब मोहम्मद सलीम की चुनौती पर लोकसभा में दो मिनट का सन्नाटा छा गया था

प्रकाशित: 19 मई 2026 • 7 मिनट पठन

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